शनिवार, 28 नवंबर 2020

उखाड़ दिया

 

"उखाड़ दिया"



बचपन मे जब कभी हम बच्चों का आपस मे झगड़ा हो जाता था तो तमाम वाद-विवाद के बीच जब हमारा पक्ष कमजोर पड़ जाता था तो भाग कर अपने बड़े भाई को बुला अपना रौब झाड़ते थे। छोटी-मोटी गली गलौज के बाद जब विवाद चरम पर होता तो अपना पक्ष मजबूत देख एक डायलोग प्रायः बोला जाता "जो उखाड़ना है उखाड़ लो"। इस वाक्य की भाषा को बड़ा ही निर्लज्ज और ओछा माना जाता था। बाद मे कॉलेज स्तर पर आये तो अपने बचपन की उन बातों को याद कर दोषी और  हीन भावना से ग्रसित महसूस करता रहा। इस निम्न स्तरीय भाषा को जब कुछ दिन पूर्व 10 सित॰ 2020 को इस वाक्य को जब शिवसेना के बड़े नेता संजय राऊत से सुना  तो बचपन के वे विस्मृत  बाते स्वतः ही स्मृति मे आ गई। घोर आश्चर्य और दुःख तो तब हुआ इस वाक्य को उन्होने अपने राष्ट्रीय समाचार पत्र सामना मे मुख्य पृष्ठ पर मोटे-मोटे शीर्षक मे  "उखाड़ दिया" लिख छापा भी, जिसमे वे मुख्य संपादक भी है। उक्त शीर्षक जिस संदर्भ मे छापा गया वो तो और भी शर्मनाक था। "उखाड़ दिया" जैसा  महान कृत उन्होने अपने बल, पौरुष और मर्दानगी पूर्ण  कार्य का प्रदर्शन अभिनेत्री कंगना राऊत के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे पर की गई टिप्पड़ी के विरुद्ध उसके बंगले को गैर कानूनी तरीके से बर्बरता पूर्वक तोड़ कर किया। बृहन्न  मुंबई नगर निगम ने अपनी संवैधानिक शक्तियों का दुर्पयोग कर अपने आकाओं की संतुष्टि हेतु इस निरंकुश तानाशाही पूर्ण कृत को अंजाम दे इस पराक्रम को कार्यान्वित किया।

उक्त शर्मनाक क्रत की आलोचना उस समय भी पूरे देश मे हुई थी। क्या एक प्रदेश के प्रथम नागरिक मुख्यमंत्री पर  अगर कोई अदना व्यक्ति कोई टिप्पड़ी करे तो क्या उस अदने व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही वो भी अवैधनिक  कार्यवाही ने क्या प्रदेश के मुख्यमंत्री के यश कीर्ति मे चार चाँद लगाये? क्या श्री उद्धव ठाकरे के गौरव-गाँ  मे  देश-प्रदेश या आम जनों के बीच कोई बढ़ोतरी हुई? हमे नहीं लगता कि एक मुख्यमंत्री पदासीन व्यक्ति के पद  प्रतिष्ठा एक अदनी अभिनेत्री के सामने पासिंग के बराबर भी हो? जैसा कि कहावत है "कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली"। इसके विपरीत बीएमसी के अधिकारियों और संजय राऊत जैसे चाटुकारों ने अवैध तरीके से कंगना के बंगले को तोड़ कर श्री ऊद्धव ठाकरे एवं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शान मे बट्टा ही लगाया है। जो आज बॉम्बे हाई  कोर्ट के निर्णय से साफ हो गया। जैसा कि आज  28 नव॰ 2020 के समाचार पत्रों मे खबर है कि माननीय न्यायालय ने बीएमसी द्वारा  कंगना के बंगले मे तोड़-फोड़ पर फटकार लगाई एवं मुआवजा भी देने को कहा।

क्या सामना पत्र मे मोटी-मोटी हैड लाइन मे "उखाड़ दिया" लिख अपने को कृत्य-कृत्य मानने वाले संजय राऊत जी "आंखो मे पानी या चुल्लू..." को तो छोड़िए क्या अपने किये पर उक्त शीर्षक के दशवे आकार के शब्दों को सामना मे प्रकाशित कर खेद प्रकट करेंगे??

एक साधारण नागरिक के नाते एक  सलाह माननीय मुख्यमंत्री श्री ऊद्धव ठाकरे जी को भी कि बड़े ही पुण्य कर्मों, ईश्वरीय आशीर्वाद, पूर्वजों के स्नेह एवं बड़े भाग्य से विरले लोगो को ही  मुख्यमंत्री जैसा उत्तरदायित्व प्राप्त होते है। कृपया चाटुकारों को दूर रख प्रदेश के गरीब, असहाय, वंचित, दबे-कुचले परिवारों के लाभार्थ नीतियाँ और कार्यक्रम बनायें ताकि उनके नीरस जीवन मे कुछ खुशियाँ आ सके। नौजवानों के लाभार्थ रोजगार का सृजन करें। आपके दल पर लगे क्षेत्रीयतावाद के ठप्पे को मिटाने एवं आपसी सद्भाव बढ़ाने हेतु कार्य करे अन्यथा फ़क़त मुख्यमंत्री बनने की ही अभिलाषा थी तो वो तो पूरी हो ही गई।    

विजय सहगल


2 टिप्‍पणियां:

विजय सहगल ने कहा…

Very nice sir aapki lekhni bahot hi lajwab or prernadayak h👌👌 by unknown person on whatsapp

शंकर भट्टाचार्य ने कहा…

सहगल साहब, क्या खूब लिखा है आपने! पूरे देशवासियों को यह मालूम था कि न्याय कंगना के पक्ष में ही जाएगा। बचा कुचा जो कसर था वह भी पूर्ण हो गया। अब भी अगर ठाकरे जी ना समझे तो कुछ और नहीं कह सकते।
भाषा में आप का दखल बहुत अच्छा है।
पढ़ने में बहुत अच्छा लगा।
नमस्कार।
शंकर भट्टाचार्य, ग्वालियर।