"ग्राम-मरोड़"
कुछ स्थान पर्यटन या तीर्थाटन की द्रष्टि से
राष्ट्रीय स्तर पर बेशक प्रसिद्ध न हों पर ऐसे स्थानों का महत्व स्थानीय स्तर के पर्यटन और तीर्थाटन पर काफी होता है। मरोड़ ग्राम
मे सिद्ध बाबा एवं बड़ी माता मंदिर एवं आशा माई मंदिर बुंदेलखंड क्षेत्र मे बहुत
प्रसिद्ध एवं काफी जाना पहचाना स्थान है। मरोड़ ग्राम यूं तो जिला टीकमगढ़ (दूरी
लगभग 100 किमी) मध्य प्रदेश मे स्थित है पर भौगोलिक दृष्टि से यह झाँसी (उत्तर प्रदेश)
से मात्र 20-21 किमी दूर राष्ट्रीय
राजमार्ग 43 पर स्थित है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अति
प्रसिद्ध पर्यटन स्थल एवं बुंदेलखंड की धार्मिक आस्था के केंद्र रामराजा मंदिर,
ओरछा भी यहाँ से मात्र 14 किमी है। मुख्य राष्ट्रीय
राजमार्ग संख्या 43 से 7-8 किमी दूर उक्त
तीनों क्षेत्र स्थानीय आम लोगो मे काफी श्रद्धा और सम्मान रखते है।
26 ओक्टूबर 2020 को दशहरे पर्व पर मेरा
कार्यक्रम अपने भतीजे संचित कंचन के साथ मरोड़ ग्राम के पहाड़ पर स्थित सिद्ध बाबा
एवं बड़ी माता पर जाने का बना। बचपन मे कभी झाँसी से लगभग 20 किमी॰ दूर ग्राम मडोर
मे शादी मे जाना हुआ था लेकिन इन तीनों स्थान पर जाना न हो पाया था। तब संचित ने
मुझे ग्राम मडोर के इन तीनों स्थान पर घुमा लाने का प्रस्ताव किया तो मना करना
संभव न था। वो पहले भी कई बार इन स्थानों
पर जा चुका था।
आजकल एक ओर जहां राष्ट्रीय राजमार्ग पर सफर
सुगम और सुविधा जनक है पर दुर्भाग्य से प्रायः शहरों की वस्ती से राष्ट्रीय राजमार्ग तक पहुँचने के मार्गों की
दशा अति दयनीय है। ऐसी ही हालत झाँसी शहर से सदर,
हंसारी होते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग 43 तक पहुँचने के मार्ग की हालत भी बहुत खराब
थी। जगह जगह धूल धूसरित माहौल प्रदूषण के चरमस्तर की चेतावनी देता नज़र आया। निर्माण
कार्य के चलते पूरे पहुँच मार्ग पर कवि स्व॰ गोपाल दास "नीरज" जी की
कविता "कारवां गुजर गया, गुबार देखते
रहे"........ रह रह कर याद आती रही।
मरोड़ ग्राम आबादी की दृष्टि से काफी छोटा
ग्राम है जहां का मुख्य कार्य खेती बाड़ी है। गाँव के एक किनारे स्थित पहाड़ पर
सिद्ध बाबा का मंदिर स्थित है जिसका मार्ग गाँव के मध्य से होकर जाता है। कभी ये मार्ग सिर्फ पैदल
जाने वालों के लिए था लेकिन आज सीमेंट टाइल्स से बना पक्का मार्ग बन गया है जिस पर
मोटरसाइकल एवं कार भी पहुँच सकती है। दोपहर के ग्यारह बज चुके थे ऊबड़ खाबड़ संपर्क
मार्ग पर चलने के कारण हालत कुछ ढीली हो गई थी। पर पहाड़ पर पहुँच कर मन को काफी
सुखद और आनंद देने वाला था। पहाड़ पर एक सुंदर साधारण लेकिन प्रभावशाली शांति देने
वाला निर्माण देख अति हर्ष हुआ। मंदिर मे श्री राम लखन सीता की भव्य नयनभिराम
प्रतिमाएँ मन को मोहने वाली थी। 72-73 वर्षीय मंदिर के मुख्य सेवक मंदिर प्रांगढ़
मे ही निवास करते है, गौशाला एवं पहाड़
पर स्थित कुआं से उक्त सिद्ध क्षेत्र को आत्मनिर्भर होने मे सहयोग करता है। वर्षात
के पानी का संरक्षण की विशेष व्यवस्था भी की गई पर इन सबसे बढ़ कर दोपहर मे पधारे
दर्शनार्थयीओं को शुद्ध, सात्विक भोजन भी
निशुल्क उपलब्ध कराना स्वामी जी के सद्व्यवस्था का प्रशंसनीय कार्य है। दोपहर तक
भूंख की छुदा शांत करने मे इस प्रसाद रूपी भोजन ने अपना महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
मंदिर के बाद एक माता मंदिर तक की छोटी,
साहसिक एवं रोमांच देने वाली पैदल यात्रा यादगार थी। पहाड़ पर डेढ़ सौ-दो सौ कदम नीच पहाड़ के किनारे पर पर प्राकृतिक पहाड़
की दो शिलाओं के बीच की एक दरार कौतूहल को बढाने बाली थी। जब संचित द्वारा बताया
गया कि इन शिलाओं की बमुश्किल एक फुट से भी कम दरार के मध्य से निकल लोग परिक्रमा
को पूरा करते है ये सुन कर तो उसने हमारी जिज्ञासा और उत्सुकता को और भी बढ़ा दिया।
मैंने जब आगे बढ़ शिला की दरार के प्रवेश द्वार तक जाने का रास्ता देखा जो डराने
वाला था। ऊंचे नीचे पत्थरों के बीच पहुँच मार्ग काफी संकरा और ऊबड़-खाबड़ था। थोड़ी
सी भी चूंक आपको सैकड़ो फुट नीचे पहाड़ की तलहटी मे गिराने को काफी थी। एक बारगी तो
परिक्रमा की सोचने पर भी सिहरन होने लगी। लेकिन ऊंची बड़ी शिलाओं के प्रवेश द्वार
तक जाने के रोमांच और साहस से वंचित न होने की चाह ने हमे धीरे-धीरे प्रवेश द्वार
तक पहुँचने की हिम्मत दी और मै धीरे धीरे कदम बढ़ाता चला गया। परिक्रमा करने का कोई
इरादा नहीं था। पर संचित ने पहल करते हुए दरार मे प्रवेश किया और एक एक कदम बढ़ाते
हुए शिलाओं की दरार को पार कर गया। संचित के
द्वारा परिक्रमा पार करने के बावजूद अपनी हृष्ट-पुष्ट काया और बढ़े हुए उदर
को देख परिक्रमा करना की सोच भी सिहरन पैदा कर रही थी। संचित द्वारा बार बार
उत्साह और हिम्मत बढ़ाने के भाव एवं प्रेरणा कदम बढ़ाने को मजबूर तो कर रहीं थी,
लेकिन मन मे आ रही शंकाओं-कुशंकायेँ भी
परिक्रमा के इरादे से पीछे हटने को बाध्य कर रही थी। चिंता ये थी कहीं पेट के कारण
बीच रास्ते मे फंस गये तो ठांड़े-बैठे मुसीबत मोल लेने वाली स्थिति न हो जाये?
लेकिन संचित के प्रोत्साहन ने अंततः कदम बढ़ा
ही दिये। अपनी साँसों को शांत और नियंत्रित कर एक एक कदम बढ़ाया। पेट को हल्का सा भीतर
कर आगे बढ़े। दरार के प्रवेश करते ही शर्ट और शर्ट के बटन पूरी तरह पत्थर की शिलाओं
के बीच घिसट रहे थे। दरार के बीच रास्ते मे एक पतला 8-10 इंच ऊंचा पत्थर अवरोध के रूप मे था जिसे भी कदम को ऊंचा
उठा पार किया। आधे रास्ते तक तो चिंता और शंकाओं के बीच दम साधे एक एक कदम बढ़ता रहा।
आधे रास्ते के पार हिम्मत और उत्साह कुछ बढ़ गया था जिसने इस लगभग 12-15 फुट लंबी दरार को पार करने मे ऊर्जा
का संचार कर पार करने मे सहयोग किया तो लगा कि इस साहसिक और रोमांच की छोटी लेकिन
डरावनी यात्रा को सफलतापूर्वक फतह कर एवरेस्ट चोटी पर विजय प्राप्त कर ली हो!!
शिला के बाहर ही बने छोटे चबूतरे पर बैठ पहाड़ के नीचे के दृश्यों के दर्शन लाभ लेते
हुए लगभग एक घंटे बैठ विश्राम के बाद बापस
हम लोग सिद्ध बाबा के मुख्य द्वार पर रखी बुलेट पर सवार हो पहाड़ के नीचे उतरे।
पहाड़ के दूसरी ओर घाटी मे बने प्राचीन आशमाई
मंदिर मे कच्चे रास्ते से हो कर पहुंचे। जहां पर दशहरे पर्व पर ग्रामीण जनों
द्वारा रामायण का अखंड पाठ का वाचन चल रहा था। भंडारे मे भोजन करने के ग्रामीण जनों
के आग्रह को पहले ही सिद्ध बाबा पर भोजन ग्रहण
करने के कारण सविनय स्वीकार न करने का अफसोस रहा। मंदिर मे आशा माई के दर्शन पश्चात कुछ समय
रामचरित मानस के पाठन मे सहभागी होने का पुण्य ग्रहण कर इस पवित्र स्थान की
तीर्थाटन का पुण्य लाभ प्राप्त कर अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान किया।
इस यात्रा मे धर्म लाभ के साथ साथ शिलाओं की
दरार के बीच परिक्रमा के साहस, रोमांच और
कौतूहल ने इस यात्रा को मन के मानस पटल पर एक यादगार यात्रा के रूप मे अमिट छाप
छोड़ी।
नोट- सम्मानीय पाठकों से निवेदन-: यध्यपि
मै यात्रा वृतांत मे खुद की सेलफ़ी फोटो लगाने
से बचता हूँ पर यहाँ यात्रा के रोमांच के यथार्थ को दर्शाते एक-दो सेल्फी फोटो को सहन
करने का कष्ट करें।
विजय सहगल










कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें