"स्व॰ श्री
सतीश चंद्र सेठ"
(विनम्र श्रद्धांजलि)
मंजिल पर पहुँचना भी, खड़े रहना भी।
बहुत
मुश्किल है बड़े होकर भी, बड़े रहना
भी॥
किसी शायर की ये खूबसूरत पंक्तियाँ हर उस
सफल व्यक्ति की बुनियाद है जो किसी संकल्प को सेवा भावना से निस्वार्थ और समर्पित
भाव से पूरा करने मे जी जान से जुटे रहते है। ऐसे ही एक सच्चे कर्मयोगी मौराँवा के
पूर्व तालुकेदार परिवार मे जन्मे श्री सतीश चंद्र सेठ से मेरा परिचय 1980 मे लखनऊ
मे हुआ जो समाज सेवा मे अनासक्त भाव से रत
थे। वे एक सामाजिक पत्रिका "खत्री
हितैषी" के दशकों तक एक छोटे
संपर्क सूत्र मात्र थे लेकिन पर्दे के पीछे
उन्होने पत्रिका के सफल प्रकाशन का श्रेय सदा ही समाज के अपने सम्मानीय
अग्रजों और समाज सेवकों को दिया। बैसे
पत्रिका मे कोई ऐसी विशेषता न थी जैसी अन्य प्रचलित साहित्यिक,
राजनैतिक, समाचार एवं व्यापारिक
पत्रिकाओं मे होती है। पत्रिका
का मुख्य आकर्षण खत्री समाज मे अपने पुत्र/पुत्रियों के वैवाहिक संबंध हेतु वर/वधू
की तलाश मे चिंतातुर संरक्षकों को योग्य बालक/बालिकाओं की सूचना उपलब्ध कराना था। आज
की तरह समाचार पत्रों मे मेट्रीमोनियल का चलन भी उन दिनों न था और ऐसे समय विवाह योग्य युवक युवतियों की सूचनाओं का पत्रिका मे प्रकाशन की शुरुआत करना उस समाज की
उन्नतशील और प्रगतशील सोच को दर्शाता है।
यूं तो पत्रिका 1936 से लगातार प्रकाशित उक्त
पत्रिका का प्रचार वेशक सीमित संख्या मे था पर देश के प्रायः प्रत्येक शहर मे पत्रिका का प्रसार था जहां खत्री जाति के लोग थोड़े
या बहुतायत मे निवासरत थे। 1936 से 70-80 के दशक तक जब सूचना संपर्क के साधन बहुत
ही सीमित थे। दूरभाष और दूरसंचार उतना विस्तारित नहीं हुआ था। ऐसे समय वैवाहिक
संबंधों के लिये योग्य वर-बधू की तलाश हर
जाति मे एक कठिन पर अति महत्वपूर्ण कार्य होता था। ऐसे समय खत्री जाति के समाज
सेवकों और बौद्धजीवियों द्वारा पत्रिका का
प्रकाशन शुरू करना उनकी विकासशील सोच और दूरदृष्टि को जाता है। सौभाग्य से अक्टूबर
1949 एवं 1962 के अंक जिन्हे श्री सतीश सेठ और मैंने तालबेहट प्रवास के दौरान
1985 मे स्व॰ श्री दयाली बट्टा जी के परिवार से प्राप्त किया था के चित्र संलग्न है। सोचिए
70 वर्ष पूर्व इस पत्रिका मे जिन विवाह योग्य बालक बालिकाओं की सूचना प्रकाशित
हुई होगी उनके संरक्षकों, माता पिताओं की सोच
कितनी आधुनिक और प्रगतिशील रही होगी।
सामाजिक कार्यों को निष्पादन एवं प्रदर्शन
मे आर्थिक पहलू हमेशा ही एक चुनौती पूर्ण
कार्य रहा है, खत्री हितैषी के अक्टूबर
1949 के अंक मे तत्कालीन संपादक श्री लक्ष्मी नारायण टंडन,
प्रेमी जी ने अपने संपादकीय मे दर्द व्याँ किया है। ऐसे तमाम कठिनाइयों के बीच 1970-80
के दशक से 2004-05 तक के चार दशकों तक "खत्री हितैषी" के
निर्वाध प्रसारण प्रकाशन किसी साधारण व्यक्ति के बूते की बात नहीं थी,
ऐसा भागीरथी प्रयास समाज के महमानव श्री सतीश चंद सेठ जैसे समाज सेवी के बूते की
ही बात थी। जिन्होने लगभग चार दशक तक समाज के विवाह योग्य बालक बालिकाओं की सूचना
मासिक पत्रिका "खत्री हितैषी" मे लगातार निशुल्क प्रकाशित कर एक बहुत बड़े सामाजिक उत्तरदायित्व
को पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ अनासक्त
भाव से निष्पादित किया। हमे अच्छी तरह याद है पत्रिका के आर्थिक पक्ष को मजबूत
करने के लिये श्री सेठ जी छोटे बड़े शहरों के भ्रमण मे सामाजिक सदस्यों से संपर्क
कर उन शहरों के व्यापारी वर्ग से विज्ञापन प्राप्त कर "एक पंथ दो काज" को
चरितार्थ करते।
मैंने उक्त पत्रिका के बारे मे सुन तो रक्खा
था पर प्रबंधन के किसी भी व्यक्ति से मेरा परिचय न था। 1980 मे लखनऊ मे बैंक सेवा काल मे डाक टिकिट संग्रह के शौक के
कारण लखनऊ जीपीओ के बाहर एक पोस्टर पर पत्रिका द्वारा सामाजिक कार्यक्रम की सूचना
के आधार पर मेरी मुलाक़ात कार्यक्रम मे श्री सतीश सेठ जी से हुई थी। सामान्य
शिष्टाचार और भेंट के बाद उनसे मेरी अनौपचारिक मुलाक़ात उनके निवास राणा प्रताप
मार्ग पर स्थित उनके निवास पर हुई जो मेरे कार्यालय नवल किशोर रोड,
हज़रत गंज से नजदीक ही था। लखनऊ के प्रवास के दौरान 1984 तक मेरा प्रायः उनसे मिलना
जुलना निरंतर जारी रहा।
सेठ जी से मुलाक़ात के पूर्व तक मेरे दिल मे
पत्रिका के प्रकाशन हेतु किसी बड़े कार्यालय और उसमे कार्यरत अनेक कर्मचारियों के
कार्य करने की परिकल्पना थी। प्रकाशन
संस्थान की तरह अलग अलग विभाग आदि के
चित्रों की छवि मेरे अंतश्चेतना पटल पर थी जैसे डाक प्राप्ति विभाग,
रचनाओं के प्रूफ बनाने और प्रूफ रीडिंग विभाग,
हिसाब किताब के लिये अकाउंट, प्रकाशन विभाग
और डिस्पैच सेक्शन आदि। लेकिन उनके आवास कम कार्यालय पर उनसे हुई मुलाक़ात के दौरान
मै देख के हैरान था कि उनकी एक छोटी सी टेबल ही उनकी मासिक पत्रिका का कार्यालय था।
वे ही डाक प्राप्ति कर्मचारी से लेकर प्रेषण विभाग के इनचार्ज थे। गहराई से परिचय
उपरांत जानकर मै हतप्रभ था पत्रिका जरूर चौक मे स्थित प्रेस मे छपती थी पर पत्रिका
की प्रूफ रीडिंग वे स्वयं ही करते थे। पत्रिका के सदस्यों का रख रखाव एवं पत्राचार,
मौद्रिक लेखा जोखा,
वार्षिक एवं आजीवन सदस्यों का रजिस्टर,
विवाह योग्य बालक/बालिकाओं की सूची,
अन्य सामाजिक गतिविधियों के समाचार,
रचनाओं, बैंक का हिसाब किताब
आदि वे खुद ही देखते थे। सबसे बड़ा कार्य हर
माह पत्रिका को प्रेस से ला कर सदस्यों का नाम पता अपने हाथों से लिख कर पुनः समस्त
प्रतियों पर डाक टिकिट चिपका कर चौक स्थित पोस्ट ऑफिस मे साईकिल पर लाद कर डिस्पैच
हेतु ले जाना कोई साधारण कार्य न था। एक
ही व्यक्ति द्वारा उक्त सारे कार्य करना श्री सतीश सेठ जैसे व्यक्तित्व के बूते की बात थी और कोई ये
एक अंक के प्रकाशन या एक माह की बात नहीं थी निरंतर लगभग तीन दशक से अधिक तक
अहर्निश पत्रिका का प्रकाशन कर समाज सेवा करना किसी जाति भूषण का ही कार्य हो सकता था। उन्होने विवाह
योग्य बालक/बालिकाओं की अधिक से अधिक सूचना एकत्रित करने हेतु अनेकों छोटे-बड़े शहरों
मे सक्रिय समाज सेवी अवैतनिक संवाददाताओं
की नियुक्ति कर उन लोगों का सकारात्मक सहयोग लिया। समाज के अनेक प्रबुद्ध सदस्यों
के साथ कुछ वर्ष संवाददाता होने का सौभाग्य मुझे भी मिला था। उनका व्यक्तित्व एक चलता फिरता सूचना केंद्र था
जो समाज की सारी गतिविधियों पर नज़र रख समाज सेवा मे निरंतर रत थे। उनके इस समर्पण
और निष्ठा के कारण जब तक मै लखनऊ प्रवास पर रहा मुझ से जो थोड़ा बहुत बन पड़ा किया। मैंने पत्रिका के प्रेषण पूर्व सदस्यों का नाम
पता लिखने का कार्य कर सहयोग किया। कभी कभी प्रूफ रीडिंग का भी कार्य कर मैंने पत्रिका
हेतु किया। मुझे लिखते हुए कोई झिझक और संकोञ्च नहीं कि पत्रिका मे तमाम पदधारियों
के नाम व अलंकरण छापे जाते रहे पर कदाचित
ही किसी को मैंने उनके पत्रिका प्रकाशन के कार्य मे सहभागी होते अपने लखनऊ प्रवास
के दौरान देखा।
श्री सतीश
सेठ जी से मिलने स्थानीय एवं लखनऊ से बाहर के अनेकों लोग लड़के लड़कियों के
वैवाहिक रिश्तों के सिलसिले मे उनसे मिलने आते थे। सेठ जी के इस परम पुनीत सामाजिक
कार्य की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है लेकिन उनके इस समाज सेवा के कार्य को
सफलता पूर्वक सम्पादन कर परणती तक पहुँचाने मे अदरणीय भाभी के सहयोग और अतिथि
सत्कार के विना कदापि संभव न था। जहां सेठ जी अपने सेवाभावि जुनून के कारण पत्रिका
के प्रकाशन मे समर्पित थे वही आदरणीय भाभी जी ने सच्ची जीवन संगनी का दायित्व निभा
कर घर परिवार और बच्चों का उत्तरदायित्व पूरी ज़िम्मेदारी के साथ निभाया। उनका यह
सहयोग भी पत्रिका के प्रकाशन की सफलता मे एक बहुत बड़ा आधारभूत योगदान की तरह स्मरण
किया जाएगा।
आज के इस सूचना तकनीकि काल मे आज की पीढ़ी
वेशक उनके योगदान को महसूस न कर सके लेकिन इक्कीश्वी सदी के पूर्व के सामाजिक लोग उनके सहयोग को भुला न पायेंगे। वे हजारों हज़ार संरक्षक
जिनके पुत्र/पौत्रियों के सफल वैवाहिक संबंध खत्री हितैषी पत्रिका के माध्यम से
हुए उन्हे याद किये बिना न रहेंगे।
10 नवम्बर 2020 को
उनके देहावसान का अत्यंत दुःखद समाचार
प्राप्त हुआ, सहसा विश्वास नहीं हुआ। अभी पिछले जून
2019 को उनसे उनके लखनऊ
स्थित आवास पर मुलाक़ात हुई थी। ऐसा नहीं लगता था कि अदरणीय सेठ
साहब का इतनी जल्दी इस तरह
विछुड़ना होगा। उनका निधन मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है। मेरा बहुत लंबा और निकटस्थ
संबंध उनसे रहा। "खत्री हितैषी" पत्रिका के माध्यम
से समाजिक दायित्वों के प्रति पूरी तरह समर्पित ऐसी निष्ठा मैंने किसी मे नहीं
देखी। उनके दुःखद निधन की जानकर वेहद दुःख और वेदना हुई। ईश्वर से
प्रार्थना है उनको अपने श्री चरणों मे स्थान दे। अदरणीय भाभी जी एवं पूरे सेठ
परिवार को इस अपूर्णीय क्षति को
सहन करने की शक्ति दे। स्व॰ श्री सतीश चंद सेठ जी को हम अश्रुपूरित
हार्दिक एवं भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते है।
विजय सहगल







2 टिप्पणियां:
स्व॰ श्री सेठ जी के परिवार को हम अश्रुपूरित भावभीनी श्रद्धांजलि आपने माध्यम से अर्पित करते है।
सहगल जी सेठ जी के विषय में विस्तार से जानकारी देने के लिए साधुवाद । खत्री हितैषी पत्रिका निरंतर अपने उद्देश्य को पूर्ण करने में संलग्न है । स्वर्गीय सतीश चन्द्र सेठ जी को भावभीनी श्रद्धांजली ।
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