"बुंदेलखंडी कवितायें"
नोट- ये बुंदेलखंडी लघु कवितायें मुझे बचपन मे "केशर बऊ" ने सुनाई थी कुछ याद रही कुछ स्मृतियों से विस्मृत हो गई। इन पंकियों के लेखक वो स्वयं थी या कोई और मै दावे के साथ नहीं कह सकता। पर इन छोटे बच्चों की "रायिम्स" को पूरे बुंदेलखंड मे खूब सुना और सुनाया जाता था। लुप्त प्रयाह इन कविताओं को संकलन करने का प्रयास है इसमे अन्य परिजन भी अपना योगदान अपनी बुद्धि विवेक की ऊर्जा से स्मरण कर कर सकते है।
(1)
मेरे लंबे लंबे सेओ।
जिसकी गरज पड़े तो लेयों॥
पैसा थाली मे रख देओ।
बर्ना तान दुपट्टा सो॥
(2)
पंचकुइयों पै लगा बाज़ार।
मालिन बैठी है दो चार॥
लै लो, लै लो मेरे यार।
ये तो चंपकली का हार॥
(3)
गोली जैनियों ने खाई।
जाकर दुकान खूब चलाई॥
बेंचे जीरों,धनिया राई।
जिसमे नफा चौगनी पाई॥
(4) "सर्दी"
वारेन से बोले नईं,
ज्वान हमारे भाई।
बूढैन को छोड़े नईं,
चाहे ओढ़े दस रज़ाई॥
विजय सहगल

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