शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

रात दीवाली, दिया जलाना

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"रात दीवाली दिया जलाना "



अब कोई रावण न लांघे,
लक्ष्मण रेखा की हद से।
जीते जी न आ पायेगा,
दुश्मन देश की सरहद पे॥
मां को तो मालूम यही है,
खतरों से लड़ना सीखा है।
बचपन मे थे संगी साथी,
पर मुकाबला अब तीखा है।
उसको बस ये बतला देना,
भागा नही, न पीठ दिखाई।
मार के दस, दुश्मन के तब,
लगी गोलियां सीने खाई॥
सोते मे उठ जाती होगी,
थोड़ी सी भी आहट से।
उनको आशा थी, मै करता,
सेवा, बिना थकावट के॥

प्रातः उठ, पूंछे जब बच्चे,
दूर गये कह, टहला देना।
चन्द्र खिलौने हम लाएँगे,
दिखा चाँद को बहला देना॥
"शाला" से बापस जब आयें,
"सीख" सदा हो आगे बढ़ना।
पापा जल्दी ही आयेँगे,
काम उन्हे बहुतेरे करना॥
हों निडर, साहसी दोनों,
डिगे नहीं बाधाओं से।
हर संकट से लड़ना सीखें,
सेना के योद्धाओं से॥

कुछ दिन सखा, सनेही, स्वजन,
बिसरे दिन की याद करेंगे।
हो कृतज्ञ मन, ऋणी सभी का,
सब मिल के संताप हरेंगे॥
घने अंधेरे मे सीमा पर,
"रोशन दिये" याद आयेंगे।
घर, आँगन औ कुटुम कबीला,
दिल ही दिल मे तड़पायेंगे॥
रात सुनहरी सपनों मे तुम,
"दुल्हन रूप" सजा, फिर आना।
अपने घर की दहलीज़ पर,
रात दीवाली, एक दिया जलाना॥
दरबाजे पर खड़ी न रहना,
राह मिलन की मकसद से।
अगर कंही मैं आ न पाऊं
देश की खातिर सरहद से॥

विजय सहगल 

1 टिप्पणी:

P.c.saxena ने कहा…

दीपावली के पावन पर्व को सीमा पर तैनात सैनिकों से जोड़कर आपने अच्छा संदेश दिया है