"मुरली मनोहर
मंदिर, झाँसी"
प्रातः स्मरणीय वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई
की कर्म भूमि होने का गौरव पर हर झाँसी वासी के लिये अनेक सौभाग्य से भी बढ़ कर है।
स्वतन्त्रता के प्रथम आंदोलन मे रानी लक्ष्मी बाई की वीरता और निडरता पर विश्व
सहित देश के हर भारत वासी को उन पर गर्व
करना स्वाभाविक है तब झाँसी वासियों को तो एक अलग अतिरिक्त गर्व की अनभूति मे कहीं
कोई संशय नहीं। मै भी उन चंद सौभाग्यशालियों मे एक हूँ जिसे इस पवित्र धरती पर
जन्म लेने का सौभाग्य मिला। मै अपने को और भी गौरव शाली समझता हूँ कि मेरा पैतृक
निवास उस पूज्यनीय धार्मिक स्थल से चंद कदमों की दूरी पर है जहां महारानी लक्ष्मी
बाई अपनी माँ तुल्य सास के साथ नित्य अपने
महल अर्थात "रानी महल" से
दर्शन हेतु इस पवित्र मंदिर मे आती थी। जी हाँ,
मै बात कर रहा हूँ शहर स्थित "मुरली मनोहर मंदिर",
झाँसी का जो हमारी पैतृक निवास के सामने चंद कदम दूर स्थित है। मुझे ध्यान है कि
महाराष्ट्र समाज के पुराने लोग इस मंदिर को "आई सा" का मंदिर के भी नाम
से पुकारते थे। कहा जाता है इस मंदिर का निर्माण 1780 मे रानी लक्ष्मी बाई की सास
अर्थात झाँसी के तत्कालीन महाराजा गंगाधर राव की माँ श्रीमती सक्कू बाई ने बनवाया
था। इस मंदिर का देश और दुनियाँ के लिये
धार्मिक के साथ इतिहासिक महत्व भी रहा है। ऐसा बताते है कि ये दुनियाँ का एक मात्र ऐसा नयनभिराम मंदिर है
जहां भगवान श्री कृष्ण, रुक्मणी और राधा
रानी की भव्य स्वरूपों के दर्शन एक साथ होते
है। इस मंदिर से मेरा प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जुड़ाव उम्र के हर पड़ाव अर्थात मेरा
बचपन, किशोर एवं युवा मे रहा। सेवा काल मे प्रायः
बाहर रहने के कारण एवं अन्य शहर मे स्थापना के कारण मंदिर से अब संपर्क न रहा। पर पिछले दिनों 23 ओक्टूबर 2020 को
अपने झाँसी प्रवास पर मैंने अपने बचपन के उन सुखद स्वर्णिम पलों को मंदिर मे एकांत
शांतचित हो मंदिर के मुख्य आँगन मे बैठ ईश्वर से एकाकार होने का अनुभव प्राप्त (चित्र3) किया।
बचपन से ही मेरी मित्र मंडली के सदस्यों को मंदिर
एक आकर्षण का केंद्र रहा है। आज के मंदिर
के मुख्य पुजारी श्री लक्ष्मण कृष्ण गोलवलकर उर्फ लच्छू महाराज भी हमारे बाल सखाओं
मे एक थे। काले सफ़ेद वर्गाकार संगमरमर के पत्थरों से सुसाज्जित फर्श का मुख्य मंडप
हमारी बाल मंडली की सर्वप्रिय क्रीडा स्थलि रही थी। बारह गोल मेहराब के
द्वारों से घिरे इस संगमरमरी आँगन के
चारों तरफ बने बरामदे हमारी मित्र मंडली की "आइस-पाइस" अर्थात आज की
छुपन-छुपाई के सर्वथा अनुकूल थे। मुख्य आँगन के बायीं तरफ बनी दो कोठरियाँ हम
बच्चों मे अदृश्य भूतह डर और कौतूहल का विषय रहती थी। कभी कभी उन कोठरियों मे भी
छुपते थे पर उन के बारे मे ये कहा जाता था कि उनमे से एक कोठरी का रास्ता जमीन के
नीचे-नीचे रानी महल तक जाता है। उक्त रास्ते का उपयोग रानी लक्ष्मीबाई आपात काल मे
करती थी। मुख्य मंदिर मंडप के एक ओर पंडित जी का निवास और दूसरी तरफ गौशाला से हो
कर पीछे बने मंदिर के कुएं की जगत और आसपास का बगीचा खेल के प्रतिभागियों को छुपने
के एकदम अनकूल थे। कुएं की जगत पर पानी खींचने की आम घिर्री से अलग बड़ी लोहे की बड़ी
चरखी जिस पर रस्सी स्वतः ही लपट जाती मेरे आकर्षण का हमेशा मुख्य केंद्र रही थी
जिसे आइस-पाइस के बहाने देखता और निहारता था। छुक-छुक दानी-बड़े घर जानी,
कोढ़ा पे-धाम छाई, छुपन-छुपाई या छुअन छुआई खेल की मित्र मंडली के
हेमचन्द पटेल, दिलीप,
शरद, चप्पे के कैलाश,
चुन्नु, मुझसे बड़े भाई प्रदीप,
उमेश, राजेश आदि मंडली के सदस्य थे। अब एक मित्र स्व॰ शरद कंचन को
छोड़ सभी वरिष्ठ नागरिकों की श्रेणी मे आ चुके है या आने के नजदीक है। कभी कभी बच्चों
के शोर सुनकर तत्कालीन पुजारी जी श्री कृष्णा महाराज या श्री विष्णु महाराज छुप कर
किसी सदस्य को पकड़ लेते तो अन्य सारे सदस्य तुरंत ही गायब हो मंदिर के बाहर भागते।
कभी कभी एक-दो चपत भी लग जाती। मित्र मंडली मे एक आम धारणा बन गई थी कि कृष्णा
महाराज बच्चों के प्रति कुछ नरम रहते थे पर छोटे महाराज कुछ कड़क स्वभाव के थे। आज इन
दोनों स्वर्गीय आत्माओं को हार्दिक नमन कर स्मरण करते है।
किशोरवय मे आते तक मंदिर मे प्रत्येक मंगल
को होने वाले रामचरित मानस के "सुंदर कांड" का सस्वर वाचन,
पठन-पाठन ने आकर्षित किया जिसका सिलसिला
कई वर्षों निरंतर चलता रहा। उन दिनों मंदिर मे सांस्कृति और संगीत की गुरु
शिष्य परंपरा भी सुंदर कांड के माध्यम से सीखी और सिखायी जाती रही जिसे हम जैसे
किशोर अपने बड़ों से सीखे रामचरित मानस के
सस्वर गायन को स्वतः ही सीख गये थे। रामचरित
मानस के प्रति अनुराग एवं सस्वर गायन वाचन आज भी कायम है। मंगल के अलावा आरती के
पश्चात दो-ढाई घंटे हारमोनियम, ढोलक और तबले की
संगत मे धर्म प्रेमी एवं स्थानीय भजन गायक नित्य अपनी प्रस्तुति देते। इन
कार्यक्रमों मे बिना किसी भेदभाव हर जाति,
वर्ग और क्षेत्र के लोग शामिल होते थे। सवर्ण-निवर्ण का कोई भेद कतई कभी न रहा। सावन
मे कृष्णा अष्टमी पर तो मंदिर खचा-खच भरा रहता। जब कृष्णा महाराज अपनी पारंपरिक
महराष्ट्रियन भेष-भूषा मे मध्य रात्रि पर्यंत तक कृष्ण जन्मोत्सव की कहानी सुनाते।
इस मंदिर एवं नगर के अन्य मंदिरों मे कृष्ण जन्मोत्सव के आयोजन से शहर मे पूरी रात
चहल-पहल रहती थी।
सावन के महीनों मे सप्ताहपर्यन्त चलने वाले
शास्त्रीय संगीत और गायन मे अन्य शहरों के नामी गिरामी कलाकार शामिल होने आते जिनको
सुनने शहर के संगीत प्रेमी देर रात तक मंदिर के आयोजन मे शामिल हो श्रवण मनन करते।
आयोजन की महत्वपूर्ण बात ये रहती की आयोजन मे पधारे कलाकार इस हेतु कोई परिश्रमिक
नहीं लेते थे और पंडित जी के निवास मे बनी दालन मे जमीन पर ही रात्री विश्राम आदि
करते रहते, ठहरते थे।
मंदिर सहित पूरे शहर मे गणेश उत्सव मे
बुंदेलखंड का परंपरागत लोक नृत्य "चाचार" का आयोजन हर सड़क-चौराहों पर
आयोजित होता। नगढ़ियाँ की थाप से पैदा होने बाले जोशीले संगीत की धुन पर बांस की
दो डंडियों को दोनों हाथों मे ले प्रतिभागी एक गोल घेरे मे नृत्य करते। हर सहभागी
अपने दोनों ओर के प्रतिभागी के साथ चाचर
को ज़ोर से टकराता। उस टकराहट से उत्पन्न युद्धोन्माद की धुन पर चाचार लोक नृत्य
किसी युद्ध से कम नज़र न आता। लेकिन क्या
मजाल कि एक भी चाचर की चोट किसी भी शामिल कलाकार के हाथों को लहूलुहान करे। नृत्य
की तीव्र गति तो देखते ही बनती। दर्शक लोग भी नगड़ियों से उत्पन्न जोश से अछूते
नहीं रहते। लेकिन इस लोक नृत्य को बगैर सीखे करना इक़दम असंभव था। हमे एवं मित्र
मंडली के तमाम सदस्यों को इस लोक नृत्य "चाचर" को सीखने का सौभाग्य स्व॰
सीताराम अग्रवाल उर्फ चौधरी जी के सौजन्य
से प्राप्त हुआ जिनका कपड़े की दुकान का व्यवसाय हमारे घर के सामने ही था। इस
बुंदेलखंडी लोक नृत्य को बढ़ावा देने,
सीखने सिखाने मे हर जाति, वर्ग के मण्डल
बने थे जिनकी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा गणेश विसर्जन वाले दिन होती। सारी रात नगाड़ियों
की आवाज दूर दूर तक सुनी जाती थी। नगड़ियों के उस्तादों को इनाम-इकराम दे उनके उत्साह
को बढ़ाया जाता था। इस हेतु उनके लय और धुन को चाचर के उस्ताद लगे रहते थे। आज जब
देश के हर प्रांत, क्षेत्र और परंपरा के
संगीत और नृत्य को बढ़ावा दिया जा रहा है
लेकिन अफसोस बुंदेलखंड क्षेत्र के राजनैतिज्ञों और नीतिनियंताओं द्वारा बुंदेलखंड
के इस लोक संगीत और नृत्य के संरक्षण न देने के कारण अब चाचर लुप्तप्राय हो देखने और सुनने को नहीं मिलती। विभिन जतियों के
हमारी वय के बहुतायत लोग जो इस कला और नृत्य मे पारंगत है,
इसे जानने वाले है यदि सारे लोग मिलकर आगे
आ इस लोक नृत्य को संरक्षित हेतु प्रयास
करे तो इस बुंदेलखंडी लोक संगीत/नृत्य 'चाचर'
को लुप्त होने से बचाया जा सकता है।
मंदिर की आरती के समय झालर (ठोस पीतल धातु
मे ढली गोल आकृति) जिसे लकड़ी से टकराकर एक विशेष आवाज उत्पन्न होती है। (चित्र मे लाल
घेरे मे दिखाया गया) इस झालर को दो लोग चार झालरों को विशेष क्रमवद्ध तरीके से बजाते जिसेसे एक विशेष
लयवद्ध सुरीला संगीत उत्पन्न होता था। मुझे भी मंदिर की आरती के समय झालर को बजाने
मे सहभागी होने का महीनों सौभाग्य मिला। आरती के पूर्व मुख्य प्रांगण के दोनों ओर
लगभग 3 फुट ऊंचे दो स्टूल आँगन की छत्त पर स्थिर लटकी झालर के नीचे लगा दिये जाते।
जिन पर चढ़ कर दोनों ओर के झालर बजाने बाले खड़े हो जाते। जब लकड़ी
की मूठ के प्रहार से एक ओर खड़ा व्यक्ति हाथ की झालर को बजाता तो दूसरा व्यक्ति ठीक
उसी समय छत्त पर लटकी झालर पर लकड़ी की मूठ से प्रहार कर झालर बजाता। इसी तरह श्रंखला वद्ध लय से जब पहला व्यक्ति उपर
की झालर को बजाये तो दूसरा व्यक्ति नीचे हाथ की झालर को बजाता। इस लय मे पूरी आरती
के लगभग पंद्रह-बीस मिनिट के दौरान जो
कर्णप्रिय ताल और लयवद्ध संगीत उत्पन्न होता उसकी मधुरता की कल्पना ही की जा सकती
है।
रात्रि
के दस बजे शयन आरती के बाद श्रीनिंबार्क संप्रदाय के श्री परमानंद जी
महाराज द्वारा रचित वंदना मुझे हमेशा
प्रिय लगती थी। उन दिनों इस वंदना का गायन एस॰पी॰आई॰ कॉलेज
के उपप्राचार्य श्री बालचंद खत्री करते थे। जो विशेषतः वंदना के समय खत्रियाने
स्थित घर से मंदिर आते थे। श्री खत्री जी वंदना को पूरी तन्मयता और स्वर लय के साथ
गाते थे। वंदना मुश्किल से पाँच-छः मिनिट की होती थी पर उपस्थित लोगो को भाव विभोर
कर देती थी। उस वंदना की लाईन मुझे अब भी
याद है:-
धन
धन राधिका के चरन, भजमन राधिका के
चरन।
सुभग
शीतल अतिसे कोमल कमल के से वरन॥
नख
चंद्रिका अनूप राजत विविध शोभा वरन।
कुन्नित
नूपुर कुंज विहरत परम कौतुक करन॥
नन्द
सुत मन मोद कारी, विरह सागर तरन।
दास
परमानंद छिन-छिन श्याम जाकी शरन॥
धन
धन राधिका के चरन....................................
इस
सुंदर वंदना के पश्चात उपस्थित दर्शनार्थियों को प्रसाद वितरण के बाद मंदिर
धर्मावलम्बियों के लिए बंद कर दिया जाता था। मुझे भले ही आज चार दशक से भी अधिक
हुए मंदिर के उन नित्य प्रति के कार्यक्रमों मे शामिल होने से वंचित रहा पर उन बीते
दिनों की यादें मन के अंतश्चेतना पटल पर आज भी सुस्पष्ट और ताज़ा है।
विजय
सहगल




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