मंगलवार, 30 जून 2020

जीवन हारा.....


"जीवन हारा....."



दिवस गये बीते महीने,
वर्षों ने गाया गीत नया॥
जीवन हारा विधि जीत गया॥

राजतिलक की थी तैयारी।
हर्षित प्रजा अवधपुर सारी॥
कोप भवन वर, दो सुध आये।
कनक धाम हा! शोक बढ़ाये॥
दिवा स्वपन ऐक क्षण टूटा।
सच हारा, जीता हठ झूठा॥
मिट गई  हाथों  की रेखायें।
भूपति भरत, राम वन जायें॥
मनन मंथरा पुनीत भया।
जीवन हारा विधि जीत गया॥

मस्तक रेखा पथ बतलाता।
भाग्य विधाता  इठलाता॥
लिखे थे महले दुमहले जिनके।
भटके वन-वन सपने तिनके॥
कहाँ मुदित मंगल थे सपने।
हुए कुटिल कंटक पथ अपने॥
कब सावन बीता, शीत नया।
जीवन हारा विधि जीत गया॥

मखमल के नरम बिछौने थे।
सेवक हर क्षण हर कौने थे॥
कानों मे कुण्डल की शोभा।
जनक नंदनी ने मन मोहा॥
वो राजमहल महारानी थी।
पर नियति को कहाँ सुहानी थी॥
घर एक वचन से रीत गया।
जीवन हारा विधि जीत गया॥

उस राज्य के वो युवराजे थे।
श्री राम, अनुज दुलारे थे॥
दोनों "वर" से वो बंधे न थे।
सब के साधे वो सधे न थे॥
राम सिया संग सहचर थे।
अनुज राम दृढ़ अनुचर थे॥
बन भ्रात प्रेम का गीत नया।
जीवन हारा विधि जीत गया॥

उर्मिल   राजभवन  रहती।
स्वामी विरह, वियोग सहती॥
महलों मे था जिसका आवास।
वह श्राप बिना भोगी वनवास॥
वह पति प्रेम की दासी थी।
पर पानी मे मीन प्यासी थी।
उसका तप महलों भीत गया।
जीवन हारा विधि जीत गया॥

अग्रज राम  बने,  वनवासी।
अधिपति भरत अयोध्या शासी॥
राज्याभिषेक,  राज सिंहासन।
रामचरण पद, "नीति" शासन॥
पलक पांवड़े थी  मातायेँ।
नैन गिरे अविरल धारायेँ॥
मंत्र कैकई फलीत भया।
जीवन हारा विधि जीत गया॥

विजय सहगल


शुक्रवार, 26 जून 2020

आत्मघात के निहितार्थ


"आत्मघात के निहितार्थ"




अभी पिछले दिनों सुशांत सिंह नामक अभिनेता द्वारा  आत्महत्या का समाचार, द्रश्य एवं प्रिंट मीडिया मे सुर्खियों मे छाया रहा। यध्यपि  फिल्मों और छोटे पर्दे के कार्यक्रमों मे अधिक दिलचस्वी न होने के कारण उस अभिनेता और उसके  अभिनय के संदर्भ मे हमे बहुत ज्यादा जानकारी नहीं है।  लेकिन सामान्य ज्ञान के नाते उनके एक  सामान्य परिवार की  पृष्ठभूमि से उठ चकाचौंध से परिपूर्ण अभिनय के क्षेत्र मे अपने आप को स्थापित करने के "संघर्ष" से भलीभाँति परिचित हूँ। दिग्गज पारिवारिक और आपराधिक चरित्र  के वर्चस्व वाले इस फिल्मी उद्योग मे बल और वैभवशाली लोगो की चुनौती को तोड़ एक मध्यम वर्गीय युवा का  इस मायावी दुनियाँ मे अपने आप को स्थापित करना एक बहुत बड़ी चुनौती को ललकारने के समान ही था। जैसा की समाचार माध्यमों, सामाजिक माध्यमों से सूचना मिल रही है इस  तथाकथित चका चौंध भरी, ठाट-बाट बाली, छद्म चमक-दमक एवं चमकीली  दुनियाँ मे पहले से सुस्थापित तमाशाई  परिवारों के सुकुमारियों, सुकुमारों, फिल्मी सितारों एवं आपराधिक डॉनों से सामंजस्य न बैठा पाने के कारण इस युवा अभिनेता ने अपने जीवन की ईह लीला को समाप्त कर लिया। अभिनय, अभिनेता और अपने सीमित फिल्मी  ज्ञान को हम छोड़ भी दे तो एक युवा के इस तरह असमय दुनियाँ से प्रस्थान से चिंतित और दुःखित होना स्वभविक है।  मै कोई बहुत बढ़ी हस्ती तो नहीं पर मध्यम वर्गीय परिवारों  की संघर्षशील जीवन के अनुभव के आधार पर तो कह ही सकता हूँ कि विपत्तियों संकटों से युद्ध मे इस तरह के पलायन से कहीं बेहतर है इन आपत्तियों या विपत्तियों के सामने डट कर संघर्ष करना फिर भले ही युद्ध मे खेत रह वीरगति को प्राप्त हों जैसे भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद गीता के अध्याय दो के श्लोक सैतीस मे अर्जुन से कहा है:-

"हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्"।
"तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः"॥ (2.37)
(अर्थात अगर युद्धमें तू मारा जायगा तो तुझे स्वर्गकी प्राप्ति होगी और अगर युद्धमें तू जीत जायगा तो पृथ्वीका राज्य भोगेगा। अतः हे कुन्तीनन्दन! तू युद्धके लिये निश्चय करके खड़ा हो जा।)

ऐसा नहीं है इस तरह के आत्मघाती कदम सिर्फ फिल्म उद्योग के लोगों द्वारा ही उठाये गये हों? जीवन के व्यवसायगत या पेशागत स्पर्धा मे अहंकारी और अभिमानी वरिष्ठों एवं  वैधानिक शक्तियों के मद मे चूर नौकरशाहों और राजनैतिक नेताओं  द्वारा अपने अधीनस्थों और आम जनों के विरुद्ध इस तरह के उत्पीढन, अत्याचार, जुल्म, ज्यादती होते  देखना आम बात है। सरकारी प्रतिष्ठान और बैंक भी इससे अछूते नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व  जुलाई 2014 मे  चंडीगढ़ मे पंजाब नेशनल बैंक के एक मुख्य प्रबन्धक द्वारा अपने प्रबंधन वर्ग के अधिकारियों  द्वारा प्रबन्धक मीटिंग मे सार्वजनिक रूप से अपमानित, प्रताड़ित और तिरस्कार पूर्ण व्यवहार के कारण ट्रेन के सामने कूद आत्महत्या की घटना व्हाट्सप पर खूब प्रवहित और प्रचारित हुई थी। एक अन्य घटना मे ओबीसी के कानपुर शाखा के मुख्य प्रबन्धक द्वारा सितम्बर 2013 मे  फांसी लगा आत्महत्या का मामला भी काफी सुर्खियों मे रहा था जिसके लिये मृतक ने प्रादेशिक स्तर के अधिकारी और अन्य स्टाफ को  आरोपित और उत्तरदाई ठहराया था। इस तरह की अन्य अनेकों घटनायेँ  विभिन्न विभागों और क्षेत्रों मे घटी लेकिन कदाचित  ही किसी घटना मे आत्मघात के लिये प्रेरित और बाध्य करने बाले किसी अधिकारी और नौकरशाह को कभी कोई सजा मिली हो। सुशांत जैसे युवा द्वारा उठाये गये आत्मघाती कदम मे भी तमाम न्यायिक मांग के बाबजूद फिल्मी  कॉकस या अंडर वर्ल्ड का कोई सदस्य या सरगना पकड़ा या दोषी पाया जायेगा इस मे संदेह है??

बैसे बैंकों मे "नेपोटिस्म" तो नहीं है पर कुछ उच्च अधिकारियों का अपने अधीनस्थों के विरुद्ध वाणी और उत्पीढन रूपी "टेररिस्म" अवश्य है। ऐसे ही मुझे भी हमारे कई अन्य साथियों को एक अधिकारी के व्यवहारिक क्रूरता और अन्याय का कोप भाजन होना पड़ा था। इस तरह के अधिकारी ये मान कर चलते है कि वे ही अपने कार्य और व्यवहार के दम पर संस्थान चला रहे है बाकी सभी स्टाफ  अपने काम मे कोताही वर्तेते है।  ठीक बैसे ही जैसे कहावतों मे उस "कुक्कुर के भ्रम को बताना  जो बैलगाड़ी के नीचे चल रहा है और उसे ये गुमान है कि बैलगाड़ी का सारा बोझा उसके उपर है और बो ही बैलगाड़ी को खींच रहा है"।

कई बार राजस्व मे छूट या माफी के लिये शाखा प्रबन्धक प्रादेशिक और आगे प्रधान कार्यालय को सिफ़ारिश करते, पर जिसका निराकरण प्रादेशिक या प्रधान कार्यालय स्तर पर महीनों और कभी कभी  सालों पेंडिंग पड़ा रहता है। बगैर इन समस्या का निराकरण किये राजस्व की बसूली का दबाब उचित न था, उपर से तुर्रा कि वसूली न करने की दशा मे राजस्व की वसूली प्रबन्धक के व्यक्तिगत खाते से करने की धमकी उस कहावत को चरितार्थ करती कि "मारे और रोने भी न दे"। इस  कार्य व्यवहार का आतंक पूरे क्षेत्र की शाखाओं मे सर चढ़ कर बोलता था।

पूर्वाग्रह के कारण कार्यालय के न्यूनतम शिष्टाचार मे अभिवादन का प्रत्युत्तर न देना, किसी घंटे दो घंटे के कार्य को देने के बाद हर पाँच-दस मिनिट मे उसके बारे मे पूंछना और सिर पर सवार रहना, अपने  प्रबन्धकों  से  अपने निजी सचिव की तरह टेलीफ़ोन ऑपरेटर का कार्य लेना, क्लास टीचर की तरह सभी के सामने दुर्व्यवहार करना, वरिष्ठ को सीट से उठा कर कनिष्ठ को उसकी कुर्सी पर  बैठा प्रताड़ित करना उनके पोषित  संस्कारों मे समाहित था। दूसरे पक्ष को पूरा  सुने बिना ही अपनी बात "नहीं....नहीं.... से शुरू कर अपना मन्तव्य थोप देना उनके स्वभाव का हिस्सा था। चिकित्सा शास्त्र, इतिहास, भूगोल, आयुष शास्त्र, विज्ञान सहित दुनियाँ का कोई ज्ञान उनसे अछूता न था जिसमे वे परास्नातक न हों! कई मुख्य प्रबन्धकों  को  उनके पद और उम्र का  लिहाज किये बिना उनके साथ अपमानित और नफ़रतपूर्ण व्यवहार के कारण वे हीनता की भावना महसूस करते। कोई उच्च पदस्थ अधिकारी अपने अतिवादी और  तिरिस्कृत व्यवहार से अपने अधिनास्थों का उत्पीढन, शोषण या जुल्म की इस हद तक कैसे जा सकता है? उसके इस अमानवीय व्यवहार की  पीढ़ा से परास्त होकर  चार मुख्य प्रबन्धकों ने अपने पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। दूसरों को कर्तव्यों का बोध करा  नसीहत देना और स्वयं अपने पूर्व कार्यकलापों के मद  मे अकंठ सराबोर डूबे रहने बाले अधिकारी का मै भी अगले क्रम मे पाँचवाँ मुहरा हो सकता था पर अपने मित्रों के उच्च संपर्कों के चलते कुछ दिन इंतजार के परामर्श के कारण उस निष्ठुर का शिकार होने से बच गया। ऐसे अधिकारियों के कार्यकाल मे इनके व्यवहार से सताये गये पीढ़ित, शोषित  अधिकारियों की संख्या शोध का विषय हो सकती है। संख्या की द्रष्टि से अति सूक्ष्म इस तरह के प्रबंधन वर्ग के लोगो ने बैंक के मानव संसाधन रूपी  बैंक की पूंजी का बड़ा अहित किया है। क्या ऐसे कर्मी  श्रेष्ठता के भाव से पोषित,  मानसिक रुग्णता से ग्रसित नहीं प्रतीत होते? दुर्व्यवहारपूर्ण रवैये की पीढ़ा से ग्रसित इन अधिकारियों की असमय स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेना  कदाचित  आत्मघात तो नहीं पर पर वैचारिक आत्मघात से कम भी न था।    
      
अतः युवा सुशांत सिंह सहित चंडीगढ़ के मुख्य प्रबन्धक स्व॰ अजय एवं कानपुर के मुख्य प्रबन्धक स्व॰ सुनील सहित अन्य व्यक्तियों का आत्मघाती कृत पीढ़ा और क्लेश देने बाला  है, जिनके कारणों  पर गहन चिंतन मनन की आवश्यकता है।  समाज के ऐसे होनहार नागरिकों को अत्महत्या के लिए प्रेरित करने बाले इस तरह के अतिवादी और आततायी इस बात को ध्यान पूर्वक सुन ले कि वैधानिक संस्थाओं मे व्यवस्थाओं से प्राप्त आपकी सर्वशक्ति सम्पन्नता, वैभवता और बलिष्ठता सिर्फ और सिर्फ  उनके पद पर बने रहने तक ही है अन्यथा उन्हे एक अदना कर्मचारी भी शायद ही एक गिलास पानी के लिये कभी पूंछे।

विजय सहगल            


रविवार, 21 जून 2020

चीनी वस्तुओं का बहिष्कार



"चीनी वस्तुओं का बहिस्कार"

 प्रिय वंधु,

आपके द्वारा प्रेषित विडियो देखा चीनी सामानों के बहिष्कार पर  सत्य (https://youtu.be/od-Rw8ltNQs)  चैनल के विचार सुने। उक्त विडियो मे गांधी जी द्वारा विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार के वैकल्पिक  रूप मे खादी के उपयोग बढ़ाने की बात की है।  उक्त प्रवाचक एक जगह 7.52 मिनिट पर कहता है कि 8146 सामान  चीन से आयात किये जाते है जिनमे 343 वस्तुओं का आयात आगे दस वर्ष भी बंद न होने का दावा किया है और इन्हे असंभव बताया है। इस प्रवाचक के ही अनुसार क्या संख्या की द्रष्टि से उन शेष 7803 वस्तुओं जो कुल आयात वस्तुओं का 95.78% होती है पर हमे विस्तार से विचार विमर्श कर चीनी वस्तुओं के बहिष्कार के विचार का समर्थन नहीं करना चाहिये? मेरा मानना है कि इन 95.78% वस्तुओं मे यदि आधी भी जो देश के आम नागरिकों से सरोंकार रखती होंगी उनके उपयोग को समाप्त करने पर आम राय नहीं बनानी चाहिये? क्या चीनी एप्प को तुरंत ही हटा कर इसकी शुरुआत हम नहीं कर सकते? विद्धुत झालर, खिलौने, शो पीस, फटाके, जूते, पेन, चमड़े के सामान, घड़ियाँ जैसे हजारों आइटम है जिनके उपयोग को बड़ी आसानी से तुरंत ही बंद किया जा सकता है। विडियो मे  इन वस्तुओं के विकल्प की चिंता के विरुद्ध उक्त  सारी वस्तुओं के विकल्प भी आसानी से  देश मे उपलब्ध है। विडियो मे प्रवाचक चीन और चीनी वस्तुओं का प्रसंशक प्रतीत होता है। दूर क्यों जाये क्या हम प्रवाचक के विचारों के मानसिक खालीपन के विरुद्ध अभी इसी वक्त चीनी वस्तुओं  के बहिष्कार के विचार जी हाँ सिर्फ विचार को भी अपने मन मे लाने और पोषित करने की भावनाओं पर चिंतन मनन भी नहीं कर सकते? क्या हम अपनी स्थिति से गिर अपने वीर जवानों के बलिदान को भूल जाये? हमे ये नहीं  भूलना चाहिये कि 15 जून 2020 के बाद का चीन हमारे परिवार के भाइयों/बेटों का हत्यारा है और हत्यारों  से सम्बन्धों के विच्छेद मे विडियो का प्रवाचक चीन की आत्मप्रवंचना और देश की  लाचारी, हताश, निराशा को प्रकट करने बाले विचारों से ओतप्रोत प्रतीत होता है हमे इसके स्वराष्ट्र  प्रेमी, स्वाभिमानी और आत्मसम्मानी होने पर शंका और संदेश उत्पन्न होता है? 
  
मैं इस संदर्भ मे एक छोटा व्रतांत सांझा करना चाहूँगा एक बार एक जंगल मे बड़ी भयंकर आग लगी। जंगल के बड़े-बड़े शेर, भालू, रींछ आदि अन्य अनेक जंगली जानवर इस दावानल पर नियंत्रण असंभव मान हताश और निराशा का भाव लिये हाथ पर हाथ धरे बैठे थे (ठीक उक्त वीडियो के प्रवाचक की तरह जो चीनी वस्तुओं के बहिष्कार को असंभव मन चल रहा है) जंगल मे लगी आग को एक नन्ही चिड़िया बार-बार तालाब से चोंच मे पानी भर आग पर डाल बुझाने का प्रयास कर रही थी।  उसके इस प्रयास पर वहाँ खड़े शेर, भालू, बंदर, हाथी जैसे बड़े पशु हँस  और मुस्करा कर उसका मखौल उड़ा कह रहे थे "ए नन्ही चिड़िया तेरे एक बूंद पानी से ये  जंगल की आग नहीं बुझने बाली? तू व्यर्थ ही अपने श्रम और समय को बेकार कर रही है। उस चिड़िया ने बहुत ही सुंदर जबाब हताशा निराशा फैलाने बाले उन बल और वैभव शाली जंगल के प्राणियों को कहा "हे महनुभावों मेरा एक बूंद पानी से आग का बुझाना वेशक एक छोटा प्रयास है पर जब इस "जंगल की आग" का इतिहास लिखा जायेगा तो मेरा नाम आग बुझाने बालों की सूची मे होगा न कि आग लगाने या  मौन खड़े आग का तमाशा देखने बालों मे।

पर अंग्रेज परस्त टाई बाले बाबूओं से  इस बात की उम्मीद करना व्यर्थ है पर जैसे कि कहावत है कि परोपकार की शुरुआत घर से होती है अतः इन चीनी वस्तुओं का बहिष्कार कोई करे, न करे पर मेरा ये द्रढ़ निश्चय है कि मै किसी भी ऐसी वस्तु का उपयोग न करूं जो चीन मे निर्मित है। हो सकता है तमाम वस्तुओं का तिरिस्कार संभव न हो लेकिन 8146 वस्तुओं मे से कहीं किसी से इसकी शुरुआत तो हम आप कर ही सकते है और न हो तो कम से कम ऐसे विचार को तो हम मन मे ला ही सकते है?

विजय सहगल        

विजय सहगल        



शुक्रवार, 19 जून 2020

शाखा विस्तार



"शाखा-विस्तार"


 


ग्वालियर शाखा  मे मेरा कार्यकाल विभिन्न समय मे विविध  हैसियत से रहा। मै 1984 मे यहाँ पहली बार लिपिक पद पर लखनऊ से स्थानांतरण होकर ग्वालियर आया था। इस शाखा मे मैने  ऑफिसर और बाद मे सन् 2000 मे प्रबन्धक के पद पर भी सफल कार्यकाल पूरा किया था। मेरे पूर्व और पश्चात इस शाखा के प्रबन्धक पद को कई अन्य  गणमान्य एवं बैंक के  अखिल भारतीय स्तर पर ख्याति प्राप्त सम्मानीय लोगो ने भी इस पद को सुशोभित किया। मेरे लिये इस शाखा मे प्रबन्धक के पद पर आसीन होना अतरिक्त सम्मान की बात यूं भी थी क्योंकि प्रबंधन/संगठन के श्रेष्ठ पुरुषों  ने मेरे जैसे एक मात्र इकलौते स्केल-ii प्रबन्धक को लगभग 3 वर्ष स्केल-iv की इस  शाखा का उत्तरदायित्व सौंपा था जिसे मैंने सफलता पूर्वक पूर्ण किया। एक बार तत्कालीन सीएमडी द्वारा केवल मार्च माह मे गैर व्याज आय के कमीशन मद के रूप मे पचास लाख रुपए से अधिक की आय प्राप्त करने पर शाखा के स्टाफ को  विशेष प्रशंसा  पत्र देकर सम्मानित किया था। विभिन्न कार्यकालों के प्रवास और निजी  आवास का भी ग्वालियर मे होने के कारण भी ग्वालियर से लगाव होना स्वाभिक था।

सन् 2000 मे ग्वालियर मे बैंक के कार्यालयों की स्थिति करेंसी चेस्ट एवं पाँच  शाखाओं सहित कुल छः कार्यालयों की थी। ग्वालियर सहित चंबल के सभी स्टाफ सदस्यों की आकांक्षा और अपेक्षा के बावजूद भी  सन् 2000 से अनेकों प्रयास के बावजूद सन् 2010 तक, दस  वर्ष के कार्यकाल मे  ग्वालियर मे एक भी शाखा का विस्तार न होना सभी स्टाफ सदस्यों को कचोटता था। ऐसा नहीं था कि इन दस वर्षों मे शाखा विस्तार के प्रयास न हुए हों? यहाँ के स्टाफ यशवीर जी, गुप्ता जी, मिश्रा जी, हिमांशु सहित अन्य अनेकों लोगो  ने ग्वालियर और उसके आसपास अपने अपने स्तर पर मुरार, ट्रांसपोर्ट नगर, सिथौली, ओहदपुर, दतिया, रायरु, बानमोर, महाराजपुर, भितरवार, पिछोर सहित अन्य जगहों का सर्वे भेज शाखा विस्तार के लिये अनथक प्रयास किये पर प्रादेशिक कार्यालय के स्तर पर ग्वालियर और चंबल क्षेत्र मे शाखा विस्तार के कार्य मे रुचि न रखने के कारण 10 वर्षों मे एक भी शाखा न खुली। ऐसा तब था जबकि प्रादेशिक कार्यालय के बैंक विकास और शाखा विस्तार के लिये उत्तरदाई  "योजना और विकास" विभाग, ग्वालियर और चंबल संभाग से विशेष स्नेह करने बाले और संगठन से जुड़े हमारे अपने लोग इस विभाग के प्रमुख नीति नियंता और  सर्वे-सर्वा हुआ करते थे। इन सम्मानीय स्वजनों ने अपने पद की गरिमा और प्रभाव का इस्तेमाल प्रत्यक्ष रूप मे कुछ  क्षेत्र विशेष तक ही सीमित रखा। इस दौरान बैंक/शाखा विस्तार की ये बयार हर साल ग्वालियर क्षेत्र को बगैर छूए निकल पूरे देश सहित भोपाल, रायपुर और  इंदौर क्षेत्र मे बड़ी तीव्र गति से प्रवाहित होती रही। ऐसा होना एक प्रगतिशील संस्था और विशेषतः बैंक मे विकास के लिये अंत्यन्त आवशयक भी था, पर ग्वालियर और चंबल की धरती और यहाँ के लोग टकटकी लगाये बैंक के विस्तार और विकास रूपी बादलों के बरसने का इंतज़ार हर साल लगातार बीस वर्ष  तक करते  रहे पर इन  निष्ठुर निर्दयी बादलों ने एक शाखा रूपी बूंद भी ग्वालियर और चंबल संभाग मे नही गिराई।

2010 मे जब मेरा स्थानांतरण ग्वालियर से भोपाल हुआ तो यहाँ के स्टाफ की मुझसे अपेक्षा थी कि  ग्वालियर और चंबल के प्रतिनिधि के नाते इस क्षेत्र का हित ध्यान मे रख कर यहाँ  शाखा विस्तार के लिये प्रयास करेंगे जो स्वाभाविक भी था। भोपाल पदस्थापना के अपने पाँच वर्ष के दौरान ऐसे अनेकों अवसर आये जब हमने ग्वालियर और चंबल संभाग मे शाखा विस्तार के लिये "योजना एवं विकास विभाग" के प्रधान प्रमुखों के समक्ष  मजबूती से पैरोकारी की, पर दुर्भाग्य रहा कि हम अपने ही बांधवों/स्वजनों  को चंबल मे "एक शाखा के भी विस्तार हेतु" सहमत न कर सके। एक बार तो ऐसी स्थिति आयी जब श्री अशोक  शिवहरे, दतिया कलेक्टर, सीईओ जिला ग्रामीण विकास अधिकरण और मुख्य नगर पालिका अधिकारी जिनकी हमारे कुछ  स्टाफ सदस्यों से  घनिष्ठ मित्रता और पारवारिक रिश्ते थे, हर तरह का प्रशासनिक सहयोग बैंक को उपलब्ध था। उन प्रशासनिक अधिकारियों की ईक्षा भी थी कि हमारे बैंक की एक शाखा दतिया खुले पर प्रादेशिक कार्यालय के चंद नीति निर्धारकों के नकारात्मक रवैये के कारण ये सभी प्रयास निरर्थक और निष्फल रहे।

इन बीस सालों मे बैंक के साथ साथ हमारा प्रादेशिक कार्यालय भोपाल का मानव संसाधन विभाग, योजना और विकास विभाग,  शाखा विस्तार कार्यक्रम, ऋण और जमा राशियों के व्यवसाय का विकास  साल-दर-साल, सीढ़ी-दर-सीढ़ी, मंजिल दर मंजिल नई-नई ऊंचाइयों को छूता रहा पर प्रादेशिक कार्यालय के विकास रूपी सूर्य की एक किरण भी ग्वालियर और चंबल के अँधियारे रूपी विकास को रोशन न कर सकी। हम और हमारे उम्र के समकक्ष लोग बीस साल तक शाखा विस्तार की अधूरी हसरत दिल मे लिये बैंक से रिटायर हो गये और रह रह कर किसी शायर की ये लाइन याद करते रहे:-
     
"मुझे अपनों ने मारा, गैरों मे कहाँ दम था।
मेरी कश्ती वहाँ डूबी, जहां पानी बहुत कम था"॥  

पर कहते है न "समय बड़ा बलवान" होता है। हमारे पवित्र ग्रन्थों मे किसी भी घटना के घटित  होने के चार मुख्य कारक बतलाये गये है। देश, काल, पात्र और परिस्थिति। हमारे क्षेत्र के "शाखा विस्तार" मे भी इन्ही कारकों का प्रभाव रहा।  सरकार की अपनी नीतियाँ और कार्यक्रम के तहत बैंकिंग संस्थाओं को मानों ग्रहण लग गया और एक अप्रैल 2020 को वो अमंगल दिन आया जब बैंकों का समामेलन हुआ जिसमे इन मुख्य कारकों मे से "देश" और "पात्र" तो वही रहे पर "काल" और "परिस्थितियों" मे बदलाव के कारण  वर्षों  की शाखा विस्तार की चाहत भी अब मन मे कोई खुशी न ला सकी।  

क्योंकि "एक बो दिन था  जब बैंक तो था पर ग्वालियर क्षेत्र मे 20 वर्षों मे "शाखा विस्तार" नहीं था,  "अहो दुर्भाग्य" आज शाखा विस्तार (पीएनबी मे मर्जर के बाद ग्वालियर क्षेत्र मे शाखा 5 से 25 हो गई) तो मिल गया पर आज बो प्यारा "ओबीसी बैंक" न था।  

मै जानता हूँ आज ओबीसी इतिहास का एक हिस्सा बन चुका है पर रह रह कर हम सबके दिलों मे "हे ओबीसी तुम ताउम्र जिंदा रहोगे और बार-बार, हर बार  याद आओगे"           



विजय सहगल



शनिवार, 13 जून 2020

तालाब-मछ्ली और आदमी


"मछ्ली-तालाब और आदमी"



दिल्ली एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र मे  ऊँची-ऊँची, कई-कई मंज़िला इमारतों को देख लगता था कि इन बहुमंजिला इमारतों मे प्रबुद्ध वर्ग के  भले और कुलीन परिवारों के लोग रहते होंगे जो समाज के उच्च वर्ग के संभ्रांत समाज से संबद्ध रखते होंगे। ये पढे-लिखे बुद्धिजीवी वर्ग के लोग एक दूसरे के सुख सुविधाओं और सामाजिक नैतिकताओं का पालन समाज के औसत वर्ग के दर्जे के नागरिकों से कहीं अधिक ज़िम्मेदारी एवं सहृदयता  से करते होंगे। राजधानी मे रहने का मेरा ये पहला अनुभव था।  इससे पहले तक मेरा  जीवन देश के कुछ मध्यम वर्गीय शहरों तक ही सीमित रहा था। पिछले 3-4 वर्ष से मुझे  दिल्ली एनसीआर की  बहुमंजलि हाउसिंग सोसाइटी मे रहने का सौभाग्य मिला।

सोसाइटी का रखरखाव, सफाई व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था, पार्क, स्विमिंग पूल ठीक ठाक हो सामान्य दर्जे का ही था। अधिकतर वासिंदे मिलनसार और व्यवहारिक थे, सोसाइटी मे बनी रहवासी समिति के लोग जागरूक और क्रियाशील थे और जहां बड़े बड़े राष्ट्रीय और सामाजिक त्योहार उत्साह पूर्वक मनाये जाने के कारण हर उम्र और वर्ग के बच्चे, महिलाये युवा और पुरुष प्रत्येक कार्यक्रमों मे बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते देखना सुखद लगता।

अधिकतर रहवासी अनुशासन मानने बाले और शांति प्रिय लोग थे। पर  इस सबके बाबजूद एक चुभने बाली अप्रिय घटना मैंने इन दिनों लॉक डाउन खुलने पर देखी जिसे देख कर दुःख और वेदना हर उस रोज या यूं कहे प्रत्येक दिन देखने को मिली  जब प्रातः भ्रमण के लिये सोसाइटी के ग्राउंड फ्लोर के एक सिरे (प्रेवेश द्वार) से दूसरे छोर (निकासी गेट) तक जाने के दौरान जब सोसाइटी के एक ब्लॉक का कोई अजनबी  रहवासी धूम्र पान का शौक रखता पर सिगरेट के बचे ठूंठ (बचे हुए अनुपयोगी हिस्सा) को अपनी मंजिल के नीचे से गुजरने बाले रास्ते पर फेंक देता। 21 मंज़िला उस इमारत के अज्ञात फ्लोर के उस अज्ञात   रहवासी के सिगरेट पीने के इस  शौक से  भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती थी?, पर उन बचे ठूंठ को एकत्रित कर घर के कचरे दान मे न फेंक बीच रास्ते पर फेंकना अप्रिय लगता।  कोई व्यक्ति धूम्रपान का शौक तो करे पर उससे उत्पन्न होने बाली या फैलने बाली गंदगी से सोसाइटी के  दूसरों रहवासियों के लिये समस्या बने तो उसके इस कृत पर प्रश्न उठना और  निंदा या आलोचना होना स्वाभाविक ही था।

सिगरेट के बचे ठूंठ और कुरूप कैंसर की तस्वीर बाली डिब्बी को देख उस नामहीन कुसंस्कारित व्यक्ति की  इस कढ़वी सच्चाई से जब सामना हुआ तब  मेरे दिल मे चली आ रही बहुमंजलि इमारतों मे रह रहे लोगो की धारणा को टूटते विखरते देख दिल को बड़ी ठेस पहुंची और इस कहावत को चरितार्थ होते देख और सुन बड़ा दुःख हुआ कि "कैसे एक मछ्ली सारे तालाब को गंदा करती है"।
ये घटना सामान्य दिनों मे उस स्थान पर ध्यान न देने के कारण  उतनी चुभने बाली न थी क्योंकि तब नोएडा अथॉरिटी के गार्डन मे घूमने जाने के कारण उस स्थान से दिन मे बमुश्किल एक या दो बार ही निकालना होता था। लेकिन लॉक डाऊन के खुलने के  कारण अपने स्वअनुशासन एवं सोसाइटी के अंदर ही भ्रमण का संकल्प लेने के कारण उस गंदगी से हर चक्कर मे सामना होना और देखना बड़ा कष्ट और दर्द देने बाला लगता। ब्लॉक की बहुमंजिला इमारत की किस फ्लोर से उक्त अमानवीय, उच्छृंखल रहवासी अपनी  हठधर्मिता और नकारात्म कुसंस्कारों से पोषित धूम्रपान की गंदगी क्यों नीचे फेंकता है? नहीं मालूम पर उस व्यक्ति का घिनोना चेहरा ग्राउंड फ्लोर के उस रास्ते मे पड़े सिगरेट के  ठूंठ और खाली सिगरेट की डिब्बी के रूप मे मार्ग के दोनों ओर काफी दूर तक दिखाई देते, जिनकी संख्या 20-30 से अधिक रहती होगी और जो हवा के कारण दोनों दिशाओं मे 10-15 मीटर तक उड़ कर विखरे हुए दिखाई देते! काश इस "महा मानव" के माता-पिता या बड़े भाई बहिनों  ने बचपन मे इसकी गंदी या बुरी आदतों के लिये डांट लगाई होती या कान खींचे होते तो कदाचित ऐसी  उद्दंडता या हट्धर्मिता वो इस सभ्य समाज मे न करता। कैसे कोई  एक व्यक्ति सोसाइटी के लगभग 500 आवासों मे रह रहे ढाई तीन हज़ार रहवासियों के जीवन को नरकीय स्थिति  मे डाल वातावरण को अप्रिय और दूषित बना सकता??

ऐसा नहीं था कि सोसाइटी के सफाई कर्मचारी अपने कार्य मे कोई कोताही वर्त रहे थे पर सिर्फ उस एक अज्ञात रहवासी द्वारा पूरे क्षेत्र मे गंदगी फैलाने के कारण उक्त छोटे छोटे सिगरेट के टुकड़े झाड़ू लगाने के बाबजूद झड़ने से रह जाते और यही टुकड़े 2-3 दिन मे संचयी गणना के कारण कभी कभी 40-50 की संख्या मे दिखाई देते, उपर से सिगरेट की खाली डिब्बी जिस पर बड़ी ही विभत्स कैंसर  की तस्वीर छपी रहती है स्थान के वातावरण को बड़ा रौद्र और भयावह नज़ारा प्रस्तुत करती।

एक कहावत के अनुसार क्या इस तरह के नागरिक "झड़े मे कूड़ा" (अर्थात साफ सुथरे स्थान मे पड़े कचरा) के समान नहीं है? क्या दूसरों के लिये संकट और दुःख पैदा करने बाले ऐसे कुसंस्कारित नागरिक  सोसाइटी ही नहीं देश और दुनियाँ  के लिये अनउत्पादक  बोझ के समान नहीं हैं? इन अधम शक्तियों के विरुद्ध सोसाइटी के हजारों  व्यक्ति भी बौने दीख पड़ते है? क्या इन सहस्त्र  बुद्धजीवियों को संगठित होकर इस मूढ़ व्यक्ति के हठधर्मिता पूर्ण  व्यवहार को बदलने के लिए अगाह नहीं करना चाहिये?, और अगर चेतावनी के बावजूद न माने तो वैधानिक कार्यवाही कर समाज के लिये संकट बने ऐसे व्यक्ति  के विरुद्ध  नागरिकों के अधिकारों के हनन के लिये आवश्यक कार्यवाही पर विचार नहीं करना चाहिये?

वर्तमान मे अपने देश की ये सबसे बड़ी विडम्बना ही नहीं बल्कि कढ़वी सच्चाई है जब चंद असामाजिक तत्वों के सामने अधिसंख्य शांति प्रिय सुबोध नागरिक मौन रह बौने नज़र आते है? आइये इस विषय मे चिंतन मनन कर अपने लिये समुचित मार्ग चुने!!   
           
विजय सहगल