बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

दिल्ली के दंगे


दिल्ली के दंगे



अब  तक दिल्ली मे 24  लोगो की मौत हो चुकी है। इन लोगो की मौत कोई कोरोना वाइरस या  स्वाइन फ्लू से नहीं हुई इनमे से अधिकतर दिल्ली के बेकसूर नागरिक थे जिनको इस देश के राजनैतिक नेताओं के बिष वमन से उपजी हिंसा की बलि चढ़ गये। इन सभी का कसूर बस इतना था कि बे मेहनत और ईमानदारी से अपने परिवार के साथ जीवनयापन कर रहे थे। अब तक इन  राजनैतिक दलों के दोगले नेताओं ने अपने दल को छोड़ दिल्ली के सभी राजनैतिक दल एक दूसरे  को हिंसा और अराजकता के लिये दोषी ठहरा रहे है। अब आम जनता के सामने विचारणीय प्रश्न ये है जब सभी राजनैतिक दल और उनके नेता पाक-साफ है तो आखिर दोषी कौन है??

मैंने अपने पिछले ब्लॉग "शाहीन बाग का सच" (https://sahgalvk.blogspot.com/2020/01/blog-post_11.html) मे लिखा था की वेशक ये आंदोलन महिलाओं, दादियों, बच्चों द्वारा किया जा रहा प्रत्यक्षतः  शांति प्रदर्शन है पर वस्तुतः  परोक्ष रूप से हिंसक प्रदर्शन ही  है।  कुछ लोगो द्वारा रस्तों को रोक कर उन  लाखों लोगो पर की जा रही उस हिंसा की तरह ही  है जो लाखों मजदूरों, व्यापारियों द्वारा उस रास्ते का इस्तेमाल अपनी रोजी रोटी के लिये या विध्यार्थी अपनी पढ़ाई लिखाई के लिये करते है। इन सीधे साधे महिलाओं, नासमझ बच्चों का इस्तेमाल अशांति और अराजकता फैलाने बालों ने ढाल के रूप मे किया। जब किसी संस्था या व्यक्ति का अस्तित्व ही खतरे मे पड़ जाये तो वह अपने अस्तित्व को बचाने के लिये किसी भी हद तक जाकर इस तरह के कुकृत्य करेगा फिर भले ही  देश मे अराजकता और अशांति की स्थिति उत्पन्न करनी पड़े। काँग्रेस के बड़े नेता मणि शंकर अय्यर, शशि थरूर, चिंदंबरम  जैसे अनेक नेताओं ने इस आंदोलन को आग देने उपद्रव भड़काने  मे कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी।

भाजपा के कपिल मिश्रा, परवेश वर्मा, या अनुराग ठाकुर जैसे लोगो ने भी इस माहौल मे गैर जिम्मेदार भूमिका अदा की जिनसे सरकार का हिस्सा होने के कारण अधिक गंभीर और उत्तरदायित्व भूमिका की ज़िम्मेदारी थी। "देश के गद्दारों......" जैसे नारों ने भड़काने का ही कार्य किया। केंद्र शासन के  एक अहम  मंत्री के नाते श्री अनुराग ठाकुर से इस तरह के टुटपुंजिये व्यवहार की कदापि उम्मीद नहीं थी। कपिल मिश्रा जैसे नेता जो "आप पार्टी" से निकलने के बाद अपनी जड़े क्षेत्र मे मजबूत करने के लिये दुश्मन देश पाकिस्तान को अपने ही देश मे बनाने को हम क्या कहे देश भक्ति या देश द्रोह?    

पिछले दिनों एआईएमआईएम के नेता वरिश पठान ने जो प्रतीत होता  है गणित के प्रखांड विद्वान है। उन्होने 100 करोड़ पर 14 करोड़ का अनुपात का फॉर्मूला पेश किया। इनके दल के अध्यक्ष आसुद्दीन ओवैसी जो अपने भड़काऊ ब्यान  के लिये प्रसिद्ध है जिनके भाषण से प्रभावित एक लड़की ने पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाये। ये दोनों मौत के ही नहीं  लाशों के सौदागर है। ये लाशों का व्यापार करके अनुपात और समानुपात के फॉर्मूला लगा कर लाशों को हिन्दू और मुसलमान की तराजू पर रख कर अपना गणित का आनुपातिक सूत्र पर शोध करते है।  इनकी ही पार्टी के एक अन्य प्रवक्ता जो विषधर नाग से भी ज्यादा  विषैले बोल बोलने बाले अकबरुद्दीन ओवैसी जो 15 मिनिट के लिये "पुलिस हटाने" के पक्षधर इनके अनुनायियों  ने दिल्ली पुलिस के जबाज़ सिपाही श्री रतन लाल को अपनी इसी घिनौनी सोच के तहत हत्या कर  हमेशा के लिये हटा दिया। आईबी अधिकारी अंकित शर्मा और राहुल सोलंकी की दंगाइयों द्वारा हत्या वारीश पठान अपनी तराजू का पलड़ा भारी देख के खुश होंगे क्योंकि ये हिन्दू थे। मुदस्सिर और शाहीद की क्रूर हत्या पर वारीश पठान इन्हे  कौम पर कुर्बान की तराजू पर रखेंगे। पठान और ओवैसी बंधु जैसे लोग मुसलमान तो  है पर सच्चे मुसलमान नहीं है। मुहर्रम पर अपनी सबसे प्यारे को कुर्बान करना एक सच्चे मुसलमान अपना फर्ज मानता है। पठान और ओवैसी जैसे नापाक मुस्लिम  दूसरों के नौनिहालों को इस तरह कुर्बान कर इसमे अपनी खुशी तलाशेंगे और अपने घर परिवारों के बच्चों को अपने घरों की लौह दीवारों  के पीछे   छुपा कर रखेंगे ताकि उन्हे जमाने की कोई खरोंच भी न लगे।  

क्या कभी वारीश पठान या इन के  राजनैतिक दलों के आकाओं ने  दंगों की अकाल भेंट चढ़े दिल्ली पुलिस के श्री रतन लाल, श्री मुदस्सिर, आईबी अफसर अंकित शर्मा, राहुल सोलंकी या श्री शाहीद के परिवार के लोगो की हालात जानने की कोशिश की होगी? दंगों मे हताहत ये सभी किसी माँ के बेटे थे।  उनके कलेजे के टुकड़ों की जघन्य हत्या के दर्द  और आँखों के सूखे आसुओं का दर्द ये जहर उगलने बाले नेता अनुराग ठाकुर, कपिल मिश्रा या ओवैसी  कभी महसूस कर सकेंगे? कभी परवेश वर्मा उस पत्नी का दर्द इस जीवन मे  कभी रत्ती भर भी कम करा सकेंगे जो दंगों की सूली पर टांग दिया गया और  जिसकी पत्नी ने  अपने पति के साथ सुख-दुःख मे जीने मरने की कसमें खाई होंगी। आसुद्दीन ओवैसी जैसे पाशविक सोच के लोग  उस बच्चे के संताप को दूर कर सकेंगे जो बच्चे अपने पिता की बाहों मे जैसा सुरक्षित महसूस करता था। लेकिन यहाँ लिखना या कहना इन राजनैतिक दलों के दैत्यों से कहना व्यर्थ होगा क्योंकि रिश्तों की अहमियत का अंदाजा सिर्फ और सिर्फ  दुनियाँ के जीवित प्राणियों मे एक मात्र आदमियों मे  होता है पशुओं मे नहीं।   
         
विजय सहगल



कोई टिप्पणी नहीं: