रविवार, 23 फ़रवरी 2020

आत्मघाती कदम


"आत्मघाती  कदम"




कई बार हम बगैर सोचे समझे अपनी सीमा लांघ कर एक अजीब स्थिति उत्पन्न कर देते है जो हमे बड़ी उलझन मे डाल सकता है। कुछ ऐसी ही स्थिति से हमे एक शाखा मे दो-चार होना पड़ा। प्रबन्धक पद पर आसीन रहते हुए मैंने लगातार काफी प्रयास के बाद  हमारी शाखा मे "मोटर न्यायालय दुर्घटना अभिकरण" का अति महत्वपूर्ण खाता खोला था। इसी संबंध मे प्रायः न्यायालय के सम्मानीय न्यायधीशों  एवं अन्य कार्यालीन स्टाफ से मिलना जुलना होता रहता था। सारे स्टाफ के वेतन का वितरण भी हमारे शाखा से होने के कारण न्यायालय के सभी स्तर और वर्ग के स्टाफ से भी हमारे बैंक स्टाफ का परस्पर मिलना जुलना होता रहता था। हमने पहली बार महसूस किया था न्यायिक कार्यों के कारण प्रायः न्यायधीशों का सामाजिक दायरा काफी सीमित रहता है उनमे से हम एक  बैंक मे सेवारत स्टाफ सौभाग्यशाली थे जिसको माननीय लोग बड़ा सम्मान करते थे। इसी कारण महीनों मे यदा कदा ही वे शाखाओं मे आते थे अन्यथा प्रायः उनके स्टाफ के लोग ही उनके  खाते  का  भुगतान चैक आदि के माध्यम से लेने  के लिये आते थे। हमारा भी न्यायालय मे एमएसीटी खातों के संबंध मे आना जाना होता रहता था जिसके कारण न्यायालय का सभी स्टाफ मेरे सहित अन्य स्टाफ का बड़ा सम्मान करता था। न्यायालय और कलेक्ट्रेट के अधिकारियों और कर्मचारियों से मिले इस सम्मान को  मै हमेशा वेतन के अतरिक्त बैंक की नौकरी के कारण मिल रहा बोनस मानता था बरना माननीय न्यायधीशों या कलेक्टर सहित एडीएम, एसडीएम सहित अन्य अधिकारियों की सामाजिक प्रतिष्ठा के सामने हम बैंक कर्मी कहीं दूर दूर तक नहीं टिकते। जब कभी जिला न्यायधीश और  अन्य माननीय जज या जिला कलेक्टर हमे गणतन्त्र दिवस या स्वतन्त्रता दिवस पर अपने समकक्ष बैठा जो इज्ज़त बख्शते उसकी कल्पना तो हम जीवन मे  कर ही नहीं सकते थे, मेरा ऐसा मानना था ये सिर्फ बैंक की नौकरी के कारण ही संभव था  बरना मै प्रायः ऐसे मौकों पर मन ही मन उस मुहाबरे को याद करता रहा "कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली"।

पर एक दिन हमारे शाखा के एक स्टाफ के बेबकूफी पूर्ण कृत्य के कारण बहुत बड़ी मुसीबत मे फंस गया। एक दिन प्रातः 11 बजे लगभग न्यायालय का चपरासी हमारी शाखा मे मेरी कैबिन मे आया और कहा कि जज साहब ने हमे अभी याद किया है। प्रायः इस तरह के बुलावे बैंक के कार्य के लिये आते थे ये ही सोच मै बड़े ही सहज ढंग से उनके कार्यालय मे उनसे मिलने गया। वे न्यायपीठ पर अपने कार्यों का निष्पादन कर रहे  थे। मेरे पहुँचने पर स्टाफ ने मुझे उनके निजी कक्ष मे बैठने को कहा। जब माननीय जज साहब न्यायपीठ से  कक्ष मे आये तो सामान्य शिष्टाचार अभिवादन के बाद मैंने उनसे बुलाने का मंतव्य जानना चाहा तो उन्होने एक विजिटिंग कार्ड देते हुए मुझसे पूंछा ये कौन शख़्स  आपकी शाखा मे है? मैंने कार्ड देख कहा जी हाँ ये हमारी शाखा का स्टाफ है। जज साहब के चेहरे के भाव पढ़ मुझे लगा मामला कुछ गड़बड़ है। मैंने हल्की आवाज मे निवेदन की मुद्रा मे प्रश्न किया सर क्या  बात है? सब कुशल तो है? तभी जज साहब ने बताया ये श्रीमान ने मुझसे मिलने के लिये अपना विजिटिंग कार्ड मेरे  पास भेजा। उनके नाम से तो वे परिचित नहीं थे पर कार्ड पर बैंक और शाखा का नाम होने के कारण जज साहब ने उन्हे अपने कक्ष मे बुला लिया। वे बोले आपका ये स्टाफ मेम्बर  हमारे पास आये थे अपने बेटे के एक मित्र के विरुद्ध दहेज प्रकरण के  केश मे जमानत करवाने के बारे मे बात करने जो कि मेरे न्यायालय मे लंबित है। सुनकर मेरे को "काटो तो खून नहीं" जैसी स्थिति थी कि फकत बैंक मे कार्यरत एक व्यक्ति सीधे जज साहब से किसी प्रकरण मे जमानत कराने हेतु  इतना दुस्साहस कैसे  कर सकता  है?? मै हैरान था और उनसे बोला  इस अदने से मूर्ख स्टाफ ने कैसे एक जज से ये कहने की  इतनी गुस्ताखी की? इसको कोर्ट की ताकत का अंदाज नहीं? बड़े से बड़े कलेकटर और अधिकारी की भी ये हिम्मत नहीं होती कि इस तरह जज से कोई बात करे? आगे जज साहब ने जो कहा उस को सुनकर मुझे मामले की गंभीरता का और  अहसास हुआ कि मामला कितना नाजुक और कष्टप्रद हो सकता था। उन्होने कहा कि मैंने आपके बैंक की   बजह से  उनको छोड़ दिया अन्यथा गिरफ्तार करा  जेल भेज देता!!  जज साहब ने  तुरंत ही उस स्टाफ को खड़े होकर कोर्ट चैंबर से बाहर जाने को कह मुझ को  बुला  भेजा ताकि उस स्टाफ की धृष्टता से  मुझको  अवगत करा सकूँ। मैंने हाथ जोड़कर उनसे स्टाफ की मूढ़ता  के लिये माफी मांगी। और उसकी बेअक्ली के लिये अनेकों बार अफ़सोस जाहिर किया। ये जज साहब की  विशाल हृदयता थी कि स्टाफ की बेअदबी और गलती को बैंक से जुड़ाव के कारण माफ कर दिया अन्यथा एक पीढ़ादायी अप्रिय  अनहोनी घटना  हो सकती थी। मैंने उन्हे इस "दया" के लिये अनेकों धन्यवाद दिया।

मन ही मन सोचता हुआ शाखा मे बापस आया कि कैसे एक कम बुद्धिमान भी  कदापि  ही न्यायालय  के गरिमा पूर्ण प्रतिष्ठित पद पर बैठे व्यक्ति को  हल्के मे लेने की मूर्खता कर सकता है?

विजय सहगल                       

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