"जन्मभूमि
डॉ॰ भीमराव अंबेडकर-महू (म॰प्र॰)"
29 दिसम्बर 2019
को शाम लगभग 4 बजे हम अब माहेश्वर से
महू आ चुके थे। एक रास्ता महू शहर होकर जा रहा था जबकि दूसरा बाइपास होकर
महू शहर के बाहर से होकर इंदौर रोड को जोड़
रहा था। मैंने अपने स्वार्थ वश बाई पास का
रास्ता अपनाया क्योंकि ये रास्ता डॉ॰ भीम
राव अंबेडकर की जन्म भूमि से होकर निकल रहा था। मेरी हार्दिक ईक्षा भी थी कि मै
देश की उस महान विभूति की जन्मस्थान से ही होकर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर वहाँ
से निकलूँ जिनके बारे मे मैंने कॉलेज जीवन मे युग निर्माण
योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित लघु पुस्तिका मे पढ़ा था। उन दिनों मे लक्ष्मी व्यायाम
शाला जाया करता था जहां पर एक भाई साहब जिनका नाम मै भूल रहा हूँ शायद जगत भाई
साहब था, जो उन दिनों वर्क शॉप रेल्वे मे सेवारत थे और जो व्यायाम का प्रशिक्षण देने के साथ युग निर्माण योजना, मथुरा का झोला पुस्तकालय भी चलाते थे। उनके पास भारत के महा पुरुषों की अनेकों लघु पुस्तिकायेँ
भी हुआ करती थी जो हम जैसे अन्य प्रशिक्षार्थियों को निशुल्क पढ़ने को दिया करते
थे। उस पुस्तिका मे डॉ॰ अंबेडकर के जीवन संघर्ष के बारे मे पढ़ा था किस तरह उन्होने
बचपन मे छुआ-छूट ऊंच-नीच के दंश को झेल शिक्षा, और
सामाजिक कार्यक्रमों मे जाति- पाँति के होने बाले भेदभाव का सामना और संघर्ष करते हुए
शिक्षा ग्रहण कर एक अनुपम, अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। ऐसी कठिनाइयों भरे जीवन संघर्ष पर
शिक्षा रूपी अस्त्र-शस्त्रों के साथ विजयी पाकर सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने के
उदाहरण बिरले ही देखने को मिलते है। बचपन मे पढ़ी उस पुस्तक मे डॉ॰ अंबेडकर की जीवन संघर्ष
यात्रा से मै काफी प्रभावित था। ऐसे महा
पुरुष की जन्म भूमि पर मै लगभग डेढ़ घंटे
रहा। दो मंज़िला सफ़ेद संगमरमर से बनी गोलाकार इमारत मे प्रवेश द्वार पर ही डॉ॰ अंबेडकर कि आदम कद प्रतिमा बनी थी। जिसके
दोनों ओर सीढ़ियों से ऊपरी मंजिल पर जाने आने का रास्ता था। बगल से ही निचली मंजिल
मे जाने का रास्ता था। निचली मंजिल के भव्य विशाल हाल मे डॉ॰ अंबेडकर की कुर्सी पर
बैठी प्रतिमा के अगल बगल उनके माता-पिता के चित्र और उनकी पत्नी की मूर्ति थी बगल मे ही देश के सर्वोच्च नागरिक
सम्मान "भारत रत्न" की
प्रतिकृति लगी हुई थी। हाल के केंद्र मे एक लकड़ी का माडल रखा था जो उनकी पुण्य भूमि की इमारत का था जिसे चैत्य
भूमि के नाम से जानते है। उपर की मंजिल मे भगवान बुद्ध की प्रतिमा के साथ बौद्ध
गुरु और डॉ॰ अंबेडकर की प्रतिमा थी।
आकृतियों के साथ उनके पुराने राजनैतिक जीवन, बचपन और युवा अवस्था एवं उनके मित्र, परिवार के सदस्यों के पुराने चित्र प्रस्तुत किये गये थे। पूरे परिसर
का रख-रखाब बहुत ही साफ सुथरे ढंग से किया गया था। परिसर के भ्रमण के बाद मै ऊपरी मंजिल
पर जाने बाली सीढ़ियों पर लगभग एक घंटे बैठा रहा जहां पर काफी संख्या मे लोग दर्शन
हेतु आ, जा रहे थे।
अब हमने प्रस्थान करने के पूर्व लघु शंका से
निवृत्त होकर चलने की सोची। शौचालय, जो कि परिसर के पिछले भाग मे था। शौचालय की दशा देख कर मैंने प्रवेश द्वार पर लगे
बैनर से श्री मोहन राव वाकोड़े, व्यवस्थापक जी के मोबाइल नंबर पर फोन लगाया। बैसे शायद मै फोन न लगाता पर बाहर लगे सूचना पट जिसमे
लिखा था "बाहर से आने बाले श्रद्धालू असुविधा होने पर संपर्क करें" अतः
मैंने श्री वाकोड़े जी को फोन लगाया। मैंने उन्हे जन्मभूमि परिसर की सुंदर और साफ
रखरखाब हेतु साधुवाद दिया पर उनका ध्यान
शौचालय की दुर्दशा की ओर आकर्षित किया। उन्होने असुविधा हेतु खेद प्रकट किया और
कुछ व्यवस्था संबंधी खामियों का उल्लेख किया। समस्या के ध्यानाकर्षण हेतु भी मेरा
शुक्रिया कहा। फिर हमारी उनसे 15-20 मिनिट यूं ही चर्चा होती रही उन्होने
व्यक्तिगत तौर पर मिलने की ईक्षा भी बताई पर न आ सकने पर खेद प्रकट किया और कभी नोएडा आने पर
मुलाक़ात का आश्वासन दिया। श्री मोहन राव जी से बातचीत कर अच्छा लगा।
इस तरह हम डॉ॰ अंबेडकर जी की जन्मभूमि के दर्शन कर
इंदौर के लिये प्रस्थान कर गये। जो हमारे लिये एक अविस्मरणीय यात्रा थी।
विजय सहगल







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