शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

लॉस्ट स्कूल


"लॉस्ट स्कूल"



आज 13 फरवरी 2020 को ग्वालियर से छः दिन बाद नोएडा स्थित  बच्चों के स्कूल जाने के लिये जल्दी नाश्ता कर बैग और स्कूल के चार्ट लेकर मै जब कक्षा स्थल पर पहुंचा तो एक बारगी लगा मै कोई गलत जगह आ गया हूँ। लेकिन लगभग एक साल से आ रहे इस जगह को कैसे भूल सकता हूँ!! पर कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर थी। हमारी क्लास के निशान तो थे पर मजदूरों की झुग्गी बस्ती कहीं भी नज़र नहीं आ रही थी। जब बस्ती नहीं थी तो बस्ती के वाशिंदे  भी कहीं नज़र नहीं आये, और नज़र न आये राकेश, धर्मेन्द्र, तेजपाल और न ही नज़र आई नन्ही नीतू, परवीन, खुशी  या निशा  जो हमारे क्लास के विध्यार्थी थे। हमारा सारा उत्साह गायब था। पेड़ के नीचे खड़े हो एक टक मै उजड़ी बस्ती और वीरान कक्षा को देखता रहा। चारों तरफ नज़र दौड़ाई सिर्फ और सिर्फ उजड़ी बस्ती से निकले टीन शेड के ढेर नज़र आये। मेरी आँखों मे रह रह  कर लखनऊ मे देखी साठ के दशक की  प्रसिद्ध फिल्म "कागज के फूल" का वो सीन याद आ  रहा था जब तब के मशहूर कलाकार गुरुदत्त पर "देखी जमाने की यारी, बिछुड़े सब बारी बारी" गाने का द्रश्य का फिल्माया गया था। मै हतप्रभ हो किनारे पर खड़ा एक टक उजड़े मैदान को देख कर स्कूल की यादों मे खोया था तभी सामने बन रही सोसाइटी का गार्ड जो मेरे आते ही पिछले एक साल से  कुर्सी लेकर आता था आज नमस्ते कर बोला "सारी बस्ती खाली हो गया", "सारे बच्चे यहाँ से चला गया", "सभी मजदूर कंपनी के सैक्टर 115 सूरखा गाँव मे चला गया"। जब मैंने पूंछा कब गये? 3-4 दिन हुआ। बोला नोएडा अथॉरिटी ने सारी जगह खाली करा लिया। अब यहाँ मार्केट बनेगा। एक साल पूर्व क्लास शुरू करने पर जिस का अंदेशा था वही हुआ "विकास हमेशा गरीब और गरीबी  की बुनियाद के उपर ही होता है", पर इस तरह इतनी जल्दी बस्ती उजड़ेगी ऐसा आभास न था। सोसाइटी का काम पूरा होने के बाद ऐसा होगा इस का तो हमे मालूम था पर अचानक स्कूल के बच्चों से जुदा होंगे इसका अंदेशा नहीं था। बिछुड़ना था ये तो सच  था पर बगैर सुखद भविष्य की कामना बच्चों को दिये वे अचानक गायब हो जाएंगे ऐसा सोचा न था। पर मै भी कहाँ हार मानने बाला था। "एकला चलो रे" के सिद्धांत पर  गार्ड से पते की विस्तृत जानकारी ले कर अंततः मै खोये स्कूल और उसकी कक्षा के छात्रों की खोज मे निकल पड़ा। लोगो से पूंछते पांछते लिंक रोड से होकर मै जैसे तैसे सूरखा गाँव पहुंचा। पूरे रास्ते कंक्रीट के जंगलों मे  ऊंची-ऊंची  गगनचुंबी निर्माणाधीन इमारतों के बीच झुग्गी बस्ती की तलाश मे उन बच्चों को खोजने के लिये जो हमारे स्कूल और हमारे कक्षा या यूं कहे हमारे जीवन के एक हिस्सा थे। एक जगह टीन शेड से घिरे मैदान को देख खुशी  से ऐसा लगा शायद हमे हमारी मंजिल मिल गई पर निराशा हाथ लगी वह मैदान पूरी तरह खाली था। फिर एक बंदे से पता करने पर उसने आगे का रास्ता सुझाया। आगे बढ़ा तो पर उन  बहुमंजिला इमारतों के जंगल मे कार को एक जगह रख कर पैदल पैदल आगे बढ़ना श्रेयस्कर लगा  क्योंकि ऊबड़ खाबड़ रास्ते और नाले कार के रास्ते मे अवरोध बन रहे थे। गली दर गली, प्लाटों के बीच बहती नाली और उढ़ती धूल के साथ लगभग आधा घंटे की पैदल यात्रा भी निरर्थक साबित हुई।  दो चार जगह पूंछ-तांछ करने पर किसी ने गाँव सूरखा मे  टावर के पास स्थित एक मैदान मे बनी नई झुग्गी बस्ती का रास्ता दिखलाया। थकावट अब चेहरे पर साफ दीख रही थी। निराशा के बीच आखरी प्रयास को मान मैंने कार को सूरखा गाँव के अंदर बढा  दिया। पतली लेकिन पक्की गली मे एक दुकान के पास मैंने कार को रोक पिछले चार-छः दिन मे बसी झुग्गी झोपड़ी के बारे मे पूंछा तो दुकानदार ने  गाँव मे और अंदर जाने का संकेत दिया। कार को अंदर  ले जाने के मेरे संकोंच को उन महाशय ने दूर करते कार ले जाने मे किसी भी परेशानी न होने की तरफ इशारा किया। जैसे तैसे अंदर गाँव मे गाड़ी को एक घर के सामने पार्क कर और पूंछा पांछी की तो किसी सज्जन ने गाँव के सरकारी स्कूल के पहले गली मे बनी झुग्गी बस्ती का हवाला दिया। पैदल पैदल गलियों मे जाकर झुग्गी बस्ती तो मिली पर वहाँ पर बो बच्चे या उनके माता पिता न मिले जो हमारे स्कूल के सदस्य थे। एक बार मैंने, जैसे अपने खोये चश्मे को भोपाल शताब्दी ट्रेन से अथक प्रयास के बाद पा लिया था (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/09/blog-post_30.html) बैसे ही बच्चों की खोज के  इस  काम को मै बड़ा आसान  समझ शुरू किया था पर दो घंटे यहाँ वहाँ भटकने के बाद भी शून्य परिणाम देख काफी दुःख, हताशा  और निराशा ने  मन को हीन  भावना से ग्रसित कर दिया।

बैसे तो मैंने बहुत कम उपन्यास या स्टोरी पड़ी है पर कॉलेज के जमाने मे श्री मुल्क राज आनंद की "लॉस्ट चाइल्ड" कहानी आज  रह रह कर याद आई, बस फर्क सिर्फ इतना था उनकी कहानी मे बच्चा सारी दुनियाँ के सुख छोड़ सिर्फ और सिर्फ अपने माता पिता को  ढूँढना चाहता था और यहाँ आज  मै उसी बच्चे की तरह  अपने खोये स्कूल को ढूँढना चाह  रहा था।

मै कह नहीं सकता उन बच्चों से फिर कभी मुलाक़ात हो या  न हो पर ईश्वर से ये  प्रार्थना   अवश्य करूंगा कि अनजान राहों पर मिले उन बच्चों की  हर ईक्षा को पूर्ण करना और उन सभी के भविष्य को सुखद और उज्ज्वल बनाना।

विजय सहगल               


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