शनिवार, 21 दिसंबर 2019

माहेश्वर

-:"माहेश्वर":-














मांडू से लगभग 12.30 बजे सुबह 28 नवम्बर 2019 को एकाध घंटे की झपकी के साथ अब हम माहेश्वर यात्रा के लिये पूरी तरह तैयार थे। मांडू से माहेश्वर की दूरी लगभग 45 किमी थी। मोटर साइकल पर बैठ बैग को पीछे पीठ पर लाद कर माहेश्वर यात्रा के लिये प्रस्थान किया। चतुर्भुज मंदिर चौराहे पर एक दो लोगो से आगे का रास्ते का मार्ग दर्शन लेकर आगे बढ़े। रास्ता थोड़ा ऊबड़-खाबड़ जरूर था पर खुशी इस बात की थी सड़क पर हल्के वाहन ही नज़र आ रहे थे वे भी न के बराबर। सुनसान सड़कों पर ऐसे खुशनुमा माहौल मे मोटरसाइकल की सवारी अच्छी लग रही थी। मांडू विंध्याचल के पहाड़ो पर होने के कारण अब घाटी मे पेडों और जंगलों के बीच से उतरना था बगैर स्पीड के भी गाड़ी तेजी से नीचे जा रही थी। पीछे छूटते पहाड़ों को देखने का लोभ बार-बार हमे पीछे मुड़-मुड़ कर पहाड़ देखने को मजबूर कर रहा था। घाटी के नीचे पहुँचने तक इसी कारण 3-4 बार रास्ते मे गाड़ी रोक कर फोटो ली फिर भी संतुष्टि नहीं मिली। पहाड़ और सड़क के बीच मे बनी घाटी के तल को देखना घने जंगलों के कारण मुमकिन नहीं था। जगह जगह पहाड़ों से पानी रिस-रिस कर सड़क के साथ चलता रास्ता मिलने पर घाटियों मे उतर जाता।

अब तक हम मैदानी इलाके मे आ चुके थे। पहाड़ पीछे छूटने के बाद रास्ता खेतों के बीच होकर गुजरने लगा। खेतों मे इस समय कपास लगी थी। दूर दूर तक कपास के सफ़ेद फूल नज़र आ रहे थे। इससे पहले हमने कपास की खेती नहीं देखी थी। एक खेत के किनारे गाड़ी रोककर कपास के फूल को एवं कपास खिलने के पूर्व उसके बंद कैप्सुल को देखा। खेतों के किनारे जगह जगह कुछ रुई देखने मिली जो हवा चलने के कारण फूलों से झड़ी होगी। आगे जाने पर अब हम एबी रोड पर कुछ किमी आगे बड़े जहां से सड़क के आरपार लगे सोचना पट एबी रोड को छोड़ बाये धामनौद की तरफ जाने का इशारा कर रहे थे। धामनौद के बाज़ार और लोगो को देख कर इस शहर और आसपास के के ग्रामीण कस्बों, गाँवों के संपन्नता की कहानी कह रहे थे। धामनौद से माहेश्वर 11 किमी शेष था।
हम लगभग 2.30 पर माहेश्वर पहुँच चुके थे। चौराहे से नर्मदा नदी के घाट का रास्ता पता कर शहर के अंदर प्रवेश किया। बाज़ार पूरी तरह बंद था। ज्ञात करने पर पता चला गुरुवार को बाज़ार की साप्ताहिक छुट्टी होती है। माहेश्वर किले के नीचे एक होटल मे कमरा लेकर बिना समय गँवाये सामान रख कर नदी के घाटों पर प्रस्थान किया। घाट के लिये ये रास्ता माहेश्वर किले से हो कर गुजरता था, जो नर्मदा नदी के तट पर ही बना है और जो नदी की सतह से लगभग 500 फूट ऊंचा रहा होगा। किले के प्रवेश द्वार सामने ही अहिल्याबाई होल्कर की 10-11 फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित थी। सामने ही प्राचीन महल जिसका काफी हिस्सा लकड़ी का बना हुआ था और जो दूर से देखने मे बहुत सुंदर लग रहा था। महल के अंदर अहिल्या बाई होल्कर के राजदरबार को उसी तरह सजाकर रखा गया था जैसे उनके राज्य मे रखा जाता था। महल मे राज्य मे इस्तेमाल होने बाली पालकी, गाड़ी और अन्य राजशी सामान रखा हुआ था। महल के बाहर आने पर अहिल्या बाई होल्कर का मंदिर था जिसमे सोने के झूले पर लड्डू गोपाल की सुंदर मूर्ति विराजमान है। अन्य अलग अलग आकार के बेशकीमती चाँदी से जड़ित शिवलिंग भी विराजमान थे। मंदिर के पूर्व एक छोटे से कमरे मे एक विलक्षण कार्य नित्य नर्मदा मिट्टी से शिव लिंग की स्थापना मंदिर मे कार्यरत विप्रो द्वारा किया जाता है और संध्या के समय उन शिवलिंगों को नर्मदा मे विधिवत पूजा अर्चना के बाद विसर्जित किया जाता है। ये नित्य क्रम हर रोज 5-6 पुरोहितों द्वारा किया जाता है। मै उक्त शिव लिंगों का बनना बाहर से देख रहा था वहाँ कार्यरत पुरोहित ने हमे अंदर आकर उक्त पुण्यक्रत को अंदर आकार देखने के लिये आमंत्रित किया जिसे सहर्ष स्वीकार कर मै 10-15 मिनिट शिवलिंग निर्माण के कार्य को एक टक निहारता रहा। उक्त कार्य की प्रथा अहिल्या बाई होल्कर के समय से अनवरत आज भी जारी है। ये अनुपम तरह का नित्य शिवलिंग स्थापना मैंने सिर्फ माहेश्वर के इस किले मे ही पहली बार देखी।
किले के दर्शन के बाद हमने नर्मदा नदी के घाटों की ओर रुख किया। किले के ही दूसरे गेट से नदी तट का रास्ता था। गेट के पास ही जगदीश द्वारा मात्र 30/-रूपये मे गरी बाला मीठा नारियल पानी पी कर अच्छा लगा। इसकी दुकान पर कल सुबह फिर आने का वादा कर मै घाट की तरफ बढ़ा। अहिल्या बाई घाट को देख कर मन प्रफ़्फुलित हो गया। अनेक वर्षो से फोटो विडियो पर ही घाट की शोभा देखी थी। आज साक्षात अपने आपको घाट के समक्ष पाकर अति उत्साहित था। चमकदार दोपहरी मे घाट का वस्तु एवं बारीक नक्काशी दार दरबाजे का शिल्प देखते ही बनता था। आधा-पौना घंटे घाट पर भ्रमण के पश्चात नाव से नर्मदा दर्शन का कार्यक्रम बनाया। कम श्रद्धालुओं के कारण कुछ समय इंतज़ार करना पढ़ा। अन्य श्रद्धालुओं के साथ बोट मे सांझा सबारी शुरू की। नर्मदा का तट बोट से बड़ा मनोरम और मनोहारी था। दूर से नर्मदा के घाटों, माहेश्वर किला, घाटों पर बने प्राचीन मंदिर, घाटों पर बनी लंबी लंबी सीढ़ियाँ, बीच बीच मे सीढ़ियों पर बने बुर्ज बहुत ही नयनभिराम और सुंदर लग रहे थे। नर्मदा नदी की विशाल जल राशि से परिपूर्ण तट पर नदी अपने शांत वेग से बह रही थी। बोट से नर्मदा दर्शन के पश्चात अहिल्या बाई घाट की सीढ़ियों पर चढ़ कर उपर मंदिर मे प्रवेश करने का निश्चय किया। मंदिर के लिये घाट की सीढ़ियाँ का आकार नीचे से उपर घटते हुए आकार मे क्रम से बना था जो दूर से देखने मे बहुत ही सुंदर दिखाई दे रहा था। मंदिर की आखिरी सीढ़ी पर एक विशाल नक्काशी दार सुंदर दरबाजा घाट की सुंदरता को सुनहरी धूप मे और भी निखार ला रहा था। दरबाजे के दोनों ओर उपर मुंडेरों पर पत्थरों की बहुत सुंदर बारीक वास्तु शिल्प की नक्काशी अनगिनत मूर्तियों पर की गई थी। दरबाजे के उपर की मंजिल के झरोखों से नदी का विशाल तट का विहंगम द्रश्य अविस्मरणीय छवि प्रकट कर रहा था, जो देखने लायक था। आयताकार विशाल आँगन मे पूर्वी और पश्चिमी छोर पर सीढ़ियो से जुड़े सुंदर मंदिर थे। जिसमे एक अहिल्या बाई और दूसरा शिव मंदिर था जो मंदिर प्रांगण मे खुले आँगन मे स्थित थे। मंदिर प्रांगण के चारों ओर खुली दालन नुमा बरामदे बने है जिनका मुह नदी की तट पर खुलता है। नदी का जल भी अन्य नदियों के मुक़ाबले काफी साफ और शांत वेग से बह रहा था। घाट की साफ सफाई भी ठीक थी इसमे और भी सुधार किये जाने की गुंजाईस से इंकार नहीं किया जा सकता था। शाम के छ: बजने को थे अब हमने कुछ आराम करने के लिये होटल की तरफ रुख किया।
होटल मे एकाध घंटे आराम के बाद मै बापस नर्मदा तट पर आया जहां पर शाम की नर्मदा आरती देखने का कार्यक्रम था। आरती का समय रात्री 8.30 का था इससे बीच हमने रात्री भोजन ग्रहण करने की सोच घाट के पास ही साँवरिया भोजनालय पहुंचे जिसके बारे मे एक दो लोगो ने अनुशंसा की थी। भोजन वास्तव मे बड़ा ही सात्विक, स्वादिष्ट एवं एक दम गरमा-गरम ताज़ा परोसा जा रहा था वह भी बिलकुल भारतीय सांस्कृतिक परिवेश मे, जमीन पर लगी छोटी छोटी लकड़ी की चौकी पर थाली मे लगा कर। अलति-पालथी मार कर बैठ चौकी पर भोजन करना बहुत अच्छा लगा। होटल के मालिक श्री गिरीश पंडित जी से उनके भोजन की प्रशंसा कर मै पुनः तट की ओर नर्मदा आरती दर्शन हेतु नदी के किनारे चल पड़ा। तभी ध्यान आया गिरीश जी को भोजन के बिल का भुगतान तो किया ही नहीं। चूंकि आरती का समय हो रहा था अतः आरती के बाद भोजन के बिल का भुगतान करने का निश्चय किया।
आरती शुरू ही होने बाली थी। तैयारियां पूर्ण हो चुकी थी। नर्मदा जी की आरती हरिद्वार या वाराणसी की तरह चकाचौंध भरी तो नहीं थी पर आरती मे शामिल होने बाले श्रद्धालूओं और स्थानीय रहवासियों की भावनाए और श्रद्धा समर्पण संख्या मे कम होने के बाबजूद किसी भी तरह वहाँ से कम न थी। दो-तीन पुरोहितों ने विधिवत मंत्रोचारों के बीच आरती शुरू की। नर्मदा माँ की स्तुति, वंदना और स्तोत्र का वाचन हुआ। कुछ भक्ति गीत नर्मदा मैया की शान मे गाए गये। आरती ग्रहण दर्शन कर रात्रि मे लगभग 9.30 बजे एक घंटे बाद कार्यक्रम समाप्त हुआ। श्री शर्राफ़ जी जो स्थानीय निवासी थे ने बताया कि यह आरती कार्यक्रम 2007 से निरंतर किया जा रहा है। नर्मदा आरती और दर्शन मन को सुकून और सुख देने बाला था। प्रसाद ग्रहण कर हम होटल की तरफ चलने के पूर्व संवरियाँ होटल पर श्री गिरीश जी को भोजन के बिल का भुगतान किया और इस भूलवश त्रुटि के लिये खेद व्यक्त किया। उन्होने बिल के भुगतान के लिये अकारण परेशान न होने की सौजन्यता प्रकट की। उन्होने कहा परेशान होने की क्या आवश्यकता न थी, पैसे आ ही जाते!! ऐसे मेहमान बाजी आज के समय कम ही देखने को मिलती है। होटल आते आते 10 बज चुके थे पहुँचते ही नींद के आगोश मे कब सो गया पता ही न चला।
(शेष अगली पोस्ट मे)

विजय सहगल

1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

सहगल जी आपने तो बिना गये लेख के माध्यम से दर्शन करवा दिये ।आपके लिखने का तरीका ही अतिउत्तम है छोटी छोटी बातें भी शामिल करते हैं ।धनयवाद