रविवार, 24 नवंबर 2019

चौसठ योगिनी मंदिर, मितावली-मुरैना(म॰ प्र॰)

चौसठ योगिनी मंदिर, मितावली-मुरैना(म॰ प्र॰)
गढ़ी पढ़ावली से अब हमारा अगला गंतव्य मितावली ग्राम स्थित चौसठ योगिनी मंदिर था जो गढ़ी पढ़ावली से लगभग 8-9 किमी था। अब तक सूर्य अस्तांचल की ओर बढ़ रहा था। सर्दी के मौसम के कारण कुछ सूर्य प्रकाश कम हो रहा था। शीघ्र मितावली पहुँचकर चौसठ योगिनी मंदिर के दर्शन हेतु उत्सुकता थी। ऐसा बताया गया था कि वर्तमान संसद भवन का निर्माण 64 योगिनी मंदिर के वास्तु नक्शे के अनुरूप बनाया गया है इस चौसठ योगिनी मंदिर का निर्माण लगभग 1600 साल पूर्व ई॰ 1323 मे महाराजा देवपाल द्वारा कराया गया था। जोकि मंदिर का नक्शा देख कर सत्य प्रतीत हो रहा था क्योंकि संसद भवन हू-बा-हू 64 योगिनी मंदिर की तरह ही है आकार आदि को छोड़कर। मितावली कस्बे के प्रारम्भ मे ही पहाड़ी के उपर चौसठ योगिनी मंदिर का निर्माण किया गया है। एक बार पुनः भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा स्थल के रख रखाव के बारे मे कहते हुए फ़ख्र है। पर यहाँ पर जयवीर या राजवीर की तरह पुरातत्व विभाग का कोई कर्मचारी नहीं मिला। महिला एवं पुरुष प्रसाधन की उत्तम व्यवस्था म॰प्र॰ पर्यटन विभाग द्वारा की गई थी पर स्वल्पाहार आदि की कोई व्यवस्था यहाँ भी नहीं थी। प्रवेश मार्ग को अच्छी तरह लोहे की जाली से दीवार मे लगाया गया था ताकि जानवर आदि पर्यटन स्थल मे प्रवेश न कर पाये किन्तु पाषाण से निर्मित प्राचीन बृषभ की जनावरकद प्रतिमा प्रवेश द्वार के अंदर शोभयमान थी। पत्थरों के छोटे छोटे टाइल्स से एक हल्का रैम्प बनाकर मंदिर तक जाने के लिये रास्ता बनाया गया है। रैम्प के बाद पहाड़ी के पत्थर काट कर छोटी बड़ी सीढ़ियाँ मंदिर तक बनाई गई है। इस चढ़ाई पर अब उतने सहज ढंग से चढ़ना हमारे लिये आसान न रहा जैसे कुछ साल पहले तक चढ़ जया करते थे। धीरे धीरे थोड़ी थोड़ी देर विश्राम के बाद चढ़ाई पूरी कर पहाड़ी की चोटी पर स्थित मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचा। पहाड़ी के उपर से गाँव और उसके पार दूर-दूर तक खेत और पगडंडियाँ दूर दूर तक नज़र आ रही थी। सुंदर दृश्य लग रहा था। पहाड़ी की चोटी समतल थी जिसपर चौसठ योगिनी मंदिर बिल्कुल संसद भवन या यूं कहे संसद भवन बिल्कुल चौसठ योगिनी मंदिर की प्रतिकृति लग रहा था। बस मात्र आकार का अंतर था। संसद भवन चौसठ योगिनी मंदिर का अति विस्तृत रूप नज़र आता है। वृत्ताकार चबूतरे पर गोल स्तंभो से वृत्त के आकार पर टिकी छत्त बनाती हुई। मुख्य अंतर दोनों का एक मात्र जो दीख रहा था वह था संसद के बाहरी दालान स्तंभों के बीच बाहर से दिखाई देते है पर मंदिर मे स्तंभों के बीच के दालान मंदिर के अंदर से दिखते है जबकि मंदिर के बाहर स्तंभों के बीच की दालान को समतल पत्थरों से बंद किया गया है जो चित्र मे स्पष्ट देखा जा सकता है। मंदिर मे प्रवेश करने का मात्र रास्ता जो पूर्व दिशा मे बनाया गया है। मंदिर मे प्रवेश करते ही गोल कॉरीडोर के बाद गोलाकार खुला आँगन संसद भवन की ही तरह है। मंदिर के वृत्ताकार खुले आँगन के बाद गोलाकार ही संसद के सेंट्रल हाल की तरह भगवान शिव का मंदिर है मंदिर के चारों ओर स्तंभों के सहारे गोलाकार परिक्रमा पथ बना है। अंदर हर दो स्तंभों के बीच छोटा से मंदिर बना था जिसमे शिवलिंग विराजमान थे जिनकी संख्या 64 थी। लोग इन मंदिर के प्रांगड़ मे एक चक्कर लगा कर भगवान शिव को अपनी भावान्जली अर्पित कर रहे थे। कहा जाता है ये मंदिर तांत्रिक विध्या के केंद्र थे। हमे देख कर सुखद आश्चर्य हो रहा था कि हमारे देश का पुरातन वास्तु शास्त्र कितना उन्नतशील था जिसका निर्माण बगैर किसी आधुनिक मशीनों, उपकरणों बगैर सीमेंट के बनाया गया था। हमे अभिमान होना चाहिए अपने पूर्वजों पर जिनके निर्देशन मे हमारे महान शिल्पकारों ने इतना उत्क्रष्ट निर्माण किया जो हजारों सालों से प्रकर्तिक आपदाओं, बाधाओं का सामना करते हुए आज भी अडिग खड़ा है।
बैसे मै अंधविश्वासों से कोशो दूर रहता हूँ पर कभी कभी जो चमत्कार से प्रतीत होते है उनके पीछे वैज्ञानिक कारणों को मानता हूँ। ऐसा ही एक अनुभव मुझे तांत्रिक चौसठ योगिनी मंदिर के अंदर प्रांगण मे देखने को मिला। मै मंदिर के अंदर के कई चित्र लेना चाह रहा था पर न जाने क्यों दो फोटो लेने के बाद हमने मोबाइल के कैमरे से कई बार फोटो लेने का प्रयास किया तो मेरा कैमरा हर बार ऑफ मोड मे आकर कैमरे को बंद कर देता था। मैंने हर बार ऑन कर कैमरे के चालू करने के इंतज़ार कर पुनः फोटो लेनी चाही पर मोबाइल हर बार ऑफ हो कर बंद हो जा रहा था इस सब पृक्रिया मे 10-15 मिनिट का समय व्यर्थ मे ही जाया हो गया। आखिर थक कर जैसे ही मै मंदिर के बाहर आया तो कुछ फोटो पहाड़ी के नीचे उतारे तब फोटो लेने मे कही कोई परेशानी नहीं हुई। मेरा फिर भी यही मानना है कुछ तकनीकि खराबी मोबाइल मे रही होगी पर चूकि ऐसी घटना हमारे साथ हुई थी इसलिए उल्लेख कर दिया।
शाम के छह बजने को हो रहे थे, सूरज भी ढलने को था अब हमारा गंतव्य यहाँ से 35-40 किमी दूर था अतः अंधेरे के पूर्व, ठौर पर पहुँचने की चाह लेकर आगे बढा। हमे खुशी थी हम जिन पर्यटन स्थानों का लक्ष्य लेकर सुबह निकले थे उन्हे हमने भ्रमण कर पूरा हासिल कर लिया था। बस एक ही टीस मन ही मन मे दर्द उत्पन्न कर रही थी कि पुरातत्व की इन अनमोल धरोहरों को सहेजे समेटे रहने के कारण, धन सम्पन्न होने के बाबजूद मुरैना प्रशासन और उनके अधिकारियों की लापरवाही से, प्रचार प्रसार के आभाव के कारण, सड़क से निष्कंटक जुड़ाव के आभाव, इन पर्यटन स्थलों सुख सुविधाओं के आभाव के कारण निर्धन बना हुआ है??
प्रसंग से हटकर - कभी कभी घुम्मकड़ी करने की कुछ थोड़ी बहुत कीमत अदा करनी पढ़ती है जो मैंने 18 नवम्बर 2019 के भ्रमण की आखिर किस्त का समापन करने की तैयारी करते समय अदा की जिसका चित्र आखीर मे संलग्न है। हम लेखन मे व्यस्त रहे वहाँ अग्नि देवता को आधा लिटर दूध की आहूति समर्पित हो गई। हा-हा-हा - नमस्कार॰

विजय सहगल

गुरुवार, 21 नवंबर 2019

बटेश्वर मंदिर श्रंखला, मुरैना, म॰प्र॰

बटेश्वर मंदिर श्रंखला, मुरैना, म॰प्र॰
18 नवम्बर 2019 को ही शनीचरी मंदिर से प्रस्थान कर अब हमारा अगला पढ़ाव बटेश्वर मंदिर श्रंखला थी। दिशा सूचक बोर्ड के अनुसार बटेश्वर की दूरी यहाँ से 8 किमी थी। शनीचरी मंदिर से रास्ता पक्का लेकिन सिंगल सड़क थी जो निपट सुनसान जंगल के इलाके से होकर जा रही थी। रास्ते मे इक्का दुक्का व्यक्ति ही दिख रहे थे। इन कंटीले पेड़ो के जंगल के बीच आगे रास्ता दो भागों मे बंट गया। हमे किस रास्ते जाना था यहाँ कोई भी दिशसूचक बोर्ड या बताने बाला कोई आसपास न दिखा। अकड़-बकड़-बम्बे बोल........ कर बायें तरफ की रोड पकड़ ली, और जैसा होता है गलत रास्ता ही पकड़ हम उसी रास्ते पर बढ लिये। 4-5 किमी तक कोई भी व्यक्ति न मिला जिससे बटेश्वर का रास्ता पूंछते पर खुशी इस बात की थी रास्ता पक्का था इसलिये अपनी धुन मे मस्त उढ़ते पंछी की तरह बिलकुल शांत सुनसान सड़क पर आगे बढ़ते रहे। दूर दूर तक कंटीले पेड़ो के जंगल ऊंचे पहाड़ो मे नज़र आ रहे थे। एक दम सुनसान। तभी सड़क से हटके दूर एक व्यक्ति जो अपने जानवरों को चरा रहा था, ज़ोर से आवाज देकर बटेश्वर का रास्ता पूंछा? उसने बापस जाने का इशारा कर पीछे छूटे दोराहे पर दूसरी रास्ता पकड़ने को कहा जो गाँव से होकर जाती है। हम जिस रास्ते पर थे वो आगे एबी रोड पर स्थित बनमोर ग्राम जा रही थी। हमने मोटर साइकल को बापस यू टर्न लेकर पुनः4-5 किमी बापस दोराहे पर पहुँच कर सही रास्ते पहुंचे। अब गाँव मे कुछ आवादी नज़र आई। एक दो ग्रामीणों से पुनः सुनिश्चित किया कि हम सही रास्ते पर है। आगे अब खुला इलाका था दूर दूर तक खेत नज़र आये। खेतों मे सरसों की छोटी-छोटी पौध धरती को चीर कर बाहर निकल रही थी। पोरसा शाखा के प्रवास पर हमे मालूम था कि सरसों की खेती मे बीज रोपने के बाद बहुत मेहनत नहीं करनी पढ़ती। एकाध पानी देने के बाद सर्दी की नमी से फसल लहलहाने लगती है और जंगली जानवर भी सरसों की फसल को नहीं खाते इसका आजकल अंदेशा बहुत रहता है। इसी बीच रास्ते मे मधु मक्खियों का एक बड़ा झुंड सड़क से 15-20 फुट ऊंचे सड़क से गुजरता नज़र आया। जल्दी ही हेलमेट की स्क्रीन को नीचे कर तेज स्पीड से मोटर साइकल को वहाँ से निकाला। आगे इसी सरसों की फसल मे फरवरी माह मे खेतों मे दूर दूर तक सरसों के पीले-पीले फूल नज़र आयेंगे जो होली के त्योहार के आने की पूर्व सूचना देते है। बटेश्वर आने के कुछ किमी दूर सड़क के दोनों ओर पत्थरों की गहरी गहरी खदाने नज़र आ रही थी। खदान मे पत्थर का खनन होने के कारण काफी गहमा गहमी नज़र आ रही थी। बड़ी बड़ी जेसीबी मशीनों से पत्थरों को उठाया जा रहा था। जेनरेटर के माध्यम से पत्थरों मे ड्रिल मशीन की आवाज़े आ रही थी। मुरैना जिला दुर्भाग्य से अवैध रेत और पत्थर खनन के लिये कुख्यात रहा है। कुछ साल पूर्व इन्ही अवैध खदानों मे खनन के कारण एक आपराधिक घटना मे एक भारतीय पुलिस सेवा के एसपी की मौत हो गई थी। अब हमे उस व्यक्ति की याद आ रही थी जिसने शनीचरी मंदिर के रास्ता पूछने पर हमसे पूंछा था क्या कुछ जांच करने आये हो? जब हमने उसे बताया था कि हम दिल्ली से आये है। यहाँ अवैध पत्थर खनन के कारण आये दिन आपराधिक घटनायें घटती है जिनके कोर्ट कचहरी, जांच आदि करने अधिकारी आते रहते है और मामले चलते रहते है। इसीलिये हमने खदानों की फोटो लेने मे पूर्णतया: परहेज किया ताकि जांच अधिकारी होने की आशंका को निर्मूल सिद्ध करें क्योंकि मुखबिरी की कोई भी शंका रेत और पत्थर माफिया आपके लिये कोई भी मुसीबत ला सकते है।
गाँव से निकल कर 4-5 किमी आगे सड़क किनारे लोहे की जाली से घिरी बाउंड्री बाल नज़र आती है मुख्य गेट से 2-3 सौ मीटर आगे बढ़ने पर दाहिनी तरफ स्कूटर एवं कार पार्किंग की समुचित व्यवस्था की गई थी। इस 2-3 सौ मीटर रास्ते को देख कर ऐसा प्रतीत नहीं होता की अंदर पुरातात्विक दृष्टि से सम्पन्न बटेश्वर मंदिर श्रंखला भी हो सकती है। साफ सुथरा टॉइलेट भी उपलब्ध था जिसका हमने इस्तेमाल कर लाभ उठाया। पर इसके अलावा चाय पान की कोई व्यवस्था यहाँ उपलब्ध नहीं थी। प्रचार प्रसार के अभाव मे सिर्फ 4-5 पर्यटक ही नज़र आ रहे थे जो स्थानीय या आसपास के क्षेत्र के निवासी ही प्रतीत हो रहे थे। यहाँ से मंदिर श्रंखला दूर से ही दीख रही थी। प्रवेश करते ही हरी घास के मैदान के पार साफ सुथरे चबूतरे पर एक कतार मे सुंदर, सुव्यवस्थित, मंदिर की तीन-चार कतारें देखने मे बड़ी मनोहारी नज़र आ रही थी। सुंदर साफ हरे घास के मैदान इस सुंदरता मे चार चाँद लगा रहे थे। पहली दृष्टि मे ही इस मंदिर श्रंखला को देखकर अल्मोड़ा स्थित जागेश्वर धाम की याद हो आई। वहाँ भी ठीक इसी तरह एक ही परिसर मे अनेकों मंदिर इसी तर्ज़ पर बने है।
प्रवेश के रास्ते पर सबसे पहले लगभग 25-30 ऊंची सीढ़ियों के उपर विशाल चबूतरे पर एक मंदिर था जो नीचे से पूरी तरह नज़र नहीं आ रहा था। उपर चढ़ने पर विशाल चार वर्गाकार मंडप से घिरा मुख्य मंडप मंदिर खजराहों मंदिर की तरह लग रहा था। उक्त मंदिर के दर्शन और वास्तु निर्माण खुश नुमा मौसम मे आँखों को सुखद और सुंदर दिखा, इसे देखने के बाद सीढ़ियों से उतरकर हम मंदिर श्रंखला को देखने के लिये बढ़े। दो ऊंचे ऊंचे कलात्मक स्तम्भ रुपी प्रवेश द्वार की तरह प्रतीत हो रहे थे। पहाड़ी की ढलान पर सुंदर घास का बड़ा मैदान बनाया गया था। हल्की चढ़ाई के बाद एक विशाल समतल चबूतरे पर 7-8 मंदिर एक लाइन मे श्रंखलावद खड़े नज़र आ रहे थे। हर पंक्ति की श्रंखला मे चबूतरे के लगभग 2-3 फुट उपर चबूतरे पर मंदिरों की अगली श्रंखला बनी थी। इस तरह 4-5 मंदिरों की श्रंखला एक के उपर एक समतल चबूतरे पर बहुत ही नयनाभिराम लग रही थी। नीचे दूर बने घास के मैदान से हरे-भरे पेड़ों की पृष्ठभूमि मे मंदिर का दृश्य बड़ा मनोहारी था। रात मे मंदिर परिसर मे फ्लड लाइट की भी व्यवस्था दिखी जो निश्चित ही रात्रि मे देखने का एक अलग ही सुखद अहसास कराती होगी। मंदिर की व्यवस्था मे लगे जयबीर से मुलाक़ात हुई उसने अपनी जानकारी अनुसार मंदिर का विवरण बताया। उसने बताया की इस जगह पर मंदिर के अवशेष यहाँ वहाँ पड़े थे। जिनकी पुनर्स्थापना अयोध्या के राम मन्दिर मे अपनी पुरातत्विक राय देने से प्रसिद्ध हुए श्री के के मुहम्मद की देख रेख मे सम्पन्न हुयी है। कुछ मंदिरों की पुनर्स्थापना का कार्य अभी निर्माणाधीन है। एक मंदिर अपनी मूल अवस्था मे अधबना दिखाई देता है जिसकी तुलना मुरैना के ही ककनमठ के मंदिर से की जा सकती है जो अपने विशाल पत्थरों से अध बने मंदिर के रूप सैकड़ों साल से खड़ा है एवं यहाँ से 30-32 किमी दूर है। कई मंदिरों के मुख्य दरवाजे की उपर भगवान विष्णु के दशाव्तार को उकेरती मूर्तियों के दर्शन से होते है। इन मंदिरों का निर्माण काल 6-7 शदी ई पूर्व प्रतिहार काल के राजाओं द्वारा कराया गया बताया जाता है। एक छोटे मंदिर मे भगवान शिव अपने पंचमुखी रूप मे विराजमान है। अति प्राचीन मुख्य शिव मंदिर भूतेश्वर महादेव मे ग्रामीण मुख्य पर्वो मे पास मे ही स्थित कुंड का जल अर्पित कर अपनी श्रद्धा अर्पित करते है। उक्त मंदिर श्रंखला बहुत कुछ उत्तराखंड के अल्मोड़ा के पास स्थित जागेश्वर धाम की तरह प्रतीत होती है। ये बात अलग है कि जागेश्वर धाम जीवंत मंदिर, तीर्थ के रूप मे स्थापित है।
ऐसा बताते है इस स्थान पर छोटे बढ़े सैकड़ों मंदिर के अवशेष पड़े है जिनकी पुनर्स्थापना होना अभी बाकी है। मंदिर मे कुंड के किनारे एक हनुमान जी की मूर्ति भी रखी है जिसकी भी पूजा अर्चना आसपास के रहवासी करते है। दो विशाल स्तंभों के द्वार से पुनः निकल कर हम अपने अगले गंतव्य गढ़ी पढावली की ओर अग्रसर हुए।
लेकिन इस बात का उल्लेख करना मै अपना परम कर्तव्य समझता हूँ कि इस स्थान के रख रखाव के लिये पुरातत्व विभाग की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है। इस हेतु ये विभाग और जयबीर जैसे उनके कर्मठ कर्मचारी बाकई बधाई के पात्र है जिनकी कर्मठता के कारण पुरातत्व की इस अमूल्य धरोहर को सहज और सुंदर ढंग से संजोया और संवारा गया है। क्या ही अच्छा होता यदि म॰प्र॰ सरकार के सड़क विभाग और पर्यटन विभाग भी इसी समर्पण भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करते। (गढ़ी पढ़ावली और मितावली अगली पोस्ट मे)
विजय सहगल

मंगलवार, 19 नवंबर 2019

"शनीचरी मंदिर-ऐंती (मुरैना- म॰प्र॰) "



"शनीचरी मंदिर-ऐंती (मुरैना- म॰प्र॰) "
चंबल क्षेत्र मे स्थित मुरैना जिला, पुरातत्व की दृष्टिकोण से काफी समृद्धशाली है, पर पर्यटन की दृष्टि से प्रचार प्रसार और रोड की जुड़ाव या रोड का टूटा-फूटा होने और पर्यटन स्थल पर सुविधाओं की कमी के कारण पर्यटक देश के अन्य पर्यटन स्थलों के मुक़ाबले बहुत कम आते है। ग्वालियर से दिल्ली नोएडा अनेकों बार सड़क के रास्ते गये, हर बार बनमोर के बाइपास पर पढ़ावली बटेश्वर मितावली का एक बोर्ड देख कर जाने का प्लान अनेकों बार बनाया पर परिवार और मित्रमंडली मे कभी कोई तैयार तो दूसरा तैयार न होता इसी तरह प्लान टलता रहा। आज 18 नवम्बर 2019 को मौसम अच्छा था धूप मे तीखा पन कम था, हल्की सर्दी थी। आज मैंने किसी से चलने का आग्रह न कर अकेला ही मोटर साइकल का रुख भिंड रोड से मुरैना बाईपास के ओर मोड़ दिया। लक्ष था ग्वालियर से लगभग 28 किमी दूर शनीचरी मंदिर और बाद मे पढ़ावली-बटेश्वर और मितावली की सैर करना। ये चारों जगह एक ही रास्ते पर आपस मे कुछ किमी की दूरी पर जुड़े है। बाईपास के उसी बोर्ड पर पहुँच कर बताई दिशा अनुसार मार्ग का अनुसरण कर आगे बढ़ा। रास्ता धूल भरा था कुछ काम चल रहा था सोचा आगे रास्ता अच्छा मिलेगा और मन मे ये ही ईक्षा रख कर आगे बढ़ता रहा। पर रास्ता अच्छे होने की कहीं कोई आशा नज़र न आई। तभी एक ग्रामीण शिव शंकर जी जो गाय, भैंस चरा रहे थे से मैंने पूंछा क्या शनिचरा का रास्ता ऐसा ही है तो उन्होने बताया अभी रास्ता ऐसा ही कच्चा है तब हमे बड़ी कोफ्त हुई पर उनके द्वारा उनके घर चल कर भोजन करने के निश्चल एवं प्रेम भरे आग्रह ने हमे लगातार आगे बढ्ने के लिये प्रेरित किया। मध्य प्रदेश सरकार पर जिसका पर्यटन विभाग तो अपना कार्य मुस्तैदी से करता है पर सड़क परिवहन विभाग अपनी मंथर और ढुलमुल गति से ही कार्य करने मे मस्त है। सड़क तो चौड़ी बनाई जा रही थी पर जिस गति से काम चल रहा था लगता ही 4-5 साल तो लग ही जाएंगे। मैंने अपने ब्लॉग "गढ़ कुडार का किला" की सड़क के बारे मे भी (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/12/blog-post_11.html) ऐसी ही प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। शनीचरा रेल्वे स्टेशन से आगे से 2-3 किमी आगे धूल धूसरित रोड पर पहला पढ़ाव शनीचरी मंदिर था। जब एक रहवासी से हमने मंदिर का रास्ता पूंछा तो रास्ता बताते हुए उसने मुझ से पूंछा कि कहाँ से आए है। मेरे दिल्ली बोलने पर उसने पुनः पूंछा कोई जांच बगैरह कों आये का? मैंने न मे सिर हिलाया। इस जांच का अर्थ मुझे बाद मे पता चला जिसका जिक्र मे आगे की यात्रा मे करूंगा।
मंदिर के 1 किमी पहले रास्ता कुछ ठीक मिला सिंगल रोड थी पर पक्की और अच्छी थी। शनीचरी मंदिर के आधा किमी पहले एक छोटे से किले नुमा गढ़ी थी जो राधा कृष्ण मंदिर के नाम से जानी जाती है। प्राचीन मंदिर था मंदिर के महंत जी काफी बुजुर्ग थे जिनको प्रणाम कर मंदिर के दर्शन किए। भगवान राधा कृष्ण की प्राचीन मूर्तियाँ विराजमान थी। मंदिर के बाहर एक बहुत बड़ी कड़ाही और दूसरी समतल विशाल कड़ाही रखी थी मंदिर के उपमहंत जी ने बाताया कि जब कभी किसी भक्त की मनौती पूरी होती है तो मंदिर मे कड़ाही मे खीर और समतल कड़ाही मे मालपूए का प्रसाद बनाये जाते है।
बमुश्किल आधा किमी आगे सीमेंटिड रोड से जुड़े शनीचरी मंदिर पहुंचे। शनीचरी मंदिर की मुरैना चंबल क्षेत्र मे बड़ी मान्यता है। ऐसी मान्यता है कि विश्व का ये एक मात्र प्राचीन शनि देव मंदिर है। ऐसा बताते है शिर्डी के पास स्थित शनि सिगनापुर से भी प्राचीन ही ये मंदिर। मान्यताओं और कथाओं के अनुसार ग्राम ऐँती जिला मुरैना के इस मंदिर मे प्रदर्शित पटल पर एक कहानी के अनुसार त्रेता युग मे हनुमान द्वारा लंका मे आग न लगने के निरर्थक प्रयास की तह मे जाने पर ज्ञात हुआ कि भगवान शनि देव को रावण ने अपने सिंहासन के पैरों तले आसन मे बंधक बना रखा है, जिनके रहते लंका मे आग नहीं लगेगी। हनुमान ने उन्हे मुक्त करा लंका छोड़ने को कहा किन्तु दुर्बल काया के कारण शनिदेव चलने मे असमर्थ थे। शनि देव की आज्ञा अनुसार हनुमान ने उन्हे लंका से आसमान मे उछाल कर फेंका तो वे लंका से निकल इस ग्राम ऐंती मे ही गिरे थे। इस लिये विश्व के एक मात्र इकलौते प्राचीन शनि देव का ये मंदिर पौराणिक मान्यताओं के कारण धार्मिक रूप से अति महत्वपूर्ण है।
दूर दूर से लोग इस प्राचीन मंदिर मे दर्शन हेतु आते है। मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार प्रशासन और भक्तों द्वारा बड़ा विशाल और भव्य बनाया गया है। मंदिर के बाहर दुकानों मे शनि देव पर चढ़ाया जाने बाला सरसों का तेल एवं पूजा की अन्य सामग्री मिलती है। मै ऐसे ही तुक्का लगा कर कह रहा हूँ शायद ये ही एक कारण हो कि देश मे मुरैना जिले मे ही सबसे ज्यादा सरसों की खेती और सरसों के तेल का उत्पादन होता है चूंकि मेरी पदस्थपना मुरैना जिले की पोरसा तहसील मे 4 साल तक रही है। जो व्यक्ति शनि के कोप से पीढ़ित है उनका दोष शांत और दोष दूर करने के लिये पंडित जोशी जी और अन्य पंडित जन पूजा पाठ कराते है। चूंकि आज शनिवार नहीं था अतः यहाँ भीड़ भाड़ न के बराबर थी। पर मंदिर प्रांगढ़ मे लगी लोहे की रेलिंग को देख कर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ शनिवार या अन्य पर्वों पर काफी भीड़ जुटती है। मंदिर परिसर मे तीन मंज़िला एक उपद्वार भी है जिसमे प्रवेश कर कुछ सीढ़ियाँ नीचे उतरकर शनिदेव के मंदिर मे जाया जाता है। शनिदेव की प्रतिमा काफी प्राचीन और भव्य है जिसके मुख मण्डल पर एक अलग ही प्रकार की आभा मण्डल से परिपूर्ण तेज प्रदर्शित होता है। मंदिर का मंडप छोटा है जिसमे एक ओर से श्रद्धालूँ प्रवेश कर शनिदेव को तेल अर्पण दर्शन कर दूसरे रास्ते से निकल जाते है। यध्यपि एक दो दर्शनार्थी के रहते हुए भी किसी विशेष यजमान की पूजा अर्चना मे व्यस्त होने के कारण मुख्य पुजारी जी से अनौपचारिक वार्तालाप न हो सका। विशेष पूजा अर्चना हेतु छोटा से स्थान दोनों रस्तों के बीच स्टील के पाइप से बनाया गया है जिसमे बमुश्किल 4-5 दर्शनार्थी ही बैठ सकते है। दीप जलाने हेतु दीप स्तम्भ मंदिर के बाहर बनाया गया है। मंदिर के पार दूर सामने दर्शनार्थियों को बैठ कर मंदिर के दर्शन और मंदिर मे भक्तों के नयनाभिराम द्रश्यों को देखने हेतु सीढ़िया बना कर दीर्घा बनाई गई है। मंदिर परिसर मे भगवान गणेश, राधा कृष्ण और हनुमान मंदिर भी बना है। रेलिंग द्वारा मंदिरों को इस तरह जोड़ा गया है कि आप दर्शन मार्ग मे प्रवेश कर समस्त मंदिरों के दर्शन कर ही बापस होंगे। मंदिर के आँगन मे दोनों ओर नीचे जल कुंड बने है जिनमे जल प्रवाहित होता रहता है।
मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के काफी पहले श्रद्धालुओं के स्नान के लिये कई स्थानों पर प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ने कई कई फब्बारे नुमा पाईप लाइन डाली गई है। सभी दर्शनार्थी स्नान के बाद अन्तः वस्त्रों मे ही दर्शन हेतु मंदिर मे प्रवेश कर पूजा अर्चना हेतु जाते है। इसे मान्यता कहे या टोटका या अंधविश्वास स्नान के बाद भक्त जन अपने पुराने कपड़े जैसे शर्ट, पैंट, पैजमा, जूता चप्पल आदि उसी स्थान पर हमेशा के लिये छोड़ देते है। ऐसा कहा जाता है कि शनिदेव के दर्शन के पूर्व दर्शनार्थी अपने वस्त्र और जूता चप्पल आदि अपने दुःख दारद्रिय के रूप मे छोड़ कर शनि दोष का निवारण करते है। श्रद्धालुओं का ये दारद्रिय मार्ग के दोनों ओर वस्त्रों के ढेर के रूप मे प्रशासन का दुःख जरूर बढ़ाता है। क्या ही अच्छा हो मंदिर प्रशासन या कोई स्वयं सेवी संस्था आगे आकार इन वस्त्रों और जूते चप्पलों का निपटान सम्मान जनक रूप मे कुछ इस तरह कर सके ताकि ये किसी के पुनः काम आ सके। श्री शनि देव महाराज की-जय! (पढ़ावली बटेश्वर मितावली का विवरण अगली पोस्ट मे)

विजय सहगल

शनिवार, 16 नवंबर 2019

बच्चों की कवितायें

बच्चों की कवितायें






चंद्रमा
चंदा मामा
पहन पजामा
चमके आधी रात को।
खाते दूध और भात को॥
कभी रात  मे छोटे होते।
कभी गोल और मोटे होते॥
हम जाते है जहां जहां।
साथ मे पहुंचे वहां वहां॥ 

सूरज
पूरब से सूरज का उगना।
चंदा से आकार मे दुगना॥ 
किरणों संग आकाश मे आता।
खोल आँख कर हमे जागता॥
विस्तर से हम झट उठ जाते।
बस्ता ले स्कूल को जाते॥

बादल
धवल सुनहरे  भूरे काले।
बादल छोटे-बड़े मतवाले॥ 
आसमान मे जिनका घर है।
उड़ते यहाँ  वहाँ न डर  है॥
पानी बादल भर भर लाते।
प्यासी धरती प्यास बुझाते॥


हवा
ठंडी - ठंडी  चले हवा।
उड़ी पतंग चील कौवा॥
हिलती टहनी असर दिखाती।
फिर भी हवा नज़र न आती॥   
आँधी बहन है भाई तूफान।
तोड़-फोड़ करता  नुकसान॥    

मेला -1

दौड़ दौड़ बच्चों का रेला।
चला  देखने गाँव का मेला॥
नंदू, मुन्ना,  चुन्नू आगे।
देख हिंडोला सरपट भागे॥
भालू नाचा, बंदर आया।
मदारी ने जब खेल दिखाया॥
शेर दहाड़ा, ऊट भी  जागा।
कड़दम-कड़दम घोड़ा भागा॥

मेला -2
हाथों मे थे रंग रँगीले।  
लाल हरे गुब्बारे पीले॥
गर्म जलेबी, मुँह को आती।  
बर्फ की चुस्की, मुन्नी खाती॥  
गुड़िया के थे मीठे बाल।  
बच्चों ने भी किया धमाल॥  


रेल गाड़ी

छुक छुक करती रेल गाड़ी।
शोर मचाती रेल गाड़ी॥
सफेद ड्रेस में गार्ड जी आते।
लाल-हरी झंडी दिखलाते॥
काली ड्रेस में टी.सी. आता।
टिकट चैक कर अकड़ दिखाता॥  
लाल ड्रेस के कुली बुलाते।
हम सब का सामान उठाते॥


"रिमझिम-बरसात"

जैसे बूंदे नभ से आती।
धरती हरी भरी हो जाती॥
कोयल कूंके राग सुनाये।
मोर "मेयो-मेयो" कर गाये॥  
दादाजी  बच्चों को डांटे।
बच्चे छोड़ वस्ता ओं छाते॥
भीग रहे थे  कर मनमानी।
रिमझिम-रिमझिम बरसे पानी॥

विजय सहगल


बुधवार, 13 नवंबर 2019

"मादक पदार्थों की लत"


"मादक पदार्थों की लत"




जैसे जैसे देश मे औध्योगीकरण और प्रगति हुई है देश के लोगो का आर्थिक विकास भी उसी गति से हुआ है और इस प्रगति के साथ समाज मे कई तरह की बुराइयों ने भी अपना घर बनाया है। इन बुराइयों मे तमाम तरह के नशे के साथ ड्रूग के नशे की समस्या की गंभीरता का अहसास मैंने 2017-18 मे प्रायः लंच के समय एक बार फिर  अपने मित्रों, विनय मल्होत्रा, रमन कपूर, अतर सिंह तोमर, विनोद जैन आदि के साथ देश की राजधानी नई दिल्ली के ह्रदय स्थल कनॉट प्लेस मे घूमते समय बाहरी सर्कल के कोनों  मे कचड़ा बीनने बाले एवं भिखारियों द्वारा अफीम, गाँजा या ड्रूग के नशे के धुएँ के उठ रहे गुबार के  रूप मे देखा था। हमे लगता है कनॉट प्लेस के  ये कोने ड्रूग या अन्य मादक पढ़ार्थों को उपयोग करने बाले लोगो से आज भी गुलज़ार हो रहे होंगे। देश की राजधानी का जब ये हाल है तो आप समझ सकते है इन मादक पदार्थों के व्यापारियों  का जाल छोटे एवं मध्यम शहरों मे कितने मजबूती से फैला होगा। ड्रग एवं अन्य मादक पदार्थों के सेवन मे बड़ी तादाद मे न केवल गरीब परिवारों के बच्चे बल्कि  संभ्रांत परिवारों के  छात्र, व्यापारी या सरकारी और गैर सरकारी विभागों के कर्मचारियों , अधिकारियों तक को अपनी गिरफ्त मे लेते  देखा जा सकता है।     

आज के नवभारत टाइम्स मे मादक पदार्थों से  नशे की लत के उपर एक पूरे परिशिष्ट को देख कर एवं अपने कॉलेज जीवन मे रेडियो पर सुनी बहुत पुरानी वार्ता पुनः याद आ गई जिसमे किसी भी प्रकार के नशे या डृग के नशे से  पीढ़ित व्यक्ति को उसकी लत के लिये उसे प्रताड़ित नहीं करने की नसीहत दी गई। उक्त परिचर्चा मे बताया गया था ड्रग के नशे से प्रभावित व्यक्ति वास्तव मे इस लत से बीमार है और बीमारी का ईलाज डॉक्टर की देख-रेख मे दबा से ही किया जाता है। ड्रग के नशे से प्रभावित व्यक्ति की ईक्षा शक्ति का पूरी तरह अभाव होकर अपने आप पर नियंत्रण खो कर नशे की गिरफ्त मे आ जाता है। उस पीढ़ित व्यक्ति को परिवार और समाज के नैतिक समर्थन एवं उसके फ़ैमिली या फ्रेंड को यह समझना पड़ेगा कि यह एक बीमारी है, न कि उसकी गलती। इस लत या अडिक्ट का इलाज साइकायट्रिस्ट द्वारा काउंसिलिंग और दवा से संभव है। मनोवैज्ञानिक, पीढ़ित को प्रेरित कर यह काम बखूबी कर सकते हैं।

ऐसे ही एक शाखा मे शाखा प्रमुख रहते हुए ही एक  ऐसे ड्रूग एडिक्ट  स्टाफ के साथ कार्य करने का अप्रत्याशित  मौका पड़ा। उनके कई तरह के नशे की बीमारी के कारण शाखा के कार्यकलापों पर काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ा लेकिन इसके बाबजूद भी नशे के दुष्परिणाम को ही हमने इन अप्रिय घटनाओं का कारण मान उन्हे या उनके व्यवहार को  कभी उक्त खेदजनक घटनाओं के लिये दोषारोपण नहीं किया। उन स्टाफ के नशे  के कारण  एक डॉक्टर जो उस शहर के बहुत बड़े शासकीय  चिकित्सा संस्थान के न्यूरोलोज़ी विभाग के प्रमुख थे, मेरे पास मेरी कैबिन मे आये चूंकि मै  उन्हे एक सम्मानित नागरिक और ग्राहक के नाते अच्छी तरह पहले से ही जानता था, उन्हे आदर सहित बैठाया। पर उनके चेहरे पर क्षोभ और नाराजी साफ देखी जा सकती थी। मैंने उनका कुशल क्षेम पूछने के पश्चात शाखा मे पधारने के आशय का  निवेदन किया, तो वे काफी दुःखी नज़र आये। उन्होने कहा कि मै आपके बैंक का बहुत पुराना ग्राहक हूँ पर आज आपके स्टाफ के दुर्व्यवहार से काफी क्षुब्ध हूँ। उनकी बात सुनकर मै स्तब्ध था मैंने हाथ जोड़ कर उनसे कहा सर मै आपको अच्छी तरह जनता हूँ और आप जैसे ग्राहक हमारे संस्थान के लिये सम्मान के पात्र हैं। कृपया आप बैठे और मुझे आपके साथ हुई धृष्टता के बारे मे बताये? उन्होने जब बताया कि काउंटर पर बैठे ऑफिसर को जब मैंने पासबुक प्रिंट कर  अपडेट करने को दी जो शायद जेब मे रखे होने के कारण कुछ तुड़-मुड़ गई थी।  उस ऑफिसर ने छूटते ही कहा आप एक पास बुक तो सम्हाल नहीं सकते अपने  मरीजों को कैसे सम्हालते होंगे? बैंक हाल मे समस्त ग्राहकों के सामने ऐसे प्रत्युत्तर की अपेक्षा उनको भी नहीं रही होगी। अन्य ग्राहकों के समक्ष यह  सुनकर उन्हे काफी बुरा लगा और वे मेरे पास उक्त अफसर की शिकायत लेकर दुःखी मन से मेरे पास आये। मुझे भी उक्त अप्रिय घटना से काफी  पीढ़ा हुई मैंने उनकी पास बुक खुद अपडेट कराकर स्टाफ के कुक्रत्य के लिये क्षमा मांगी और भविष्य मे किसी भी सेवा के लिये उन्हे सीधे मेरी कैबिन मे आने का निवेदन किया। मैंने सौजन्यता वश चाय आदि के लिये पूंछा पर अनेपक्षित  माहौल के कारण डॉक्टर साहब पासबुक लेकर चले गये।

एक अन्य दिन एक व्यापारी ग्राहक उन्ही अफसर की शिकायत लेकर हमारे पास आये और बताया कि जीवन बीमा निगम द्वारा जारी चैक उन्होने समाशोधन के माध्यम से जमा करने हेतु उक्त ऑफिसर को दिया था लेकिन 3-4 दिन बाद भी न तो चैक का भुगतान खाते मे आया और न ही चैक बापस  उन्हे मिला। उनकी बैंक सील के साथ पावती स्लिप  उन ग्राहक महोदय ने  हमे दिखाई। चैक उन्होने इन अफसर के सुपुर्द किया था। मै  भी हैरान था कि जब  चैक जमा हुआ है तो या तो उसका भुगतान आना चाहिये या अनादरित चैक बापस मिलना चाहिये? हमने क्लियरिंग से संबन्धित स्टाफ से पूंछ-ताछ की, चैक को यहाँ-वहाँ खोजा पर चैक नहीं मिला। अब समस्या खड़ी हो गई किया क्या जाये? संबन्धित ऑफिसर ने भी  जो नशे से पीढ़ित होने के कारण इस संबंध मे कुछ बताने से  हाथ खड़े कर दिये। स्वाभाविक था कि 90-92 हजार की रकम का चैक था ग्राहक भी शिकवे-शिकायत की धमकी दे रहा था। उत्तम एवं त्वरित ग्राहक सेवा का उदाहरण के रूप मे  अब केवल  एक ही रास्ता था कि ग्राहक से निवेदन कर जीवन बीमा निगम से दूसरा चैक बनाने का निवेदन किया जाये।  इस हेतु मैंने ही ग्राहक से स्वयं ही कहा कि हम  जीबन बीमा निगम को इस आशय का पत्र लिख देते है  कि चैक बैंक मे गुम हो गया ताकि इस पत्र के आधार पर जीबन बीमा निगम शीघ्र चैक जारी कर दे। संबन्धित व्यक्ति हमारे बैंक का पुराना  ग्राहक था, अतः  हमने  उत्तम ग्राहक सेवा का परिचय एवं आपसी विश्वास के तहत ग्राहक को इस आशय का पत्र दे दिया ताकि इसके आधार पर जीवन बीमा निगम शीघ्र डुप्लिकेट चैक ग्राहक को  जारी कर दे।  ऐसा हुआ भी 3-4 दिन मे डुप्लिकेट चैक जारी होकर समाशोधन के माध्यम से ग्राहक के खाते मे जमा भी हो गया।

बात आयी-गयी हो गई। मै समझा था मामला समाप्त हो गया, पर कुछ दिन बाद उक्त ग्राहक ने अपने  बकील के माध्यम से एक नोटिस बैंक को भेजा, जिसमे बैंक द्वारा चैक को गुमाने से ग्राहक के व्यापारिक बिल की बापसी से उपजी क्षति की प्रतिपूर्ति हेतु बैंक से 2 लाख रुपए की मांग की गई। उक्त क्षतिपूर्ति के अभाव मे उपभोक्ता न्यायालय मे केस दर्ज कराने की बात कही गई। नोटिस को पाकर मै भी हैरान परेशान हो गया कि बड़ी मुश्किल से तो चैक का झंझट निपटा था और कहाँ से फिर एक नई मुसीबत गले पड़ गई। चूंकि चैक बैंक मे गुम होने का पत्र मैंने पहले ही उक्त ग्राहक को दे दिया था जिसके आधार पर उसका पक्ष मजबूत था अतः उसने उपभोक्ता न्यायालय मे हमारे विरुद्ध याचिका दाखिल कर दी।

मैंने शाम के उक्त ग्राहक से उनके बाज़ार स्थित प्रतिष्ठान पर नोटिस के संबंध मे बात करने का निश्चय किया। एक-डेढ़ घंटे चली बैठक मे हमने उनसे निवेदन किया कि हमने ही आपकी सुविधा हेतु ये  स्वीकारते हुए कि चैक बैंक से खो गया है इस आशय का पत्र दिया था। इस पत्र के आधार पर ही आपको डुप्लिकेट चैक प्राप्त हो गया। फिर क्यों आपने ये नोटिस दे दिया? हमने आप पर पूर्ण विश्वास कर उक्त पत्र दिया था फिर आपको इस का दुर्पयोग कर बैंक/हमारे  विरुद्ध कार्यवाही करना उचित नहीं? पर उक्त व्यापारी अब नये व्यापार पर उतार आया था। वह हमारी गलती को ब्लैकमेल कर हमसे पैसा ऐठना चाहता था। मैंने कहा भी कि इस पूरी प्रिक्रिया मे मुश्किल से 4-5 दिन लगे और आप को चैक का भुगतान मिल गया। जिस ऑफिसर ने आप का चैक गुमाया उसको तो कुछ नहीं हुआ और हमने आपको चैक गुम होने का पत्र दे कर आपकी सहायता की तो हम ही को आप सजा दे रहे है ये तो सरासर गलत हैं। पर उक्त व्यापारी हमारी गलती का पूरा-पूरा फायदा उठाना चाहता था अतः उसने किसी भी तरह का सहयोग करने से माना कर दिया। जब हमने बज़ार के अन्य अपने परिचित व्यापरियों से बात की तो किसी व्यापारी ने उक्त व्यापारी के पिता से मिलने को कहा जो उस समय 80-85 साल से उपर के रहे होंगे और बड़े धार्मिक प्रवृत्ति के थे। अगले दिन मै उनके घर उनका पता पूंछते-पूंछते गया। सौभाग्य से वे घर पर मिल गये। काफी उम्रदराज बुजुर्ग थे। धोती कुर्ता पहने माथे पर लंबा चौड़ा तिलक लगाये काफी सौम्य और धार्मिक सरल व्यक्तित्व के लग रहे थे। मैंने चरण वंदन कर उनसे अपना परिचय दे कर सारी समस्या कह सुनाई। उनका बेटा भी वही था। काफी बड़ा घर और संयुक्त परिवार लग रहा था। हमे पूरा विश्वास था उक्त बुजुर्गबार हमारी सत्यनिष्ठा और मदद करने के भाव के मद्देनज़र हमारी मदद करेंगे और अपने बेटे से उक्त कानूनी नोटिस को बापस लेने के लिये कहेंगे। घर पर स्थित उनके सारे 5-6 भाईयों ने एक साथ बैठ कर चाय पिलाते  हुए उक्त घटना की चर्चा भी की। उनके पिता श्री की बातों से लगा कि उनके पुत्रों ने प्रकरण के बारे मे उन्हे पहले से बता रखा था। जब हमने उनके पिता से सहायता की गुहार लगाई तो उन्होने जो जबाब दिया सुनकर मै हतप्रभ था वे बोले "जिसने गलती की उसे सजा तो मिलनी ही चाहिये। पर मैंने प्रतीकार करते हुए निवेदन किया जिसने गलती की उसे तो बिल्कुल सजा नहीं मिल रही अपितु हमने सहायता की तो आप हमे ही दंडित कर रहे हैं? तब पता नहीं उन्होने रामायण  की कौन कौन सी चौपाई सुना कर और महाभारत के द्रष्टांत सुनाकर, लंबे-चौड़े धार्मिक उपदेश देकर वे भी  अपने पुत्रमोह मे उसी  के पक्ष मे ही खड़े नज़र आये।  हम जिस अनुमान के साथ आये थे वह पूर्णत: गलत निकला। हमे लगा हमारे ड्रग लेने के अभयस्थ स्टाफ के साथ साथ इस परिवार को भी वरिष्ठ चिकित्सकीय काउंसिलिंग कर इलाज की जरूरत थी।      

उपभोक्ता न्यायालय मे केस चला हमारे बैंक के बकील मिस्टर चौहान  ने काफी मदद की अंततः केस मे हमारे उपर 2000/- की क्षति पूर्ति उक्त व्यापारी को देने का निर्णय उपभोक्ता न्यायालय ने दिया। उक्त हर्जाने का भुगतान कर हमने  इस प्रकरण से पीछा छुड़ाया।  

उक्त दोनों उदाहरणो के मद्देनज़र हमे काफी परेशानियों और कष्टों के बाबजूद हमने संबन्धित अधिकारी को उक्त संबंध कभी कुछ  नहीं कहा। क्योंकि मै मानता था कि ड्रग और अन्य नशे से पीढ़ित उस अफसर को खुद ही नहीं पता था वे क्या कर रहे हैं। वे ड्रग के नशे से प्रभावित अपनी ईक्षा शक्ति का पूरी तरह समाप्त कर  अपने आप पर नियंत्रण खो कर नशे की गिरफ्त मे आ चुके थे। उनको इस बात का भान नहीं था कि उनके इस कृत से संस्था या उनके साथियों को कितना नुकसान हो रहा है?  वो एक ऐसी बीमारी से ग्रसित हो चुके थे जिसे "दवा" के साथ साथ चिकित्सकीय परामर्श और पारवारिक/सामाजिक सहयोग की आवश्यकता थी।
विजय सहगल