चौसठ योगिनी मंदिर, मितावली-मुरैना(म॰ प्र॰)
गढ़ी पढ़ावली से अब हमारा अगला गंतव्य मितावली ग्राम स्थित चौसठ योगिनी मंदिर था जो गढ़ी पढ़ावली से लगभग 8-9 किमी था। अब तक सूर्य अस्तांचल की ओर बढ़ रहा था। सर्दी के मौसम के कारण कुछ सूर्य प्रकाश कम हो रहा था। शीघ्र मितावली पहुँचकर चौसठ योगिनी मंदिर के दर्शन हेतु उत्सुकता थी। ऐसा बताया गया था कि वर्तमान संसद भवन का निर्माण 64 योगिनी मंदिर के वास्तु नक्शे के अनुरूप बनाया गया है इस चौसठ योगिनी मंदिर का निर्माण लगभग 1600 साल पूर्व ई॰ 1323 मे महाराजा देवपाल द्वारा कराया गया था। जोकि मंदिर का नक्शा देख कर सत्य प्रतीत हो रहा था क्योंकि संसद भवन हू-बा-हू 64 योगिनी मंदिर की तरह ही है आकार आदि को छोड़कर। मितावली कस्बे के प्रारम्भ मे ही पहाड़ी के उपर चौसठ योगिनी मंदिर का निर्माण किया गया है। एक बार पुनः भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा स्थल के रख रखाव के बारे मे कहते हुए फ़ख्र है। पर यहाँ पर जयवीर या राजवीर की तरह पुरातत्व विभाग का कोई कर्मचारी नहीं मिला। महिला एवं पुरुष प्रसाधन की उत्तम व्यवस्था म॰प्र॰ पर्यटन विभाग द्वारा की गई थी पर स्वल्पाहार आदि की कोई व्यवस्था यहाँ भी नहीं थी। प्रवेश मार्ग को अच्छी तरह लोहे की जाली से दीवार मे लगाया गया था ताकि जानवर आदि पर्यटन स्थल मे प्रवेश न कर पाये किन्तु पाषाण से निर्मित प्राचीन बृषभ की जनावरकद प्रतिमा प्रवेश द्वार के अंदर शोभयमान थी। पत्थरों के छोटे छोटे टाइल्स से एक हल्का रैम्प बनाकर मंदिर तक जाने के लिये रास्ता बनाया गया है। रैम्प के बाद पहाड़ी के पत्थर काट कर छोटी बड़ी सीढ़ियाँ मंदिर तक बनाई गई है। इस चढ़ाई पर अब उतने सहज ढंग से चढ़ना हमारे लिये आसान न रहा जैसे कुछ साल पहले तक चढ़ जया करते थे। धीरे धीरे थोड़ी थोड़ी देर विश्राम के बाद चढ़ाई पूरी कर पहाड़ी की चोटी पर स्थित मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचा। पहाड़ी के उपर से गाँव और उसके पार दूर-दूर तक खेत और पगडंडियाँ दूर दूर तक नज़र आ रही थी। सुंदर दृश्य लग रहा था। पहाड़ी की चोटी समतल थी जिसपर चौसठ योगिनी मंदिर बिल्कुल संसद भवन या यूं कहे संसद भवन बिल्कुल चौसठ योगिनी मंदिर की प्रतिकृति लग रहा था। बस मात्र आकार का अंतर था। संसद भवन चौसठ योगिनी मंदिर का अति विस्तृत रूप नज़र आता है। वृत्ताकार चबूतरे पर गोल स्तंभो से वृत्त के आकार पर टिकी छत्त बनाती हुई। मुख्य अंतर दोनों का एक मात्र जो दीख रहा था वह था संसद के बाहरी दालान स्तंभों के बीच बाहर से दिखाई देते है पर मंदिर मे स्तंभों के बीच के दालान मंदिर के अंदर से दिखते है जबकि मंदिर के बाहर स्तंभों के बीच की दालान को समतल पत्थरों से बंद किया गया है जो चित्र मे स्पष्ट देखा जा सकता है। मंदिर मे प्रवेश करने का मात्र रास्ता जो पूर्व दिशा मे बनाया गया है। मंदिर मे प्रवेश करते ही गोल कॉरीडोर के बाद गोलाकार खुला आँगन संसद भवन की ही तरह है। मंदिर के वृत्ताकार खुले आँगन के बाद गोलाकार ही संसद के सेंट्रल हाल की तरह भगवान शिव का मंदिर है मंदिर के चारों ओर स्तंभों के सहारे गोलाकार परिक्रमा पथ बना है। अंदर हर दो स्तंभों के बीच छोटा से मंदिर बना था जिसमे शिवलिंग विराजमान थे जिनकी संख्या 64 थी। लोग इन मंदिर के प्रांगड़ मे एक चक्कर लगा कर भगवान शिव को अपनी भावान्जली अर्पित कर रहे थे। कहा जाता है ये मंदिर तांत्रिक विध्या के केंद्र थे। हमे देख कर सुखद आश्चर्य हो रहा था कि हमारे देश का पुरातन वास्तु शास्त्र कितना उन्नतशील था जिसका निर्माण बगैर किसी आधुनिक मशीनों, उपकरणों बगैर सीमेंट के बनाया गया था। हमे अभिमान होना चाहिए अपने पूर्वजों पर जिनके निर्देशन मे हमारे महान शिल्पकारों ने इतना उत्क्रष्ट निर्माण किया जो हजारों सालों से प्रकर्तिक आपदाओं, बाधाओं का सामना करते हुए आज भी अडिग खड़ा है।
बैसे मै अंधविश्वासों से कोशो दूर रहता हूँ पर कभी कभी जो चमत्कार से प्रतीत होते है उनके पीछे वैज्ञानिक कारणों को मानता हूँ। ऐसा ही एक अनुभव मुझे तांत्रिक चौसठ योगिनी मंदिर के अंदर प्रांगण मे देखने को मिला। मै मंदिर के अंदर के कई चित्र लेना चाह रहा था पर न जाने क्यों दो फोटो लेने के बाद हमने मोबाइल के कैमरे से कई बार फोटो लेने का प्रयास किया तो मेरा कैमरा हर बार ऑफ मोड मे आकर कैमरे को बंद कर देता था। मैंने हर बार ऑन कर कैमरे के चालू करने के इंतज़ार कर पुनः फोटो लेनी चाही पर मोबाइल हर बार ऑफ हो कर बंद हो जा रहा था इस सब पृक्रिया मे 10-15 मिनिट का समय व्यर्थ मे ही जाया हो गया। आखिर थक कर जैसे ही मै मंदिर के बाहर आया तो कुछ फोटो पहाड़ी के नीचे उतारे तब फोटो लेने मे कही कोई परेशानी नहीं हुई। मेरा फिर भी यही मानना है कुछ तकनीकि खराबी मोबाइल मे रही होगी पर चूकि ऐसी घटना हमारे साथ हुई थी इसलिए उल्लेख कर दिया।
शाम के छह बजने को हो रहे थे, सूरज भी ढलने को था अब हमारा गंतव्य यहाँ से 35-40 किमी दूर था अतः अंधेरे के पूर्व, ठौर पर पहुँचने की चाह लेकर आगे बढा। हमे खुशी थी हम जिन पर्यटन स्थानों का लक्ष्य लेकर सुबह निकले थे उन्हे हमने भ्रमण कर पूरा हासिल कर लिया था। बस एक ही टीस मन ही मन मे दर्द उत्पन्न कर रही थी कि पुरातत्व की इन अनमोल धरोहरों को सहेजे समेटे रहने के कारण, धन सम्पन्न होने के बाबजूद मुरैना प्रशासन और उनके अधिकारियों की लापरवाही से, प्रचार प्रसार के आभाव के कारण, सड़क से निष्कंटक जुड़ाव के आभाव, इन पर्यटन स्थलों सुख सुविधाओं के आभाव के कारण निर्धन बना हुआ है??
प्रसंग से हटकर - कभी कभी घुम्मकड़ी करने की कुछ थोड़ी बहुत कीमत अदा करनी पढ़ती है जो मैंने 18 नवम्बर 2019 के भ्रमण की आखिर किस्त का समापन करने की तैयारी करते समय अदा की जिसका चित्र आखीर मे संलग्न है। हम लेखन मे व्यस्त रहे वहाँ अग्नि देवता को आधा लिटर दूध की आहूति समर्पित हो गई। हा-हा-हा - नमस्कार॰































