रविवार, 31 मार्च 2019

"विविध भारती"


"विविध  भारती"



कुछ चीजें ज़िंदगी का कब हिस्सा बन जाती हैं पता भी नहीं चलता। उन के साथ-साथ चलने से कभी मन मस्तिष्क पर बोझ नहीं होता इसी कारण उन का साथ  ज़िंदगी का सुखद अटूट हिस्सा बन जाता हैं। रेडियो या ट्रंजिस्टर  एक ऐसा उपकरण हैं जो हम जैसे लाखों करोड़ो लोगो की ज़िंदगी का आज से नहीं बल्कि पिछले अनेक दशकों से ज़िंदगी का अभिन्न अंग बने हुए  हैं। सूचना प्रसारण के  एक शसक्त माध्यम के रूप मे इसे हम बचपन से देखते आये थे। ये दोनों ही उपकरण हमारे घर मे नहीं थे। सन् 1964-65 मे  रेडियो का किसी घर मे होना समृद्धिशील परिवार  की निशानी मानी जाती थी। जैसे आजकल  टी. वी. डिस्क या 80-90 के दशक मे घरों मे टी॰वी॰ अंटीना लगा होता था 50-60 के दशक मे जिन घरों मे रेडियो होता था उनके छत्त पर पतले-पतले धातु के जालों से बना  5-6 फुट लंबा  पट्टा दो बाँसों के बीच मे बंधा रहता था। जिसके एक सिरे से एक तार अंटीना और दूसरा नीचे ड्राइंग रूम रखे रेडियो से जुड़ा होता था। हमारे मुहल्ले मे सिर्फ दो घरों मे ही रेडियो था। एक हमारे कुटुंब मे रिश्ते के ताऊ थे जिन्हे हम बच्चे बाबू कहते थे एवं दूसरा पड़ौस मे रहने बाले तंबाकू के बड़े गुजराती व्यापारी पटेल साहब के यहाँ था। पड़ौस के सभी  घरों मे बच्चों का और परिवार के सभी सदस्यों का आना जाना लगा रहता था। रेडियो का देखना तो प्रायः हो जाता था पर कभी कभार रेडियो मे बज रहे गानों को सुनने मिल जाता था। उसे छूने की हिम्मत तो  हम कभी न दिखा सके।  रेडियो के बड़े सुनहरे जाली दर पर्दे के नीचे काँच की आयताकार पट्टी मे रेडियो स्टेशन के मीटर बैंड की संख्या लिखी रहती थी। काँच की पट्टी मे 2-3 बड़े बड़े गोल स्वीच लगे रहते, एक जो काँच की पट्टी के अंदर लगी चमकीली सुई को दायें-बायें घूमने का काम करता  और दूसरा, आवाज को काम ज्यादा करता। काँच की पट्टी और सुनहरी जाली के पीछे कुछ बल्बों की हल्की रोशनी अंदर से चमकती थी। एक बहुत छोटी काँच की चौकोर खिड़की नुमा आकृति जो सबसे आकर्षित करती थी। जिसके अंदर हल्की हरी रोशनी चमकती थी। हरी रोशनी बायें से दायें लगातार चलती थी और जो मन-मस्तिष्क मे दशहरें मे होने बाली रामलीला के स्टेज का  अहसास कराती थी, जैसे पर्दा सरकते ही  रामलीला के पात्र आकार जीवंत हो जाते बैसे ही  उस चौकोर आकृति मे हरे रंग की बायें से दायें घूमती लाइट   को देख कर यही अहसास होता मानो पर्दा खिसकते ही  उस चौकोर आकर्ति नुमा स्टेज के अंदर बैठ कर  रेडियो उद्घोषक कार्यक्रम संचालित कर रहे है  और गायक-गायिका रेडियो के अंदर मधुर आवाज मे गाना गा रहे हैं। उन दिनों रेडियो रखने बालों को वार्षिक लाईसेंस फीस पोस्ट ऑफिस मे चुकानी होती थी। जिसकी पास बुक मे लाइसेन्स फीस की एंट्री की जाती थी।
उन दिनों बहुत ज्यादा रेडियो  स्टेशन उपलब्ध नहीं थे। सबसे चर्चित रेडियो स्टेशन सीलॉन जो बाद मे रेडियो श्री लंका के नाम से भी जाना जाता था, विविध भारती और ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सेवा। देश दुनियाँ के समाचार के लिए बीबीसी लंदन भी  विश्वसनीय माना जाता था जो एक निश्चित समय पर श्री लंका रेडियो के माध्यम से समाचार प्रेषित करता था। सुबह ठीक आठ बजने के पूर्व श्री लंका रेडियो और ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सेवा पर   फिल्मी गीत का आखिरी गाना  आवश्यक रूप से श्री के॰ल॰ सहगल द्वारा गये गाने  की आवाज से होता। एक और प्रसिद्ध कार्यक्रम उन दिनों रेडियो श्री लंका पर प्रत्येक बुधबार को होता था वह था "बिनाका गीत माला"। इस कार्यक्रम की प्रस्तुति उद्घोषक "श्री अमीन सयानी" द्वारा अपनी बेहद शानदार आवाज मे की जाती थी। साल के अंत मे बिनाका गीत माला का सबसे ज्यादा बार बजने बाला "शरताज गीत" का चयन किया जाता। इस कार्यक्रम की दीवानगी श्रोताओं के बीच देखते ही बनती थी। कुछ धुरंधर श्रोता बर्ष के शरताज की भविष्य वाणी करते थे। जैसी ही भविष्य वाणी सच होती परिवार के सदस्यों के बीच ज़ोर-ज़ोर से चीख कर  उत्साह के रूप मे गाने के बजते ही की जाती थी। इतना पागलपन और दीवानगी हमने अपनी ज़िंदगी मे नहीं देखी। हर घर और मुहल्ले के लोग या मित्र गण उन घरों मे एकत्रित हो जाते जिनके घरों मे रेडियो होता। उस दौरान घरों मे चाय-पकोड़ों के दौर चलते रहते। सड़कों पर दिसम्बर के आखिरी बुधवार को रात 8 से 9 बजे सन्नाटा पसरा रहता।  धीरे-धीरे रेडियो और ट्रंजिस्टर की पहुँच बढ़ने लगी। इस दौरान हमारे घर भी ट्रंजिस्टर आ गया था। आँगन मे तुलसीघरा के उपर उसका स्थान नियत था। उन दिनों ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस से भी फिल्मी गानों का प्रसारण होता था पर सुबह 8 बजे का हिन्दी समाचार बुलेटिन इस पर नहीं आता था अतः 8 बजे बापस विविध भारती का स्टेशन लगा दिया जाता था। उन दिनों कुछ लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम हवा महल भी शाम के पसंद किया जाता था। एक और कार्यक्रम फौजी भाइयों के लिए भी बड़ा प्रिसिद्ध था जिसमे हर हफ्ते कोई फिल्मी कलाकार फ़ौजिओं के लिये उनके पसंद के गानों को  सुनवाया  जाता था। हाँ रात मे बगैर किसी चूक के पौने नौ के हिन्दी समाचार घर के सारे लोगों द्वारा  जरूर सुने जाते थे। "ये आकाशवाणी हैं, अब आप देवकी नन्दन पांडे से समाचार सुनिए"...... । ये जानी पहचानी लाइन और उस  आवाज से उस समय के लोग भली भांति परिचित थे। प्रायः दिन मे तो ट्रंजिस्टर हमारे कब्जे मे रहता था पर रात मे जल्दी सोने की आदत के कारण नौ बजे के बाद इस पर मेरी बड़ी बहिन का कब्जा हो जाता था। उसे देर रात तक पढ़ाई के साथ गाने सुनने का शौक था। दीवानगी इस हद तक कि  रात के सभी कार्यकर्म रेडियो स्टेशन से समाप्त हो जाते, खुद भी सो जाती पर ट्रंजिस्टर घर्र-घर्र सारी रात बजता रहता। सुबह जब कोई उठता तो ट्रंजिस्टर बंद करता। इस के लिये कई बार उसको डांट पड़ती। गर्मियों कि छुट्टी मे प्रायः हम भाइयों  के साथ  "तालबेहट" मे अपने चाचा के गाँव  जाना होता। दिनभर तो तालाब पर नहाना और तैरना सीखना होता पर इस जगह अधिकतर घरों मे लाइट नहीं थी। चाचा के यहाँ भी लाइट और ट्रंजिस्टर नहीं था। बगल मे पड़ौसी के यहाँ ट्रंजिस्टर था उन्हे भी समाचार सुनने का शौक रहा था, मैं भी चाचा जी के यहाँ छत्त पर पड़ौसी के ट्रंजिस्टर पर समाचार सुनता। घुप्प अंधेरे मे आवाज़ दूर तक आती थी जिसका फायदा हमे मिलता और बगैर पड़ौसी के अहसान के हमे समाचार अपने आप सुनने को मिल जाते।    
अब तक कॉलेज की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी। नौकरी की तलाश जारी थी। 1980 मे  सौभाग्य से नौकरी का बुलावा आने पर लखनऊ जाना हुआ। मेरे बड़े भाई भाई पहले से लखनऊ मे सेवारत थे। अब  दिन चर्या बदल चुकी थी। काम के घंटे निश्चित थे। लेकिन यहाँ भी सुबह का आगाज  5.54 पर विस्मिल्ला खाँ  की शहनाई से होता। तब  से आज तक कुछ ऐसी आदत बन गई की विविध भारती पर जब तक विस्मिल्ला खाँ की शहनाई ने सुन ले दिन की शुरुआत कुछ अधूरी सी लगती। सुबह आधा घंटे का "वंदनवार कार्यक्रम" जो गैर फिल्मी, धार्मिक भजनों पर आधारित होता था। पंडित भीम सेन जोशी, श्री कुमार गंधर्व, श्री जसराज, श्री हरिओम शरण, स्व॰ जगजीत सिंह के भजन सुनना  बहुत अच्छा लगता था जो सुबह की सार्थकता को खुश नुमा बनाता था। "प्रभु हम  पे कृपा करना, प्रभु हम पे दुआ करना,, वैकुंठ तो यही हैं......" । उक्त भजन हमारे बड़े भाईसाहब को अत्यंत प्रिय था। जिसको वे प्रायः साथ मे गुनगुनाते रहते। उन दिनों टी॰वी॰ का चलन शुरू ही हुआ था। टेक्सला टी॰वी॰ कंपनी द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम बहुत अच्छा लगता था जो सप्ताह मे एक दिन पंजाबी भाषा मे आता था और पंजाबी हमे बिल्कुल नहीं आती थी, पर पूरे कार्यक्रम की पस्तुति से हमे कभी ऐसा नहीं लगा कि कार्यक्रम पंजाबी मे आता हैं। उसकी टैग लाइन जो गुरुग्रंथ साहब के शबद से ली गई थी  "कोई बोले राम-राम, कोई खुदाय, कोई सेवे गुसैयाँ.......... "  कानों को सुकून देने बाली, बेहद कर्णप्रिय  लगती थी। आधा घंटे के कार्यक्रम मे गुरु ग्रंथ साहब के कोई   एक-दो शबद को शामिल किया जाता। कार्यक्रम के प्रस्तुत कर्ता का नाम तो नहीं मालूम पर उसकी आवाज भी बहुत शानदार थी,  कार्यक्रम का समापन इन लाइनों से होता  जो मुझे आज भी यदा हैं "... यह प्रोग्राम टेक्सला टी॰वी॰ बनाने बालों द्वारा प्रस्तुत कीता गया" । प्रसारित होने बाले कार्यक्रम जैसे भूले-बिसरे गीत, कृषि चर्चा, जिले की चिट्ठी, प्रदेश की चिट्ठी, रामचरित मानस, समाचार, फिल्मी गानों के कार्यक्रम एक सुंदर फूलों के गुलदस्ते की तरह थे। विविध भारती के कार्यक्रमों के साथ -साथ हमारी दिनचर्या भी चलती रहती, जैसे सुबह बंदनवार के समय चाय पी जा रही होती, भूले बिसरे गीत और कृषि दर्शन के समय अखबार पढ़ा जाता था जो सुबह आठ बजे के समय तक चलता, फिल्मी गानों के साथ खाना बनाना और नहा धो कर नौ-सवा नौ बजे साइकल पर सवार होकर ऑफिस के लिये प्रस्थान करने तक लखनऊ मे यही दिनचर्या थी। सुबह की ये जीवन चर्या विविध भारती के स्टेशन के बदलने के सिवाय  कमोवेश सालों साल एक सी ही रही। जब ग्वालियर, पोरसा या डबरा रहा तो विविध भारती ग्वालियर सुनता, रायपुर मे  विविध भारती रायपुर, भोपाल मे  विविध भारती भोपाल या सेवानिवर्ति तक विविध भारती  दिल्ली या एफ॰एम॰ गोल्ड दिल्ली तक यही दिन चर्या रही। आज भी सेवानिव्रती के बाद जब कभी बच्चों के पास  नोएडा, घर भोपाल या ग्वालियर प्रवास होता हैं तब भी दिनचर्या यही रहती हैं, हाँ पहले विविध भारती का साथ 10 बजे पूर्व "आज के फनकार"  तक ही होता था लेकिन अब आज कल 10 बजे के बाद भी "गाने एस॰एम॰एस॰ बहाने", "गीत गाते गुनगुनाते" के बाद तक भी चलते हैं। टी॰वी॰,के इस मकड़ी जाल के युग मे, और  व्हाट्सप, "फ़ेस बुक" जैसे सामाजिक संचार माध्यमों के बीच एवं एफ़॰एम॰ रेडियो के अंगिनित स्टेशनों के बीच भी विविध भारती का अपना एक अलग महत्व हैं, हमे नहीं लगता विविध भारती का स्थान कोई अन्य रेडियो स्टेशन ले सकता हैं। 
धन्यवाद विविध भारती इतने लंबे साथ के लिये।  

विजय सहगल

                 

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

योगक्षेमं


योगक्षेमं 

सांझ के अवसान मे हे प्रभु, डर से निडर बना देना। 

पग  मे आये हर कांटे को हे प्रभु, शूल से फूल बना देना॥    
जब ध्यान करें परमेश्वर का, प्रभु काम क्रोध से दूर रहें।                
चित शांत रहे, मन चरणों मे प्रभु नाम-शोध से पूर्ण  रहे॥
अनासक्त भक्ति से कर्म करे, फल प्रभु-चरणों मे समर्पित हो।
बिना मान-अपमान, दु:ख-सुख,  हरि सुमरिन से गर्वित हो॥
सत्य मार्ग से डिगे बिना प्रभु, भय से अभय बना देना।
सांझ के अवसान मे हे प्रभु, डर से निडर बना देना॥
पग मे आये हर कांटे को प्रभु, ......................... ॥ 


शास्त्र विहित सब कर्म करे, जन कल्याण की  आहुति हो।


कर्तव्य पथ पर आगे बढ़े, तामस वृत्ति से न मोहित हो॥
मात-पिता गुरु सेवा के जो, प्रभु ने आदेश कहे।
यज्ञ दान तप रूप कर्म, प्रभु गीता के संदेश बहे॥
उस देश काल मे रहे-चले, प्रभु ऐसी डगर बना देना।
सांझ के अवसान मे हे प्रभु, डर से निडर बना देना।
पग मे आये हर कांटे को  प्रभु............................ ॥
 
जीवन-मरण का जो चक्र चले, इस चक्र से हे प्रभु मुक्ति मिले॥
हर पल हर क्षण प्रभु सुमरिन हो,  "श्री-चरणों" से शक्ति मिले।
अमर आत्मा, देह क्षण भंगुर, अशांत को सुख चैन कहाँ।  
श्री विजय, विभूति, अचल नीति, योगेश्वर श्री कृष्ण जहाँ ॥
गीता रूपी महाकाव्य,  श्री हरि रूपम  अद्भुतम।    
निसकंटक राह बना ऐसी, कर योगक्षेमं वहाम्यहम्      
रहे समर्पित, त्याग हर इच्छा, जीवन सफल बना देना।
सांझ के अवसान मे हे प्रभु, डर से निडर बना देना॥  
पग मे आये हर कांटे को हे प्रभु, शूल से फूल  बना देना ॥

-विजय सहगल  


मंगलवार, 26 मार्च 2019

"माँ"


"माँ"

तुम्हारे पास का अहसास,
सुखी हर पल  बनाता  हैं।
डर होकर भी मुझको,
निडर होना सिखाता  हैं॥
गिरा जब राह मे चलके।
पड़े तब पाँव मे फलके॥  
चुभा जब पांव मे काँटा,
जमी को आप ने डाँटा॥
सुखद हाथ का अहसास,
मुझे  सर पर  कराता हैं।
तुम्हारे पास का अहसास।
सुखी हर पल .............. ॥   
लगी जब भूख खाने की
कमी दाने उगाने की॥
न था दूर तक पानी।
प्यासे ओंठों  ने तब  ठानी॥  
काट कर पेट जब  अपना,
प्यास मेरी बुझता हैं।
तुम्हारे पास का अहसास।
सुखी हर पल.............. ॥
हुए जब राह मे असफल।
सहारा दिला कर, हर पल॥  
राहें थी बड़ी दुश्वर,
था दुश्मन, सारा-जहाँ मेरा। 
जला कर रोशनी तूने,
किया था दूर अंधेरा॥
दिलासा देकर हमारी आश,
को फिर, गिर कर उठाता  हैं॥
तुम्हारे पास का अहसास ,
सुखी हर पल ................. ॥
मुश्किले जब कभी आयी,
दवा हर मर्ज़ की  खाई॥  
असर दिखाने की तब बारी थी।  
साथ जब माँ हमारी थी॥  
तेरा हर साथ मुझको खास,
देव दर्शन कराता हैं।
तुम्हारे पास का अहसास,
सुखी  हर पल बनाता हैं॥

विजय सहगल

रविवार, 24 मार्च 2019

सैम पित्रोदा को प्रमाण


सैम पित्रोदा को प्रमाण

मेरे प्यारे अंकल सैम,

पिछले दिनों आपका वक्तव्य पुलवामा मे हुई आतंक पूर्ण घटना के जबाब मे हमारे वायु सेना द्वारा पाकिस्तान के विरुद्ध की गई एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाये थे और एयर स्ट्राइक  के सबूत एवं उसमे मारे गये अंतकियों की संख्या के सबूत  चाहे गये थे। आपके द्वारा ये भी चाहा गया था कि पुलवामा जैसी घटनाये तो होती रहती हैं इसके लिये सारे पाकिस्तान को दोषी ठहरना गलत हैं।

महोदय, पाकिस्तान जैसा  देश जो स्वतन्त्रता के 71 साल बाद भी  कश्मीर पर हमारे देश मे आतंक वाद फैला कर देश मे अस्थिरता और अशांति ला  रहा  हैं।   आखिर कब तक चुप रहा जा सकता हैं। मेरा द्रढ़ मत हैं कि यदि देश का विभाजन 1947 मे नहीं होता तो ये कश्मीर समस्या भी न होती। देश के  इस विभाजन के लिये तत्कालीन राजनैतिक व्यक्तियों की संकुचित  सोच,  मूर्खता पूर्ण नीति, पद लोलुपता और निजी स्वार्थ जिम्मेदार था। श्री जवाहर लाल नेहरू देश के विभाजन  और कश्मीर पर अदूरदर्शी नीति के लिये   सबसे अधिक जिम्मेदार थे। आज उस  निजी स्वार्थ पूर्ण नीति,  पद लोलुपता का नतीजा ही हैं जिसमे हमारे देश के बहादुर फौज के जवानों को अकारण अपना बलिदान देना पड़ रहा हैं और जिसके लिये एक मात्र पाकिस्तान की आतंकवादी गतिविधियां ही मुख्य रूप से  जिम्मेदार हैं जो बारबार आतंकवादियों को कश्मीर मे  हिंसा फैलाने  भेज रहा हैं। काश आप जैसा मूर्धन्य सलाहकार उस समय नेहरू जैसे नेताओं को देश का विभाजन को न स्वीकार  करने  के लिये सलाह देते।  नेहरू  ने भी ये देश का विभाजन क्यों कर स्वीकार किया समझ से परे हैं। सुना था वे तो बड़े होशियार, विद्वान  और गहन विचार  कुशल पुरुष थे। उन्हे तो भारतीय संस्कृति, परंपरा और   इतिहास का ज्ञान था। महाभारत का द्रष्टांत तो निश्चित ही उन्हे मालूम ही  होगा। उन्होने धर्मयुक्त युद्ध न लड़ कर विभाजन क्यों स्वीकार किया? अंग्रेज़ो के कुचक्र पूर्ण चालों के विरुद्ध निश्चित ही उन्हे महाभारत युद्ध की तरह संघर्ष करना चाहिये था, क्योंकि जिन्ना या उनके अनुयाई और पाकिस्तान मे रह रहे मुसलमान, आखिर  थे तो  कौरवों की तरह अपने ही भाई ही। यदि 1947 मे नेहरू जी प्रधानमंत्री पद रूपी मोह को त्याग कर श्रीमद्भगवत गीता मे अर्जुन को  भगवान कृष्ण के आदेशानुसार प्रेरित करते कि  :-

क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्तवय्युपपद्यते |
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप || गीता अध्याय 2, श्लोक 3||
(अर्थात :- हे अर्जुन नपुंसकता को मत प्रपट हो, तुझ मे यह उचित नहीं जान पड़ती, हे परंतप
ह्रदयकी तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिये खड़ा हो जा।)

यदि श्री नेहरू उस दिन कौरवों रूपी" जिन्ना" एवं उनके समर्थकों के विरुद्ध महाभारत का धर्मयुक्त युद्ध देश के विभाजन के खिलाफ़  लड़ते तो आज कश्मीर समस्या नासूर की तरह हमारे देश को लगातार कष्ट न देती। दुनिया मे तमाम देशों मे विभाजन हुए पर सारे देश अपने खुशहली और विकास मे लगे हुए हैं। सिर्फ पाकिस्तान ही एक ऐसा देश हैं जो हमारे देश के विरुद्ध  आतंकवादी गतिविधियों को पाल पोष कर बड़ा कर उन्हे पराश्रय दे रहा हैं इसलिए पाकिस्तान के विरुद्ध एयर स्ट्राइक की कार्यवाही आवश्यक हैं और जिसके लिये सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान जिम्मेदार हैं। यदि पूर्व की सरकारों द्वारा मुंबई पर हमले और संसद पर हुए हमले के विरुद्ध ये कार्यवाही पहले कर दी गयी होती  तो आज पाकिस्तान की ये हिम्मत न होती। यध्यपि हमारे शास्त्रानुसार हर जन्मे हुए कि मृत्यु निश्चित हैं, पर पुलवामा मे शहीद हुए हमारे बहादुर बलिदानियों को अकारण ही  पाकिस्तान की आतंकी, कायरना पूर्ण हरकत की बजह से शिकार न होना पड़ता।   यदि वे युद्ध लड़ते हुए दुश्मनों को मारकर शहीद होते तो हमारे लिये और भी फ़ख्र कि बात होती। इसलिये यूं ही अपने देश के लिये आतंकी गतिविधियों मे  बलिदान होने से अच्छा हैं युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त होना अथवा दुश्मनों  के घर मे घुस कर उनको  को मारकर देश-राज्य मे परिपूर्ण सुखों को भोग करना।  अतः   पाकिस्तान  के विरुद्ध कार्यवाही करना अवश्यसंभावी हैं।  

आप तो टेलीकॉम क्रांति के जनक कहे जाते हैं, ज्ञान आयोग के मुखिया भी आप हैं, बड़े ज्ञानी पुरुष हैं। आपने बर्फ से ढकी हिमालय कि चोटियों पर टेलीफ़ोन टावर का जाल क्यों नहीं फैलाया?,  अंडमान निकोबार के उन दीपों मे टावर का जाल क्यों नहीं फैलाया या उन रेगिस्तानी जगहों मे टेलीफ़ोन उपकरण नहीं लगाये, जहां कोई मानव मात्र नहीं रहता या जो पूरी तरह निर्जन हैं? निश्चित ही आप ज्ञानी-विज्ञानी सोच बाले महापुरुष हैं जो ये जानते हैं कि टेलीफ़ोन उपकरण, टावर या टेलीफ़ोन तार का निर्जन या मानव रहित जगहों मे लगाने से क्या फायदा या क्या उपयोग। श्रीमान यही सोच हमारी सेना, वायु सेना एवं अन्य वैज्ञानिकों की रही  कि निर्जन जगहों पर एयर स्ट्राइक करने का क्या उपयोग? सेना-वायु सेना के बहादुर सैनिक और अफ़सर जिन्होने अपनी सारी ज़िंदगी युद्ध कौशल करने और सीखने मे ही लगाई हैं, कुछ सोच समझ कर बालाकोट के आतंकी अड्डों को निशाना बनाया गया होगा। यध्यपि आप देश मे टेलीफ़ोन क्रांति के जनक कहे जाते हैं, पर याद रहे आप  दुनियाँ की टेलीफ़ोन क्रांति के जनक नहीं हैं? और ऐसा भी नहीं हैं कि आपके न रहते टेलीफ़ोन क्रांति या कम्प्युटर क्रांति अब बंद हो गई हैं? मेरा स्पष्ट मत हैं ये टेलीफ़ोन या कम्प्युटर तकनीकी   आपके समय से और प्रगतिशील एवं और उन्नतशील हो चुकी   हैं,  जो यह पता कर सक्ने मे सक्षम हैं कि बलाकोट मे कितने मोबाइल एयर स्ट्राइक बाले दिन  एक्टिव थे। अपने को योग्य या ज्ञानवान समझना श्रेष्ठ हैं पर दूसरों को नासमझ या मूर्ख समझना आपकी योग्यता पर सवालिया निशान हैं?? और जहां तक हताहतों कि संख्या का सवाल हैं तो  "हे कॉंग्रेस श्रेष्ठ" दुश्मन के घर मे घुस कर एयर स्ट्राइक करना तो संभव हैं पर उनके नष्ट किये गये आतंकी अड्डों और आतंकियों के हताहतो की संख्या का आकलन तकनीकी के उपयोग कर आप जैसे विशेषज्ञ आसानी से कर सकते हैं। आप  तनिक भारत और पाकिस्तान के अवाम के  बौद्धिक स्तर एवं लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर भी नज़र डाल लेते तो अच्छा रहता। न्यूयार्क टाइम्स पढ़ने के पूर्व थोड़ा पाकिस्तान का इतिहास भी पढ़ लेते। बोलने और लिखने की जो आज़ादी भारत देश मे हैं क्या पाकिस्तान मे ऐसा संभव हैं?? हमारे देश मे पढे-लिखे लोगो का बाहुल्य हैं, इसी  लिये (आपातकाल के 21 महीनों (25 जून 1975 से 21मार्च 1977 तक) को छोड़ कर) मतभिन्नता चारों ओर दिखाई देती हैं। श्रीमान यही फर्क है भेड़ों और शेरों के झुंड का जो हमे पाकिस्तान से अलग रखता हैं बर्ना क्या कारण हैं कि आप जैसा ज्ञानी और बौद्धजीवि दलों के झुंड के विपरीत पाकिस्तान कि इतनी बढ़ी आबादी मे से  एक भी व्यक्ति हताहतों की संख्या और आतंकी अड्डे के नुकसान का आंकड़ा भी नहीं देता?? इस सैनिक तानशाह मुल्क मे   क्या मजाल सेना की अनुमति के विरुद्ध इंसान तो क्या कोई परिंदा भी बालाकोट सीमा मे  गया हो?? ये तो हमारे देश के संविधान निर्माताओं का शुक्र मनायें कि आप जैसे अनेक लोगो को अपने देश की सेना की आलोचना करना या बहादुर सेना को "गली का गुंडा" कहने की आज़ादी मिली हैं।  पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान मे आप सेना या शासन के विरुद्ध ये बात करते तो  आप या आप जैसे लोगो को  वहाँ की सेना के सिपाहियों द्वारा  आप जैसे लोगो को लाठी, डंडों, जूतों और बंदूक की बटों से पीटा होता और आवश्यकता होने पर बंदूक की गोली से चिर निद्रा मे सुला दिया होता, जैसा कि हम टेलिविजन पर बलूचिस्तान और पाक अधिक्रत कश्मीर मे प्रायः देखा करते हैं।   मैं आपको चुनौती देता हूँ आप पाकिस्तान के बड़े हिमायती और शुभचिंतक हैं, हिंदुस्तान मे पाकिस्तान दिवस मनाने बाले  प्रवर्तक हैं कृपया पाकिस्तानी आकाओं से बीजा लेकर बालाकोट जाये  और इतने हफ्तों बाद भी बालाकोट की यथार्थ स्थिति को बयान करें?? आप जो कहेंगे और वर्णन करेंगे  हम और सारा देश उसे स्वीकार करेगा और हाँ निश्चिंत रहे  सबूत भी नहीं मांगेगा!!

अब रही बात सबूत की?
श्रीमान ये आस्था और विश्वास का विषय हैं जैसे माँ अपने नवजात बच्चे को पिता को दिखाते वास्ता देती हैं देखों पापा! या बोलो पापा।  यही वास्ता या विश्वास जो माँ, बच्चे के  पैदा होने से बाल्यकाल मे बच्चे के चलने या बोलने तक और  सारे रिश्तेदार जब बच्चे को माँ-पिता के  रिश्ते का बोध  कराते है तो सभी, बच्चे को कभी माँ को दिखा कर कहेंगे बोलो माँ, पिता को दिखा कर कहेंगे बोलो पिता जी या पापा तो बच्चा  इन्ही बातों का विश्वास कर  एक दिन  माँ को देख कर माँ और पिता को देख कर पापा बोलने लगता हैं  तो हम सभी तालियाँ बजा कर खिलखिला कर बच्चे की तोतली आबाज से खुश  होते हैं।  यही है वास्ता, आस्था या विश्वास जिसे मानकर बच्चा सारी ज़िंदगी माँ को  माँ और पिता को पापा मान लेता हैं इसके लिये किसी प्रमाण या कागजी शपथ-पत्र की आवश्यकता  नहीं पढ़ती।  इसलिये "हे पित्रोदा नन्दन" हमारी सेना और उसके जवान भी  हमारी धरती अर्थात हमारा देश कि तरह ही  हमारी माँ है जो हम देश वासियों की माँ  की तरह रक्षा करती हैं। इनकी वीरता और बहादुरी के लिये प्रमाण मत मांगे और इन के द्वारा आतंकवादियों के विरुद्ध की गयी  शूरवीरता की बातों पर उसी तरह विश्वास करें जैसे  माँ ने पिता को पिता कहने के वास्ते कही थी। हमे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है हमारी कुछ अनचाही कड़वी बातों को आप अन्यथा नहीं लेंगे।

आपका,

विजय सहगल                 





बुधवार, 20 मार्च 2019

होली का अंतर




"होली का अंतर"

साठ की होली।
ठाठ की होली ॥
ईक्षा पूरी।
न जी हजूरी॥  
न समय का चक्कर।
न जुल्म से टक्कर॥  
आस अधूरी।
तनखा पूरी॥    
तभी सवेरा, जब आंखे खोली।
साठ की होली ठाठ की होली॥

रोज नई शाखायेँ ढूंढ़ी।
आंखे हो गई आधी बूढ़ी॥
समझे थे जिसको हम शान।
प्रतिकार मिला, बिन-बुला मेहमान॥
अपना राज, अब अपनी खोली।  
साठ की होली, ठाठ की होली॥

मतांतर जब हो।
लोकतन्त्र ही तब हो॥   
काम-काम का करें जो शोर।
हमें छोड़ बाकी सब चोर॥  
छेद पच्चीसों, नैया डोली।
साठ की होली, ठाठ की होली॥

नाक कान थे हम सारे।
नगरी-नगरी, दुआरे-दुआरे॥  
कहने को आज़ादी, ....पर दूर।
हम सब थे बंधुआ मज़दूर ॥  
समय ने जब जंजीरे खोली।  
साठ की होली, ठाठ की होली ॥
           
          -विजय सहगल

होली


"होली"


आज बहुत अर्से बाद ऐसी होली आई हैं जब एक मशीनी हक़ीक़त से हट कर होली के त्योहार की उमंग और उत्साह को सहज ढंग से महसूस करेंगे। क्योंकि अभी तक नौकरी के दौरान हम अपने मुख्य  त्योहार जैसे होली, दिवाली, नया वर्ष एक मानव रूपी मशीन की तरह मानते आ रहे थे, बही औपचारिकता, होली की बधाई, हैप्पी होली या होली मुबारक हो आदि।  अनौपचारिकता तो मानो इतने सालों मे कही खो गई थी, होली का उत्साह-उमंग तो कही रह ही नहीं गया था। हमे याद हैं बचपन के बो दिन जब एक महीने पहले से होली की तैयारियाँ शुरू हो जाती थी। पड़ौस मे एक टूटे खंडहर नुमा भूतह मकान जिसे हम बच्चा पार्टी "सऊआ का खड़ेरा" कहा करते थे, मे होली के लिये ईधन एकत्रित किया जाना शुरू कर दिया करते थे। "सऊआ" कौन थी हम नहीं जानते थे बड़े लोगो से सुन-सुन कर हम भी सभी बच्चे उसे "सऊआ का खड़ेरा" कहते थे। खंडहर होने के पूर्व मकान निश्चित ही अपने वैभव और संपन्नता को अपने आप मे समेटे होगा। हर साल होली के पूर्व मुहल्ले के सारे बच्चे इस  भूतह हवेली के  मालिक हो जाया करते थे। उन दिनों आज की तरह गैस, बिजली आदि की उपलब्धता तो थी नहीं, सभी लोग लकड़ियों और गोबर के कंडे (उपले) को ही  घर के ईधन के रूप मे इस्तेमाल करते थे। होली पूर्व स्कूल की छुट्टियों मे होली मनाने की योजनाये बच्चों द्वारा बनाई जाती थी। मुख्य कार्य होली के लिये लकड़ी-कंडे एकत्रित करना था। ग्रामीण क्षेत्रों से सिर पर लकड़ियों और कंडे की ऊंची ऊंची डालियों को ले कर ग्रामीण महिलाये-पुरुष  बेचने के लिये शहर आते थे। बच्चों के झुंड सविनय हर लकड़ी बाले से "एक लकड़ी" और कंडे बालों से "एक कंडा" को "होली टैक्स" के रूप मे लेते थे। कई बार उक्त ग्रामीण उक्त टैक्स को देने से मना कर देते थे। तब गुरिल्ला आक्रमण दस्ता हरकत मे आ जाता था। जब ग्रामीण अपने ग्राहकों से लकड़ियों-कण्डों के मोल-भाव मे व्यस्त होता उक्त बन्दर सेना के एक-दो सदस्य लकड़ियो या कण्डों पर झपट्टा मारकर एक-दो लकड़ी या कंडे ले कर भाग जाते थे। लूटे गये लकड़ी या कण्डों को खंडहर मे फेक दिया जाता था। यदि पकड़े गये तो सारी बच्चा सेना एक साथ खड़े होकर लड़ने तैयार रहती। बूड़े-बुजुर्ग भी होली का बस्ता देकर मामला रफा-दफा करा देते थे। ये ईधन कलेक्शन होलिका दहन के दिन तक चलता रहता था। होलिका दहन बाली रात मे कुछ बड़े युवकों द्वारा घूम-घूम कर कच्चे छप्परों को या खंडहारों के दरवाजे या बंद पड़े घरों की उजड़ी चौखटों को होलिका  दहन भी किया जाता था, जिससे हम बच्चे हमेशा दूर रहते थे। कुछ ग्रामीण बैल गाड़ियों मे लकड़ियाँ और जानवरों के लिये सूखे चारे का  "पूरा" (सूखी घास को एकसाथ बांध कर एक गटठे का रूप देना "पूरा" कहलाता हैं) बना कर भी बाजार मे बेचने के लिये लाये जाते। होली पर इन बड़ी-बड़ी गाड़ियों मे पीछे से "लकड़ी या घास के पूरे" को   खीच कर  भाग जाना हम बच्चों की साधारण बात थी। होली पर खाली लकड़ियों-कण्डों के अलावा अन्य खर्चों की पूर्ति के  लिये कुछ नगदी की भी जरूरत पड़ती ताकि भांग की ठंडाई और रंग-गुलाल का इंतजाम किया जा सके। इसके लिये टेलीफ़ोन के तारों पर धागे के एक सिरे पर मछ्ली का कांटा लगा कर रास्ते से निकलने बाले शहरी/ग्रामीण की टोपी या पगड़ी पर फंसा देते थे। दूसरा सिरे पर बैठा लड़का तुरंत ही धागे को खींच लेता जिससे टोपी या पगड़ी हवा मे लटक जाती। नीचे खड़े बच्चों की टीम पैसे का मोल-भाव कर पैसे के बदले टोपी/पगड़ी बापस कराने का काम करती। कुछ पैसा आसपास के दूकानदारों या ठेले-खोमचे बालों से चंदे के रूप एकत्रित किया जाता था।  
  
 हमारे घर के पास ही मुरलीमनोहर का मंदिर हैं जिसकी आज भी झाँसी मे बड़ी मान्यता हैं, कहा जाता हैं कि झाँसी कि रानी लक्ष्मी बाई इस मंदिर मे दर्शन के लिये आती थी। झाँसी के राजपरिवार का राज्याश्रय इस मंदिर को प्राप्त था। इसलिए इस मंदिर के पीछे घास मंडी मे जलाये जाने बाली होली को  झाँसी नगर मे मुख्य होली का दर्जा प्राप्त था। इस होली को जलाने के लिये शहर कोतवाली के दरोगा ही अधिकृत रहा करते थे। मंदिर की आरती से ही दरोगा जी होली का दहन किया करते थे। दहन के आधा-एक घंटे पूर्व दरोगा जी झाँसी राज के लेखाधिकारी के मकान मे उन की आवभगत पूरे मुहल्ले के लोग के साथ की जाती थी। इन  परिवारों के घर आज भी "लिखधारी" उपनाम लिखते हैं।  होली हो और फाग के गीत और होरियारों द्वारा छीटाकशी और गालियाँ दरोगा जी को न दी जाये ऐसा कैसे हो सकता था। पर होली के उल्लास मे पुलिस मुखिया द्वारा इस हुड़दंग को बड़ी सहजता से लिया जाता था।   

झाँसी नगर मे  होलिका दहन के अगले दिन रंग कि होली नहीं खेली जाती क्योंकि होलिका दहन के अगले दिन  झाँसी के राजा एवं रानी लक्ष्मी बाई के पति श्री गंगाधर राव का देहावसान हुआ था अतः स्वर्गीय राजा के सम्मान मे  होली का रंग एवं फाग का उत्सव होलिकादहन के दूसरे दिन किया जाता था। हमने बचपन मे देखा था उस समय के बूढ़े-बुजुर्ग रंग कि होली, होलिका दहन के दूसरे दिन ही मनाते और खेलते थे।  समय के लंबे अंतराल मे इतिहास की इस परंपरा को समय के साथ भुला दिया गया। अब झाँसी मे भी होली होलिका दहन के अगले दिन भी  खेली जाती हैं।  झाँसी के राजा स्वर्गीय श्री  गंगाधर धार राव की समाधि आज भी झाँसी मे लक्ष्मी गेट बाहर लक्ष्मी तालाब के पास बनी हैं। कुछ माह पूर्व मुझे उनकी समाधि पर पुनः जाने का सौभाग्य मिला था। प्रसन्नता हैं की पुरातत्व विभाग द्वारा समाधि की देख भाल अच्छी तरह की जा रही हैं। 

आज नौकरी की आपाधापी से मुक्ति के बाद बचपन की होली खेल या माना  तो  नहीं पाएंगे पर उन दिनों की होली को भरपूर याद तो कर ही सकते हैं। सोच कर हैरानी  और खुशी होती हैं कि कितने महान और ज़िंदादिल, विशाल ह्रदय और विचार कुशल  थे बे लोग जो बचपन मे हमारे और हमारी  मित्र मंडली द्वारा होली मनाने के लिये सताये या परेशान किये गये और कितनी नादानियाँ और शैतानियाँ हम और हमारे बाल साथियों ने की। उन त्रुटियों को आग्रह पूर्वक स्वीकार करते हुए झाँसी के तत्कालीन राजा  स्वर्गीय श्री गंगाधर राव को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए प्रातः स्मरणीय झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई को नमन करते हुए,  अपने नगर के लोगो को, शुभचिंतकों और ईष्ट मित्रों को होली के पावन पर्व की हार्दिक बधाई और शुभ कामनाएँ प्रेषित करते हैं।  

विजय सहगल