"विविध भारती"
कुछ चीजें ज़िंदगी का कब हिस्सा बन जाती हैं पता भी
नहीं चलता। उन के साथ-साथ चलने से कभी मन मस्तिष्क पर बोझ नहीं होता इसी कारण उन
का साथ ज़िंदगी का सुखद अटूट हिस्सा बन
जाता हैं। रेडियो या ट्रंजिस्टर एक ऐसा
उपकरण हैं जो हम जैसे लाखों करोड़ो लोगो की ज़िंदगी का आज से नहीं बल्कि पिछले अनेक
दशकों से ज़िंदगी का अभिन्न अंग बने हुए हैं। सूचना प्रसारण के एक शसक्त माध्यम के रूप मे इसे हम बचपन से
देखते आये थे। ये दोनों ही उपकरण हमारे घर मे नहीं थे। सन् 1964-65 मे रेडियो का किसी घर मे होना समृद्धिशील परिवार की निशानी मानी जाती थी। जैसे आजकल टी. वी. डिस्क या 80-90 के दशक मे घरों मे टी॰वी॰
अंटीना लगा होता था 50-60 के दशक मे जिन घरों मे रेडियो होता था उनके छत्त पर
पतले-पतले धातु के जालों से बना 5-6 फुट
लंबा पट्टा दो बाँसों के बीच मे बंधा रहता
था। जिसके एक सिरे से एक तार अंटीना और दूसरा नीचे ड्राइंग रूम रखे रेडियो से जुड़ा
होता था। हमारे मुहल्ले मे सिर्फ दो घरों मे ही रेडियो था। एक हमारे कुटुंब मे
रिश्ते के ताऊ थे जिन्हे हम बच्चे बाबू कहते थे एवं दूसरा पड़ौस मे रहने बाले
तंबाकू के बड़े गुजराती व्यापारी पटेल साहब के यहाँ था। पड़ौस के सभी घरों मे बच्चों का और परिवार के सभी सदस्यों का
आना जाना लगा रहता था। रेडियो का देखना तो प्रायः हो जाता था पर कभी कभार रेडियो
मे बज रहे गानों को सुनने मिल जाता था। उसे छूने की हिम्मत तो हम कभी न दिखा सके। रेडियो के बड़े सुनहरे जाली दर पर्दे के नीचे
काँच की आयताकार पट्टी मे रेडियो स्टेशन के मीटर बैंड की संख्या लिखी रहती थी।
काँच की पट्टी मे 2-3 बड़े बड़े गोल स्वीच लगे रहते, एक जो काँच की पट्टी के
अंदर लगी चमकीली सुई को दायें-बायें घूमने का काम करता और दूसरा, आवाज को काम
ज्यादा करता। काँच की पट्टी और सुनहरी जाली के पीछे कुछ बल्बों की हल्की रोशनी
अंदर से चमकती थी। एक बहुत छोटी काँच की चौकोर खिड़की नुमा आकृति जो सबसे आकर्षित
करती थी। जिसके अंदर हल्की हरी रोशनी चमकती थी। हरी रोशनी बायें से दायें लगातार
चलती थी और जो मन-मस्तिष्क मे दशहरें मे होने बाली रामलीला के स्टेज का अहसास कराती थी, जैसे
पर्दा सरकते ही रामलीला के पात्र आकार
जीवंत हो जाते बैसे ही उस चौकोर आकृति मे
हरे रंग की बायें से दायें घूमती लाइट को
देख कर यही अहसास होता मानो पर्दा खिसकते ही उस चौकोर आकर्ति नुमा स्टेज के अंदर बैठ कर रेडियो उद्घोषक कार्यक्रम संचालित कर रहे
है और गायक-गायिका रेडियो के अंदर मधुर
आवाज मे गाना गा रहे हैं। उन दिनों रेडियो रखने बालों को वार्षिक लाईसेंस फीस
पोस्ट ऑफिस मे चुकानी होती थी। जिसकी पास बुक मे लाइसेन्स फीस की एंट्री की जाती
थी।
उन दिनों बहुत ज्यादा रेडियो स्टेशन उपलब्ध नहीं थे। सबसे चर्चित रेडियो
स्टेशन सीलॉन जो बाद मे रेडियो श्री लंका के नाम से भी जाना जाता था, विविध भारती
और ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सेवा। देश दुनियाँ के समाचार के लिए बीबीसी लंदन भी विश्वसनीय माना जाता था जो एक निश्चित समय पर
श्री लंका रेडियो के माध्यम से समाचार प्रेषित करता था। सुबह ठीक आठ बजने के पूर्व
श्री लंका रेडियो और ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सेवा पर फिल्मी
गीत का आखिरी गाना आवश्यक रूप से श्री
के॰ल॰ सहगल द्वारा गये गाने की आवाज से
होता। एक और प्रसिद्ध कार्यक्रम उन दिनों रेडियो श्री लंका पर प्रत्येक बुधबार को
होता था वह था "बिनाका गीत माला"। इस कार्यक्रम की प्रस्तुति उद्घोषक
"श्री अमीन सयानी" द्वारा अपनी बेहद शानदार आवाज मे की जाती थी। साल के
अंत मे बिनाका गीत माला का सबसे ज्यादा बार बजने बाला "शरताज गीत" का
चयन किया जाता। इस कार्यक्रम की दीवानगी श्रोताओं के बीच देखते ही बनती थी। कुछ धुरंधर
श्रोता बर्ष के शरताज की भविष्य वाणी करते थे। जैसी ही भविष्य वाणी सच होती परिवार
के सदस्यों के बीच ज़ोर-ज़ोर से चीख कर
उत्साह के रूप मे गाने के बजते ही की जाती थी। इतना पागलपन और दीवानगी हमने
अपनी ज़िंदगी मे नहीं देखी। हर घर और मुहल्ले के लोग या मित्र गण उन घरों मे
एकत्रित हो जाते जिनके घरों मे रेडियो होता। उस दौरान घरों मे चाय-पकोड़ों के दौर
चलते रहते। सड़कों पर दिसम्बर के आखिरी बुधवार को रात 8 से 9 बजे सन्नाटा पसरा
रहता। धीरे-धीरे रेडियो और ट्रंजिस्टर की
पहुँच बढ़ने लगी। इस दौरान हमारे घर भी ट्रंजिस्टर आ गया था। आँगन मे तुलसीघरा के
उपर उसका स्थान नियत था। उन दिनों ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस से भी फिल्मी
गानों का प्रसारण होता था पर सुबह 8 बजे का हिन्दी समाचार बुलेटिन इस पर नहीं आता
था अतः 8 बजे बापस विविध भारती का स्टेशन लगा दिया जाता था। उन दिनों कुछ लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम हवा महल भी शाम के पसंद किया जाता
था। एक और कार्यक्रम फौजी भाइयों के लिए भी बड़ा प्रिसिद्ध था जिसमे हर हफ्ते कोई
फिल्मी कलाकार फ़ौजिओं के लिये उनके पसंद के गानों को सुनवाया जाता था। हाँ रात मे बगैर किसी चूक के पौने नौ
के हिन्दी समाचार घर के सारे लोगों द्वारा
जरूर सुने जाते थे। "ये आकाशवाणी हैं, अब आप देवकी नन्दन पांडे से समाचार सुनिए"...... । ये जानी पहचानी
लाइन और उस आवाज से उस समय के लोग भली भांति
परिचित थे। प्रायः दिन मे तो ट्रंजिस्टर हमारे कब्जे मे रहता था पर रात मे जल्दी
सोने की आदत के कारण नौ बजे के बाद इस पर मेरी बड़ी बहिन का कब्जा हो जाता था। उसे
देर रात तक पढ़ाई के साथ गाने सुनने का शौक था। दीवानगी इस हद तक कि रात के सभी कार्यकर्म रेडियो स्टेशन से समाप्त
हो जाते, खुद भी सो जाती पर
ट्रंजिस्टर घर्र-घर्र सारी रात बजता रहता। सुबह जब कोई उठता तो ट्रंजिस्टर बंद
करता। इस के लिये कई बार उसको डांट पड़ती। गर्मियों कि छुट्टी मे प्रायः हम भाइयों के साथ "तालबेहट" मे अपने चाचा के गाँव जाना होता। दिनभर तो तालाब पर नहाना और तैरना
सीखना होता पर इस जगह अधिकतर घरों मे लाइट नहीं थी। चाचा के यहाँ भी लाइट और
ट्रंजिस्टर नहीं था। बगल मे पड़ौसी के यहाँ ट्रंजिस्टर था उन्हे भी समाचार सुनने का
शौक रहा था, मैं भी चाचा जी के यहाँ
छत्त पर पड़ौसी के ट्रंजिस्टर पर समाचार सुनता। घुप्प अंधेरे मे आवाज़ दूर तक आती थी
जिसका फायदा हमे मिलता और बगैर पड़ौसी के अहसान के हमे समाचार अपने आप सुनने को मिल
जाते।
अब
तक कॉलेज की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी। नौकरी की तलाश जारी थी। 1980 मे सौभाग्य से नौकरी का बुलावा आने पर लखनऊ जाना
हुआ। मेरे बड़े भाई भाई पहले से लखनऊ मे सेवारत थे। अब दिन चर्या बदल चुकी थी। काम के घंटे निश्चित थे।
लेकिन यहाँ भी सुबह का आगाज 5.54 पर
विस्मिल्ला खाँ की शहनाई से होता। तब से आज तक कुछ ऐसी आदत बन गई की विविध भारती पर
जब तक विस्मिल्ला खाँ की शहनाई ने सुन ले दिन की शुरुआत कुछ अधूरी सी लगती। सुबह
आधा घंटे का "वंदनवार कार्यक्रम" जो गैर फिल्मी, धार्मिक भजनों पर आधारित होता था। पंडित भीम सेन जोशी, श्री कुमार गंधर्व,
श्री जसराज, श्री हरिओम शरण,
स्व॰ जगजीत सिंह के भजन सुनना बहुत अच्छा
लगता था जो सुबह की सार्थकता को खुश नुमा बनाता था। "प्रभु हम पे कृपा करना, प्रभु हम पे दुआ करना,,
वैकुंठ तो यही हैं......" । उक्त भजन हमारे बड़े भाईसाहब को अत्यंत प्रिय था।
जिसको वे प्रायः साथ मे गुनगुनाते रहते। उन दिनों टी॰वी॰ का चलन शुरू ही हुआ था।
टेक्सला टी॰वी॰ कंपनी द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम बहुत अच्छा लगता था जो सप्ताह मे
एक दिन पंजाबी भाषा मे आता था और पंजाबी हमे बिल्कुल नहीं आती थी, पर पूरे कार्यक्रम की पस्तुति से हमे कभी ऐसा नहीं लगा
कि कार्यक्रम पंजाबी मे आता हैं। उसकी टैग लाइन जो गुरुग्रंथ साहब के शबद से ली गई
थी "कोई बोले राम-राम, कोई खुदाय, कोई सेवे गुसैयाँ.......... "
कानों को सुकून देने बाली,
बेहद कर्णप्रिय लगती थी। आधा घंटे के
कार्यक्रम मे गुरु ग्रंथ साहब के कोई एक-दो शबद को शामिल किया जाता। कार्यक्रम के प्रस्तुत
कर्ता का नाम तो नहीं मालूम पर उसकी आवाज भी बहुत शानदार थी, कार्यक्रम
का समापन इन लाइनों से होता जो मुझे आज भी
यदा हैं "... यह प्रोग्राम टेक्सला टी॰वी॰ बनाने बालों द्वारा प्रस्तुत कीता
गया" । प्रसारित होने बाले कार्यक्रम जैसे भूले-बिसरे गीत, कृषि चर्चा, जिले की चिट्ठी,
प्रदेश की चिट्ठी,
रामचरित मानस, समाचार, फिल्मी गानों के कार्यक्रम एक सुंदर फूलों के गुलदस्ते
की तरह थे। विविध भारती के कार्यक्रमों के साथ -साथ हमारी दिनचर्या भी चलती रहती, जैसे सुबह बंदनवार के समय चाय पी जा रही होती, भूले बिसरे गीत और कृषि दर्शन के समय अखबार पढ़ा जाता था
जो सुबह आठ बजे के समय तक चलता,
फिल्मी गानों के साथ खाना बनाना और नहा धो कर नौ-सवा नौ बजे साइकल पर सवार होकर
ऑफिस के लिये प्रस्थान करने तक लखनऊ मे यही दिनचर्या थी। सुबह की ये जीवन चर्या
विविध भारती के स्टेशन के बदलने के सिवाय कमोवेश सालों साल एक सी ही रही। जब ग्वालियर, पोरसा या डबरा रहा तो विविध भारती ग्वालियर सुनता, रायपुर मे विविध
भारती रायपुर, भोपाल मे विविध भारती भोपाल या सेवानिवर्ति तक विविध
भारती दिल्ली या एफ॰एम॰ गोल्ड दिल्ली तक
यही दिन चर्या रही। आज भी सेवानिव्रती के बाद जब कभी बच्चों के पास नोएडा, घर भोपाल या ग्वालियर प्रवास होता हैं तब भी दिनचर्या यही रहती हैं, हाँ पहले विविध भारती का साथ 10 बजे पूर्व "आज के
फनकार" तक ही होता था लेकिन अब आज कल
10 बजे के बाद भी "गाने एस॰एम॰एस॰ बहाने", "गीत गाते गुनगुनाते" के बाद तक भी चलते हैं। टी॰वी॰,के इस मकड़ी जाल के युग मे, और व्हाट्सप, "फ़ेस बुक" जैसे सामाजिक संचार माध्यमों के
बीच एवं एफ़॰एम॰ रेडियो के अंगिनित स्टेशनों के बीच भी विविध भारती का अपना एक अलग
महत्व हैं, हमे नहीं लगता विविध
भारती का स्थान कोई अन्य रेडियो स्टेशन ले सकता हैं।
धन्यवाद
विविध भारती इतने लंबे साथ के लिये।
विजय सहगल



