शनिवार, 8 मई 2021

कोरोना से सामना

 

"कोरोना से सामना"






मेरे ब्लॉगर मित्रों, पिछले लगभग 18-20 दिन बड़े ही कठिनाइयों और कष्ट से निकले। 16 अप्रैल 2021 को मेरा सामना कोरोना से हो गया। कहाँ कौन सी चूक हुई नहीं जानता पर हल्की खांसी और बुखार के प्रारम्भिक लक्षण दिखने के बावजूद 21 अप्रैल को कोरोना से पीढ़ित करार दिया। ये बीमारी मुझ तक सीमित होती तो भी चल जाता मेरी श्रीमती जी भी साथ ही साथ इस बीमारी से पीढ़ित हो गई। ग्वालियर प्रवास पर हम आये तो थे आराम करने लेकिन हा!! दुर्भाग्य इस महामारी के अकारण ही शिकार हो गए। महानगरों मे सुन रही और दृश्य मीडिया पर दिखाई जा रही भयावह स्थिति ने हमे चिंता और संकट मे डाल दिया। लेकिन छोटे और मध्यम शहरों मे मिली पहचान ने प्रारम्भिक चिकित्सकीय सेवाओं मिलने मे कोई दिक्कत न आने दी। डॉक्टर संजय मेहरा जैसे नेक दिल और भले इंसान रूप मे देवता ने एवं पारवारिक मित्र दिल्ली के डॉक्टर विशाल  जैन ने  हिम्मत के साथ चिकित्सकीय परामर्श उपलब्ध कराया अन्यथा महानगरों मे इन सेवाओं का भी उपलब्ध होना बड़ा दुष्कृत कार्य था।

कोविड से ग्रस्त इस महामारी मे, मै तो क्या श्रीमती जी का सहारा बनता लेकिन उसके सहारे के बिना मेरा स्वस्थ होना नामुमकिन था। खाने पीने की समस्या से लेकर दवा आदि का प्रबंध भी उसे देखना पड़ा। प्रारम्भ के 4-5 दिन तापमान 102 के ऊपर तक चला गया। बड़ी विपरीत एवं कठिन परिस्थितियाँ थी। दवाई के साथ तापमान कम करने हेतु रात-विरात ठंडे पानी मे पैरों को टब मे डाल बैठना, सिर, माथे, हाथों मे ठंडे पानी की पट्टियाँ रखना मेरे जैसे आलसी आदमी हेतु बड़ा कठिन कार्य श्रीमती जी के कारण सुगम हो गया। इन विपरीत हालातों मे अपनी देखभाल के साथ मेरी देखभाल करना श्रीमती जी के ही बूते का काम था। छोटे और माध्यम शहरों मे हॉस्पिटल मे कोरोंटीन मे इस तरह की सेवा और देखभाल की कल्पना असंभव कार्य है कदाचित कोरोंटीन मे तापमान कम करने जैसे कार्य या अन्य देखभाल के आभाव मे प्रायः  अप्रिय हादसे इसी कारण होते हों?

मेरे घर मे वेला के फूल लगे है जिनकी खुशबू मुझे बेहद प्रिय है पर इस दौरान एक दिन इन फूलों  गंध का अनुभव न होना ने हमे और चिंतित एवं परेशान कर दिया। किसी अदृश्य अनहोनी की चिंता ने इन 4-5 दिनों विशेषकर 102-103 डिग्री के तापमान ने शारीरिक कष्ट और वेदना के साथ चिंता मे डाल दिया!! दूसरी ओर दिल्ली एनसीआर मे बच्चों को चिंतित कर रखा था। हम दोनों के न चाहते हुए भी 23 अप्रैल  को तो बेटे की जिद ने ट्रेन से ग्वालियर आने का आरक्षण भी करा लिया। लेकिन इसी दिन मध्य रात्री 3 बजे उसे ग्वालियर न आने के लिये किसी तरह हम लोगो ने उसे राजी किया डर ये था कहीं वो भी कोरोना से पीढ़ित न हो जाए।

लेकिन ईश्वर की कृपा मित्रों की शुभकामनायें एवं परिवार मे माँ सहित सभी भाई-बहिनों से नित्य विडियो वार्तालाप ने भी इस महामारी से उबरने मे बड़ी सहायता की। संजय पांडे एवं भाई राजेंद्र जी जैसे पारिवारिक पड़ौसियों ने दवाई, एवं आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित कर एक सच्चे पड़ौसी का साक्षात धर्म निभाया जिसे विस्मृत नहीं किया जा सकता। कोरोना वैक्सीन की पहली डोज़ ने भी गंभीर स्थिति उत्पन्न न होने देने  मे अति महत्वपूर्ण भूमिका अदा की जिसे भुलाया नहीं जा सकता जिसका उल्लेख मैंने 13 मार्च के अपने ब्लॉग "कोविड के टीकाकरण" मे किया था (https://sahgalvk.blogspot.com/2021/03/blog-post_13.html)।

21 अप्रैल 2021 को ग्वालियर प्रशासन की गहरी निद्रा मे होने का आभास मैंने स्वयं देखा और महसूस किया। घोर महामारी और आपदा मे आरटीपीसीआर टेस्ट के लिये थाटीपुर डिस्पेन्सरी मे लगभग 200-250 आदमी एक घंटे से डिस्पेन्सरी खुलने का इंतज़ार कर रहे थे। प्राइवेट लेब मे भी टेस्ट मे आवश्यक उपयोग की सामाग्री के आभाव टेस्ट नहीं हो रहे थे। न चाहते हुए भी कमजोरी के  हालात मे कुछ समय मैंने भी डिस्पेन्सरी मे इंतज़ार किया। यध्यपि इंग्लैंड अमेरिका या अन्य विकसित देशों की तरह मै भारत मे शासन से अपेक्षा तो नहीं रखता कि हर मरीज की देखभाल के लिये एक नर्स या डॉक्टर उपलब्ध कराये  पर जन सेवक सरकारों से इतनी उम्मीद तो की ही जाती है कि वे चिकित्सकीय सूचना आम लोगो को उपलब्ध तो कराएं ही। पर खेद और दुःख है उस दिन कलेक्टर, कोविड कंट्रोल रूम, जय आरोग्य हॉस्पिटल के संबन्धित अधिकारियों को डिस्पेन्सरी न खुलने की जानकारी फोन कर दे सकूँ, पर हा! शोक सभी फोन अनुत्तरित रहे। अगले दिन मुख्य चिकित्सा सचिव श्री मो॰ सुलेमान, आईएएस, एवं श्री आकाश त्रिपाठी, अतरिक्त चिकत्सा सचिव भोपाल के फोन भी अनुत्तरित रहे। मेरा मानना है सचिव स्तर या आईएएस स्तर  के अधिकारी से ये अपेक्षा करना कि जन साधारण के फोन कॉल अटेंड करे पर एक बाबू स्तर के कर्मचारी को इस कार्य मे लगाया ही जा सकता था? पर जब व्यवस्था मे लगे प्रशासन के अति महत्वपूर्ण प्रशासनिक अधिकारी इतनी गहरी नींद मे सोये हों तो  मान॰ मुख्य मंत्री को ट्वीट करने का उल्लेख करना तो व्यर्थ ही है। जब कोविड महामारी मे अप्रत्यक्ष रूप से  बैंक सेवा निर्वाध जारी रखी जा सकती है तो महामारी से सीधी तौर पर जुड़ी प्रत्यक्ष चिकित्सकीय सेवाओं मे सरकार के मौन  की घोर लापरवाही का जीता जागता उदाहरण शर्मसार करने वाला था। पहले भी 23 फरवरी 2021 को मैंने अपने ब्लॉग "अंधेर नगरी चौपट मामा" मे माननीय शिवराज सिंह के प्रशासन पर टिप्पड़ी की थी। (https://sahgalvk.blogspot.com/2021/02/blog-post_23.html)।   

लगातार 14-15 दिन के इलाज़ के पश्चात आज मै पूर्णतया: स्वस्थ हूँ पर इस दौरान आये दिन अपने प्रिय जनों, मित्रों जिनके साथ मैंने कार्य किया या जिन्हे नजदीक से जानता था कोरोना महामारी से असमय, आकस्मिक निधन के समाचार वेदना और संताप देने वाले थे। बैंक के सहकर्मी राजीव शेखर सिन्हा, टीके सिंह, जैसे होनहार नौजवानों के दुःखद विछोह सुन इस महामारी की गहनता और गंभीरता ने हृदय को झकझोर दिया। क्या अन्य अनेक जाने अनजाने नौजवान या सामान्य नागरिकों का अकाल मौत के मुंह मे जाना उनकी गलती या असावधानी वश ऐसा हुआ? कदापि नहीं!

क्या दोष था इन जैसे सैकड़ों नौजवानों नागरिकों और व्यक्तियों का जिसे एक मानव निर्मित कोरोना महामारी ने काल के गाल मे समाहित कर लिया। चीन की भू विस्तार की हवश के कारण  मानव जाति को अकाल मृत्यू मे झोकना की कुत्सित छुद्र मानसिकता ने आज विश्व को मौत के दो राहे पर खड़ा कर दिया। क्या चीन के शासकों की इस कुत्सित नीच कृत की निंदा नहीं होनी चाहिए? जिसने कोरोना जैसी महामारी के जिन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया और जिसके नियंत्रण हेतु सारी दुनियाँ के देश आर्थिक और सामाजिक विषमताओं के बीच अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है। चीनी शासकों की इस घिनौनी और तुच्छ नीति की घोर निंदा और भर्त्स्ना सारे विश्व को एक स्वर मे मिलकर करनी  ही चाहिए।

दो गज की दूरी, मास्क का उपयोग और बारंबार हाथ धोने की आदत मे  शुमार कर  आइये सभी मिल कर परम पिता परमात्मा से प्रार्थना कर इस महामारी से लड़ने, पार पाने और विश्व को कोरोना से मुक्ति हेतु आग्रह करें।                            

विजय सहगल