रविवार, 18 नवंबर 2018

शांतिकुंज हरिद्वार


शांतिकुंज -हरिद्वार






मुझे शांतिकुंज हरिद्वार मे संजीवनी शिविर मे 9 दिवसीय सत्र मे भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। मै अपनी पत्नी श्रीमती रीता के साथ दिनांक 31 जुलाई 2018 को सत्र मे भाग लेने हेतु हरिद्वार पहुँच गया। शांतिकुंज का वातावरण प्राचीन गुरुकुल या आश्रम की तरह है। दिनचर्या भी अलग हटकर रहती है। इस संजीवनी सत्र मे शामिल होना हमारे लिये एक चैलेंज था क्योंकि जिस दिनचर्या के हम या हम जैसे लोग अभ्यस्त है और जो तथाकथित शिक्षा एवं पद का आवरण हमने ओढा है उसको उतारे विना सत्र मे सफलता संधिग्ध थी? सत्र मे शामिल अभ्यर्थियों से अपेकक्षा रहती है की सत्र के शिविरार्थीयों के लिये  निश्चित भारतीय परिधान मे ही प्रतिदिन के सत्र मे शामिल हों अर्थात पीली धोती कुर्ता एवं मंत्र चादर। यों तो गायत्री परिवार की पत्रिका अखंड ज्योति के माध्यम से हमारे बड़े भाई श्री शरद सहगल  1970-71 से जुड़ें थे। वे अखंड ज्योति  के संपर्क मे कैसे और किसके माध्यम से आये मालूम नहीं पर झाँसी मे मेरे घर पर पत्रिका नियमित समय पर आती थी। पत्रिका यध्यापि मै पूरी तो नहीं पढ़ता था फिर भी प्रथम पृष्ट एवं बॉक्स मे प्रकाशित कई छोटी छोटी कहानियाँ एवं दृष्टांत एवं अंतिम पृष्ठ पर सामाजिक सदसन्देश देती कविता जरूर  एक बार मे ही पढ़ लेता था। पत्रिका का प्रभाव उसमे प्रकाशित लेख एवं विचार तो होते ही थे  जो मुख्य बात उसमे हमने नोट की थी कि पत्रिका की विषय वस्तु, लेख आदि उत्तम होते ही थे किन्तु पत्रिका मे कोई भी विज्ञापन नहीं था, जो आज भी अनवरत रूप से पत्रिका मे नहीं छपता। पत्रिका का प्रकाशन 1926 से परम पूजनीय गुरदेव श्री राम शर्मा आचार्य द्वारा लगातार किया गया। उनके विचारों और लेखों से प्रेरित पत्रिका आज भी नियमित प्रकाशित होकर देश और विदेश मे युगनिर्माण योजना के तहत विचार क्रांति अभियान चला रही है। एक और बात जो इस मिशन से जुड़े लोगो ने उस समय हमे  प्रभावित की बह थी पत्रिका वितरित करने बाले सज्जन से हमारी भेट, जो महीनो नहीं हुई, बो परिजन पत्रिका हमारे घर झाँसी  के दालान मे नियमित छोड़ जाते यहाँ तक कि  वार्षिक शुल्क देय होने के बाबजूद पैसे कई महीने बाद लेने आये तब उनसे भेट हुई मैंने आग्रह पूर्वक उन्हे घर मे आमंत्रित किया और उनका परिचय प्राप्त किया उनका नाम तो नहीं मालूम पर सरनेम श्री विश्वकर्मा लिखा करते थे।  ऐसे सेवा भावी कार्यकर्ता से मुलाक़ात पर मै उनके प्रति काफी आदर और सम्मान का भाव आज भी रखता हूँ।  31 जुलाई को हम दोनों हरिद्वार स्थित शांतिकुंज आश्रम पहुँच गये। संजीवनी सत्र के मुख्य व्यवस्थापक श्री नमो नारायण पांडे जी से संपर्क हुआ उन्होने सत्र मे शामिल होने आये अभ्यर्थियों को कमरे का आवंटन किया। एक कमरे मे छ: लोगो की व्यवस्था की गयी थी। स्त्री एवं पुरुषों के लिये अलग अलग व्यवस्था थी। प्रत्येक   कमरे मे आवशयक सुविधा जैसे पंखे, लाइट, लेट्रिन बाथरूम की व्यवस्था थी, प्रत्येक अभ्यार्थी के लिये पलंग अलग गद्दों सहित था। चूंकि हम सभी शिविरार्थी युग निर्माण योजना सतसंकल्प हेतु आये थे इसलिए हमे कम से कम सुविधाओं मे अपनी दिनचर्या पूर्ण करनी थी जैसा की गुरुदेव का सदवाक्य है कि "सुखी रहने के दो तरीके है-अपनी आवश्यकताओं को कम करें एवं परिस्थितियों से समझौता करे"। वास्तव मे सभी अभ्यार्थी एक व्रहद  लक्ष्य "युग निर्माण मिशन" का ककहरा सीखने आये थे जिसकी पहली सीढ़ी है कि "युग निर्माण कैसे होगा"? "व्यक्ति के निर्माण से"। शिविर मे शामिल अधिकतर परिजनो का आध्यात्मिक विध्या का  ज्ञान हमसे कही बहुत ज्यादा था। वे मंत्र, यज्ञ हवन क्रिया आदि मे  बहुत निपुण थे।   सत्र की शुरुआत 31 को संकल्प सिद्धि के साथ हुई। लगभग 1000-1100 सौ  शिविरार्थी जो देश के अलग अलग प्रांतो से आये हुए थे संकल्प लेने हेतु सभागार मे उपस्थित थे। सभी शामिल परिजनो को दिनचर्या एवं खान पान एवं रहन सहन के नियम श्री नमो नारायण पांडे जी द्वारा बताया गया। दिनचर्या कठिन थी लगा मै शायद उसको पूरा कर भी पाऊँगा या नहीं? दिन की शुरुआत प्रातः 3.30 बजे बिस्तर से उठने से करनी थी तत्पश्चात 30-40 मिनिट मे दैनिक रूटीन, स्नान आदि के बाद तैयार होना था, साथ मे कमरे मे रह रहे अन्य साथियों के लिये भी स्थान छोड़ना था ताकि इन्ही 30-40 मिनिट मे अन्य परिजन भी तैयार हो सके। पहले दिन की शुरुआत थोड़ी कठिन रही किन्तु रूम मे रह रहे सहभागी श्री हरी राम प्रजापति, श्री शिव मोहन यादव एवं श्री रामतीर्थ जो तीनों गाजीपुर से सत्र मे शामिल होने आये थे और जिनकी पृष्ठभूमि ग्रामीण कृषक परिवारों से थी के कारण आसान हो गयी थी। ये परिजन ठीक समय पर अपनी दिनचर्या शुरू कर देते थे और हमारे कमरे मे सबसे पहले तैयार हो जाते थे। चूंकि छ: लोगो को एक ही समय पर तैयार होना होता था अतः नहाने, लैट्रीन, एवं दातौन-मंजन हेतु अलग अलग स्थान/कक्ष बनये गये थे। गर्मी के वावजूद भी हरिद्वार मे सुबह का मौसम ठंडे पानी से नहाना मुझे एक हिम्मत का काम लगा। हमारे कक्ष मे अन्य दो साथियों मे एक श्री लम्बोदर मिश्रा जो बहराइच से थे और 1990 से मिशन के लिये समयदान कर रहे थे एवं अन्य श्री सतीश शर्मा जो गाज़ियाबाद से थे। 4.30 बजे से सत्र का प्रथम चरण गुरुदेव श्री राम शर्मा आचार्य  एवं माताजी श्रीमती भगवती देवी के निर्देशन मे ध्यान योग से होता तत्पश्चात उनके द्वारा किसी विषय पर छोटा सा सम्बोधन होता। एक-दो मिनिट के आराम के बाद 1 घंटे 30 मिनिट के लिये गायत्री मंत्र का जप करना अनिवार्य होता था। गायत्री मंत्र जाप दोपहर एवं शाम को भी 45-45 मिनिट करना होता था।  ये जप साधना समूहिक रूप मे उसी प्रवचन हाल मे करनी होती जहां नित्य के सारे कार्यक्रम होते। एक समाचार कुछ दिन पूर्व हमने पढ़ा था कि चेन्नई के किसी मंदिर मे पहली बार एक हरिजन को मंदिर का पुजारी नियुक्त किया गया। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि गायत्री परिवार मे ऐसे सैकड़ो कार्यकर्ता है जो सामाजिक रूप से कमजोर और पिछड़े वर्ग से आते है और जो पिछले अनेकों वर्षो से  जो विधिपूर्वक पूजा, हवन, संस्कार आदि सम्पन्न कराते है। हमे याद है 1996 मे जब मुझे कलेक्टरेट रायपुर (छत्तीसगढ़) शाखा को नवीन परिसर मे स्थान्तरित करने का मौका मिला तो शाखा का विधिवत हवन पूजन कलेक्टरेट रायपुर स्थित ग्रामीण विकास विभाग मे चतुर्थ श्रेणी मे कार्यरत श्री हीरा लाल प्रजापति एवं श्री कांशी राम कुशवाह से कराया था। वे हवन-पूजन कराने मे पारंगत थे और आध्यात्मिक विषयों मे ज्ञान हमसे कहीं ज्यादा था और जो  बहुत योग्य और हम से आध्यात्मिक विध्या मे आगे थे।  6.30 बजे से सभी शिविरार्थी यज्ञ मे शामिल होते है यज्ञ शांतिकुंज मे रहने बाली बहिनों द्वारा नित्य सम्पन्न कराया जाता है। यज्ञ मे शांतिकुंज मे स्थित कार्यकर्ता एवं आये हुए अन्य इक्छुक अतिथि भी शामिल होने के पात्र होते बशर्ते सभी स्त्री -पुरुष भारतीय परवेश (पुरुष -धोती कुर्ता, स्त्री-साड़ी ) मे हों। यज्ञ का कार्य विधिवत रूप से बनी 3 यज्ञ शालाओं मे स्थापित 27 हवन कुंडो मे सम्पन्न कराया जाता जो पुराने आश्रम व्यवस्था की याद दिलाती थी जो बचपन मे हम रामलीलाओं मे देखते या रामचरित मानस/कल्याण  मे लगी तस्वीरों या पुराने धार्मिक कैलेंडरों मे देखा करते। हमे बताया गया कि यज्ञशालाओं मे मे से एक हवन कुंड मे बहुत प्राचीन अग्नि अखंड रूप से लगातार जलती रहती है जिसे स्वयं गुरुदेव हिमालय मे तप साधना करने के पश्चात साथ मे लाये थे और उस हवन कुंड मे स्थापित किया था। उस हवन कुंड मे अग्नि आज भी लगातार प्रज्वलित रहती है। यज्ञ मे शामिल होने के पश्चात गुरदेव श्री राम शर्मा, आचार्य द्वारा 1926 मे प्रज्वलित अखंड दीपक का दर्शन और गुरदेव की समाधी को प्रणाम करना नित्य का क्रम था।   लगभग 1.30 घंटे का अवकाश हल्का फुल्का चाय नाश्ता आदि करने के लिये मिलता था। दिन के दूसरे सत्र की शुरुआत 8.30 बजे से 10 बजे तक होती जिसमे किसी एक विद्वान द्वारा सामाजिक या धार्मिक रीति रिवाज पर अपने विचार रखे जाते। सभी शिविरार्थीयों से अपेक्षा की जाति की समाज की कुरितययों को दूर करने, जातिविहीन समाज की रचना हेतु और गुरदेव द्वारा लिखित 3200 से भी अधिक लिखित पुस्तकों को विचार क्रांति अभियान के तहत घर घर जाकर प्रचार प्रसार हेतु कार्य करे।  तीसरा सत्र का समय 1.30 से 4.00 बजे तक रहता इसमे भी विचारगोष्टी या प्रवचन के पूर्व 10-15 मिनिट की संगीतमय भजन प्रस्तुति  के साथ होती जो सामाजिक समरसता और सामाजिक बुराई के उन्मूलन का संदेश देते। चौथा सत्र शाम के छ: बजे नाद योग से शुरू होता था जिसमे 15 मिनिट सुमधुर बासुरी और तबले की युगल संगीत मय प्रस्तुति होती ऐसा प्रतीत होता जैसे कि सूर्य अस्त हो रहा है, गोधूलि बेला मे सभी पशु पक्षी अपने घोंषलो मे बापस हो रहे है। किसान अपने हल बैलों के साथ गले मे बंधे घुंघरुओं कि मधुर ध्वनि करते हुए  अपने घरों को बापस आरहे हों और गायों के झुंड कोलाहल करते हुए  शाम को दिन भर के  भ्रमण पश्चात अपने अपने स्थान पर बापस आ रहे हों। इस सत्र मे भी संगीत मय प्रस्तुति के बाद सामाजिक विषयों पर प्रवचन होता और रात्री 8.00 बजे पूरे दिन के कार्यक्रम की समाप्ति होती। भोजन के पश्चात 9.30 बजे सभी अपने कमरे मे विस्तर पर सोने के लिये पहुँच जाते ताकि अगले दिन प्रातः 3.30 बजे से पुनः तैयार हो सके। इस  दिनचर्या का कार्यक्रम पूरे 9 दिन इसी तरह चला। 9 दिन के शिविर मे एक दिन कुछ समय शांतिकुंज एवं देवसांस्कृति विश्व विध्यालय के प्रमुख डा. श्री प्रणव पाण्ड्या एवं दीदी श्रीमती शैलवाला से भी मिलने का कार्यक्रम शिवरार्थिओ से कराया गया।   पूरे नौ दिन के प्रवास मे स्व-परीक्षण कर मै कह नहीं सकता कि मै कहाँ तक सफल रहा? पर मै एक दावा तो कर सकता हूँ कि सत्र के भौतिक अनुशासन का हमने सत -प्रतिशत पालन किया, शिक्षा और पद के छद्म आवरण को एक हद तक उतारने मे सफल रहा। आते वक्त हम एक दूसरे परिजनो से  अपरचित थे पर जाते वक्त हमारे काफी परिजन  आपस मे परचित हो गये जो देश के विभिन्न शहरों से आये थे। श्री अनिरुद्ध मिश्रा जी (अहमदाबाद) , श्री अर्जुन व्यास (मुंबई), श्री सोनी जी (हिमाचल),  श्री सुरेन्द्र गुप्ता (लखीमपुर खीरी), श्री प्रेम नारायण पटेल (सागर), उनमे से कुछ है। मै अपने आपको शिविर मे शामिल हुए परिजनो मे इसलिये हीन समझता रहा क्योंकि मैंने अपने, अपने परिवार के निर्माण के अलावा कोई भी ऐसा कार्य नहीं किया जो समाज या युग निर्माण के निमित्त हो? 
अब मै पूरे शांतिकुंज की दिनचर्या पर भी प्रकाश डालना चाहूँगा। शांतिकुंज आने वाले प्रत्येक परिजन को संस्कार और यज्ञ आदि मे शामिल होने के लिये यथा संभव रहने के लिये स्थान उपलब्ध कराया जाता है। स्थान या कमरों मे रुकने बाले आगंतुकों से अपेक्षा कि जाती है कि कमरे बाथरूम आदि की स्वच्छता वे अपने घर की तरह करे।   पूरा शांतिकुंज इतना साफ सुथरा रहता है की देखते ही बनता है आपको आश्चर्य होगा कि पूरे आश्रम की साफ सफाई गायत्री परिवार के ही परिजन स्वयं करते है । भोजन बनाने के लिये आये हुये या रह रहे परिजन ही चावल, दाल, सब्जी आदि की सफाई, इनका बनाना-पकाना, रोटी वेलना सेकना आदि कार्य खुद ही करते है। भोजन ग्रहण करने के लिये थाली और गिलास लेकर प्रत्येक व्यक्ति पंक्तिवध्द  होकर लाइन मे वैठता है भोजन परोसने की ज़िम्मेदारी भी भोजन कर रहे या भोजन ग्रहण कर चुके परिजन सम्हाल्ते है। भोजन करने के बाद थाली और गिलास स्वयं ही साफ कर सभी परिजन उसे निश्चित स्थान पर रखते है। सफाई की व्यवस्था भी कुछ परिजन सम्हाल्ते है। पूरे शांतिकुंज मे साहित्य विक्रय केंद्र, कार्यालय की देखभाल के लिये देश के कोने-कोने से आये समयदानी परिजन अपनी निशुल्क सेवायें देते है। सारे संस्कार जैसे-जन्मदिन, उपनयन, जनेऊ, विवाह, तर्पण, गर्भजन्मोत्सव  आदि कार्यक्रम भी गरीब-अमीर के भेदभाव के बिना सम्मान सहित सम्पन्न कराये जाते है। नित्य पूरे आश्रम मे आये हजारों परिजनो के बीच चाहे यज्ञ के समय या भोजन बनाने, ग्रहण करने या परोसने या संस्कार कराते समय ये पहचान पाना असंभव जी हाँ असंभव है कि कौन किस जाति, गोत्र, वर्ण या प्रांत का है। सभी परिजन एक साथ सभी कार्य साथ साथ करते है। 11 अगस्त को जबकि पूरा हरिद्वार मे कावड़ मेले मे आये लाखों लोगो द्वारा कचरे के पहाड़ जगह जगह छोड़ दिये गये हों किन्तु  उसकी सफाई हेतु सैकड़ो गायत्री परिवार के परिजनो ने लगभग दो कि. मी. लंबाई मे हरिद्वार स्थित घाटो मे श्रमदान कर सफाई  की और शासन का सहयोग किया।  और अंत मे एक मुख्य बात  जिसको जानने की जिज्ञासा आपको भी होगी कि नौ दिन, एक माह, तीन माह या अन्य छोटे सत्रों मे आये परिजन या ऐसे व्यक्ति या परिवार जो गायत्री परिवार से नहीं भी जुड़े है संस्कार आदि कराने शांतिकुंज आते है उन से क्या शुल्क लिया जाता है!! आपको जानकर हैरानी होगी कि ठहरने, बिजली, पानी, भोजन, संस्कार आदि कराने का कोई भी  शुल्क/दक्षिणा आदि किसी भी परिजन से नहीं लिया जाता है और न ही उसके लिये किसी को बाध्य किया जाता है। जो परिजन यदि कोई दान देना चाहे तो उस दान की वाकायदा रसीद जारी की जाति है।  मेरा आग्रह है आप जब भी कभी हरिद्वार जायें तो एक बार अवश्य कुछ समय के लिये शांतिकुंज मे अवश्य जायें और हो सके तो व्यक्ति, परिवार, ग्राम, जिला, प्रदेश, देश ही नहीं  युग निर्माण सतसंकल्प हेतु यज्ञ मे शामिल हों।

विजय सहगल