"यूक्रेन
और अमेरिका,
एक आलोकप्रिय-असफल वार्ता"
अमेरिका के वाशिंगटन स्थित व्हाइट हाउस के
ओवल ऑफिस मे शुक्रवार 28 फरवरी 2025 की देर रात अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप, उपराष्ट्रपति जे॰डी॰
वेंस और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के बीच तीखी नोकझोंक और बहस
हुई। दुनियाँ के अनेकों मीडिया कर्मी,
पत्रकारों की उपस्थिति मे दो संप्रभु
राष्ट्रों के बीच ऐसी अप्रिय और असफल वार्तालाप, दुनियाँ ने शायद ही
कभी देखी या सुनी हो। डॉनल्ड ट्रंप और वोलोदिमिर जेलेंस्की के बीच हुई इस कूटनीतिक
वार्तालाप के दौरान तीखी नोकझोंक, बहस मुसाहिबा और
निंदा परनिंदा को, सीधे टीवी
प्रसारण के माध्यम से देख, दुनियाँ को सकते मे डाल दिया। यूक्रेन और रूस के बीच
पिछले तीन सालों से चले आ रहे इस युद्ध ने विश्व के अनेक देशों की भूराजनैतिक और
आर्थिक स्थिति को बुरी तरह प्रभावित किया है।
24 फरवरी 2022 को शुरू हुए इस युद्ध मे
यूक्रेन के हजारों लोग मारे गये और लाखों लोग विस्थापित होकर शरणार्थियों के रूप
मे जीवन यापन कर रहे हैं। इस युद्ध ने यूक्रेन जैसे एक विकसित राष्ट्र को पूरी तरह
खंडहर मे तब्दील कर आर्थिक रूप से भी बर्बाद कर दिया। यूक्रेनी राष्ट्रपति
वोलोदिमिर जेलेंस्की का अपने देश की रक्षा
की खातिर यूरोप और अमेरिका के NATO संगठन
( उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन ) प्रति
झुकाव ने रूस और यूक्रेन के बीच शत्रुता के बीज 2014 मे ही वो दिये थे जब यूक्रेन ने इस संगठन
मे शामिल होने के प्रयास शुरू कर दिये थे।
रूस ने भी ठीक उसी तरह अपने देश की सुरक्षा की चिंता करते हुए यूक्रेन के
नाटो संगठन मे जाने के प्रयास का कडा विरोध किया। दोनों देशों के तर्क अपनी अपनी
जगह ठीक हो सकते हैं। नाटो संगठन अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा और ब्रिटेन सहित 32 देशों का एक समूह है जिसकी सुरक्षा नीति
के तहत इन सदस्य देशों पर किसी भी दुश्मन देश द्वारा यदि आक्रमण किया जाएगा तो ये
आक्रमण उन 32 देशो पर आक्रमण माना जाएगा और 32 सदस्यों वाले नाटो देशों की सेनाएँ संयुक्त रूप से उस दुश्मन
का मुक़ाबला करेंगी। यूक्रेन द्वारा नाटों संगठन की सदस्यता मिलती तो उसे स्वाभाविक
रूप से, रूस जैसे
शक्तिशाली देश से यूक्रेन की रक्षा के लिये न केवल 32 देशों की सेनाओं का साथ और
समर्थन मिलेता अपितु युद्ध मे आवश्यक
उपयोग के आधुनिक हथियार और साजो सामान भी मिल जाता। वही रूस के राष्ट्रपति
ब्ल्दिमीर पुतिन की ये चिंता भी जायज़ थी,
कि यदि यूक्रेन नाटो देशों मे शामिल हो गया तो अमेरिका सहित नाटो देश की सेनाओं की
पहुँच रूस की सीमाओं तो हो जायेगी जो कालांतर मे रूस की सुरक्षा के लिये एक बहुत बड़ा खतरा और चिंता का कारण हो
सकता था। जो यूक्रेन कभी रूस का ही हिस्सा था पर इन्ही पूर्वाग्रहों को लेकर
यूक्रेन और रूस मे मतभेद इतने गहरा गये कि दोनों के बीच 2014 और 2022 मे युद्ध
लड़ने की नौबत आ पहुंची। 2014 मे अमेरिका सहित अन्य देशों के हस्तक्षेप से रूस और
यूक्रेन के बीच हुए शांति समझौते के तहत दोनों देशों मे युद्ध विराम समझता हुआ था
साथ ही दोनों देशों के युद्ध वंदियों को छोड़ने का भी एक सम्झौता हुआ था लेकिन 2022
मे रूस ने इस समझौते को एक बार पुनः तोड़ कर यूक्रेन पर हमला कर दिया।
2022 से चल रहे इस युद्ध मे यूरोपियन देशों
सहित अमेरिका की तत्कालीन बाइडेन सरकार ने यूक्रेन को नाटो संगठन का सदस्य तो नहीं बनाया लेकिन यूक्रेन को अपना
नैतिक समर्थन देते हुए भरपूर सैनिक हथियारों और युद्धक साजो सामान की भरपूर सहायता
दी। इन्ही आधुनिक हथियारों, तोपों, टेंकों और अन्य साजो सामान की बदौलत ही रूस जिस युद्ध को तीन दिनों मे जीत कर यूक्रेन को परास्त करने के सपने
देख रहा था उसको तीन वर्षों मे भी नहीं कर पाया। लेकिन जनवरी 2025 मे अमेरिका मे
सत्ता परिवर्तन के बाद राष्ट्रपति डॉनल्ड
ट्रंप के सत्ताशीन होते ही सारे समीकरण बदल गये। प्रायः देशों मे सत्ता परिवर्तन
के साथ उन देशों की अन्य देशों के साथ विदेश नीतियों मे परिवर्तन देखने को नहीं
मिलते लेकिन डॉनल्ड ट्रंप ने "अमेरिका प्रथम" नीति के तहत यूक्रेन मे चल
रहे युद्ध मे अमेरिका के संसाधनों को लगाने पर न केवल अपने हाथ खींच लिये अपितु
पिछली बाइडन सरकार द्वारा दी गई 350 बिलियन डॉलर की सहायता को उनकी (बाइडन की) मूर्खता
निरूपित कर यूक्रेन से इस सहायता के बदले
मे उसके देश मे मिलने वाले पाँच सौ बिलियन
डॉलर की कीमत के दुर्लभ और मूल्यवान खनिज
जैसे ग्रेफाइट, लिथियम, टाइटेनियम और
यूरेनियम जैसे खनिजों पर अमेरिकी अधिकार
के समझौते का दबाव बनाया लेकिन इस समझौते मे यूक्रेन की रूस से सुरक्षा और रूस द्वारा हड़प की गयी यूक्रेन की
भूमि की बापसी की कोई गारंटी सुनिश्चित नहीं की गयी। हद तो तब हो गयी जब रूस
यूक्रेन युद्ध के तीसरे साल मे प्रवेश पर 25 फरवरी 2025 को संयुक्त राष्ट्र में
लाये गए प्रस्ताव जिसमे रूस की सेनाओं की
यूक्रेन से बापसी की मांग पर,
अमेरिका ने अब तक की नीतियों के उलट,
रूस के पक्ष मे मतदान किया। इसी दवाब के
अंतर्गत यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की को अमेरिका राष्ट्रपति डॉनल्ड
ट्रंप ने समझौते के तहत व्हाइट हाउस मे पिछले शुक्रबार को आमंत्रित किया था।
यूक्रेन द्वारा अमेरिका को कीमती खनिज देने के समझौते से एक बात तो स्पष्ट है कि यदि यूक्रेन को ये समझौता करने के
लिये अभी या बाद मे मजबूर होना पड़ा, तो इससे तो बेहतर था यूक्रेन रूस से ही सम्झौता कर युद्ध न
करता तो कम से कम उसके देश की ऐसी दुर्दशा और बर्बादी तो न होती और इस युद्ध मे उसे बलि का बकरा तो न
बनना पड़ता? बदले हुए
हालातों मे यूक्रेन की हालत पर यह भारतीय कहावत सटीक बैठती है कि धोबी का कुत्ता घर
का न घाट का......।
अमेरिका से मिनरल समझौते के लिये आए
यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से वार्ता के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने जिस
अपमान जनक भाषा और भाव भंगिमा का प्रदर्शन किया वह दुनियाँ के
देशों के लिये एक चेतावनी है कि शक्तिशाली राष्ट्र किस तरह छोटे और कमजोर
राष्ट्रों को पहले सहायता के नाम से प्रलोभन देकर अपने जाल मे फँसाते है और अपनी
स्वार्थसिद्धि के बाद किस तरह उनका आर्थिक
भयादोहन और शोषण करते हैं? अमेरिका द्वारा
यूक्रेन के साथ ज़ोर जबर्दस्ती से खनिज समझौते के लिये दबाव बनाना इस बात का जीता
जगता, स्याह उदाहरण है।
यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की और अमरीकी
राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप वार्ता की वार्ता के दौरान जब यूएस उपराष्ट्रपति जेड़ी
वेंस ने बात शुरू करते हुए जेलेंस्की से कहा शांति और प्रगति का रास्ता कूटनीति को
जोड़ता है और प्रेसिडेंट ट्रंप यही काम कर रहे हैं। जेलेंस्की ने उनकी बात काटते
हुए कहा कि तीन साल पहले रूस ने हम पर हमला कर हमारे भू क्षेत्र को छीना तब किसी
ने पुतिन को नहीं रोका? तब आपकी कूटनीति
कहाँ थी? आप किस कूटनीति
की बात कर रहे श्रीमान जेडी वेन्स?
आपका क्या अभिप्राय है? विदित हो कि
फरवरी 2022 मे युद्ध विराम के बावजूद रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण कर युद्ध शुरू किया
था। उपराष्ट्रपति जेडी वेन्स अपने राष्ट्रपति की स्तुति करते हुए कहते है कि मै उस
कूटनीति की बात कर रहा हूँ जो आपके देश को विनाश से बचायेगी। आप हमारी बेइज्जती कर
रहे है!! अमेरिका मीडिया के सामने हमे दोषी बता रहे है। युद्ध को समाप्त करने के
लिये ट्रंप ने पुतिन से बातचीत का रास्ता खोला और तत्काल युद्धविराम की कोशिश की।
आपको तो युद्ध लड़ने मे अनेक तरह की मुश्किले आ रही हैं। जेलेंस्की ने प्रत्युत्तर
देते हुए कहा कि, युद्ध के समय हर
किसी को मुश्किले आती हैं। क्योंकि आप ने कभी युद्ध लड़ा नहीं जब कभी आप युद्ध
लड़ेंगे तो आप को महसूस होगा। इतना कहने की देर थी कि ट्रंप को जलेन्स्की की ये बात
चुभ गयी और ट्रंप ने ऊंची आवाज मे कहा। हमें ये मत बताइये कि हम क्या महसूस कर रहे
हैं। आप उस स्थिति मे नहीं हैं कि हमे ये बात बताये। आपके पास कोई रास्ता नहीं। आप
करोड़ो लोगों की ज़िंदगियों से खेल रहे हैं। जेलेंस्की के जबाव ने आग मे घी का काम किया
जब उन्होने ये कहा कि वे प्रारम्भ से ही अपनी जंग अकेले ही
लड़ रहे थे, और इस पर
उन्हे गर्व है। ट्रंप ने क्रोधावेश मे कहा
आप अकेले नहीं थे। आप कभी अकेले नहीं थे। हमने आपको एक मूर्ख राष्ट्रपति (बाइडन)
के माध्यम से 350 बिलियन डॉलर के युद्धक साजो समान दिये। यूक्रेनी सैनिक बहादुर
हैं लेकिन यदि आपके पास हमारे (अमेरिका के ) हथियार न होते तो यह लड़ाई दो
हफ्तों मे खत्म हो जाती। अब तो ट्रंप ने
जेलेंस्की को चेताते हुए एक क्लास टीचर की तरह डाँटते हुए कहा कि उनका देश
(यूक्रेन) एक बड़े संकट से गुजर रहा है,
वे इस युद्ध को नहीं जीत सकते, हमारी बजह से आपके
पास इस संकट से निकलने का एक मौका है,
इस तरह से बिज़नस नहीं हो सकता। आपको अपना नज़रिया बदलना पड़ेगा। आगे ट्रंप ने
जेलेंस्की को कहा कि आपके पास अब कोई
रास्ता नहीं, आप लाखों लोगो
की ज़िंदगी से खेल रहे हैं, आप तीसरे विश्व
युद्ध का जुआँ खेल रहे हैं, आप के पास सैनिक
नहीं हैं यदि आप युद्ध विराम के लिये मान
जाते हैं तो गोलियां बरसनी बंद हो जाती और आपके लोग न मरते। आप जो कर रहे है वह इस
देश के लिये अपमानजनक है। आप बिल्कुल भी
आभार प्रकट नहीं कर रहे हैं। जेलेंस्की ने
प्रतिवाद करते हुए अपनी बात पुनः रक्खी की वह अपने देश की सुरक्षा के लिये पक्का
आश्वासन चाहते है। और इस तरह दोनों राष्ट्र प्रमुखों की वार्ता टूट कर असफल हो
गयी। अमेरिका मे इन बदली हुई राजनैतिक परिस्थितियों मे यूक्रेन के हालात पर किसी शायर
की ये पंक्तियाँ खूब याद आती है- न खुदा ही
मिला ना विशाले ए सनम, न इधर के रहे न उधर
के रहे।
अब वार्ता पटरी से उतर गयी थी,
फिर तो प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप ने जिन कड़े और सख्त
शब्दों का उपयोग किया वो कूटनीति की दुनियाँ मे लंबे समय तक अप्रिय घटना के रूप मे
याद किये जायेंगे, वहीं कनाडा और
समस्त यूरोपियन देश यूक्रेन के पक्ष मे खड़े हैं जो इस बात को इंगित कर रहा हैं कि
आने वाला समय मे अमेरिका के बदले हुए रुख
से न केवल यूक्रेन के लिये अपितु नाटो संगठन की अपनी एकता और संगठन की मजबूती पर
भी संकट के बादल खड़े हो सकते हैं।
विजय सहगल

