शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023

बेहट" (संगीत सम्राट तानसेन की जमस्थली, ग्वालियर)"

 

"बेहट" (संगीत सम्राट तानसेन की जमस्थली, ग्वालियर)"







पिछले दिनों ग्वालियर मे 19 दिसम्बर 2022 से 23 दिसम्बर 2022 तक विश्व संगीत समागम "तानसेन समारोह" सम्पन्न हुआ। इस विश्व प्रसिद्ध संगीत समारोह के मूल मे महान संगीतज्ञ श्री तानसेन अर्थात रामतनु पांडे है जिनका जन्म सन 1506 मे ग्वालियर से लगभग 40 किमी दूर बेहट नमक ग्राम मे हुआ था। मध्य प्रदेश शासन के सांस्कृतिक और पर्यटन  विभाग द्वारा हर साल दिसम्बर माह मे त्रिदिवसीय तानसेन समारोह के  आखिरी दिन की सभा का आयोजन  तानसेन के सम्मान मे उनकी जन्म और साधना स्थली बेहट मे किया जाता है। इस छोटे से दिखने वाले गाँव मे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की  विश्व प्रसिद्ध हस्तियाँ कार्यक्रम प्रस्तुत कर संगीत सम्राट तानसेन के प्रति अपना सम्मान और श्रद्धा सुमन  अर्पित करते है।

पिछले अनेकों वर्षो के सोच विचार के बाद आज दिनांक 29 जनवरी 2023 को इस पवित्र स्थान पर जाने का कार्यक्रम बना। अपने परिवार के साथ ग्वालियर से शुरू हुई इस यात्रा ने शहरों के  यातायात की भीड़भाड़ से मुक्त शानदार सड़क ने यात्रा को और भी  सुगम और सरल बना दिया था। गाँव की संकरी गलियों से होकर दूसरे छोर पर झिलमिल नदी के किनारे है तानसेन की साधना स्थली बेहट मे स्थित शिव मंदिर। तानसेन समारोह और तानसेन की जन्मस्थलि होने के कारण यहाँ तक का पहुँच मार्ग न केवल पक्का है बल्कि मुख्य स्थल मे गेरुए पत्थर का एक  बड़े आकार का प्रवेश द्वार बनाया गया है। प्रवेश द्वार के सामने ही एक चबूतरा बना है ऐसा कहा जाता है कि तानसेन इसी चबूतरे पर बैठ संगीत की साधना करते थे। पूरा प्रांगण ऊंचे ऊंचे पेड़ो से आच्छादित था। प्रांगण के किनारे किनारे झिलमिल नदी की शांत धारा प्रवाहमान थी। बायीं तरफ कुछ सीढ़ियाँ चढ़ कर उस पवित्र मंदिर की ओर बढ़े तो सहसा ही एक छोटे मंदिर को देख आश्चर्य चकित हो गया। चमत्कारिक रूप से एक तरफ झुके हुए इस शिव मंदिर को देख ऐसा लगा मानों वास्तु निर्माण के दोष के दौरान ये मंदिर एक तरफ झुका होगा। पर मंदिर के सेवादार श्री संजीव शर्मा ने इस मंदिर के इतिहास पर प्रकाश डाला जो बड़ा दिल्चस्व था। इस मंदिर के शिवलिंग की एक विशेषता और है कि यहाँ स्थित शिव पिंडी  उन गिने चुने शिवलिंगों मे से एक है जिसका आकार गोलाकार न होकर चौकोर है।

उन्होने बताया इस मंदिर मे हमारे पूर्वज तानसेन के जन्म से पूर्व से भी  परंपरागत रूप से सेवा करते आ रहे है। किवदंती के अनुसार गाँव के समृध्शाली श्री मकरंद पांडे के कोई संतान न थी। वे झिलमिल नदी के किनारे स्थित इस शिव मंदिर मे संतान की अभिलाषा से नित्य भगवान शिव का दूध से अभिषेक करते  थे। भगवान के स्नेह  आशीर्वाद से उन्हे सन 1506 मे  पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम उन्होने रामतनु पांडे रक्खा पर दुर्भाग्य से गूंगा होने के कारण वह बोल नहीं सकता था। जिह्वा के तन्तु,  तालु से चिपके होने के कारण एवं  बोल न पाने के कारण  लोग उन्हे "तन्ना" या "तनुआ" (गूंगा) कह कर बुलाते थे। मंदिर के पुजारी ने उन्हे भी पंचानन महादेव शिव का अभिषेक करने की सलाह दी। शिव कृपा से एक दिन उन्हे आभास हुआ कि एक अदृश्य शक्ति ने उन्हे कुछ मांगने को कहा। बोल न सकने के कारण उन्होने अपने गले पर हाथ फेरा!! उस अप्रत्यक्ष शक्ति ने ज़ोर से चीखने के संकेत देने पर तनुआ ने पूरी ताकत से आवाज निकाली!! तब चमत्कारित ढंग से आसमान से एक बिजली कौंधी जिसके कारण मंदिर का भवन  एक ओर झुक गया। अब रामतनु बोल सकता था। तब उसने ईश्वर से आग्रह कर गले मे ऐसे सुरीले स्वर का आशीर्वाद मांगा जो न पहले कभी हुआ हो और न आगे भविष्य मे कभी होगा। भगवान शिव से  मनवांछित फल मिलने के कारण अब रामतनु पांडे अपनी सुरीले स्वर के बजह से न केवल ग्रामीणों अपितु पशु पक्षियों को भी अपने सुरीली आवाज से आकर्षित करने लगे। कालांतर मे बेहट के रामतनु पांडे  उर्फ तनुआ अब तानसेन थे।

तानसेन की प्रारम्भिक संगीत शिक्षा मथुरा के स्वामी हरिदास के सनिध्य मे हुई। अपनी सुरीली तान के कारण उनकी ख्याति दिन व दिन बढ्ने लगी। अपनी संगीत साधना को और निखारने के कारण ग्वालियर राजदरबार के महान शास्त्रीय संगीत उस्ताद मोहम्मद  गौस के सनिध्य मे संगीत की राग-रागनियाँ का ज्ञान प्राप्त किया। वे ग्वालियर के तत्कालीन राजा मान सिंह तोमर के राजदरबार मे दरबारी गायक रहे। कहते है कि राजा मान सिंह तोमर की रानी मृगनयनी की संगीत मे अभिरुचि के दौरान उनकी सेविका हुसैनी से प्यार हो गया और बाद मे उस स्त्री से तानसेन का विवाह हो गया इसलिए संगीत के घरानों मे तानसेन की संगीत विध्या और गायन शैली को "हुसैनी घराना" भी कहा जाता है। कालांतर मे संगीत गायन की  उनकी यश पताका से भाव विभोर होने के कारण  रीवा नरेश रामचन्द्र ने उन्हे अपने राज दरबार मे नियुक्त करने का आमंत्रण दिया। रीवा नरेश के दरबार मे एक बार अकबर ने तानसेन को सुना तो उन्होने रीवा नरेश से आग्रह कर तानसेन को अपने दरबार मे बुला कर अपने नवरत्नों मे शामिल कर लिया। कहा जाता है कि संगीत सम्राट तानसेन के गायन, आलाप और तान से राग-रागनियाँ साक्षात प्रकट हो जाती थी। एक बार अकबर की  हठ के कारण तानसेन से दीपक राग गाने का आग्रह किया। निश्चित समय पर जिस  एकाग्रता और तन्मयता से जैसे जैसे तानसेन  इस राग का आलाप बढ़ाते गए बैसे बैसे वातावरण का तापमान बढ़ता गया। उपस्थित श्रोता पसीने से तर-वतर होने लगे और दरबार मे  रखे दीपक स्वतः ही जल उठे और महल मे आग की लपटे दिखाई देने लगी। पुनः राग मेघ मल्हार का आलाप देने पर बरसात की बूंदों से आग पर काबू पाया गया।

प्राचीन बरगद के पेड़ के नीचे निर्मित इस झुके हुए इस चमत्कारिक शिव मंदिर के दोनों ओर दो दालान बने हुए है। पंडित जी ने बताया कि इन दालनों का निर्माण अकबर द्वारा तानसेन की जन्मस्थली बेहट की यात्रा  के दौरान कराया गया था।

तानसेन की मृत्यु 26 अप्रैल 1586 को दिल्ली  हुई, ऐसा कहा जाता है कि उनकी शवयात्रा मे अकबर के साथ उनके सभी दरबारी भी शामिल हुए थे। संगीत सम्राट तानसेन की समाधि उनके गुरु मोहम्मद गौस के मकबरे के पास ही बनाई गयी। उनके समाधि स्थल के पास स्थित मैदान मे ही प्रति वर्ष दिसम्बर माह मे उनकी याद मे विश्व प्रसिद्ध संगीत समागम मनाया जाता है। मुझे याद है मेरे ग्वालियर प्रवास के दौरान शायद 1990-91 मे मै पहली बार अपने कार्यालीन सहयोगी विनोद अग्रवाल  के साथ  तानसेन समारोह मे शामिल हुआ था। उस समारोह मे विश्व के महान शास्त्रीय संगीत  गायक स्व॰ भीमसेन जोशी को तानसेन पुरुस्कार से सम्मानित किया गया था। उस  देर रात समारोह मे पंडित भीम सेन जोशी का वो सुरीला भजन

"जो भजे हरि को सदा............., जो भजे हरि को सदा.........."

"वो ही परम पद पाएगा..........., वो ही परम पद पाएगा..........." मेरी मधुर  स्मृतियों मे आज भी अच्छी तरह अक्षुण्ण है।

 

तब से आज तक तानसेन समारोह की भव्यता और दिव्यता मे काफी अंतर आ चुका है। आज का समारोह संगीतिज्ञों और श्रोताओं की सुख सुविधाओं से परिपूर्ण है लेकिन पुराने समय और आज के समय मे भी ग्वालियर के संगीत प्रेमी बिना किसी अपेकक्षा और आकांक्षा के इस समारोह की प्रतीक्षा बड़े बेसब्रि और अधीरता से करते है।     

बेहट ग्राम मे झिलमिल नदी के मुहाने पर स्थित शिवमंदिर के अलौकिक दर्शन भाव विभोर करने वाले थे। संगीत सम्राट रामतनु पांडे उर्फ तानसेन की जन्मस्थली का भ्रमण मुझ जैसे संगीत के अनिभिज्ञ और अनगढ़  श्रोता के लिए यह स्थान श्रद्धा और आदर रखता हो तब   पारंगत संगीतज्ञों और विदुषी गायकों के लिए सम्राट तानसेन की जन्म और साधना स्थली बेहट  किसी तपस्थली और तीर्थ स्थल से कम न होगी। संगीत सम्राट तानसेन को हमारा नमन। बारम्बार नमन हो!!     

विजय सहगल