"सोहन
लाल का सुनहरा संसार?"
आज तो संध्या ने बाथरूम से निकलते ही आसमान
सिर पर उठा लिया! अब तो हद हो गयी!! बाथरूम है या ड्राइंग रूम?
किसने रक्खी कुर्सी बाथरूम मे? बाथरूम से
निकलते हुए उसने अपने पति रूपेश से लगभग चींखते हुए कहा! अब तो एक-एक दिन काटना
मुश्किल हो गया है इस घर मे। अजीब अजीब काम देखने को मिलते हैं इस घर मे!! रूपेश
जो ऑफिस जाने की तैयारी कर रहा था,
अचानक संध्या के इस तरह चिल्लाना सुनकर,
भागते हुए बाथरूम की तरफ दौड़ा। क्या हुआ डार्लिंग!!
पूंछते हो, क्या हुआ?
देखो अपने पापा की करतूत बाथरूम मे कुर्सी लेकर क्या उपन्यास पढ़ रहे थे?
क्या कोई ऐसे बाथरूम मे कुर्सी रखता हैं?
बैसे ही तो बाथरूम छोटा हैं बमुश्किल खड़े होने की जगह नहीं,
क्या जरूरत थी बाथरूम मे कुर्सी रखने की।
जबसे सोहन लाल के छोटे बेटे रूपेश की शादी
हुई है उसकी पत्नी संध्या का व्यवहार अपने सास ससुर के प्रति अच्छा नहीं रहा। बात
बात पर अपने मायके की समृद्धि का उल्लेख तो समझ आता हैं पर घड़ी-घड़ी,
छोटी-छोटी बात मे बूढ़े सास ससुर को तिरिस्कार और निरादर करने वाले शब्द बाणों से
आहत करना सोहन लाल जी और उनकी धर्मपत्नी सरला के दिल मे अंदर ही अंदर कष्ट और वेदना के गहरे घाव देता,
पर मजबूरी थी कि सारी ज़िंदगी छोटे से व्यापार मे दोनों बच्चों के परवरिश और पढ़ाई
लिखाई मे इतनी संपत्ति न जोड़ सके कि बुढ़ापे के लिये सिर पर एक छोटी छत्त बना पाते।
सोहन लाल जी ने दोनों बेटे, महेश और रूपेश
की शिक्षा मे कोई कसर नहीं छोड़ी थी। दोनों
ने ही देश के सर्वोत्तम आईआईटी संस्थानों से इंजीन्यरिंग की डिग्री हंसिल की थी और देश की
सर्वोत्तम कंपनियों मे उच्चपदासीन पद पर आरूढ़ थे। घर मे पैसे की कोई कमी नहीं थी। दोनों
पुत्रों का रिश्ता अपने ही समाज के धनाढ्य परिवारों की लड़कियों के साथ हुआ था। सोहन
लाल जी सारी उम्र अपना व्यवसाय देश की आईटी सिटी बेंगलोर मे किया था इसलिये बेंगलोर शहर से उन्हे एक अलग ही तरह का लगाव था। लगाव होता भी क्यों न,
व्यापार से सेवानिवृत्ति के बाद बेंगलोर की आलीशान,
सन सिटी कॉलोनी मे वे अपने छोटे बेटे रूपेश के साथ जो
रहते थे। रूपेश ने यध्यपि बेंगलोर मे अब तक मकान तो नहीं लिया था लेकिन शीघ्र ही
एक फ्लैट क्रय करने का विचार था। लेकिन जब
से रूपेश ने बेंगलोर की सन सिटी सोसाइटी मे किराये से मकान लिया,
सोहन लाल इस कॉलोनी मे काफी खुश थे,
इस शानदार कॉलोनी के पार्क मे सुबह-शाम अपने हम उम्र वरिष्ठ साथियों के साथ उठना
बैठना और गप्प शप्प करना उनके दैनिक जीवन का एक हिस्सा हो गया था।
लेकिन आज तो संध्या के तीखे शब्द वाणों ने सोहन
लाल के दिल को छलनी कर दिया था। फिर भी उन्होने शांत और संयत होकर अपनी बहू संध्या
से कहा,
बेटा कल ग्रुप मे चर्चा हो रही थी कि उनके एक सदस्य का बाथरूम मे पैर फिसलने के
कारण कूल्हे की हड्डी टूट जाने के कारण पिछले एक हफ्ते से अस्पताल मे इलाज़ चल रहा हैं। कल उनका एक बड़ा ऑपरेशन होगा जिसमे एक स्टील
की छड़ डाली जाएगी। पूरी प्रक्रिया काफी कष्टसाध्य और खर्चीली होने वाली थी। गोयल
जी के साथ हुई घटना से सवक लेकर वरिष्ठ जनों ने आपसी चर्चा के दौरान बाथरूम मे कुर्सी
पर बैठ कर नहाने और अंडर गारमेंट कुर्सी पर बैठ कर चेंज करने की सलाह दी थी,
ताकि खड़े होने पर स्लिप होने या लड़खड़ाने की नौबत ही न आये। साथियों की सलाह को
देखते हुए ही मैंने बाथरूम मे कुर्सी रक्खी थी। कुर्सी का उपयोग मै पिछले कई दिन से कर रहा था,
पर आज बाथरूम से स्नान के बाद कुर्सी निकालना भूल गया था। बेटा!,
आगे से अब ऐसा नहीं होगा। लेकिन संध्या को तो बस अपने सास ससुर को उलहना देने का
कोई न कोई बहाना चाहिए होता था। बड़ा बेटा महेश मुंबई की एक बड़ी बहुमंजिला इमारत मे रहता था। कभी कभी सोहन
लाल दंपत्ति का मुंबई जाना तो होता,
पर उनके सांस की बीमारी के चलते मुंबई के आर्द्रता पूर्ण मौसम उनके लिये माफिक न होने
के कारण उनका मुंबई प्रवास प्रायः
संक्षिप्त ही रहता। पर महेश भी कभी आग्रह पूर्वक अपने माता पिता को बेंगलुरु आने और रुकने के लिये नहीं
कहता। सोहन लाल जी को अपने बेटे का ऐसा व्यवहार भी दिल ही दिल मे कचोटता।
आज मोहनलाल जी का मन बड़ा अशांत और बेचैन था।
क्लेश, दुःख और पीड़ा के भाव उनके चेहरे पर स्पष्ट
पढे जा सकते थे। बेटा ऑफिस जा चुका था। संध्या सुबह से ही मुंह
फुला कर अपने कमरे मे बैठी रही। खाना बनाने वाली बाई ने नाश्ता बना कर टेबल पर
रक्ख तो दिया था लेकिन सोहन लाल दंपत्ति से नाश्ता खाया न गया। आज सोहन लाल जी मन
ही मन आत्मग्लानि और अपराधबोध के भाव से बुरी तरह ग्रसित थे। जिन बच्चों को इतने
लड़-प्यार से पाला, अच्छी और ऊंची शिक्षा
दिलाई, आखिर बच्चों के पालन पोषण और संस्कारों मे
कहाँ कमी रह गयी थी, जो उम्र के इस आखिरी
पढ़ाव मे ऐसे दिन देखने को मिल रहे हैं। दो वक्त की रोटी भी इतने तिरिस्कार और
अपमानित हो कर मिल रही है, कदाचित ही किसी
माँ बाप को ऐसे दिन देखने को मिले। काश अपनी जवानी के दिनों मे चार पैसे जोड़ लिये
होते तो दूसरों पर आश्रित होकर ऐसे दिन न देखने को मिलते। पत्नी सरला ने बगैर कुछ सुने ही पति के चेहरे
के भावों को महसूस किया और दोनों आँखे नम हो गयी। सोहन लाल जी ने पत्नी के कंधों
पर हाथ रक्ख उसे ढांढस बधाई!! मन ही मन,
अपनी बेबसी और लाचारी के लिये शर्मिंदा हो,
उम्र की इस दहलीज़ पर पति के रूप मे अपनी ज़िम्मेदारी पूरा न करने की लाचारी के लिये
मानो, सरला से माफी मांग रहे
हों। सरला ने उन्हे शांत करने की बहुत
कोशिश की, पर वे आज काफी तनाव ग्रस्त थे। इसी उधेड़-बुन,
सोच-विचार और हीन भावना के चलते भरी दोपहरी उनकी आँख लग गयी और कब वे गहरी नींद मे सो गये पता नहीं
चला। जब शाम को सोहन लाल जी पार्क मे अपने साथियों के बीच पहुंचे तो उनके चेहरे के
हाव-भाव देख साथियों ने उनके कुशलक्षेम पूंछ
उनके चेहरे पर चिंता की लकीरों के बारे मे पूंछा। लेकिन उन्होने सरलता पूर्वक अपनी
चिंताओं को छुपा कर मुस्कराते हुए यूं ही थोड़ी अस्वस्थता का बहाना बना दिया,
पर अपने निकट मित्र रविंदर से उनकी दुःख और चिंता छुप न सकी। एकांत मे
उन्होने रविंदर को अपनी ब्यथा कह सुनाई।
साथियों ने उन्हे बड़े बेटे के पास शिफ्ट
होने के सलाह दी लेकिन स्वास्थ और उसके व्यवहार से भी वे मुंबई जाना टालते रहे। अब तक उन्होने अपनी आवश्यकतायेँ
इतनी सीमित कर ली थी कि किसी भी विषय मे परिवार से कदाचित ही कोई मतभेद की नौबत उनकी तरफ से आये। अपने आप को उन
परिस्थितियों मे ढाल लिया कि बहू संध्या से किंचित मात्र,
वाद-प्रतिवाद की संभावना बने। ईश्वर भी इतना निष्ठुर हो सकता हैं कि सारी ज़िंदगी
सम्मान और स्वाभिमान से बिताने वाले सोहन लाल जी को उम्र की आखिरी दहलीज लांघने के
लिये इतना तिरिस्कार और अपमान झेलना पड़े?
लेकिन आज तो मोहनलाल जी पर दुःखों का पहाड़ वज्राघात बन कर टूट पड़ा!! जब रूपेश ने
ऑफिस से आकर ये बतलाया, पापा मै और संध्या
इस रविवार दूसरी सोसाइटी मे मकान लेकर शिफ्ट हो रहे हैं। सुनकर सोहन लाल जी और
सरला को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ?
मानो पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई!!
रविवार को सोसाइटी के नीचे सामान शिफ्ट करने
हेतु मजदूरों के साथ एक ट्रक खड़ा देख पड़ौसियों ने पूंछा सोहन लाल जी अचानक यहाँ से
शिफ्ट कर रहे हों बताया नहीं? सोहन लाल ने कहा
हाँ! रूपेश ने एक बड़ा घर ले लिया, हाँ उसका प्रमोशन
भी हो गया न। अपने चेहरे पर आए दुःख को छुपाते हुए उन्होने पड़ौसियों को बताया। लेकिन
शाम को सोहन लाल जी को उसी फ्लैट मे देख पड़ौसियों को सोहन लाल ने खुद ही बताया हम लोग
माह के अंत मे यही से बड़े बेटे के पास चले जाएंगे रूपेश को छुट्टी की प्रोब्लम थी इसी
लिये पद्रह दिन पहले शिफ्ट हो गया हम लोग पद्रह दिन बाद इसी माह के अंत मे जाएंगे।
इस महीने का किराया तो बेटे ने एडवांस मे
दे दिया था इसलिये महीने के आखिर तक पंद्रह दिन तक तो कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन
पंद्रह दिन बाद की चिंता उन्हे खाये जा रही थी। आमदनी के स्रोत सीमित थे। शाम को रविंदर
से अपनी चिंता बतला कर कुछ दुःख हल्का
करने की नाकामयाब कोशिश उनके चेहरे पर साफ छलक रही थी। रविंदर ने क्लब के सभी साथियों से सोहन लाल जी पर आए संकट
को सांझा किया। निर्णय शीघ्र लेना था। सन सिटी सोसाइटी से 20 किमी दूर एक छोटे से
घर मे शरण लेना मजबूरी थी किराया भी पाँच हजार जो था। नये घर मे जब से सोहन लाल जी
आए थे काफी चिंतित और परेशान रहने लगे थे। रह रह कर रूपेश के व्यवहार ने उन्हे दुःखी
कर रक्खा था और इस संताप और संकट को वे किसी के साथ सांझा भी न कर सके। इस अचानक आयी
विपत्ति ने उन्हे बीमार कर दिया और इसी विपदा ने एक दिन उनके प्राण हर लिए!!
एक दिन रविंदर जी को सोहन लाल जी के निधन का
दुखद समाचार उन्हे मिला वो तुरंत सरला भाभी से मिलने पहुंचे तो लोगो ने बताया कि सोहन
लाल जी के देहांत के बाद उनका बेटा उन्हे अपने साथ ले गया। रविंदर जी पूंछते पाँछते
रूपेश के घर पहुंचे और सरला भाभी के हाल चाल
लिए। उनको समझते देर न लगी कि बेटे-बहु के
पास रहने की मजबूरी और पति से अचानक ऐसे विछुड्ने ने उन्हे अंदर तक तोड़ दिया था। रविंदर जी ने अगले ही दिन क्लब को सूचित किया कि
सोहन लाल जी नहीं रहे!! अचानक क्लब के सदस्यों को सोहन लाल जी के इस दुनियाँ मे न रहने
की सुन सहसा विश्वास नहीं हुआ। बेटे रूपेश ने सोहन लाल जी,
के निधन की सूचना तक क्लब के सदस्यों या रविंदर अंकल को नहीं दी जो उनके सबसे करीबी
थे! हीं भावना से ग्रसित रूपेश नहीं चाहता था कि उसके और उसकी पत्नी के मोहल लाल जी
से किए गए व्यवहार का लोगो को पता चले।
विजय सहगल

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