"राग
- पुत्र मोह"
हे!
द्वापर के धृतराष्ट्र।
हैं, कलियुग मे
भी बंधु भ्रातृ॥
ठसक!
देश आज़ाद कराया, खादी वाली टोपी ने!
कश्मीर
फंसा कर देश को बांटा, स्वार्थ नीति थोपी ने॥
"देश
नहीं बटनें देंगे", शपथ भुला कर बापू की, ।
निजी
स्वार्थ मे, देश को बांटा, ऐसे सत्ता काबू की॥
घरबार
छोड़ हुए अभागे, लाज़ लुटी अवलाएं!
लुटे-मिटे जन, मानस-तन, सिकुड़ी मुकड़ी सीमाएँ!!
साल, दशक युग बीते, राजतंत्र अदले बदले।
प्रजातंत्र
की नींव हिलाने, करते कुछ अमले हमले॥
दंभ
उन्हे है, नहीं चलेगा, ये देश, बिना
उन्ही के।
सच तो
ये है, कभी नहीं थे, ये पंथ, प्रांत किन्ही
के॥
हर
युग मे दुःशासन होता, पुत्र मोह मे माता।
कुटिल
कपट को आरूढ़ करने "राजा राग"
सुहाता॥
नहीं आज हैं, धृतराष्ट्र, गांधारी आरूढ़ है।
डटी
आज भी कौरव सेना, दृश्य बड़ा दारुण हैं।
अस्थि
विहीन हैं इनके कंधे।
पुत्र
मोह में आज भी अंधे॥
अँधियारा
अब भाग चुका है॥
सत्य-सनातन
जाग चुका है।
हे! भारत! आतिष्ठोत्तिष्ठ हो।
युद्ध अब, दृढ़ निश्चित हो॥
जहाँ
कृष्ण!, सा सारथ होगा।
कौरव
विहीन भारत होगा॥
विजय
सहगल


6 टिप्पणियां:
इस महाभारत का अंत तब संभव होगा
जब कृष्ण की गीता का अंगीकार होगा
वाह प्रिय सहगल जी, अब तो आप बहुत सुन्दर सुन्दर और सारगर्भित कविताएं भी लिखने लगे हैं l
बधाई और बहुत बहुत शुभकामनाएं l
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏
S P GUPTA, Hydrabad
Very nice
अद्भुत dear , अद्भुत कविता
अद्भुत dear, अद्भुत कविता
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