सोमवार, 1 दिसंबर 2025

पुस्तक, सुधियों की आधी सदी-लेखक-राज चड्ढा

 

"पुस्तक, सुधियों की आधी सदी-लेखक-राज चड्ढा"









पिछले दिनों हमारे सम्मानीय बड़े भाई तुल्य  श्री राज चड्ढा द्वारा लिखित पुस्तक सुधियों की आधी सदी के  भव्य विमोचन मे शामिल होने से किसी कारणवश वंचित रहा, पर हाल ही मे अदरणीय चड्ढा जी की उक्त पुस्तक को पढ़ने का सौभाग्य मिला। चड्ढा जी से हमारा रूबरू मिलना अभी 2-3 वर्ष पूर्व ही, गायों के पीने के पानी की एक टंकी मंगाने से शुरू हुआबैसे उनके नाम और भाजपा मे उनकी सक्रियता से मै बखूबी  परिचित था। 14 अप्रैल 2024 को पक्षियों के लिये दाना और पानी के सकोरे के वितरण से मिलने का जो सिलसिला शुरू हुआ वो आज तक जारी हैं। अगर मै ग्वालियर हुआ तो शत प्रतिशत रूप से उनके आवाहन पर उनके कार्यक्रम मे अवश्य शामिल हुआ फिर वह कार्यक्रम चाहे मई जून की भरी गर्मियों मे पक्षियों के लिये सकोरे बांटने हेतु,  दाना पानी का रहा हो या बरसात मे  वृक्षारोपण का काम। पेड़ों को बचाने का आंदोलन हो या धरना प्रदर्शन। दुर्घटना से बचाव हेतु  ट्रैक्टर ट्रॉलियों के पीछे रिफलैक्टर स्टिकर चिपकाना हो या विशेष रिफ्लेकशन वाला पैंट लगाने का। चड्ढा साहब का समाज सेवा, पर्यावरण और प्रदूषण बचाने के लिये सेवा या समर्पण, मानवीय दुर्घटना से बचाने के लिये अपनी इस प्रौढ़ अवस्था मे सड़क पर घूम रहे आवारा पशुओं के सींग पर रात्री मे चमकने वाले रिफ्लेक्टिव पेंट लगाने के  जोखिम भरे  खतरनाक कार्य करते देख कर, मै उनके सेवा और काम के प्रति निष्ठापूर्वक समर्पण और  जुनून को देख कर हैरान था। गाय, विशेषकर आवारा बैल, पेंट, ब्रश और लोगो को देख कर अकसर भड़क कर हिंसक व्यवहार करते पर चड्ढा साहब, न केवल  हम लोगो को प्रेरित कर हौसला बढ़ाते अपितु  खुद भी इस उम्र मे इस पेंट लगाने के जोखिम भरे काम को करते। ग्वालियर मे अटल स्मारक के लिये सैकड़ों पेड़ों की कटाई के विरोध मे कलेक्टर कार्यालय मे धरना प्रदर्शन उनकी जीवटता और नगर के एक स्वर्ण आभूषण व्यवसायी द्वारा अपने शोरूम के अग्र भाग की सुंदरता दिखाने के लिये वृक्ष काटने के कुप्रयासों पर त्वरित प्रदर्शन उनकी निर्भीकता और निडरता को दर्शाता है।

चड्ढा जी द्वारा लिखित पुस्तक "सुधियों की आधी सदी" को पाते ही,  पहले सरसरी तौर पर आगे से पीछे पलटा और आदत के मुताविक पहले और आखिरी पृष्ठों पर नज़र डाली। उनके जीवन की अलग अलग समय से जुड़ी फोटो के साथ उनकी पहली दो पुस्तकों सांची कहौं और आदमक़द कुकुरमुत्ते के मुख्य पृष्ठ देखने का सौभाग्य मिला। कुछ फोटो उन कार्यक्रमों की भी थीं  जिनमे मुझे साक्षी और सहभागी होने का दैव योग मिला।  इसी क्रम मे पुस्तक के अनुक्रमांक एक "एक कहानी मेरी कहानी के पहले" और  आखिरी अनुक्रमांक 52- "अब आगे क्या?" पुस्तक के इन दोनों अध्याओं से ही चड्ढा साहब के व्यक्तित्व, कृतित्व, उनकी सोच और उनको मिले संस्कारों को जाना-समझा जा सकता है। सारी ज़िंदगी जन संपर्क और जन सेवा के बाद उम्र के इस पढ़ाव पर भी बचपन मे अपने पिता से मिली उस सीख पर कायम हैं कि न तो उनके पास करोड़ो का सात मंज़िला चमचमाता घर हैंन कोई उल्लेखनीय उपलब्धि पर संतोष है कि "मै चोर नहीं हूँ!!" निश्चित ही उनके पिता द्वारा 1947 मे सहन की गयी देश के विभाजन से उपजी विभीषिका से मिली अप्रत्याशित परिस्थितियों से उत्पन्न यह सीख उन्हे आत्मसंतोष और आत्मतुष्टि प्रदान करती होगी। इसके साथ ही अंतिम प्रश्न वाचक अध्याय को  पढ़ने का  लोभ संवरण न कर सका। जितनी बेबाकी, स्पष्टता और सरलता से चड्ढा जी ने अपनी आधी सदी की यादों को इस अध्याय मे समेटा है, उससे उनके जीवन एक खुली किताब के रूप दृष्टिगोचर होता हैं। जल्दबाजी, अधीरता, मुखरता, बातों को बताने और छुपाने जैसी  जिन बातों को चड्ढा जी, भूलें कह कर निरूपित करते है, वस्तुतः हम जैसे, उनके मित्र, शुभचिंतक और प्रेमी उनकी इन्ही खूबियों के कारण  उनके इस स्वभाव को उनके जीवन का श्वेत पक्ष बतलाते हैं। रामचरित मानस की चौपाई:- निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।  उनके जीवन पर सटीक बैठती हैं। कदाचित चड्ढा साहब की ऐसी  निश्छलता, साफ़गोई, स्पष्टवादिता बेशक उनको आज की भ्रष्ट, दूषित, विकृत और कलुषित राजनीति मे अनुपयुक्त और अयोग्य ठहराती हो पर उनकी इन्ही खूबियों, योग्यताओं के कारण हम जैसे सैकड़ो लोग उन्हे अपना आदर्श निरूपित करते हुए आज भी उनसे जुड़े हैं। आज के राजनैतिक परिदृश्य मे स्थानिय भ्रष्ट, झूठे और बेईमान  सत्तारूढ़ नेताओं से परे उन्हे एक अलग पहचान प्रदान करती  है।

भारतीय जन संघ, जिसका चुनाव चिन्ह उन दिनों  जलता हुआ दीपक हुआ करता था के प्रति उनके पिता की  राजनैतिक प्रतिबद्धता के कारण उनका झुकाव संघ और भारतीय जन संघ के प्रति होना स्वाभाविक था। उन दिनों स्वतन्त्रता के आंदोलन की पृष्ठभूमि और कॉंग्रेस की प्रभावशाली भूमिका के चलते, भारतीय जन संघ का झण्डा बुलंद करना एक कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य था जिसे चड्ढा जी ने निर्बल के पक्ष मे खड़े होकर बलबान से बैर ठान, निर्बल की लड़ाई बलवान की....... को चरितार्थ किया। उन दिनों के संघर्ष के दौर मे चड्ढा जी  भारतीय जन संघ  के लोकप्रिय नेता बलराज मधोक के साथ अपने परम मित्र हिन्द कुमार कोहली और दौरलतरम का स्मरण करना नहीं भूले। संघ से अपने जुड़ाव और उन दिनों के अपने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का स्मरण  यथा एक नाथ जी रानाडे जैसे महान व्यक्तित्व के रु-ब-रु दर्शन किसी को भी अभिभूत कर सकता है। डॉ केशव बलिराम हेडगेवार के अथक त्याग और बलिदान से स्थापित संघ और उन दिनों ग्वालियर के संघ के अपने साथियों गेंदा लाल, लक्ष्मण राव, कुंटे जी, बापू नाना, महिपति जी, अन्ना जी, बेलापुरकर जी का स्मरण एवं अन्य हजारों अनाम कार्यकर्ताओं के आत्मोत्सर्ग के कारण ही संघ आज इस स्थिति मे पहुंचा। चड्ढा जी का  कुशा भाऊ ठाकरे जैसे निस्वार्थ कर्मयोगी का सानिध्य से प्राप्त प्रोत्साहन निश्चित ही ऊर्जास्पद स्वर्णिम प्रसंग कहा जाएगा।                          

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जन संघ से जुड़े कर्मठ और सक्रिय कार्यकर्ता के जीवन मे, 1982 के राम मंदिर के लिए चले आंदोलन और 1975 मे तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी द्वारा घोषित क्रूर आपातकाल की यादों के प्रसंग न हों ऐसा हो नहीं सकता। चड्ढा जी के जीवन मे भी इन दोनों घटनाओं से जुड़े  खट्टे मीठे प्रसंगों  का उल्लेख पुस्तक मे किया गया है। चड्ढा जी अपनी यादों को सांझा करते हुए कहते है कि विश्व हिन्दू परिषद के आवाहन पर रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान न केवल ग्वालियर अपितु पूरे देश के  रामभक्तों में  अभूतपूर्व उत्साह था। कैसे ग्वालियर सहित मध्य प्रदेश के रामभक्त झाँसी के लक्ष्मी व्यायामशाला  मे एकत्रित थे। चड्ढा जी के आग्रह पर कैसे ट्रांसपोर्टर अर्जुनदास जी ने ट्रकों की लाइन लगा कर  राम भक्तों को अयोध्या पहुंचाने का कार्य किया और कैसे पूरे रास्ते गाँव, देहात और कस्बों के लोगो ने जगह जगह रोक कर कारसेवकों का स्वागत किया जो अभिभूत कर देने वाला अनुभव  था। पूरे भारत से अयोध्या मे भारी संख्या पर रामभक्तों के आ जाने के कारण आंदोलन  समिति के अगले आदेश तक झाँसी मे रुकने निर्देश के कारण चड्ढा जी और ग्वालियर के कारसेवकों को मन मसोसकर झाँसी मे ही रुकना पड़ा। झाँसी मे कर्फ़्यू और पुलिस बल द्वारा गोली चलाने के दृश्यों को "झाँसी जब ऐसी थी तो अयोध्या कैसी होगी?" के अंतर्गत सुंदर  शब्दों मे बहुत ही जीवंत तरीके से उल्लेख पुस्तक मे किया है।

12 जून 1975 मे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश पर जैसे ही तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी को अगले छह साल के लिये अयोग्य घोषित किया गया, देश ने 25 जून 1975 का आपातकाल के रूप मे इन्दिरा गांधी का एक सुर्ख स्याह तानाशाह दौर देखा। पूरे देश मे मौलिक अधिकारों का हनन और लोकतान्त्रिक अधिकारों को ताक पर रख कर कैसे विपक्षी नेताओं को चुन चुन कर जेलों के अंदर भेजा गया। पुस्तक मे उन दिनों ग्वालियर मे पुलिस प्रशासन द्वारा विपक्ष सहित भारतीय जनसंघ और संघ के बड़े बड़े नेताओं की गिरफ्तारी और उन दिनों की काली, क्रूर घटनाक्रम  का वर्णन चड्ढा जी ने अपनी पुरस्तक मे किया है जो बड़ी भयावह स्थिति दर्शाने वाला है। पुस्तक मे चड्ढा जी द्वारा उस दौर के अपने वरिष्ठ साथियों से मिले स्नेह और प्रेरणा तथा कनिष्ठ साथियों के मनोबल बढ़ाते प्रसंगों को पुस्तक मे रोचकता से समाहित किया है। राजमाता सिंधिया को भारतीय जनसंघ मे लाने वाले सरदार आंग्रे के आवास हिरणवन, कोठी मे हुई लूट के प्रसंग, पूर्व प्रधान श्री अटल बिहारी बाजपेयी से जुड़े किस्से चड्ढा साहब की भारतीय जनसंघ और बाद मे भारतीय जनता पार्टी, ग्वालियर  मे, सर्वस्वीकारता को बतलाता है। सांसद, प्रभात झा का दैनिक स्वदेश से जुडने के प्रसंग,  गंगा राम जी बांदिल, नरेश जी जौहरी, काका शेजवलकर, जगदीश गुप्त, भाऊ साहब पोतनीस, भानु जी, से जुड़े प्रसंगों को बड़ी सरसता से लिखा है जो पुस्तक के पाठक को  आनंदित कर देता है।

पुस्तक मे राजनैतिक क्षेत्र मे रहते हुए चड्ढा जी ने बड़े ही निश्चल ढंग से अपनी सफलताओं से ज्यादा  असफलताओं का का जिक्र किया है। गरीब चंदर के हितों के लिये पुलिस कोतवाली का घेरना, शताब्दी वर्ष के मेला प्राधिकरण का अध्यक्ष बनना, वीआईपी रोड के निर्माण का प्रसंग, अटल जी द्वारा मेले के समापन, अपने परिषद बनने की चुनौती जैसे अनेक प्रसंगों पर राजनीति  उन्होने  अपने सिद्धांतों पर की,  जिसमे सच्चाई और ईमानदारी सन्निहित थी। भारतीय जनसंघ और बाद मे भारतीय जनता पार्टी द्वारा आयोजित उनके राजनैतिक आंदोलनों  और प्रदर्शनों मे जहाँ एक ओर  निर्भीकता, निडरता दिखलाई  पड़ती है, वही दूसरी ओर राजनैतिक अभियान  समर्पण और  सच्चाई की भावना से ओतप्रोत रहे, जो आज भी दाना पानी जैसे सामाजिक कार्यों मे दिखलाई पड़ते है।

अपने पूरे राजनैतिक जीवन मे सच्चाई, ईमानदारी के साथ,  कमजोर और वंचित  वर्ग के हितों के रक्षार्थ   चड्ढा साहब, अपने आप को दीपक के  रूप मे अद्धृत कर "दिये और तूफान" की कहानी की  सार्थकता को  सिद्ध करते रहे और ये संघर्ष जंगल और पर्यावरण को बचाने के लिये दाना पानी के रूप मे आज भी निरंतर जारी है। पुस्तक सुधियों की आधी सदी की इस  पुस्तक मे चड्ढा जी के रूप मे, समाज के हर उस  साधारण आदमी की कहानी और जीवन संघर्ष ठीक उसी तरह  परिलक्षित होता है जो असाधारण ईमानदारी, सच्चाई और अनासक्त भाव से समाज के प्रति अपने कर्तव्य कर्मों को करना अपना धर्म समझता है, जैसा की  श्रीमद्भवत गीता के अध्याय 2 श्लोक संख्या 47 मे भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है:-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।  

 

अर्थात तेरा कर्म करने में  ही अधिकार है उसके फलों में कभी नहीं। इसलिये तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो। चड्ढा जी के जीवन के बहुआयामी व्यक्तित्व को दर्शाती ये पुस्तक इन्ही कारणों से पाठकों को पढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

विजय सहगल

               


1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

क्या पुस्तक अमेजॉन पर उपलब्ध हैl