"सालासर
बालाजी मंदिर"
19 जनवरी 2025 को विश्व प्रसिद्ध सालासर
बालाजी, हनुमान मंदिर के दर्शन
का सौभाग्य प्राप्त हुआ। राजस्थान प्रदेश के चुरू जिले मे जयपुर-बीकानेर हाईवे पर सालासर
कस्बे मे स्थित बालाजी मंदिर के बारे मे कहा जाता हैं कि इस मंदिर की स्थापना बाबा
मोहन दास ने सन 1755 मे की थी। भक्त प्रवर श्री मोहन दास जी की भक्ति भावना से
प्रसन्न होकर स्वयं रामदूत हनुमान ने असोटा ग्राम मे मूर्ति रूप मे प्रकट होकर
श्री मोहन दास की मनोकामना पूर्ण की। ऐसी किवदंती है कि असोटा गाँव के एक किसान
द्वारा अपने खेत की जुताई के दौरान अपने हल की नोक से एक पत्थर के टकराने की आवाज
सुनी। किसान ने उस जगह की मिट्टी को जब और खोदा तो उसे एक हनुमान प्रतिमा की
प्राप्ति हुई। इसी दौरान किसान की पत्नी उसके लिये लाये भोजन के साथ जब खेत मे
पहुंची तो किसान ने अपनी पत्नी को हनुमान प्रतिमा को दिखाया। किसान की पत्नी ने
वस्त्रों से प्रतिमा को साफ कर जल आदि से स्नान करा कर साफ किया और अपने साथ लाये
बाजरे के चूरमे का प्रसाद अर्पण कर सिर झुका कर अपने आराध्य को नमन किया। ऐसा कहा
जाता है तभी से भगवान बालाजी जी हनुमान को बाजरे के चूरमे का प्रसाद भी अर्पित
किया जाता हैं।
भगवान बालाजी हनुमान के प्रकट होने का
समाचार असोटा गाँव मे आग की तरह फ़ेल गया। असोटा के ठाकुर ने भी यह खबर सुनी।
बालाजी ने ठाकुर को सपने मे आदेश दिया कि इस मूर्ति को सालासर कस्बे मे स्थापित
करें। उसी रात सालासर के भक्त मोहन दास को भी उसी रात सपने मे बालाजी को देखा और
वे बालाजी हनुमान के स्वागत आगमन हेतु सालासर कस्बे की सीमा पर पहुँच गये। जब
ठाकुर को इस बात का ज्ञान हुआ कि असोटा आए बिना ही मोहन दास जी को बालाजी भगवान की
अगमानी हेतु खड़े है तो उन्हे घोर आश्चर्य हुआ। निश्चित ही ऐसा सर्वशक्तिमान बालाजी
हनुमान की कृपा और आशीर्वाद से ही हो रहा था। ऐसा कहा जाता हैं कि जब ससम्मान
बालाजी हनुमान की मूर्ति सालासर पहुंची तो भक्त मोहन दास ने निर्देश दिया कि जिस
बैल गाड़ी मे बालाजी हनुमान की प्रतिमा लायी जा रही थी उस गाड़ी के बैल जहां स्वतः
रुकेंगे वहीं पर बालाजी हनुमान की स्थापना कर मंदिर का निर्माण किया जायेगा। कुछ
समय बाद बैल रेत के टीले पर जाकर रुक गया। तब उसी पवित्र और पूजनीय स्थान पर
विक्रम संवत 1811 श्रावण शुक्ल नवमी (सन 1755) मे बालाजी हनुमान की स्थापना की गयी
और इस तरह वो सालासर बालाजी धाम कहलाया जाने लगा। जिस बैल गाड़ी मे असोटा गाँव
से हनुमान जी की प्रतिमा को लाया गया था वह बैलगाड़ी आज भी मंदिर परिसर मे भक्तों
के दर्शनार्थ आज भी रक्खी हैं। चूंकि भक्त मोहन दास ने बालाजी हनुमान की
कल्पना दाड़ी व मूंछ मे अपने आराध्य के रूप मे किये थे इसलिये ही सालासर बालाजी हनुमान
ही एक मात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान
हनुमान के दर्शन दाड़ी-मूंछ के रूप मे होते हैं।
ऐसी मान्यता हैं कि भक्त मोहनदास की भक्ति
और समर्पण देख कर बालाजी भगवान ने उनको दर्शन देकर मनोकामना पूर्ण करने का वचन
दिया। तब मोहन दास ने बालाजी भगवान से सदा सालासर मे निवास करने और दर्शनार्थ आये
उनके भक्तों की मनोकामना पूरी करने का वचन लिया,
तब से सालासर मे आये बालाजी हनुमान के दर्शनार्थियों की हर मनोकामना पूरी होती
हैं। मनौती की कामना के रूप मे दर्शनार्थी मंदिर मे नारियल बांधते हैं। मंदिर
परिसर मे ही भक्त मोहन दास द्वारा अपने
हाथों से प्रज्वलित धूनी जो अभी तक प्रजावलित है। अपनी बहिन कान्ही के देहावसान के बाद उनकी समाधि के पास ही मोहनदास ने जीवित समाधि ले ली जो वहीं पास मे
स्थित है।
प्रवेश द्वार क्रमांक 1 मे बालाजी भगवान के
दर्शनार्थ लोगो की भीड़ के साथ मैंने भी अपने परिवार के साथ प्रवेश किया। एक दालान
से होते ही मंदिर की विशाल सीढ़ियों से चढ़ते हुए हम लोग सीधे बालाजी भगवान के मंदिर
के ठीक सामने पहुँच गए। सोने के पत्तरों
से जढ़ित मंदिर मे सिंदूर से विभूषित दाड़ी और मूँछ के रूप मे भगवान बालाजी की छोटी
सी लेकिन भव्य और तेज आभामंडल से प्रकाशित मूर्ति के दर्शन हुए। चाँदी और सोने के
आभूषण और पात्रो से मंदिर की दिव्यता और भव्यता मे और निखार आ गया था। स्वर्ण धातु
से निर्मित भगवान हनुमान की गदा बालाजी भगवान के शाश्वत रूप के दर्शन करा रही थी। मंदिर के दरबार
मे जहां एक ओर स्वर्ण पत्रों से बालाजी हनुमान के एक ओर चतुर्भुज भगवान विष्णु और दूसरी ओर स्वर्ण कमल पर माँ लक्ष्मी
की प्रतिमा को उकेरा गया था। भगवान गणेश,
राधा कृष्ण और सीता-राम लक्ष्मण सहित विराजमान थे। भगवान बालाजी हनुमान के दर्शन कर
हम सभी लोग जैसे ही बाहर निकले तब तक दोपहर का समय हो गया था। एक काउंटर पर कुछ लोगो
की भीड़ देख जिज्ञासावश पूंछतांछ की तो जानकारी मिली की मंदिर के प्रसाद हेतु टोकन लेने
वालों की भीड़ थी। इस समय तक भूख भी लगनी शुरू हो गयी थी। फिर क्या था 150 रुपए प्रतिव्यक्ति
की दर से हम लोग भी मंदिर के प्रसाद ग्रहण करने हेतु ने भंडारगृह से होकर लिफ्ट के माध्यम से हम सभी मंदिर
के भोजनालय कक्ष मे जा पहुंचे। सुव्यवस्थित भोजन कक्ष मे टेबल कुर्सी पर बैठ कर भोजन
की शुरुआत की। प्रसाद की सुमधुर सुगंध ने भूख को और बढ़ा दिया था। तत्काल ही दाल,
गट्टे की सब्जी और आलू-परमल की सब्जी गरमा-गर्म पूड़ियों के साथ ग्रहण की। राजस्थान
का प्रसिद्ध मीठा चूरमा जिसमे शुद्ध घी ने उसका स्वाद को दुगना कर दिया। भर पेट भोजन
के पश्चात पुनः मंदिर की ओर भगवान बालाजी हनुमान को प्रणाम कर कार पार्किंग की ओर अपने
गंतव्य के लिये बढ़ चले।
बापसी मे राजस्थान पुलिस की बर्दी मे एक पुलिस
कर्मी को कचड़े के ढेर से खाने पीने की वस्तुओं को खोजते देख मन बिचलित हो गया। कुछ
समझ मे आये इससे पूर्व ही कुछ अन्य पुलिस कर्मी उस सहकर्मी का हाथ पकड़ कर अपने साथ
ले गये। शायद वह व्यक्ति मानसिक रुग्णावस्था मे रहा था।
सालासर कस्बा एक छोटा लेकिन विकसित और एवं
प्रसिद्ध तीर्थ स्थान हैं। कस्बे की सारी आर्थिक गतिविधियों सालासर बालाजी मंदिर
के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। सालासर मे आये हुए भक्तजनों से होने वाली कस्बे की आय
ही लोगो का मुख्य आर्थिक स्रोत है। मंदिर के चारों ओर ही व्यापारिक केंद्र,
होटल, धर्मशालाएँ भोजनालय और अन्य सामाग्री की
दुकाने हैं। इस धार्मिक स्थान पर कार या स्कूटर पार्किंग के शुल्क के नाम पर कुछ
लोग दर्शनार्थियों की मजबूरी का फ़ायदा भी उठाते हुए दिखे।
इस तरह बालाजी हनुमान के भव्य दर्शनों को मन मे सँजोये हम लोगो ने अपने घर की ओर प्रस्थान
किया।
विजय सहगल







1 टिप्पणी:
धन्यवाद भाई साहब... ऐसा प्रतीत हुआ कि हमने भी साक्षात् दर्शन कर लिए...
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