शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

खाटू श्याम-हारे का सहारा

 

"खाटू श्याम-हारे का सहारा"








अपने गुड़गाँव प्रवास के दौरान 18 जनवरी 2025 को राजस्थान के सीकर जिले के ग्राम खाटू मे स्थित, विश्व प्रसिद्ध तीर्थ खाटू श्याम जाने का अवसर प्राप्त हुआ। प्रातः 9 बजे, गुड़गाँव से खाटुश्याम की लगभग  248 किमी सड़क यात्रा  अच्छी थी। लगभग 5.30  घंटे की कार यात्रा के पश्चात ये कहना अतिसन्योक्ति न होगी कि  राजस्थान राज्य मे सड़क परिवहन अच्छा हैं। सारा परिवार इस सड़क यात्रा मे कुछ थक गया था, इसलिये भगवान खाटू श्याम मंदिर  के दर्शन आदि की जानकारी लेकर दो घंटे के विश्राम के पश्चात एक नयी स्फूर्ति, उमंग और उत्साह ने  मंदिर के दर्शन की इच्छा  और आकांक्षा को और भी बढ़ा दिया। पूरी यात्रा के दौरान दिन मे अच्छी ख़ासी गर्मी रही पर सूर्यास्त के बाद खाटू श्याम  कस्बे मे हल्की सर्दी थी। होटल से अन्य धर्मावलंबीयों की तरह बिना जूते चप्पलों के नंगे पैर ही जाने का निर्णय उचित ही था क्योंकि मंदिर का प्रवेश द्वार एक ओर से शुरू होकर दूसरी ओर के रास्ते से निकलता है इसलिये उतारे गये जूते चप्पल को लेने के लिये फिर से प्रवेश द्वार पर जाने से बचने का यही एक रास्ता था।  

ऐसा कहा जाता है कि जब कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत का युद्ध अवश्य संभावी हो गया तो दोनों पक्षों के वीर योद्धाओं ने अपनी अपनी युद्ध रणनीतियों पर चर्चा की। जब भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक को महाभारत के युद्ध पर चर्चा हेतु भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों सहित अन्य महारथियों को आमंत्रित किया गया। विभिन्न योद्धाओं मे से किसी ने  महाभारत युद्ध एक माह, किसी ने  पंद्रह दिन और किसी ने दस दिन चलने की राय दी। जब बर्बरीक से इस विषय मे कृष्ण ने पूंछा तो उसने युद्द को चंद पलों मे समाप्त होने की बात की। सुन कर पांडव पक्ष के सभी महारथी हैरान थे। तब श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से इस संदर्भ मे विस्तृत रणनीति बताने के लिये कहा।         

ऐसी किंवदंती हैं कि बर्बरीक, भगवान शिव का भक्ति मे लीन हो तपस्या मे रत था। बर्बरीक पांडू पुत्र भीम का पौत्र और घटोत्कच का  पुत्र था। वह बड़ा प्रतापी, वीर और साहसी था। कठिन तपस्या से प्रसन्न हो भगवान शिव ने बर्बरीक को बरदान मे तीन तीर दिये। इसी लिये उन्हे तीन बाण धारी भी कहा जाता हैं। शिव जी ने बताया कि पहला तीर चलाने पर बर्बरीक अपने उन सभी दुश्मनों पर मृत्यु का चिन्ह अंकित कर देगा जिनका वह वध करना चाहता है  और दूसरा तीर उन चिन्हित दुश्मनों का वध कर देगा। तीसरा तीर पूरी सृष्टि का विनाश कर देने मे सक्षम होगा। तीनों तीर  अपने लक्ष्य भेदन कर, बर्बरीक के पास उसके तुरीण मे बापस आ जाएंगे।  लेकिन शर्त ये थी कि इन बाणों का उपयोग सिर्फ हारने वालों के पक्ष मे करना होगा। इसलिये बर्बरीक अर्थात खाटू श्याम को,  हारे का सहारा कहा जाता हैं। इन बरदानों का परीक्षण हेतु कृष्ण ने बर्बरीक से पीपल के उस पेड़ पर लगे समस्त पत्तों का छेदन करने को कहा। बर्बरीक द्वारा पहला तीर छोड़ते ही बाण ने पेड़ के समस्त पत्तों का भेदन करते हुए उनमे छेद कर दिया, तत्पश्चात बाण  कृष्ण के पैर के चारों ओर मंडराने लगा क्योंकि एक पत्ते को कृष्ण ने अपने पैर के नीचे जो दबा लिया था। पांडव सेना के सभी महारथी इस धनुरविध्या को देख कर आश्चर्य से हैरान और  प्रसन्न थे कि बर्बरीक जैसा धनुर्धर उनके पक्ष मे लड़ेगा, पर अंतर्यामी भगवान श्री कृष्ण मन ही मन ऐसा देख चिंता मे पढ़ गये। वे जानते थे कि कम सेना के बावजूद अंत मे पांडव सेना ही विजयश्री का वरण करेगी तब बर्बरीक अपनी शपथ के वशीभूत हारने वाली कौरव सेना के  पक्ष मे लड़ते हुए पांडव सेना का पूरी तरह वध कर देगा। इसलिये श्रीकृष्ण ने एक ब्राह्मण का वेश धर कर, बर्बरीक से ब्राह्मण को  दान देने का वचन लेते हुए उसका शीश मांग लिया। इस तरह अपनी रणनीति के तहत उन्होने बर्बरीक जैसे शक्तिशाली योद्धा युद्ध के रास्ते से हटा कर  पांडवों को,  विनाश से बचा लिया। लेकिन बाद मे उन्होने बर्बरीक की महाभारत युद्ध देखने की इच्छा की पूर्ति हेतु उसके कटे हुए शीश को  एक पहाड़ी पर स्थापित कर उसकी  युद्ध देखने की अभिलाषा को पूर्ण किया साथ ही बर्बरीक को अपने प्रिय भक्त के रूप मे  कलियुग के  "खाटू  श्याम"  के रूप मे सुविख्यात होने का आशीर्वाद दिया।             

खाटुश्याम मंदिर एक छोटा किन्तु अति प्राचीन मंदिर हैं। मूल मंदिर सन 1027 मे रूप सिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कंवर ने बनवाया था। 1720 मे मारवाड़ के शासक अभय सिंह ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। मंदिर प्रबंधन ने वर्तमान मे मंदिर के सामने, प्रवेश द्वार से निकासी द्वार तक स्टील के पाइप से 13-14 मार्ग बनाये हैं। पूरा परिसर प्रवेश मार्ग से निकासी तक ऊंची-ऊंची टीन की चादरों से ढंका हुआ है।  जिनके माध्यम से मार्ग के बीच मे एक ऊंचे चबूतरे पर निर्मित मंदिर मे स्थापित भीम के पौत्र बर्बरीक के शीश को  खाटू जी श्याम के रूप मे दर्शन कर श्रद्धालु उन्हे अपनी आदरांजलि देकर अपनी मनोकामना और मनौती के लिये प्रार्थना करते हैं। भक्तगण लोहे के पाइप्स से अलग-अलग बने इन 13-14 निश्चित, निर्धारित मार्गों से होते  हुए दर्शन के लिये जाते  हैं, इसलिये प्रसाद, फूल इत्र या अन्य अर्पण के लिये लायी हुई वस्तुओं को आप स्वयं भावनात्मक रूप से भगवान को अर्पित कर अपने पास ही रक्खे और अपने साथ अपने घर ले जाएँ। उन्हे दूर से मंदिर की ओर फेंक कर उनका अनादर और अपव्यय न  करें।  इस आशय की सूचनाओं का प्रसारण मंदिर प्रशासन भी लगातार करता रहता हैं। मंदिर प्रबंधन द्वारा की गयी दर्शन व्यवस्था और कम भीड़ होने के कारण पहले तो हमने अपने परिवार के साथ 5वी-छठी लाइन मे लगकर दर्शन किये क्योंकि पहली की चार लाइन महत्वपूर्ण व्यक्तियों के लिये निर्धारित थी। लेकिन सदस्यों के  एक राय होने के कारण सभी लोगो ने पुनः प्रवेश द्वार पर आकार सबसे आखिर 14वी लाइन मे लगकर फिर से खाटू श्याम जी के दर्शन किये क्योंकि इस लाइन के दर्शनार्थी, मंदिर के सामने बने एक ऊंचे चबूतरे पर खड़े होकर भगवान के दर्शन करते हैं, जो सुदूर तो हैं पर ज्यादा स्पष्ट और सुदर्शन हैं। इस चबूतरे पर से मंदिर और भक्त बर्बरीक के शीश के दर्शन, श्रंगार और चाँदी के नक्काशीदार मंदिर के भव्य वास्तु और द्वार के दर्शन कर सकते  हैं। प्रतिवर्ष खाटू मे फाल्गुन माह की षष्ठी से बारस (द्वादशी) तक एक विशाल मेला लगता है क्योंकि इस दिन ही बर्बरीक ने स्वयं अपने हाथों से अपना शीश भगवान श्रीकृष्ण के चरणों मे समर्पित किया था। देश विदेश से इन दिनों लाखों भक्तगण खाटू श्याम जी के दर्शनार्थ यहाँ आ कर अपनी मनोकामनाओं के लिये भगवान से प्रार्थना करते हैं।

खाटू कस्बा का पूरा अर्थशास्त्र सिर्फ भगवान खाटू श्याम के दर्शनार्थ आये भक्तों के कारण सौभाग्य, समृद्धि और सफलता के सोपान की कहानी कहता हैं। मंदिर के रास्ते मे प्रसाद की दुकानों के सेवकों द्वारा जबर्दस्ती हाथ पकड़ कर प्रसाद क्रय करने की ढिठाई से मन के खिन्नता को रोकने के  उपाय व्यापार मण्डल और पुलिस प्रशासन द्वारा यदि किये जाएँ तो भक्तों को अनावश्यक कटु अनुभवों से बचाया जा सकता हैं।  पूरे दिन के भ्रमण और भगवान श्री खाटू श्याम जी के दर्शन परश्चात रात को राधा की हवेली नाम के रेस्टोरेन्ट मे स्वादिष्ट राजस्थानी भोजनालय मे पूर्णतः भारतीय रीतिरिवाज और राजस्थानी परिवेश मे सेवा कर रहे स्टाफ ने  सुरुचि भोजन को  और भी स्वादिष्ट और सुखद बना दिया।  

तीन बाणधारी, हारे का सहारा, प्रभु खाटू श्याम की जय!!

विजय सहगल

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Oti sundar varnan

विजय सहगल ने कहा…

[02/02, 16:43] I S Kadian Chandigarh: Manoranjak jankari ke liye dhanyavad. Aap ne is mandir ke bare mai mahatavpuran jankari de kar meri kaie bhrantiyon ko sapasatsta se hal kar diya.
👍🏻🙏🏻🙏🏻
[02/02, 16:45] I S Kadian Chandigarh: I was supposing that it is temple belonging to shri krishan ji msharaj.
Thanks a lot once again Sehgal ji.🌹🌹
I S kadian, chandigarh