सोमवार, 10 फ़रवरी 2025

उत्तराखण्ड में समान नागरिक संहिता के निहितार्थ


"उत्तराखंड मे समान नागरिक संहिता के निहितार्थ"


अंततः 27 जनवरी 2025 को उत्तराखंड मे  समान नागरिक संहिता लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन गया। अब गुजरात भी उत्तराखंड के पदचिन्हों पर चल उसका अनुसरण करने वाला अगला राज्य हो सकता है। उत्तराखंड के मुखमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस दिन अधिसूचना जारी कर एक इतिहास रच दिया। यह कानून राज्य की अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर, पूरे उत्तराखंड राज्य और इसके बाहर रहने वाले राज्य के निवासियों पर लागू होंगे। मुख्यमंत्री धामी ने उत्तराखंड की जनता से तीन वर्ष पूर्व किये वादे को पूरा किया। सर्वोच्च न्यायालय ने अनेकों बार देश मे समान नागरिक संहिता, लागू करने का सुझाव अपने विभिन्न निर्णयों मे दिया था। संघ और भारतीय जनता पार्टी के एजेंडे मे, यूनिफ़ोर्म सिविल कोड (यूसीसी), एक मुख्य विषय के रूप मे शुरू से ही रहा हैं। उत्तराखंड सरकार द्वारा यूसीसी को लागू होना समाज मे एक आधुनिक, प्रगतिशील और समानता के सार्वभौमिक   सिंद्धांत की ओर एक उत्तम कदम है। समान नागरिक संहिता के लागू होती ही उत्तराखंड मे महिलाओं के साथ होने वाले अमानवीय बहू विवाह, हलाला, तीन तलाक  जैसे मामलों पर रोक लगेगी। यूसीसी को उत्तराखंड मे लागू करने से  किसी धर्म, संप्रदाय या समुदाय को लक्ष्य कर उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाना  नहीं है। इस कानून को लागू करने के विरुद्ध  देश और राज्य के विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं मे कड़ी प्रितिक्रिया स्वाभाविक थी। देश के सबसे पुराने राजनैतिक दल कॉंग्रेस ने अपने स्वभाव के अनुरूप अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की नीति को आगे बढ़ाते हुए इसे मुस्लिमों के विरुद्ध बतलाया। कॉंग्रेस का ये मानना  कि देश अभी यूसीसी के लिये तैयार नहीं है!! इसके लिये लंबे समय की जरूरत है!! देश की स्वतन्त्रता के 77 साल बाद भी उसकी ये संकुंचित सोच और तंगदिली उसकी तुष्टीकरण की नीति का पुष्टीकरण करती प्रतीत होती है। मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ऐ-हिन्द ने भी यूसीसी को उच्चतम न्यायालय मे चुनौती देने की बात कहीं।

कुछ लोगों ने लिव इन रिलेशन मे रह रहे वयस्कों को अनिवार्य पंजीकरण और सूचनाओं को पुलिस के साथ सांझा करने की बाध्यता को निजता का हनन करने वाला बताया गाया। हालांकि सरकार ने  कानून के अन्य प्रावधानों और इस बात का ध्यान रखने का आश्वासन दिया है।

जब देश के शीर्ष न्यायालय ने शहबानों केस मे  यह सुझाव दिये जाने के बावजूद कि मुस्लिम समाज को इस दिशा मे पहल करने की आवश्यकता है ताकि वे प्रगति की राह मे पीछे न रह जाए!! पर खेद और अफसोस, तत्कालीन कॉंग्रेस सरकारों ने देश मे समान नागरिक संहिता के सुझाव पर तार्किक बहस करने के उलट इसे  सांप्रदायिक अमली जामा पहनाने की कोशिश की। इस विषय पर कॉंग्रेस सहित, विपक्षी दल के दोहरे मापदण्ड देखने को मिलते हैं। जहां एक ओर ये दल हमेशा देश के  युवाओं मे बेरोजगारी, आम जनों के लिये रहने के मकान, खाने के लिये रोटी और पहनने के लिये  कपड़ा आदि की मांग करते  है, वहीं जब इन सभी समस्याओं के मूल मे बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिये सरकार,  समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नियंत्रण कानून के क्रियान्वयन की बात करती है तो विपक्षी  दल इन क़ानूनों पर मौन रह कर चुप बैठ जाते हैं, मानों मुँह मे दही जम गया हो। जब भारतीय संविधान, स्त्री-पुरुष  को समानरूप से मताधिकार, शिक्षा और रोजगार मे समानता, आपराधिक कानून मे समानता प्रदान करता  है, तो शादी, तलाक, संपत्ति उत्तराधिकार कानूनी विषयों  मे धर्म और लिंग  के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव क्यो?  विदित हो कि इन्डोनेशिया, बहरीन, तुर्किये, और लेबनान जैसे मुस्लिम देशों तक मे आधुनिक कानून लागू हैं तब भारत मे इन प्रगतिशील कानून को लागू करने पर आपत्ति  क्यो?

जहां एक ओर हर धर्म के मानने वालों को अपने रीति-रिवाज के अनुसार शादी करने की छूट होगी वहीं शादी का पंजीकरण 60 दिन मे कराना अनिवार्य होगा। इस कानून के अंतर्गत 27 मार्च 2010 के बाद से कानून लागू होने की तारीख के बीच हुए विवाह को भी 6 महीने मे रजिस्टर करवाने होंगे। इसकी शुरुआत स्वयं  मुख्यमंत्री  पुष्कर सिंह धामी ने अपने विवाह का पंजीकरण करा कर किया। किसी व्यक्ति की मृत्यु पर उसकी संपत्ति का समान रूप से वितरण उसके पति/पत्नी और बच्चों मे किया जायेगा। उस मृतक व्यक्ति के माता-पिता को भी समान अधिकार मिलेंगे। बेटियों को भी बेटों के समान संपत्ति मे समान अधिकार मिलेंगे। इस अवसर पर मुख्य मंत्री जी ने एक पोर्टल का भी शुभारंभ किया। उन्होने कहा कि सभी धर्मों की महिलाओं को भी समान अधिकार प्राप्त होंगे और सही मायनों मे राज्य मे महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा सुनिश्चित होगी। इस कानून के माध्यम से  समाज मे महिलाओं पर हलाला, बहुविवाह, और तीन तलाक जैसी कुप्रथाओं पर पूरी तरह से रोक लगाई जा सकेगी। सभी धर्मों मे विवाह न्यूनतम उम्र लड़कों के लिये 21 वर्ष और लड़कियों के लिये 18 वर्ष निश्चित की गयी।    

आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि उत्तराखंड मे समान नागरिक संहिता के लागू करने से प्रेरणा लेकर इस आधुनिक और प्रगतिशील कानून को पूरे देश मे लागू करने की दिशा मे  देश की  अन्य राज्य सरकारें इसी नक्शे कदम पर कानून बना कर देश को एक उन्नत और प्रगतशील देश की श्रेणी मे लाने का प्रयास करेंगे और संविधान निर्माताओं का समानता पर आधारित   लिंगभेद, वर्गभेद, जातिभेद की भावनाओं से परे,  एक महान भारत के सपने को साकार करेंगे।            

विजय सहगल

       


1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

इसे भले ही एक चुनावी नारा / संकल्प कह लें … किंतु आधुनिक प्रगतिशील समाज बनाने की दिशा में यह कदम पूर्णतः उचित है … फिर भी … पूरे समाज द्वारा इसे अंगीकार करने में बहुत समय लगेगा
- राजेश कंचन