रविवार, 16 फ़रवरी 2025

ग्वालियर व्यापार मेला-2025

 

"ग्वालियर व्यापार मेला-2025"





हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी ग्वालियर व्यापार मेला ग्वालियर मे जारी है। 25 दिसम्बर 2024 से शुरू इस व्यापारिक मेले के औपचारिक समाप्ति 25 फरवरी 2025 को  होगी। कभी 1905 मे ग्वालियर के तत्कालीन महाराज स्व॰ माधव राव सिंधिया द्वारा क्षेत्र के किसानों के लिये शुरू किये गये पशु मेले ने आज मध्य प्रदेश के सबसे बड़े व्यापारिक मेले का रूप धारण कर लिया। 104 एकड़ मे फैले इस मैदान को स्थाई रूप से सिर्फ इस वार्षिक मेले के लिये आरक्षित किया गया हैं। जहां सैकड़ों छोटी-छोटी स्थाई दुकाने, एक सभागार, पार्क पुलिस चौकी बनी हुई है जो प्रायः दिसम्बर से जनवरी-फरवरी तक चलने वाले मेले के दौरान ही सक्रिय होकर मेले का रूप धारण कर लेती हैं।

मेले मे देश के विभिन्न प्रदेशों से आये हुए हेंडीक्राफ्ट्स, कलाकृतियाँ, मूर्ति शिल्प, कालीन एवं विभिन्न उत्पादों के अतिरिक्त, इलेक्ट्रॉनिक्स सामान जैसे टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, एसी, फ़र्निचर, स्टील आलमीरा  के साथ कपड़े, कंबल खिलौने भी बिक्री के लिये उपलब्ध कराये जाते हैं। कश्मीर, भदोही, कर्नाटक बंगाल आदि के उत्पाद भी बिक्रय हेतु लाये जाते हैं। विभिन्न छतरियों (पविलियन) के हिस्सों मे प्रदर्शित खान पान की दुकाने भी मेला भ्रमण करने वाले लोगो को अपनी ओर आक्रर्षित किये बिना नहीं रहती। वृजवासी की प्रसिद्ध नाश्ते और खाने की दुकान,  खाने वालों का एक मुख्य आकर्षण है।  मेरठ का प्रसिद्ध सीरमल, खाजा भी  आकर्षण का केंद्र था। महिलाओं के चूड़ी, कड़े, नकली गहने, और प्रसाधन की वस्तुएँ भी जगह जगह देखी जा सकती हैं।   मेले मे किशोरों और बच्चों के लिये गुब्बारों पर निशाना साधती बंदूकों की दुकान और  झूले ने हों ऐसा कैसे हो सकता हैं। बड़े-बड़े आधुनिक ऊंचे ऊंचे विभिन्न झूलों की लंबी श्रंखला एक क्षेत्र मे अपनी अलग ही छटा बिखेरते हैं। रात्रि मे इन झूलों पर लगी लाइटें दूर से ही मेले मे बच्चों के साथ बड़ों को आकर्षित करती हैं। बच्चे तो बच्चे मुझ जैसे वरिष्ठ नागरिक भी ऊंचे से झूले मे बैठकर चक्कर खाने और शरीर मे हिंडोले का  ऊंचे जाने और नीचे आने की गुद-गुदी को ज़ोर से हंस कर और चिल्ला कर संतप्त करने की कोशिश करते दिखा जो अवर्णीय और अविस्मृतिय है।   






किसानों और ग्रामीणों के लिये शुरू हुए इस सम्पूर्ण  पशु मेले का अब उतना तो हिस्सा तो वर्तमान मेले मे नहीं दिखता परंतु कुछ दुकाने अब भी परंपरागत ग्रामीणों और किसानों के लिये समर्पित हैं। पशुओं जैसे गाय, बैल, भैंस, ऊंट और घोड़ों को पहनाये जाने वस्त्र, आभूषण, घंटी, काठी, घुंघरू, चैन, कौड़ी और मोतियों से सजे  पट्टे आदि    को मेले मे बिकते देखा जा सकता हैं। इन पालतू जानवरों के सफाई और मालिश आदि की औज़ार जो पशुओं को मीठी मीठी और मन भावन खुजली करती है मानों पशुओं को उनके शरीर पर हाथ फेरते हुए उन्हे  प्यार और दुलार कर रहे हों। ग्रामीणों के अपने परंपरागत पहनावे धोती, कुर्ता के साथ उनके सिर से एक फुट  ऊंची लाठी ने हो ऐसा कैसे हो सकता हैं। एक से एक सुंदर मोटी, ऊंची, छोटी लठियाँ का चलन आज भी ग्रामीण क्षेत्रों मे हैं जो उन्हे आत्मरक्षा के लिये शहरी और जंगली जानवरों से बचाता हैं। लाठी के दोनों सिरों पर अल्युमुनियाम, पीतल की कैप लगाने और मजबूती के लिये लोहे का छल्ला एक सिरे पर लगाने का कार्य भी साथ साथ अतिरिक्त कीमत देकर लाठी को सजाया भी जाता है। उक्त दुकान को देखना और अनुभव करना एक अलग ही सुखद और अजूबा अनुभव था।









ग्रामीण क्षेत्रों मे गंगा भोज (मृतक की तेहरवीं) पर आयोजित किये जाने वाले समूहिक भोज के लिये सौ किलो  खीर या  सब्जी बनाने के लिये विशाल कढाई को देखना भी आश्चर्य करने वाला था कि आज भी सैकड़ों लोगो का भोजन, धार्मिक और सामाजिक अवसरों इन कढ़ाइयों पर तैयार किया जाता हैं। धार्मिक उत्सवों मे उपयोग होने वाले ढ़ोल, मजीरे, झांझर की दुकाने मेला मे लगी हुई थी। घरों और रसोई मे दैनिक उपयोग मे आने वाली वस्तुओं चकला, बेलन, चूल्हे तवा, सूप, छलनी, पतीलों के साथ आइरन बॉक्स के व्यापार भी मेले मे आये हुए थे जो दशकों से मेले मे भाग लेते आ रहे हैं। हर रोज मेले के सभागार मे संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम अपनी एक छटा संगीत और कला के रसिकों को लुभाने मे पीछे नहीं रहता। न केवल ग्वालियर अपितु देश के अलग अलग क्षेत्रो के कला संगीतज्ञों और मर्मज्ञों की भागीदारी से मेले का महत्व और भी बढ़ जाता है।







एक समय था मेले मे राज्य सरकार बिक्री कर मे 50% की छूट देती थी तब हर वस्तु पर आम नागरिकों को वसुओं के क्रय मे लाभ मिलता था लेकिन जीएसटी लागू होने से ये छूट अब समाप्त हो गयी लेकिन इस मेले का मुख्य आकर्षण मेले मे बिकने वाले घरेलू और व्यापारिक दुपहिया, तिपहिया  और चार पहिया वाहन हैं। मेले मे बिक्रय किये जाने वाले वाहनों के रोड टैक्स पर राज्य सरकार 50% की छूट इस मेले का सबसे बड़ा आकर्षण हैं। यही कारण है कि जीतने वाहन ग्वालियर मे पूरे साल नहीं बिकते उतने इस एक-डेढ़ माह मे बिक जाते हैं। जहां एक ओर दुपहिया वाहनों पर 4-5 हजार की छूट मिलती हैं वहीं कारों की खरीद पर 40-50 हजार की बचत तक हो जाती हैं। महंगी कारों पर ये बचत दो ढाई लाख तक होती हैं। 

छोटू भाई के बाइस्कोप ने तो बचपन की यादें ताजा कर दी। ढाई फुट के छोटू भाई बहुत ही खुश मिजाज व्यक्ति मेले मे 50-60 के दशक मे घर-घर गली कूँचों मे सिर पर रख कर बच्चों को  दिखलाये जा रहे बाइस्कोप के माध्यम से उन दिनों चलने वाली किसी फिल्म की रील के कुछ टुकड़े इसमे चलाया करते थे। लेंस के माध्यम से थिएटर मे फिल्म देखने का मजा देता हैं।    

तब आप भी ग्वालियर मेले मे वाहनों सहित अन्य वस्तुओं को क्र्य करने का लाभ अभी आने वाले 10-15 दिन उठा सकते हैं। एक राज के बात और जब मेला समाप्त हो जाता हैं तो कश्मीर के शाल, भादोही कालीन, खुर्जा की क्रॉकरी  या अन्य उत्पाद भी सस्ते मे बिक्री किये जाते है ताकि इन उत्पादों के व्यापारियों को अपने माल को बापस ले जाने के लिये माल-भाड़े की बचत हो सके। तो आइए इस मेले से वस्तुओं को क्रय कर फायदा उठाइये।

विजय सहगल                       

2 टिप्‍पणियां:

विजय सहगल ने कहा…

Nice presentation sir. Bioscope in our village was called as Bara man ki dhobhan where we can see the pictures of films.
🙏🏻🙏🏻🌹🌹
I S KADIAN, Chandigarh

बेनामी ने कहा…

बचपन की यादें ताजा हो गयीं … 😊
- राजेश कंचन