शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

किसी जाति का अपमान, लोकतन्त्र की लड़ाई कैसे

 

"किसी जाति का अपमान, लोकतन्त्र की लड़ाई कैसे?"

 





23 मार्च 2023 को काँग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एवं वर्तमान मे वयनाड से सांसद श्री राहुल गांधी को देश की एक पिछड़ी जाति "मोदी"  को अपमान जनक गाली देने के मानहानि मामले मे सूरत, (गुजरात) के एक न्यायालय ने दो वर्ष की सजा दी, जिसके कारण उन्हे लोकसभा की सदस्यता से वंचित होना पड़ा!! हालांकि न्यायालय ने उसके आदेश के विरुद्ध ऊंची अदालत मे ले जाने हेतु कुछ ही मिनटों मे उनको  जमानत भी  दे दी। सवाल ये उठता है कि राहुल गांधी ने 2019 मे  किसी जाति विशेष के लाखों लाख व्यक्तियों को अपने भाषण मे "चोर" कह, अपमान जनक टिप्पड़ी से क्यों आहत किया?

इस हेतु हम सब को अपने-अपने बचपन मे झांकना होगा! जब स्कूल मे पढ़ने वाले अपने सहपाठियों और मित्रों से किसी बात पर मतभेद या झगड़ा हो जाने पर सारे लोग एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिये किसी भी हद तक असंयत हो, गाली गलौज, अनर्गल मिथ्या आरोप और रिश्तों को तार-तार करने वाले ब्यानों से बाज़ नहीं आते थे, इस दौरान कभी कभी अकारण ही मारपीट भी कर देते थे। हफ्ते दस दिन के बाद फिर खेलने और आपसी बातचीत मे बड़े ही सहज और मिलनसार हो जाते थे। बचपन से किशोर अवस्था मे से होकर जब हम सभी मित्र अपनी युवावस्था मे मिले  तो अपनी वेवकूफी और मूर्खता पर खूब हँसते थे। क्योंकि समय के अनुसार हमारी सोच और आपसी व्यवहार, वर्ताव  मे परिपक्वता आ चुकी थी जो समय के साथ जीवन मे होने वाले बदलाव मे स्वाभाविक थी, पर बड़ा खेद और अफसोस है कि समय के साथ जो गंभीरता और प्रौढ़ता अधिकतर लोगो मे आ जाती  है, वो परिपक्वता जीवन के 52 वसंत देखने के बाद भी  श्री राहुल गांधी मे आज तक नहीं आ पायी। इसका एक मात्र कारण उच्च धनाढ्य कुल मे चाँदी की चम्मच लेकर पैदा हुए, बड़े नाज़ों नखरे मे पले पढे बच्चों मे होना स्वाभाविक था। पर, यदि अधिकतर भारतीय मध्यम वर्गीय परिवारों मे पले बढ़े बच्चों की तरह हम बच्चों की  ढिटाई पर हमारे माँ बाप की तरह राहुल के परिवार के लोगो ने, उनके भी कान खींचे होते या एकाध चपत लगाई होती तो शायद उनका ऐसा स्वभाव न होता।

राजनीति मे राजनैतिक दलों और उनके नेताओं मे मतभेद होना स्वभाविक है। दलों की  अपने नीतियों और कार्यक्रमों मे मतांतर होना साधारण बात है। इन विषयों पर वाद-विवाद, मतभेद या असहमति होना भी लाज़मी है, पर इन विचार-विभिन्नता के चलते हम किसी विपक्षी के लिंग, जाति, धर्म या संप्रदाय पर कटाक्ष कर शब्दों के माध्यम से उसको अपमानित या तिरिष्कृत  करें तो ये न केवल नैतिक दृष्टि से अपितु कानूनी आधार पर भी अनैतिक है!!, अपराध है!! अन्यथा सूरत के न्यायालय द्वारा उनको बार बार शब्दों, भाषणों या व्यवहार से किसी पिछड़ी जाति को अपमानित करने, गाली देने के अपराध पर उनसे क्षमा-याचना के सुझाव को बारंबार नज़र अंदाज़ करना उनकी हठधर्मिता, अपने आपको औरों से श्रेष्ठ सावित करने की उनकी मानसिकता का ही परिचायक नहीं तो और क्या था? ऐसा नहीं था कि सूरत के माननीय न्यायाधीश का  क्षमा-याचना प्रस्ताव स्वीकारने का सुझाव, उनका पहला प्रस्ताव होता? इससे पूर्व 2018 मे "राफेल" लड़ाकू विमान के मुद्दे पर उन्होने सूप्रीम कोर्ट मे क्षमा याचना कर मामले से छुटकारा पाया था। "चौकीदार चोर है" के अपने वक्तव्य पर भी 2019 मे राहुल गांधी ने माफी मांगी थी। कदाचित सूरत कोर्ट मे भी यदि राहुल माफी मांग लेते तो शायद उन्हे संसद की सदस्यता से वंचित न होना पड़ता और न ही उनकी इतनी फजीती होती! अपने अहंकार और श्रेष्ठता के भाव से ग्रसित होने के कारण वीर सावरकर और संघ सहित  अन्य  मानहानि के ऐसे मामलों मे देश के विभिन्न न्यायालयों मे उनके विरुद्ध वाद लंबित है जिनका समाधान होना अभी शेष है।    

दिनांक 03 अप्रैल 2023 को सूरत के न्यायालय के आदेश के विरुद्ध सेशन कोर्ट से मिली जमानत के बाद उनका ये कहना कि "यह मित्रकाल के विरुद्ध लोकतन्त्र को बचाने लड़ाई है", और "सत्य ही मेरा अस्त्र"!!, उनका घमंड,  दंभ, और एक बचकानी हरकत ही कहा जायेगा अन्यथा देश की एक पिछड़ी जाति को गाली देना, उसके लाखों लाख सदस्यों को अपमानित करने से "कौन से लोकतन्त्र को बचाने की लड़ाई" माननीय "आर्य श्रेष्ठ!!" श्री राहुल गांधी लड़ रहे है? अपने आपको "श्रीमद्भगवत गीता" का पाठक बताने वाले "श्रेष्ठी" राहुल गांधी क्या बताएँगे कि किसी जाति विशेष को आवेश और अशांत मन से "मान भंग" करना कौन सा "धर्म" या  "शास्त्र विहित  लड़ाई" है? समाज के एक  दबे कुचले वर्ग को "चोर" कह अपमानित कर, वे,  "सत्य" के कौन से "अस्त्र" को परिभाषा करना चाहते है?  किसी जाति विशेष को गाली निकालना "लोकतन्त्र की लड़ाई" या "सत्य का अस्त्र" नहीं अपितु उनको बचपन मे मिले उनके कुसंस्कार  और कालांतर मे पुख्ता हुआ उनका अहंकार, हठधर्मिता, उद्दंडता और अशिष्टता ही है?

कॉंग्रेस के प्रौढ़ और परिपक्व अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खड़गे भी न जाने किस  भीष्म प्रतिज्ञा के बशीभूत, हस्तिनापुर के राज सिंहासन के प्रति बचनबद्ध हो, काँग्रेस का हित त्याग, श्री राहुल गांधी की एक जाति विशेष के अपमान और तिरिष्कार रूपी हठधर्मिता के साथ खड़े है? तब फिर काँग्रेस के दूसरे चाटुकार नेताओं से कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे राहुल गांधी को सद् मार्ग की राह दिखाने की हिमाकत कर सके!! चाहिये तो ये था कि काँग्रेस के प्रति सच्ची निष्ठा, समर्पण और वफादारी रखने वाले  राजनैतिक युद्धाभिलाषी  वरिष्ठ नेतागण मिल बैठ, राहुल गांधी को, उनके द्वारा,  समाज के पिछड़ी जाति को कोसने के कृत्य पर क्षमा याचना करा, एक अविवादित विषय को विवादित बनाने के मामले को रफा दफा कर काँग्रेस की  नीतियों और कार्यक्रमों के बलबूते जनता के समक्ष अपना पक्ष रख लोकतान्त्रिक तरीके से अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा की लड़ाई लड़ते!!, लेकिन हा!! दुर्भाग्य!!, ऐसा प्रतीत होता है कि काँग्रेस रूपी कुएं मे मानों भांग पड़ी है जिसके जल का सेवन कर सारे कोंग्रेसी नशे मे मस्त हो, काँग्रेस का अच्छा-बुरा त्याग सिर्फ और सिर्फ एक व्यक्ति श्री राहुल गांधी के अनुचित और उच्छृंखल आचरण के बावजूद, उनके प्रति अपनी प्रतिवद्धता, भक्ति और अनुराग  जताने की दौड़ और  चाटुकारिता, चापलूसी  मे  दूसरों से ज्यादा श्रेष्ठ साबित करने की होड़ मे लगे है।

एक वक्तव्य मे श्री राहुल गांधी को मैंने कहते सुना है कि उन्होने भगवत गीता पढ़ी है, तब सालों साल के संस्कार, सोच और धृति (धारण शक्ति)  से मजबूत हुई  उनकी बुद्धि के बारे मे श्रीमद्भगवत गीता से एक श्लोक को मै, उद्धृत कर रहा हूँ जो कदाचित उनके स्वभाव पर सटीक बैठता है, जिससे वे सहमत हों या न हों पर उससे वे भलिभांति परिचित अवश्य होंगे:-

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ।।अध्याय 18 ,श्लोक 32।।  अर्थात

हे अर्जुन! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को (भी), "यह धर्म है" ऐसा मान लेती है तथा (इसी प्रकार अन्य) सम्पूर्ण पदार्थ को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है।

श्री राहुल जी द्वारा न केवल, देश की एक पिछड़ी जाति को समूहिक रूप से गाली दे, अपमानित करने के "अधर्म" को ही "श्रेयस्कर" धर्म बतलाना अपितु उसको न्यायोचित ठहराने  का कुत्सित प्रयास करना ही, न्यायालय मे उनके आपराधिक कृत्य मे सजा का कारण बना, फिर श्री राहुल गांधी से उम्र की इस दहलीज़ पर अपने स्वभाव मे बदलाव की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।

विजय सहगल     

   

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