रविवार, 23 अप्रैल 2023

सिल्क रूट - गंगटोक (सिक्किम)

 

"सिल्क रूट - गंगटोक (सिक्किम)"









12 नवम्बर 2022 को हमारा कार्यक्रम सिक्किम के एक मात्र औध्योगिक नगर एवं सिक्किम का  प्रवेश द्वार  रंगपो से  जुलूक गाँव होकर नथुला पास जाने का था। पिछले रात की थकान के बाद एक अच्छी नींद लेने के बाद हम लोग प्रातः छह बजे उठ तो गए पर जल्दी प्रस्थान के चक्कर मे प्रातः भ्रमण को स्थगित कर नहाने धोने की तैयारी मे लग गए। जब तैयार होकर होटल छोड़ने के लिए हम लोग होटल बीटल वैली के काउंटर पर सामान के साथ पहुंचे तो काउंटर पर उपस्थित युवती ने अपनी आकर्षक  मुस्कान के साथ प्रातः वंदन कर होटल मे ठहरने और सुविधाओं के बारे मे पूंछा। मेरे द्वारा 1200/- रुपए मे होटल मे एक अच्छे स्टे के लिए उसे धन्यवाद दिया। जब उसने अपने होटल के ट्री हाउस और हैंगिंग वे ब्रिज के घूमने के बारे मे पूंछा जिसके बारे मे मेरे द्वारा  अपनी अनिभिज्ञता प्रकट करने पर उसने एक बार उसके होटल के गार्डेन, वे ब्रिज, ट्री हाउस देखने का विशेष आग्रह किया जिसको मैंने स्वीकार कर अपने सामान को काउंटर पर ही छोड़ पार्क की ओर प्रस्थान किया।

विशेष तौर पर पेड़ों के तने के उपर बने कमरे, होटल वीटल वैली की विशेषता थी। जिन पर छोटी-छोटी सीढ़ियों के माध्यम कमरे के भोजन कक्ष और वही से छोटे लकड़ी और लोहे के तारों के ब्रिज के माध्यम से शयन कक्ष तक पहुंचा जा सकता था। कुछ अन्य रूम, झोपड़ी नुमा वातानुकूलित कमरों को पेड़ों के बीच बनाया हुआ था जो देखने मे सुंदर लग रहे थे। बच्चों के लिए खिलौना गाड़ी, ट्रेन भी रक्खी थी । इस सुंदर वातावरण मे बच्चों को मिलने वाली खुशी का अंदाज़ सहज ही लगाया जा सकता था। इन सब से हट  कर ऊंचाई पर बने लोहे के तारों पर झूल रहे अनेक वे ब्रिज होटल का मुख्य आकर्षण थे, जिसके रोमांच ने मुझे विशेष रूप से आकर्षित किया।  जमीन से लगभग 20 फुट से लेकर 70-80 फुट की ऊंचाई पर विभिन्न  पेड़ों के बीच लोहे के तारों की सहायता से  बनाए गए ब्रिज पर चलना रोमांच भरपूर  और  चुनौती पूर्ण था। यध्यपि  कुछ समय पूर्व  गुजरात के मोरवी मे इसी  तरह के एक बड़े  झूला पुल के टूट कर नदी मे गिरने की घटना हो चुकी थी इसलिये  मेरी श्रीमती जी पहले तो इन झूला पुलों पर जाने से इंकार करती रहीं पर मैं इस साहस और चुनौती  पूर्ण  परीक्षा पास करने के लिए उत्साहित और उत्सुक था। मेरे साहस, हिम्मत और दिलेरी को देख कर वह भी मेरे  पीछे पीछे पेड़ों की सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। फिर क्या था कुछ डर और झिझक के बाद उसमे भी बहादुरी आ गयी और हम लोग उस बीटल वैलि के इस साहसिक खेल पार्क मे लगभग एक-डेढ़ घंटे तक झूलते पुलों  पर  साहसिक गतिविधियों करते रहे।

सुबह का वक्त था बगैर नाश्ता किए निकले थे एक छोटे कस्बे रोंगली मे चाय नाश्ते के लिए रुके एक छोटे से रेस्टुरेंट मे समोसा, कचौड़ी गरम उपलब्ध थी जो स्वाद मे भी ठीक ही थी। ताजा स्पंजि रसगुल्ले ने स्वल्पाहार पर विराम लगा कुछ देर मुंह का  मीठा स्वाद बनाये रक्खा।   सिक्किम मे सरकार और लोग पर्यावरण के मामले मे काफी जागरूक और संवेदनशील है इसलिए यहाँ 2 लीटर से छोटी कोई भी पानी की बोतल बिक्री के लिये किसी भी दुकान पर उपलब्ध नहीं होती। आदेश की अवेहलना पर पुलिस द्वारा जुर्माने की सख्त कार्यवाही होती है। पर्यटक और पानी बिक्री करने वाले व्यापारी, दोनों  से जुर्माना बसूला जाता है। जब मैंने दुकानदार से 2 लीटर पानी की बोतल चाही तो बोतल होने के बावजूद दुकानदार ने नहीं दी। कारण पूंछने पर उसने जो कहा वो चिंतनीय था। उसने कहा हम बिहार के दूकानदारों को पाँच लीटर से नीचे बोतल बेचने पर भी पुलिस धमकाती है और परेशान करती है। यदि ऐसा है तो सिक्किम प्रशासन के लिये आत्मचिंतन का विषय होना चाहिये?

आगे रास्ते मे एक बहुत ही सुंदर और शानदार झरना "पधमचीन" देखने को मिला। जो ऊंचे पहाड़ों से एक पतली धारा के रूप मे अवतरित हो पानी की फुहारे दूर दूर तक विखेर रहा था। पहाड़ों की चोटियों से निकला पानी जब नीचे एकत्रित हो आगे वह रहा था तो एक दम काँच की तरह साफ और पारदर्शी था। सड़क से निकलने वाले वाहन मे बैठे लोग इस पानी को पीने के लिये भर रहे थे। खनिज पदार्थों से युक्त ये साफ पानी प्रकृति प्रदत्त अमूल्य उपहार हम सब को निशुल्क उपलब्ध हो रहा था। इच्छा  तो थी खुली और चमकदार  धूप स्नान के साथ झरने से निकाल रहे शीतल और शुद्ध पानी से स्नान कर लिया जाये पर आप तो जानते ही है भारत के गृह मंत्रालय की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता तो मै तो एक छोटा अकिंचन व्यक्ति जो ठहरा!! पर हाँ झरने के किनारे बन रही गरमा गरम मैगी का लोभ संभरण न कर सका और बहते पानी के बीच एक बड़ी चट्टान पर बैठ कर धूप के साथ मैगी खाने का एक अवस्मरणीय  आनंद जरूर  उठाया।

अब हमारी अगली मंजिल थी तिब्बत से सिल्क के व्यापार के रास्ते के एक पढ़ाव "जुलूक" गाँव तक पहुँचने की थी।  प्राचीन भारत मे देश के राजे रजवाड़ों, व्यापारियों और धन सम्पन्न परिवारों मे सिल्क और उसके कपड़े के आकर्षण किसी से छुपा नहीं है। उन दिनों चीन ही एक मात्र देश था जहां से सिल्क धागे और उसके अन्य उत्पाद भारत मे इसी रास्ते आते थे जिसका उल्लेख उल्लेख प्राचीन साहित्य और किस्से कहानियों मे काफी मिलता है। जुलूक गाँव इस सिल्क व्यापार के रास्ते का एक अहम पढ़ाव था, जहां भारतीय और चीनी  व्यापारी कुछ विश्राम,  विराम के पश्चात अपनी आगे की यात्रा करते थे। लगभग 700 लोगो की आबादी वाले   इस जुलूक गाँव से नथुला दर्रा लगभग 45 किमी॰ दूर स्थित है जो चीन की सीमा से लगा हुआ है। मुख्य सड़क से नीचे पैदल उतर कर हम लोग एक स्थानीय होम स्टे मे रुके। स्थानीय निवासियों द्वारा संचालित होम स्टे देश, काल के अनुसार ठीक था। शाम की चाय, रात्री भोजन और प्रातः के ताजे और गरम  स्वल्पाहार ने इस होम स्टे की सार्थकता पूर्ण रूपेण सिद्ध कर दी। सूरज ढलते ही सर्दी ने अपना प्रकोप दिखाना शुरू कर दिया जिसने हमे विस्तर के अंदर रहने को मजबूर कर दिया। विस्तर मे ही खाने के बाद न्यनतम जल से आचमन और हस्त प्रक्षालन कर की ठंडी से जूझते हुए विस्तर मे ही मुंह ढँक कर ऐसे सोये कि प्रातः छह बजे बाद ही विस्तर छोड़ा। सारी रात निस्तब्ध शांति के बीच कभी कभार श्वान के भौंकने की आवाज सुनाई दे जाती अन्यथा गाँव मे  मुर्गे की वांग से सुबह की जगाहट हुई। सर्दी इतनी थी कि दीर्घ और लघु संकाओं के निवारण पश्चात जल की कुछ बूंदे शरीर पर छिड़क अपने शरीर को पवित्रता के भाव से स्नान कर आगे की यात्रा के लिये प्रस्थान किया।

प्रातः होम स्टे की संचालिकाओं से उनके सुंदर आथित्य और स्वादिष्ट भोजन के लिये धन्यवाद ज्ञपित कर जब आगे बढ़े तो रात मे गिरी  हल्कि फुल्कि बर्फ रास्ते मे दिखाई दी। एक ही पहाड़ के सर्पीले रास्ते से होकर लगभग 13-14 किमी॰ का रास्ता तय करना एक सुखद रोमांच देने वाला था। पहाड़ी रास्ता इसलिये और भी सुंदर दिखाई दे रहा था क्योंकि पहाड़ी रस्तों से दायें-बाएँ होते हुए, एक  सड़क के ऊपर दूसरी और दूसरी के ऊपर तीसरी सड़क स्पष्ट नज़र आ रही थी। जब पहाड़ की चोटी पर पहुँच नीचे का विहंगम दृश्य देखा तो खुशी का ठिकाना न रहा। सारी सड़के एक के नीचे एक लहराती बलखाती नज़र आयी। समुद्र ताल से लगभग ग्यारह हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित लगभग 28-30 हेयर पिन कर्ब दिखाई दे रहे थे। प्रकृति और मानव निर्मित ये सुंदर नज़ारा पहाड़ी के शीर्ष चोटी से दिखाई दे रहा था। काफी कोशिश के बावजूद मै  अपने मोबाइल कैमरे से सड़क के  10-12 मोड़ को ही कैद कर सका।

इस पहाड़ी के उच्चतम बिन्दु पर स्थित थंबी व्यू पॉइंट से कंचनजंगा की चोटियों के मनोहारी दृश्य अप्रितम और अद्व्तिय थे। प्रकृति द्वारा हिमालय की कंचनजंगा चोटी  के श्रंगार पर सूर्य की सुनहरी रश्मियों का प्रकाश सोने पर सुहागा की कहावत को चरितार्थ कर रहा था, जो देखते ही बनता था। यध्यपि जुलूक यात्रा मेरे भ्रमण कार्यक्रम मे नहीं थी पर मेरे वाहन के  सारथी श्री बालकिसन अधिकारी के सुझाव और निर्देशानुसार जुलूक गाँव के भ्रमण को आखिरी वक्त शामिल किया। यहाँ के लिये आवश्यक परमिट की व्यवस्था भी बालकिशन जी ने कर, इस  सिल्क रूट पर स्थित जुलूक गाँव की यात्रा को एक अवस्मरणीय यात्रा बना दिया।

विजय सहगल                 

                    

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