शनिवार, 25 मार्च 2023

बाबा हरभजन सिंह मंदिर-सिक्किम

 

"बाबा हरभजन सिंह मंदिर-सिक्किम"







13 नवम्बर 2022 को सिक्किम के जुलूक गाँव से प्रातः आठ बजे प्रस्थान हो चुका था। रात मे पूरे क्षेत्र मे थोड़ी से बर्फ पड़ चुकी थी। पूरे साल सर्दी वाले इस क्षेत्र मे थोड़ी और सर्दी  बढ़ा दी थी। नरम बर्फ के कारण कहीं कहीं गाड़ी के टायर फिसलने से थोड़ी चिंता जरूर हो रही थी कि यात्रा मे आगे ज्यादा व्यवधान न हो। पर ईश्वर की कृपा रही आगे कोई बहुत ज्यादा समस्या नहीं आयी।

दूर पहाड़ी  पर चटक रंग-बिरंगी  चमकती कुछ इमारतों दिखाई दी जो बाबा हरभजन सिंह के मंदिर की इमारतें थी। यूं तो देश मे अनेक देवी, देवताओं के मंदिर है पर देश मे ये एक मात्र मंदिर है  जो किसी सैनिक के नाम से नाथुला दर्रे के पास भारत चीन की सीमा के नजदीक बना है। जहां पर न केवल सैनिक बल्कि  दूर दूर से लोग अपने इस इस बहादुर सैनिक के दर्शन हेतु आते है। ऐसी मान्यता है कि बाबा हरभजन सिंह अपनी शहादत के बाद भी अपनी नौकरी कर रहे है।  इन सर्दीली हवाओं के बीच आज हमारी यात्रा का लक्ष्य भी  भारत चीन सीमा के नजदीक स्थित बाबा हरभजन सिंह जी के मंदिर के दर्शन करना था। बाबा हरभजन सिंह की कहानी बड़ी अद्भुद और आश्चर्य करने वाली है। 30 अगस्त 1946 गुज़राबाला (आज के पाकिस्तान) मे जन्मे बाबा हरभजन सिंह फरवरी 1966 मे भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट मे सिपाही के रूप मे भर्ती हुए थे। 1968 मे अपनी पूर्वी  सिक्किम पदस्थपना के दौरान एक दिन सेना के कुछ घोड़ों के काफिले के साथ सेना की एक पोस्ट पर जा रहे थे। अचानक पैर फिसलने पर वे नीचे बह रहे एक नाले मे गिर गये। उनका शव पानी की तेज धाराओं से घटना स्थल से 02 किमी॰ जा पहुंचा। लगातार पाँच दिन की कोशिश के बाद जब उनका कोई पता न चला तो उनको लापता घोषित कर दिया गया। तभी एक आश्चर्य चकित अद्भुद घटना घटी। उनके एक साथी को सपने मे बाबा हरभजन सिंह ने अपनी मृत्यु का घटना क्रम बता अपने मृत शरीर के स्थान की जानकारी दी और अपनी समाधि बनाने की ईक्षा व्यक्त की!! पहले तो सेना के अधिकारियों को सपने के इस घटना क्रम पर विश्वास नहीं हुआ पर जब  कुछ सैनिक उस स्थान पर पहुंचे तो देख हैरान थे कि सपने वाले स्थान पर ही सिपाही हरभजन सिंह का पार्थिव शरीर पड़ा मिला। इसके चलते ही सैनिक अधिकारियों ने उनके मृत शरीर की अन्त्येष्टि कर उस स्थान पर समाधि का निर्माण किया जो आज बाबा हरभजन सिंह के मंदिर के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि मृत्यु के बाद भी बाबा हरभजन सिंह पूरी मुस्तैदी के साथ अपनी ड्यूटि करते है और चीनी सैनिकों की गतिविधियों पर अपनी पैनी नज़र रखते है और समय समय पर अपनी यूनिट को सतर्क भी करते है। इन्ही सब गतिविधियों के कारण लोगो और सैनिकों की आस्था और विश्वास बाबा हरभजन सिंह के प्रति और भी प्रगाढ़ एवं मजबूत हो गया। सेना द्वारा भी अन्य सैनिकों की तरह हरभजन सिंह को वेतन, छुट्टी, वेतन वृद्धि सहित अन्य सैनिक सुविधाएं उनकी शहादत के बावजूद भी प्रदान की जाती रहीं लेकिन अब वे सेवानिवृत्त हो चुके है।  एक शहीद  सैनिक के प्रति श्रद्धा और सम्मान का अपने आप मे एक इकलौता उदाहरण है जब सेना द्वारा अपने इस बहादुर शहीद सैनिक को  लगातार वेतन भत्ते और अन्य सुविधाओं के साथ मरणोपरांत कैप्टन की उपाधि से भी सुशोभित किया।      

भारत चीन सीमा पर काली चमकदार डम्मर की पक्की सड़कों को देखना मन को सुकून और सुरक्षा का अहसास देने वाला था। एक ऊंची छोटी पहाड़ी पर बाबा हर भजन सिंह की छोटी से बंकर  को आज भी जस के तस अक्षुण्ण रक्खा गया है जिस पर  छोटी छोटी 20-25 सीढ़ियों से होकर पहुंचा जा सकता है। बमुश्किल 8x6 फुट की बंकर  मे एक तरफ उन की  चारपाई पर साफ सुथरी करीने से लगी शैया सजी थी उसके विपरीत दीवार पर उनकी प्रेस की हुई वर्दी व नीचे रैक मे पॉलिश किए हुए चमकदार शूज रक्खे थे। ऐसा बताया गया कि हर रोज उनकी वर्दी पर प्रेस और जूतों पर पॉलिश कर चारपाई की विच्छावन को एक सा रक्खा जाता है जो दूसरे दिन कुछ गुढ़ी-मूढ़ी अवस्था मे सिलवट लिए मिलती है। ऐसी मान्यता है कि बाबा हरभजन सिंह आज भी सीमा की निगरानी के बाद विश्राम के लिए अपनी बैरक मे अब भी  आते है। बैरक के नीचे ही उनका मंदिर बनाया गया है ऐसी किवदंती है कि मंदिर मे  पानी की बोतल अर्पित करने के बदले मिली बोतल के पानी को सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ 21 दिन बाद उस जल के सेवन से कई तरह की बीमारियाँ दूर हो जाती है। इस पुराने मंदिर से निकलने वाला हर वाहन यहाँ रुक कर बाबा को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करता है।

हर रविवार और अन्य धार्मिक त्योहारों पर बाबा हरभजन सिंह के इस मंदिर पर लंगर का आयोजन किया जाता है। सौभाग्य से आज भी जब हम यहाँ से निकले तो प्रातः से ही आयोजन की तैयारी हो रही थीं। सेना की गाड़ियों के काफला सड़क के एक ओर खड़ा था जिसमे लंगर का राशन और रसद रक्खा हुआ था। टेंट लगाए जा चुके थे। कुछ सैनिक हमारे सहित, हर आने जाने वाले वाहनों को चाय, टोस्ट, बिस्कुट तथा मैगी को प्रसाद के रूप मे बड़े सम्मान और आदर के साथ वितरित कर रहे थे। हम धनभागी थे कि गुरु के इस लंगर मे सहभागी होने का हमे सौभाग्य प्राप्त हुआ।

यात्रियों, श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुविधा के लिये 11 नवम्बर 1981 को   इस पुराने मंदिर के स्थान से 9 किमी॰ आगे नथुला दर्रे की ओर  बाबा हरभजन सिंह के  एक नए मंदिर का निर्माण कराया गया है क्योंकि यहाँ तक आने के लिये पर्यटकों को पर्मिट की आवश्यकता होती है।        

जब आज के समय हमारे सुरक्षा कर्मी कितनी विपरीत और कठिन परिस्थितियों मे देश की सुरक्षा के जज्बे के साथ अपने कर्तव्य मे रत है तब सोंचे कि आज सी 55 वर्ष पूर्व बाबा हरभजन सिंह अपने सैन्य साथियों के साथ कितनी असुविधाओं और संसाधनों के बिना भी देशभक्ति के जज्बे के साथ कैसे देश की सीमाओं की रक्षा करते होंगे। बाबा हरभजन सिंह जी के इस मंदिर के बारे मे मैंने पढ़ा था जब मै दस वीं का छात्र था। आज इस मंदिर के दर्शन बचपन मे पली अभिलाषा के पूर्ण होने का संकल्प था। मै बाबा हरभजन सिंह जी को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर उनकी बहदुरी और देशभक्ति को नमन करता हूँ।

विजय सहगल    

 

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति