शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

स्व॰ प्रभाष जोशी

 

"स्व॰ प्रभाष जोशी"

 


घर मे बचपन से अखबार आते देख कुछ ऐसी आदत बन गई थी कि हर उम्र और स्थान के हिसाब से अलग अलग समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के संपर्क मे रहा। बचपन मे झाँसी मे सन् 1965-66 मे  एक दो अखबार निकलते जरूर थे पर प्रसार संख्या की दृष्टि से दैनिक जागरण मुख्य समाचार पत्र था। दैनिक भास्कर और दैनिक मध्य देश भी निकलता था लेकिन कम कीमत और कम पेज  के कारण  ये अखबार हेअर कटिंग सेलून अर्थात नाइयों की दुकान, टी स्टॉल, छोटे हॉकर  के अखबार माने जाते थे जो उनकी दुकान पर आने वाले ग्राहकों द्वारा सुबह से शाम तक पढ़ कर जिनका पूरा कचूमर निकाल लिया जाता था जिनको बाद मे पौंछा या सामान की पुड़ियाँ बना कर उपयोग किया जाता। उन तीनों दैनिक समाचार पत्रों मे कोई ऐसा  प्रभावशाली लेखक या संपादक नहीं था जो  अपनी लेखनी का प्रभाव छोड़ सके या  जिन्हे उनकी लेखनी के कारण स्मरण किया जा सके।

साहित्यिक पत्रिकाओं मे धर्मयुग एवं साप्ताहिक हिंदुस्तान प्रसिद्ध थे जो सामान्य पाठकों की पहली पसंद थी। "नवनीत" "सरिता", निहारिका भी अच्छी साहित्यिक पत्रिकाओं मे सुमर थी लेकिन इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका "मनोहर कहानियाँ" प्रचार प्रसार मे नंबर एक थी पर इस पत्रिका को श्रेष्ठी परिवारों मे सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था। सत्य घटनाओं पर आधारित कहानियों के घटना क्रम को इतना मिर्च-मसाला लगा कर परोसा जाता मानों लेखक पूरे घटनाक्रम मे दिव्य अलौकिक दृष्टि के साथ हमेशा अदृश्य रूप से पूरी घटना का साक्षात चश्मदीद गवाह रहा हो!! प्रबुद्ध और बुद्धिजीवी, राजनैतिक घटना क्रम का सार समेटे साप्ताहिक पत्रिका "दिनमान" पत्रिका काफी पॉप्युलर थी। नेहरू पुस्तकालय झाँसी मे पाठकों के बीच अन्य पत्र पत्रिकाओं एवं समाचार पत्र बड़ी डिमांड मे रहते थे इसके विपरीत दिनमान पत्रिका,  उपस्थित पाठकों के बीच यूं ही कभी भी पढ़ने के लिये उपलब्ध रहती थी जिसकी डिमांड न के बराबर थी।  उम्र के विकास के साथ साप्ताहिक पत्रिका "रविवार"  और भारत मे आपातकाल के दौरान मुंबई से प्रकाशित साप्ताहिक ब्लिट्ज़  ने भी खूब वाहवाही बटोरी रविवार जिसके संपादक  शायद उदयन शर्मा एवं ब्लिट्ज़ के संपादक रूसी करंजिया थे। यध्यपि झाँसी मे  मैथली शरण गुप्त, स्व॰ वृन्दावन लाल वर्मा जैसे विश्वस्तरीय कवि और लेखक दिये लेकिन झाँसी शहर के समाचार पत्र तब से आज तक कोई साहित्यिक वातावरण या गोष्ठियों के आयोजन कराने मे असफल और निष्फल रहे जो समय समय पर लेखकों, कवियों और साहित्यिक मनीषियों के उत्साहवर्धन मे उत्प्रेरक का कार्य कर सकती थी।

उन दिनों कॉलेज स्तर पर 1975 मे जब देश के संविधान को ताक पर रख आपात काल घोषित किया तो साप्ताहिक बिलिट्ज़ जो श्री आर के करंजिया के संपकीय निर्देशन मे निकलता था एवं जनसत्ता जो कि प्रभाष जोशी जी के प्रधान सम्पादकत्व और निर्देशानत्व मे छापता था, के संपर्क मे आया। उन दिनों अधिकतर अखबारों श्रीमती गांधी के सामने शष्टांग दंडवत थे या बलपूर्वक करा दिये गए थे।  लेकिन तत्कालीन सरकार के अवैधानिक कुकृत्यों के विरुद्ध किसी संपादक ने देश और देशवासियों के प्रति अपनी निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता, ईमानदार लेखन और अनासक्त भाव से  कर्मण्येवाधिकारस्ते...... के आदर्श सूत्र वाक्य के माध्यम से अपनी कर्तव्यों  का निर्वहन जिस ज़िम्मेदारी के साथ किया उसकी मिसाल स्व॰ प्रभाष जोशी के रूप देखने को मिलती है। मै श्री प्रभाष जोशी से कभी मिला नहीं, कभी देखा नहीं, दुर्भाग्य से उनकी फोटो को  भी उनके देहावसान के बाद देखने को मिली पर जनसत्ता मे उनकी लेखनी का मै बड़ा कायल था। बाद के वर्षों मे भी प्रभाष जोशी जी  के संपादकत्व मे जनसत्ता ने एक अलग पहचान बनायी। जनसत्ता और प्रभाष जोशी के लेखों के प्रति मेरी इतनी आसक्ति थी कि मैंने लंबे समय तक संपादकीय परिशिष्ट नियमित तौर पर पढता रहा था।

अस्सी के दशक मे जब पंजाब मे उन दिनों खालिस्तानी  आतंकवादियों का बोलबाला था। पंजाब केसरी दैनिक के संस्थापक सदस्य लाला जगत नारायण जैसे सच्चे देशभक्त और निडर पत्रकार की 9 सितम्बर 1981 को इन आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी। तब प्रभाष जोशी ने जनसत्ता मे अपने लेख के माध्यम से उन आतंकवादियों को खुली चुनौती देते हुए उन के कायरता पूर्ण, अधम कृत्यों  की निंदा करते हुए उन्हे ललकारते हुए लिखा था कि "तुम मे हिम्मत हो तो उनकी हत्या करके दिखाओ"। उन्होने लिखा था, "मै किसी सुरक्षा दस्ते के बिना अपने घर और कार्यालय मे रहता हूँ"। उन दिनों पंजाब के उन आतंकवादियों को इस तरह की चुनौती एक दुस्साहस ही कहा  जायेगा। लेकिन श्री प्रभाष जोशी की पैनी लेखनी के साहस और दिलेरी के ऐसे अनेकों किस्से थे, उन्होने अपनी लेखनी मे  सत्य और निर्भीकता के उच्चतम मानदंड तय कर रक्खे थे। उनकी कलम को आज के पीत  पत्रकारिता से तुलना "सूरज" और "दिये" की तुलना होगी।

उनकी पत्रकारिता मे निर्भीकता की एक बानगी उनके एक लेख मे देखने को मिली जब उन्होने एक स्वर्गीय पूर्व प्रधानमंती के नैतिक चरित्र पर लांछन लगाते उन पर परस्त्रीगमन का आरोप लगा उन्हे खुली चुनौती दी थी  कि, "हिम्मत है तो उन पर मानहानि का दावा लगाएँ!!"  "कागद कारे साप्ताहिक स्तंभ के अंतर्गत बिना किसी अधिसूचित विषय पर जो मन मे आये लिखने की नीति ने  उनका "कागद कारे" स्तंभ को जितनी प्रसिद्धि मिली वो एक मिसाल थी।   उनकी लेखनी की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम होगी। उनकी लेखनी एक साधारण भारतीय जनमानस की आवाज की अभिव्यक्ति थी। उनका क्रिकेट के प्रति लगाव तो आश्चर्य जनक था मानों वे एक सिद्धहस्त खेल संपादक हों। मैंने कभी  क्रिकेट के विषय मे कभी कोई स्तंभ या समाचार दिल्चस्वी लेकर नहीं पढा, पर प्रभाष जोशी जी के सचिन तेंदुलकर , गावस्कर और उनके क्रिकेट पर लिखे लेखों को मैंने अपनी अभिरुचि के विरुद्ध जा कर प्रत्येक लेख को दिल्चस्वी लेकर पढ़ा। उनकी लेखनी की भाषा शैली ही कुछ ऐसी थी कि बगैर पढे नहीं रहा जाता था।

मै कभी भी महानायक श्री अमिताभ बच्चन के अभिनय का कोई बहुत बड़ा प्रशंसक नहीं रहा, पर श्री  प्रभाष जोशी जी द्वारा जनसत्ता मे प्रकाशित लेख मे  उनकी कंपनी एबीसी लिमिटेड पर सरकारी कर अदायगी का दोषी ठहराये जाने के बाद दिवालिया घोषित होने के उपरांत कैसे अपने धन संपत्ति और घर जायदाद को गिरमी रख टैक्स  की एक-एक पायी चुकाने के कृत की भूरि भूरि प्रशंसा की थी जिससे  मै काफी प्रभावित था।

1988-89 मे मै अपनी सागर, मध्यप्रदेश  पदस्थपना के दौरान, स्थानीय समाचार पत्र मे अंशदान के बाद जनसत्ता समाचार पत्र के संपादक श्री प्रभाष जोशी जी की लेखनी के आकर्षण के कारण उक्त समाचार पत्र को शाखा का हिस्सा बनाया था क्योंकि दिल्ली से आने कारण उसका वितरण दिन मे बारह-एक बजे के बाद ही संभव  होता था। हाँ रविवार के साप्ताहिक अंक मे "कागद कारे"  कॉलम के आकर्षण के कारण मैंने पेपर हॉकर से विशेष अनुरोध कर रविवार का समाचार पत्र अपने घर मे मँगवाता था जो शाखा के नजदीक ही स्थित था। रविवार के अंक की  1-2 घंटे के  अध्यन  की तुष्टि से मिली संतुष्टि के कारण छुट्टी की सार्थकता सिद्ध हो जाती थी।

आज यों ही उनका स्मरण हो आने के कारण मै उन्हे स्मरण कर उन्हे  भवभीनि श्रद्धांजलि, अदरांजलि  अर्पित कर उन्हे और उनकी लेखनी को  नमन करता हूँ।

विजय सहगल

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बहुत सुंदर शब्दों व विश्लेषणों से आपने १९७५-७६ के अख़बारों को जीवंत कर दिया ।प्रभास जोशी जी के व्यक्तित्व जिसको उनके संपादकीय से ही परिचय प्राप्त किया था आँखों के सामने आ गया। आपकी लेखन शैली का भी क़ायल हो गया।

P.c.saxena ने कहा…

समसामयिक विषय पर उचित टिप्पणी लिखना निर्भय और निडर पत्रकार का ही काम होता है ऐसे लोगों में श्री जोशी जी का नाम भी शामिल है