शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

संकुआं कुंड-सेवढ़ा (जि॰ दतिया-मध्यप्रदेश)

 

"संकुआं कुंड-सेवढ़ा (जि॰ दतिया-मध्यप्रदेश)"









कभी कभी छोटे से गाँव कस्बों मे भी कोहनूर हीरा रूपी प्राकृतिक रमणीय स्थान देखने को मिलते है जिसे ईश्वर ने अपने   प्राकृतिक उपहारों, दैवीय सुंदरता रूपी आशीर्वाद से कृतार्थ किया होता है ऐसे ही एक स्थान का यहाँ हम उल्लेख करेंगे वो है "संकुआं कुंड"!! इस स्थान को देखने की इच्छा काफी दिनों से थी पर सुयोग 29 जनवरी 2023 को बना। चिंता ये थी कि "संकुआं कुंड"!! तक का 75 किमी॰  मार्ग कैसा होगा? कहीं एक मार्गी या कच्चा रास्ता तो नहीं? पर आधे रास्ते मे संगीत सम्राट तानसेन की जन्म और साधना स्थलि बेहट  थी तो इतना तो विश्वास था कि बेहट तक का रास्ता तो ठीक होना चाहिये क्योंकि प्रति वर्ष होने वाले विश्व प्रसिद्ध संगीत समारोह के तीसरे दिन की सभा यहाँ ही आयोजित होती है जिसमे प्रदेश की  राजनैतिक हस्तियों, प्रशासन के आला अधिकारियों के साथ देश के मूर्धन्य संगीतकार और शास्त्रीय गायक यहाँ अपनी हाजरी देकर तानसेन जी को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते है।    जैसा सोचा था, सड़क उससे भी अच्छी थी। बेहट से आगे का मार्ग भी भिंड जिले से होकर "संकुआं कुंड" तक जाता है, वो भी न केवल अच्छा था बल्कि इस दोहरे मार्ग मे ट्रैफिक न के बराबर होने के कारण ड्राइविंग तनाव रहित सुखद अहसास लिए थी। जिला दतिया मध्यप्रदेश के सेवढ़ा तहसील मे स्थित "संकुआं कुंड" सिंध नदी के मुहाने पर स्थित है।

"संकुआं कुंड" मे प्रवेश करते ही कार, जीप और अन्य छोटे वाहनों की लाइन लगी देख मन मे जिज्ञासा हुई कि आखिर इतने कम ट्रैफिक के बावजूद लाइन लगाने का क्या औचित्य? तब ज्ञात हुआ कि आगे अग्रेजों के जमाने का पुरानी विरासत कालीन, स्वतन्त्रता पूर्व निर्मित,  अति संकरा देशी रपटा अर्थात एकल  मार्गीय चूने और पत्थर से निर्मित पुल तक ही  भिंड और ग्वालियर से आने वाली बसें एवं अन्य बड़े वाहन "संकुआं कुंड" के लिए यहाँ तक ही आ सकते है।  सिर्फ  कार, जीप और अन्य हल्के चार पहिया और दो पहिया वाहन ही पुल से होकर दूसरी तरफ आ-जा सकते है। जब एक ओर से कार और अन्य छोटे वाहन छोड़े जाते तो दूसरी ओर से आ रहे किसी भी तरह के वाहनों को दूसरी तरफ से रोक दिया जाता है। सिंध नदी पर बना हुआ यह पुल ही भिंड और दतिया जिले के इस "संकुआं कुंड" को जोड़ता है। पुल के  इन दोनों छोरों के बीच ही "संकुआं कुंड" स्थित है। ऐसा नहीं था कि विकास का सेतु स्वतन्त्रता के 75 वर्ष पश्चात भी इस दोनों किनारों को जोड़ने वाला  एक आधुनिक पुल न दे सका हो? ऐसा भी नहीं था कि पुल रूपी विकास की बयार के  चरण यहाँ न पड़े हों पर भ्रष्टाचार की बुनियाद पर खड़ा यहाँ बना पक्का, सीमेंट और रेत से बना  आधुनिक  पुल 4 अगस्त 2021 की बाढ़ मे, कम सीमेंट और अधिक रेत के कारण  बह गया।

अपनी बारी की प्रतीक्षा के बाद हम अपनी कार को मंथर गति से चलाकर पुल के उस पार पहुंचे। लगभग 200 मीटर लंबे पुल के नीचे बह रही सिंध नदी को देख नहीं लगा कि इसके नजदीक ही जल प्रपात है जो संकुआं कुंड मे गिरता है। पुल के दूसरी ओर सिवाय स्थानीय नागरिकों के अलावा पर्यटकों या दर्शकों की कोई बहुत ज्यादा आमद नहीं थी। एक दो पान और गुटके की गुमटी के अतिरिक्त कोई चाय-पानी या खान पान का इंतजाम नहीं था। वो तो अच्छा था कि हम लोग अपने साथ  खाना-पानी का प्रबंध कर चले थे अन्यथा स्वल्प या दीर्घ आहार का यहा कोई इंतजाम नहीं था। स्थानीय रहवासी बीड़ी, पान तंबाकू के साथ पत्ते खेलने मे व्यस्त थे। लगभग एक-डेढ़ बजे का वक्त था घूमने के पूर्व सभी ने पेट पूजा करने का निश्चय किया ताकि घुम्मकड़ी के लिए कुछ अतिरिक्त ऊर्जा का संचय किया जा सके।

जल प्रपात की गूंज तो सुनाई दे रही थी पर प्रपात के दर्शन अभी दूर थे। किनारे से जैसे जैसे हम लोग जलप्रपात की ओर बढ़े तो इस अप्रितम अविश्वसनीय, अति सुंदर जल प्रपात की धाराओं को बड़े वेग और गर्जना के साथ बहता देख एकटक देखता ही रह गया। जल कुंड का भ्रमण कराने के लिये उपलब्ध एक मात्र नाव से सैर करने के विचार ने ही रोमांच से भर दिया। नाव के नाविक श्री पंकज जो कि एक 22-23 वर्ष का शालीन नवयुवक एक  कुशल नाविक भी  था, जिसने हमारे परिवार के सदस्यों को सुरक्षा की दृष्टि से 4-4 की संख्या मे नाव की सैर कराने के आमंत्रण दिया। ऐसा माना जाता है कि एक ही नाव मे बैठ कर  मामा भांजे नदी मे यात्रा नहीं करते अतः पहली बारी मे मै अपनी पत्नी और बहिनों के साथ नाव मे सवारी के लिए तैयार था। पहाड़ी से नीचे उतर, घाट से हम लोग नाव मे सवार हुए। जिस जलप्रपात की गर्जना दूर से इतनी तेज़ थी अब हम उसके नजदीक, बिल्कुल नजदीक जाने वाले थे। 

जब पंकज ने हम लोगो को बैठा कर, अपनी नाव को कुंड मे गिर रहे प्रपात की ओर खेना शुरू किया तो रोमांच के साथ मन के किसी कोने मे जल धाराओं के नजदीक जाने पर डर भी लग रहा था। पानी की धाराओं का शोर कानों की पर्दों को बेधने को तत्पर था। धाराओं के किनारे से निकलती नाव मे आपस की बातचीत भी  एक दूसरे को सुनाई नहीं दे रही थी। कुंड मे गिर रहे जल धाराएँ, कुंड से उठ रहे   सफेद झाग से, दूध के सागर सा अहसास करा रही थी। पंकज ने जिस कुशलता और प्रवीणता से नाव को खे कर  जल धाराओं के  3-4 मीटर की दूरी से निकाल शिव मंदिर पर किनारे लगाया तो हम सभी उसकी सुघड़ और निपुण  नाव चालन की तारीफ किए बिना न रह सके। कुछ ही मिनटों मे हम जल प्रपात के दूसरे छोर पर थे। नाव से उतर मंदिर मे शिवार्चन कर हम लोगो मंदिर की छत्त से जल प्रपात का सौन्दर्य देखने लगे। जलप्रपात से निकल रही धाराओं से उठ रही नन्हें नन्हें जल की फुहारे हम पर्यटकों का स्वागत ऐसे कर रही थी जैसे पाणिग्रहण संस्कार मे शामिल अतिथियों का स्वागत मानों क्षत्रों मे भरे गुलाब जल छिड़क कर किया जा रहा हो। छत्त पर से वॉटर फॉल को निहारना ऐसे था  मानों साक्षात ईश्वर रचित नितांत रमणीय, नयनाभिराम रचना के माध्यम से परमात्मा से  साक्षात्कार कर रहे हों। पुनः एक बार मंदिर के घाट से नाव मे सवार हो कुंड की शांत जल धाराओं पर नाव से डोलना मन को  आनंद, सुख और हर्ष देने वाले क्षण थे। कुछ आगे बढने पर पतली पतली स्लेट रूपी चट्टानों से बनी एक प्रकृतिक आर्क या दरवाजा दिखाई दिया जो माल्टा देश के सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र अजूर विंडो से मिलता जुलता था। कुंड के चारों ओर छोटे बड़े अनेकों मंदिर बने हुए थे। कहते है कि बरसात के समय कुंड के चारों ओर पानी की विशाल जलराशि से "संकुआं कुंड" का सौन्दर्य देखते ही बनता है।

नाव भ्रमण के बाद कुंड के इस छोर पर जाने की अभिलाषा को मै न रोक सका और छोटी और फिसलन भरी जल धाराओं के बीच पैदल पैदल चल पड़ा। चट्टानों पर लगी काई के कारण अत्यधिक  फिसलन थी फिर भी पैरों को मजबूती के साथ जमाते हुई धीरे धीरे धाराओं को पार किया। कुछ दूर सूखी चट्टानों से होते हुए जा मुख्य जलप्रपात के इस  छोर पर पहुंचा!! यहाँ से जलप्रपात का अनुभव भी बैसा ही था जो दूसरी  तरफ से महसूस हुआ था।  मुख्य धारा से कुछ हट कर बने घाट पर बच्चे तैरते हुए नहा रहे थे। एक बारगी तो मन मे आया कि कपड़े उतार कर इन बच्चों के साथ तैरने का आनंद लिया जाये!! पर तब तक बच्चे घाट से जा चुके थे। तैरना जानने के बावजूद भी एक अंजान और सुनसान जगह पर घाट पर तैरना मैंने उचित नहीं समझा। उपर से चट्टानों की छत्त के नीचे बने मंदिर, दलानों को देखना भी कौतूहल से कम न था, किस तरह चट्टानों को नीचे-नीचे काट कर मंदिर और शैल आश्रय बनाना किसी पुरुषार्थ से कम न रहा होगा।

मध्यप्रदेश एक ओर जहां "संकुआं कुंड" के प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारना सुखद था पर वही  घाट पर जगह जगह पान मसाले, खैनी-तंबाकू की पीक, सैम्पूं और तेल के खाली पाउच से फैली गंदगी को देख कर मन आत्मग्लानि से भर गया। यहाँ आने वाले स्थानीय नागरिकों और बच्चों की इस लापरवाही से मन व्यथित था। दुर्भाग्य से स्थानीय निवासियों, जन प्रतिनिधियों, शासन प्रशासन की अक्रियाशीलता, अकर्मण्यता, निष्क्रियता और अकुशलता  के कारण "संकुआं कुंड"  वैसी ख्याति अर्जित नहीं कर पाया जिसका वो वास्तव मे हकदार है। मैंने 11 दिसम्बर 2018 के अपने ब्लॉग "गढ कुण्डार का किला" https://sahgalvk.blogspot.com/2018/12/blog-post_11.html 11 decembar 2018 gadh kudhar

मे भी मध्य प्रदेश के पर्यटन विभाग की निष्क्रियता का उल्लेख किया था तब से आज तक कदाचित ही उनकी रीति-नीति मे कोई बदलाब देखने को मिला, जो बड़ा पीढ़ा दायक था।

विजय सहगल   

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