राम
बाग -झाँसी
मै अपनी लगभग 40 साल की सेवा के दौरान देश
के लखनऊ, ग्वालियर,
रायपुर, भोपाल सागर मुरैना होते
हुए अंततः देश की राजधानी दिल्ली से अप्रैल 2018 मे सेवानिवृत्त हुआ पर शायद ही
कोई काल ऐसा रहा हो जब मै अपनी जन्मभूमि झाँसी की जड़ों से जुड़ा न रहा हूँ। यही
कारण है जब भी मै अपने गृह नगर जाता हूँ तो अपनी जड़ो की तलाश मे निकाल जाता हूँ। इस
बार भी मै 2 दिसम्बर 2022 को अपने मित्र की बेटी की शादी मे शामिल होने अपने मूल
स्थान झाँसी मे था। इस दिन इस समारोह के साथ अपने बचपन के उन स्थानों पर गया जहां
आज से पाँच दशक पूर्व बड़े उत्साह और उमंग से जाता था। लक्ष्मी गेट बाहर उन दिनों
आबादी बहुत कम हुआ करती थी, पर सावन के
महीने मे ये स्थान 4-5 दिन झाँसी के धर्म प्रेमी धर्मावलंबियोंसे भरा रहता था।
भगवान कृष्ण की झाँकियों की शुरुआत गोपाल धर्मशाला,
मुरली मनोहर मंदिर (मुरली मनोहर मंदिर पर मेरा ब्लॉग https://sahgalvk.blogspot.com/2020/11/blog-post.html दिनांक 02
नवम्बर 2020) से शुरू होकर लक्ष्मी तालाब के किनारे बने काली जी के मंदिर,
लक्ष्मी मंदिर, रामबाग और तालाब के
किनारे स्थित शंकर जी के मंदिर पर समाप्त होती थी। देर रात तक सजी झाँकियों को देखने शहर,
सदर और सीपरी बाज़ार से लोग बड़ी संख्या मे आते थे। 60-70 के दशक मे धार्मिक अवसरों
पर लोग टोलियों बना कर पैदल यात्रा करना पसंद करते थे। कुछ लोग
लक्ष्मी तालाब के दूसरे छोड़ पर बने अठखम्मा मंदिर के लिए लंगड़ की नाव की सेवाए भी
लिया करते थे जो लक्ष्मी तालाब मे चलने वाली एक मात्र नाव का सहृदय,
दयालु और नर्मदिल नाविक था। पास ही झाँसी के राजा स्वर्गीय गंगाधर राव की समाधि बनी
हुई थी जो उन दिनों देखरेख के अभाव मे उजाड़ थी पर आज अपने रखरखाव के कारण एक दर्शनीय
स्थल का रूप ले चुकी है।
सड़क के बीचों बीच बने "राम बाग"
या "सरावगी की बगिया" का मुख्य द्वार तो बंद था जो झाँकियों के समय मुख्य प्रवेश द्वार हुआ करता था पर मध्य
का द्वार हर बार की तरह खुला था। आज मुझे दशकों बाद एक बार पुनः राम बाग जाने का सौभाग्य
प्राप्त हुआ जो इस दौरान विकास से अछूता रहने के बावजूद रखरखाव मे अव्वल था। राम
बाग को दशकों पूर्व के अपने मूल रूप मे
हू-ब-हू अक्षुण देख बहुत अच्छा लगा। प्रवेश द्वार से अंदर जाते ही हनुमान
जी के मंदिर के दर्शन हुए। षठकोण रूप मे निर्मित मंदिर मे प्रवेश के बारहदरी
अर्थात बारह द्वार बने थे जिसके अंदर परिक्रमा पथ के अंदर मुख्य मंदिर मंडप मे भव्य आकर्षक हनुमान जी की प्रतिमा के दर्शन हुए
जहां बचपन मे सावन के महीने मे दर्शनार्थियों की लंबी लाइन लगी रहती थी। मंदिर के
सामने बगिया के पथ के पार एक आखाडा बना था जो आज भी अपने मूल रूप मे अब भी बैसा का
बैसा बना था। अखाड़े के सेवक श्री चौधरी जी फावड़े से मिट्टी की गुड़ाई कर रहे थे उस फावड़े
का बजन 20 किलो से कम न रहा होगा। मुझे
सत्तर के दशक मे इस अखाड़े मे लंबी चौड़ी कद काया के गुरु (श्री प्रभु तिवारी) की
याद हो आई जो अधिकतर समय इस अखाड़े मे बच्चों को पहलवानी के दांव पेंच सीखाते थे।
उन दिनों अखाड़े के बाहर विभिन्न आकार और बजन के लकड़ी के बड़े बड़े और बजनी मुगदर घुमा कर अखाड़े के प्रशिक्षार्थी
अपने शरीर सौष्ठव का निर्माण करते थे। कहते है कि पुराने समय मे अखाड़े की इस
मिट्टी मे "मनों" (एक मन बराबर 40 किलो) शुद्ध घी मिला कर मिट्टी को नरम
और भुरभुरा बनाया जाता था। अब इस दौर के अखाड़े बिरासत की बात हो गये।
राम बाग के प्रवेश द्वार से अंत तक पत्थर का
एक गलियारा बनाया गया है। जिसके छोर पर पानी की एक बावड़ी को देख कर संतोष हुआ
जिसमे उन दिनों युवा और किशोर उपर से छल्लान्ग लगा कर कूदते थे। वहीं पास मे उन
दिनों धनाढ्यता का प्रतीक घोडा बग्घी रहा करती थी जो आज नहीं दिखाई दी। आवागमन के
नए नए साधन आ जाने के कारण अब शायद घोडा बग्घी की प्रासंगिकता कहीं खो गई।
ज्ञातत्व हो कि स्व॰ सुंदर लाल
सरावगी द्वारा स्थापित रामबाग और उनके पुत्र स्व॰ श्री हरचरन लाल सरावगी की गिनती उन दिनों झाँसी
शहर के गिने चुने धनपतियों मे होती थी।
स्व॰ हरचरन लाल सरावगी को मुझे बचपन मे सानिध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ था
जब वे राम बाग स्थित मंदिर मे भगवान के वस्त्रों को सिलवाने हेतु मेरे घर के बाहर
स्थित भगवान दास टेलर मास्टर की दुकान पर आते थे।
राम बाग के मध्य मे स्थित राम जानकी मंदिर
की भव्यता देखती ही बनती है। दशको पूर्व मे जिस मंदिर के प्रांगण मे शास्त्रीय गीत
संगीत की सभा- समागम होती थी उसके सौदर्य की आभा आज भी जस के तस है। सावन की झांकियों के
दिनों मे दर्शनार्थी मंदिर के आँगन से मुख्य मंदिर तक भगवान के दर्शनार्थ लंबी
लाइनों मे खड़े हो विलंबित प्रतीक्षा करते थे। मंदिर के बाहर खुले आँगन मे फब्बारे
बने हुए थे जिनसे निकला पानी आगे झरनों के रूप मे सीढ़ियों के नीचे बहता हुआ सुंदर
प्रतीत दिखाई देता था। बेशक उन दिनों की भांति झरने का पानी कल कल बहता नज़र तो न
आया पर अपने पुरानी भव्यता की कहानी मुझे स्पष्ट दिखाई दे रही थी। राम बाग के
ट्रस्टीयों को चाहिए कि शासन के सामंजस्य से इस राम बाग को "ऐतिहासिक
विरासत" का रूप देकर संरक्षित और सुरक्षित रखने का प्रयास करें।
उन
दिनों पानी से लबालब भरे लक्ष्मी तालाब का प्राकृतिक सौन्दर्य देखते ही बनता था।
पानी वाली धर्मशाला के बाद बड़े बड़े तैराकों के लिये लक्ष्मी तालाब तैराकी के शिक्षण और प्रशिक्षण हेतु
झाँसी मे एक अहम स्थलों मे से एक था। तैराकी के कुशल शिक्षकों मे उन दिनों बद्री
प्रसाद लाहौरी की बड़ी भूमिका थी और जिनका
झाँसी के गणमान्य नागरिकों मे एक बड़ा नाम था। सावन के महीनों के इन 5-6 दिनों मे मुरली
मनोहर मंदिर, काली जी,
राम बाग सहित अनेक स्थानों मे देश के गीत,
शास्त्रीय संगीत के जाने माने बड़े बड़े दिग्गज कलाकारों का जमघट लगा रहता था। झाँसी
के रसिक श्रोता इन शास्त्रीय संगीत की सभाओं मे आने वाले उस्ताद और गुरुओं से खयाल,
दादरा, ठुमरी,
कजरी आदि सुनने के लिये देर रात तक अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते थे। शास्त्रीय
संगीत के ये कलाकार भी इन कार्यक्रमों मे
अपनी प्रस्तुति को अपना सौभाग्य मान संगीत की इन महफिलों मे शामिल होने को अपना
परम सौभाग्य मान ईश्वर को अपना धन्यवाद ज्ञपित करते थे। संध्या आरती के समय काली
जी मंदिर से शंख, झालर और आरती के
घण्टियों की आवाज शाम के अंधेरे मे एक सुमधुर संगीतमय ध्वनि उत्पन्न करती थी जो तालाब
की लहरों पर सवार होकर तैरता हुआ इस
शास्त्रीय घोष को तालाब के दूसरे छोर तक ले जाता और जहां से प्रतिध्वनि के रूप मे साफ
सुनाई देता था। सावन की घटाओं मे मंदिरों मे जगमगाते विधुत प्रकाश को तालाब मे
उत्पन्न प्रतिविम्ब लहरों के माध्यम झिलमिलाता नज़र आता था।
नगर निगम झाँसी ने इन धार्मिक और ऐतिहासिक
महत्व के मंदिरों सहित पास मे ही स्थित झाँसी के राजा गंगाधर राव की समाधि को सहेज
कर रक्खा है। लक्ष्मी तालाब के सौंदरिकरण का कार्य भी प्रगति पर है। तालाब के बीच
रानी झाँसी की प्रतिमा स्थापित हो चुकि है पर उसके चारों ओर के निर्माण का कार्य
अभी निर्माणाधीन है आशा करते है कि निर्माण के बाद न केवल शहर वासियों अपितु पर्यटन
की दृष्टि से भी इन इमारतों के रूप को निखार कर झाँसी और झाँसी की रानी लक्ष्मी
बाई के गौरव और यश गाथा को उसी तरह
पुनर्स्थापित किया जायगा जैसा कि प्रसिद्ध
कवियत्री और लेखिका सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी कविता मे लिखा था:-
"बुंदेले
हरबोलों के मुंह, हमने सुनी कहानी
थी"।
"खूब
लड़ी मर्दानी वह तो, झाँसी वाली रानी
थी॥"
विजय
सहगल







1 टिप्पणी:
आपने अपने ग्रह नगर में जाकर अपनी पुरानी यादें ताजा कर ली और आपके लिखे ब्लॉग को पढ़कर मैंने भी झांसी के महत्वपूर्ण जगहों के विषय में जानकारी प्राप्त कर ली
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