"ईधन"
किसी भी व्यक्ति के जीवन मे रोटी,
कपड़ा, मकान उसकी मूलभूत आवश्यकताओं मे शामिल है जिसके
लिए व्यक्ति सारे जीवन संघर्ष करता है। इन मूलभूत आवश्यकताओं मे सड़क,
बिजली पानी को जोड़ साधारण मानवी के लिए एक सुगम जीवन उपलबब्ध कराना एक आदर्श राज्य
की कल्पना मे शामिल है। शायद इसीलिए गोस्वामी तुलसी दास जी ने श्री रामचरित मानस मे
राम राज्य की अवधारणा को निरूपित करते हुए एक चौपाई मे कहा है:-
सब नर करहिं परस्पर प्रीति, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति॥
अर्थात राम राज्य मे देह से संबन्धित, दैवीय प्रकोप एवं भौतिक अपदाये किसी को नहीं ब्यापती। सब मनुष्य परस्पर प्रेम पूर्वक रहते हुए शास्त्रानुकूल नीतियों, मर्यादाओं के अनुसार अपने स्वधर्म का पालन करते है।
पर इस कलियुग मे, साठ के दशक मे बचपन मे मैंने अपने घर पर भोजन बनाने के लिए ईधन की जद्दोजहद देखी है और अपनी माँ को हम भाई बहिनों के लिये खाना बनाने मे होने वाली कठिनाई को नजदीक से देखा। चूल्हे से उठते धुएँ से जलती आंखे, अपने साड़ी के पल्लू से आँखों को ढक, गीली लकड़ी और उपले से उठते धुएँ से अपने आपको बचाने के संघर्ष तो जैसे रोज की बात थी। ऐसा नहीं था कि ईधन के लिये ये लड़ाई सिर्फ हमारे घर मे थी कमोवेश ये संकट उस समय हर मध्यम घर की कहानी थी।
घरों मे ईधन की आपूर्ति के लिये मुख्यतः
लकड़ी और गाय के गोबर के उपले या कंडे की
उपलब्धता को हम बचपन से देखते आए थे। यूं तो मिट्टी का तेल,
लकड़ी का बुरादा, लकड़ी और पत्थर के कोयले को भी लोग ईधन के रूप मे इस्तेमाल करते
थे। इन तरह तरह के ईधन को घरों मे निरंतर आपूर्ति लगभग रोज का ही कार्य थे जो
बरसात के मौसम मे और भी कठिन और दुरूह थी। शहरों मे लकड़ी की उपलब्धता गाँव से
बैलगाड़ियों और ग्राम वासियों द्वारा सिर पर छोटे-छोटे गट्ठर रख कर की जाती थी।
मेरे घर के बाहर पानी की टंकी के चौराहे पर लकड़ियों की बैल गाड़ी या सिर पर लकड़ी का
गट्ठर ला रहे ग्रामवासियों के आते ही खरीद
दारों की भीड़ उन्हे घेर कर लकड़ी के दाम की पूंछ-परख से शुरू हो जाती थी। साथ ही
साथ मोल-भाव को ऊंचा-नीचे लाने की सौदेबाजी भी प्रारम्भ हो जाती थी। चतुर क्रेता
लकड़ी को तोड़ कर उसके सूखे या नमी दार होने की पुष्टि कर दाम तय करते थे क्योंकि
सूखी लकड़ी हल्की, उपयोग मे आसान और धुआँ रहित होती थी जबकि गीली लकड़ी भारी बड़ी कठिनाई
से जलती और धुआँ करती थी। अपनी माँ को अनेकों बार गीली लकड़ी से उठ रहे धुएँ से दो चार होते देखा था। बरसात
के दिनों मे सूखी लकड़ी को खुले मे रखने से बचाने के लिये आँगन और पौर मे रक्खा
जाता था। घर मे एक गाय की कोठरी मे भी लकड़ी को रखना एक विकल्प होता था क्योंकि उन
दिनों घरों से गाय का पालन समाप्त हो चुका था। लकड़ी को जलाने मे गाय के गोबर के उपलों
को एक सहायक ईधन के रूप मे इस्तेमाल किया
जाता था। शहरों मे उपलों की उपलब्धता भी ग्राम वासियों द्वारा की जाती थी क्योंकि
गौपालन या भैंस पालन मे दूध के अलावा गोबर
के उपले एक अतिरिक्त आय के श्रोत के रूप मे होते थे। उपलों को गिनती के हिसाब से
खरीदा बेचा जा सकता था एक दो कंडे रुंगन (मुफ्त) मे भी गिन लिये जाते थे। कंडों की
कीमत छोटे बड़े आकार के हिसाब से भी तय होती थी। बरसात के पूर्व कंडों की मांग काफी
बड़ जाती थी क्योंकि बरसात मे कंडे बनाने और उन्हे सुखाने की समस्या रहती थी। कभी
कभी बाहर से सूखे दिखने वाले कंडों को तोड़ने पर अंदर से गीले नमी दार दिखते थे जो
जलाने पर धुआँ छोड़ते थे। चूल्हे मे लकड़ी जलाना भी एक कला थी। कंडे के टुकड़े कर उन
पर थोड़ा सा कैरोसिन ऑइल डाल कर उसमे आग लगा दी जाती थी और फिर उन पर लकड़ियों को रख
कर उनके जलने का इंतज़ार किया जाता था। हाँ कभी कभी हम लोगो की शैतानियों पर जलाऊ
लकड़ी से हल्की फुलकी पिटाई भी हो जाती थी।
कोयला माफिया स्टेशन से निकलने वाली
मालगाड़ियों से कोयले का अवैध दोहन कर बाज़ार मे बिक्री के लिये लाता था। पत्थर के
कोयले को जलाने मे कठिनाई होती थी क्योंकि देर से आग पकड़ने के कारण उसको जलाने के
लिये दूसरे ईधन जैसे मिट्टी का तेल या लकड़ी को लगातार जलाए रखना होता था। काफी दूर
से आसमान मे उड़ते धुएँ की लकीर से उस घर
की लोकेशन को आसानी से ढ़ूढ़ा जा सकता था। इन सभी ईधन की एक विशेषता थी कि इनके
उपयोग के बाद इन्हे पानी डाल कर बुझाने के बाद पुनः उपयोग मे लाया जा सकता था। लकड़ी,
कोयला आदि को पानी डाल कर बुझाने से उत्पन्न विशेष ध्वनि के कारण मुझे लकड़ी या कोयला बुझाने मे बड़ा मजा
आता था। आज की पीढ़ी ने शायद ही इस आनंद का अनुभव किया हो।
पत्थर के कोयले का उपयोग प्रायः होटल,
हलवाई करते थे पर घरों मे इसका उपयोग कम होता था। लेकिन स्टेशन के आसपास रहने वाले
एवं रेल्वे कॉलोनी के हर घरों मे शाम के समय प्रायः हर घर के बाहर पत्थर के कोयले
की अंगीठी से उठता धुआँ इसके उपयोग का ध्योतक था।
पत्थर का कोयला ईधन के रूप दीर्घ
अवधि तक ऊर्जा देता था और एक अच्छे ऊर्जा के स्रोत के रूप मे होता था। बड़ी मात्रा मे उत्पाद बनाने
मे सुगमता के कारण ही हलवाई या दुकानदार इसका उपयोग अधिक करते थे और इसके लिये कुछ
कीमत ज्यादा अदा करते थे।
जब कभी गाँव से लकड़ी या कंडों की पूर्ति कम
होती थी तो सब्जी मंडी के कोने मे स्थित टाल से लकड़ी लेनी पड़ती थी। लकड़ी की टाल के
मालिक एक छोटे कद के गोल मटोल तेज तर्रार
पंजाबी सज्जन थे पर कोयले और लकड़ी जैसे अस्वच्छ व्यवसाय के बावजूद उनके स्वच्छ सफ़ेद,
प्रेस किये कपड़े उनकी नफासत और नजाकत को दर्शाता था जो टाल के नजदीक ही "चंद्रा
होटल" को भी संचालित करते थे। होटल को बंद हुए दशकों बाद आज भी,
उस गली को चंद्रा होटल की गली के नाम से जाना जाता है। मोटी और भारी भरकम लकड़ी के डूंड़ (टुकड़े),
चूल्हे मे बड़ी परेशानी पैदा करते थे। उनको छोटे छोटे टुकड़ो मे बांटने के लिये बड़ी
मशक्कत करनी पड़ती थी। पड़ौस मे स्थित साइकल वाले की दुकान से हथौड़ा लाकर छैनी की
मदद से छोटे छोटे टुकड़ो मे तोड़ना पड़ता था। कभी कभी छैनी उच्छल कर चोट पहुंचाती थी
तो कभी कभी छैनी की जगह हथौड़े का प्रहार
हाथ पर हो जाने पर, होने वाले दर्द
की कल्पना आज की पीढ़ी शायद ही महसूस कर
सके।
एक अन्य ईधन था मिट्टी का तेल या केरोसिन
ऑइल जिसका उपयोग गैस स्टोव या बत्ती वाले स्टोव मे होता था जो उपयोग मे सुगम और
आसान था पर जिसकी उपलब्धता सहज और सुगम न थी। स्टोव को चालू करना यूं था तो आसान
पर पहले बर्नर को गरम करने की कला को सीखे बगैर,
स्टोव जालना आसान नहीं था। बर्नर की लौ को तेज रखने के लिये बर्नर मे आए कचरे को साफ करने के लिये सुई सी पतली
पिन से कचरा साफ करना भी एक हुनर था। कभी कभी अधिक हवा के दवाब के कारण स्टोव फटने
की घटनाए भी सुनाई देती पर मैंने कभी ऐसी घटना होते नहीं देखी। शायद उन दिनों स्टोव
फटने की ऐसी ही घटनाओं की आड़ मे दहेज जैसी
कुप्रथा के कारण बहुओं को जलाने की कुछेक घटनाओं ने स्टोव को बड़ा बदनाम किया था।
राशनिंग के चलते,
केरोसिन ऑइल के विपणन मे दुकानदार भ्रष्टाचार,
काला बाजारी, बेईमानी,
करते ये बुराइयाँ उन दिनों राशन के दूकानदारों
मे आम थी या यूं कहें कि उनमे कूट कूट कर
भरी थी। लंबी लंबी लाइन, घट (कम) तौली,
ज्यादा कीमत बसूलना आम बात थी। प्रायः जनता को मिलने वाला कोटा बाहर-ही बाहर ब्लैक
मे बेच दिया जाता था। अफसर शाही, व्यापारियों की
मिली भगत के कारण भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा थी। महीने मे 8-10 बार तेल की तलाश मे
दुकानों के 2 फुट लंबे राशन कार्ड और खाली
डिब्बे के साथ चक्कर लगाना आम बात थी। उन दिनों आम जनता के समय की मानों कोई कीमत ही नहीं थी। 2-4 लीटर
तेल लाना मानों किसी युद्ध को फतह करने की तरह था।
उन दिनों घरो मे बिजली नहीं थी। शाम के घरों
मे रोशनी के लिये भी केरोसिन ऑइल का उपयोग लालटेन मे होता था,
दुकानों मे बड़े बड़े लेंप जलाये जाते थे।
कुछ दुकानदार गैस बत्ती की लालटेन जलाते थे जिसकी दूधिया रोशनी मे काम करने मे
स्पष्टता और सुगमता थी और देखने मे भी अच्छी
लगती थी। इन गैस लालटेन मे रेशमी धागों का एक फिल्लामेंट बांध कर केरोसिन ऑइल से
निकलने वाली गैस से जलाया जाता था। प्रायः बारात और शादी,
व्याह और दूसरे सभा,
जलसों आदि मे इन गैस लालटेन्स की बड़ी मांग
होती थी जिनको किराए पर ले कर उपयोग मे लाया जाता था,
क्योंकि इनकी तेज दूधियाँ रोशनी सभी को आकर्षित करती थी।
बेईमानी और भ्रष्टाचार के कारण देश की स्वतन्त्रता
के बाद आम मानवीय
के लिये "ईज़ ऑफ लिविंग" (जीवन जीने मे आसानी) के लिये शायद ही कहीं कोई
सार्थक प्रयास हुए। आम लोगो ने तत्कालीन समय मे अधिकारियों और व्यापारियों की कपट और
कुटिलता के कारण जीवन मे आयी परेशानियों, कठिनाईयों के कारण, अभावों मे, जीवन यापन को अपनी नियति मान लिया था। आम
जनता मे रोटी, कपड़ा
मकान जैसी मूल आवश्यकतायेँ तो सपने की बात
थी तब शासन, प्रशासन से पानी, बिजली
सड़क की अपेक्षा कैसे की जा सकती थी??
विजय
सहगल







1 टिप्पणी:
बहुत सुंदर सहगल साहब । आपने ऐसा जीवंत विवरण किया कि बचपन में जाकर खड़ा हो गया । तब से अब की ज़िंदगी की तुलना करता हूँ तो लगता है इन सब समस्याओं को तो सोचने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती । वाक़ई ज़िंदगी अब बहुत सरल हो गयी है ।
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