शनिवार, 7 जनवरी 2023

एलिफ़ेंट वॉटर फ़ॉल्स - मेघालय

 

"हाथियाँ जल प्रपात (एलिफ़ेंट वॉटर फ़ॉल्स) - मेघालय"











1 नवम्बर 2022 को मै अपने समूह को अन्य छह सदस्यों के साथ मेघालय प्रवास पर था। सुबह की हल्की सर्दी और सुनहरी धूप मे गुवाहाटी के कोलाहल और भीड़ भाड़ से दूर हमारी टेंपू ट्रेक्स का  मेघालय राज्य की सीमा मे प्रवेश करते ही पर्यावरण मे हरियाली का प्रादुर्भाव स्पष्ट नज़र आया। मेघालय की दिशा मे यात्रा के पूर्व मीलों तक राष्ट्रीय राज मार्ग के बाएँ तरफ असम और दाहिने तरफ मेघालय राज्य को देखना अचरज भरा था। लेकिन पूरी तरह मेघालय मे प्रवेश करते ही  राज मार्ग के किनारे अनानास, केले, पपीता, खीरे, संतरे आदि फलों की छोटी-छोटी गुमटियाँ दिखाई देने लगी  जिनका संचालन मेघलयी महिलाओं द्वारा किया जा रहा था। फलों के साथ स्थानीय अचार और मुरब्बे आदि का भी बिक्रय इन गुमटियों पर छोटी छोटी शीशियों मे किया जा रहा था। ऐसे ही एक गुमटी पर हम सब ने पाइनेपल और कमरख का स्वाद लिया। महिला दुकानदार ने बहुत करीने से अनानास के छिलके निकाल कर छोटे छोटे टुकड़ो पर जब नमक और लाल मिर्च का मसाला मिलाया तब मसाले ने अनानास के  स्वाद मे और इजाफा कर दिया। कमरख के खट्टे स्वाद इस दौड़ मे अनानास से पिछड़ गया।  हमारे ग्रुप की छोटी सदस्या दिशा जिसे हम सभी ग्रुप लीडर के नाते प्यार से "कर्नल"  कह संबोधित करते ने आवश्यक भुगतान के बाद महिला दुकानदार से "खुबलाई" कहा तो उस ख़ासी महिला के चेहरे पर मुस्कान फैल गयी। मेघालय की ख़ासी भाषा मे खुबलाई का अर्थ है "धन्यवाद"! अब तो "खुबलाई" शब्द का उपयोग हम सब ने पूरे मेघालय यात्रा के दौरान खूब किया जिसने हमेशा मेघालय के बच्चे, जवान महिला पुरुष के चेहरे पर हमेशा एक प्यारी मुस्कान छोड़ी।

आज की यात्रा का पहला पढ़ाव "हाथियाँ जल प्रपात" अर्थात "एलेफेंट वॉटर फॉल" था। जिसे  साधारण जल प्रपात की तरह मान  मै अनिक्छा पूर्वक वॉटर फॉल देखने के लिए बढ़े। लेकिन जब कुछ सीढ़ियाँ उतरकर हम नीचे वॉटर फॉल के सामने पहुंचे तो ऐसा लगा  जैसे हम अचानक नींद से जागे हों!! एकटक पानी के बहते झरने को देख लगा मानों दूध की धाराएँ पहाड़ों से कल कल करती नीचे गिर रही हों!! इतने सुंदर प्राकृतिक झरने को देख लगा ईश्वर ने मेघालय को यूं ही  मेघों (बादलों) का घर नहीं बनाया बल्कि अपने अप्रितम सौंदर्य का स्नेह-आशीर्वाद प्रदान करने मे कहीं कोई कंजूसी नहीं की। यह जान कर और भी सुखद आश्चर्य था कि यहाँ एक-दो नहीं पूरे तीन-तीन जल प्रपात है। प्रकृति ने कैसे जल प्रपात के इस रंग मंच पर एक ही जल की धारा, अपने तीन अलग अलग रूपों मे अभिनय के लिए उतरी हो। पूर्व मे इस जल प्रपात को स्थानीय ख़ासी जनजाति के लोग "थ्री स्टेप्स वॉटर फॉल" (तीन पगीय जल प्रपात) कहते थे क्योंकि तीनों जल प्रपात एक के बाद एक नीचे की ओर बने है। लेकिन अंग्रेजों के आगमन के पश्चात इस जल प्रपात के बाएँ स्थित पहाड़ी का आकार हाथी सा दिखने के कारण इसे एलिफ़ेंट वॉटर फॉल कहा गया। पर दुर्भाग्य से सन् 1897 मे आए भूकंप के कारण उक्त हाथी रूपी चट्टान के नष्ट होने के बावजूद इसे आज भी एलिफ़ेंट वॉटर जल प्रपात के नाम से जाना जाता है। कुछ सीढ़ियाँ नीचे उतरने के बाद एक बार फिर हम एक नए रूप मे दूसरे जल प्रपात के सामने थे। हरी भरे  पेड़-पौधों की झाड़ियों और टहनियों के बीच बहती धारा इस पानी के झरने मे ऐसा प्रतीत हुई मानो कुछ क्षण विश्राम के कारण दूध धारा दूध के लंबे लबे लच्छों के रूप मे जम गयी हो और जमे हुए दूध की मलाई के लच्छे रबड़ी का स्मरण करा मुंह मे पानी भर दे तो इसमे मेरा क्या दोष? मै इस जल प्रपात संख्या दो पर ज्यादा नहीं ठहर सका क्योंकि मेरे जैसे "डाइबिटिस" के मरीज का "शुगर लेबेल" रबड़ी की याद मे कहीं बढ़ न जाये!!

कुछ और सीढ़ियाँ उतरने के बाद जब हम लोग वॉटर फॉल क्रमांक तीन के सामने पहुंचे तो वॉटर फॉल के दृश्य को देख हतप्रभ थे। एक बार फिर पानी की धाराएँ उपर से नीचे चौड़ी और चौड़ी होते चली गयी। दूध की तरह बहती धाराओं ने वहाँ उपस्थित पर्यटकों के चेहरे पर खुशी स्पष्टतः महसूस की जा सकती थी। वहाँ उपस्थित पर्यटक, विभिन्न दिशाओं और कोणों से जल प्रपात की और अपने परिवार के साथ वॉटर फॉल की यादगार फोटो को मोबाइल और कैमरे मे  कैद करने को लालायित थे। वॉटर फॉल से गिर रहा पानी जिस सरोवर या कुंड मे एकत्रित हो रहा था उसकी पारदर्शिता शीशे की तरह आर पार दिखाई दे रही थी। लोग सरोवर के बीच पानी मे खड़े होकर और पानी के बाहर से भी बहते हुए पानी के झरने को अपलक निहार रहे थे। काफी देर तक प्रकृति के इस शानदार सुंदर रचना को एकटक देखने के बावजूद भी वहाँ से हटने का दिल नहीं कर रहा था। स्वर्ग के सपनों से बाहर निकलना आसान नहीं था। लेकिन अनइकच्छा पूर्वक दिवास्वपन से निकलने पर ऊंची ऊंची सीढ़ियों पर उपर चढ़ने की कल्पना ने हम जैसे वरिष्ठ जनों के हौसले पस्त कर दिये। उम्र के इस पढ़ाव पर दो-तीन घंटों की थकान के बाद  हर सीढ़ी हिमालय के एवरेस्ट चोटी पर चढ़ाई  की तरह लग रही थी। एक बार फिर  हमारे ग्रुप के कर्नल दिशा टंडन ने हम सभी प्रौढ़ता की ओर अग्रसर हो रहे वरिष्ठ जनों की हौसला अफजाई "हैरी पॉटर" की झाड़ू की याद दिला कर कराई  जिस पर बैठ कर वो कैसे फुर्र फुर्र कर दायें बाएँ मुड़ते हुए अपने गंतव्य पर उड़ जाता है।  "हैरी पॉटर" की झाड़ू तो नहीं मिली पर कर्नल दिशा के  उत्साह और उमंग से मिली ऊर्जा ने हम छहों बुजृगों को सीढ़ियाँ चढ़ने की प्रेरणा ने स्फूर्ति और ऊर्जा अवश्य दे दी।  

एलीफेंट वॉटर फॉल की मीठी और सुखद यादों के साथ जब सभी अजय के फूड कोर्नेर  से चाय पान कर पार्किंग मे पहुंचे जो पूर्व मे नोएडा मे काम कर चुका था। जब हम सभी  बस मे पहुंचे तो बस के दरबाजे खुले थे पर ड्राईवर महोदय बस से नदारद थे। हम सभी ये सोच कर अपने चालक का इंतज़ार करने लगे कि शायद वे कहीं दीर्घ या लघु शंका के समाधान हेतु गए होंगे। पर लगातार एक-डेढ़ घंटे तक उनके न आने और  मोबाइल पर कॉल करने के बावजूद संपर्क न होने के कारण हम सभी किसी अनहोनी की आशंका से चिंतित हो उठे। नकारात्मक विचारों को परे हटाते हम सभी सारी रात बस मे ठहरने की मन गढ़ंत कहानियाँ गढ़ने लगे। किसी ठंडी रात काटने की कल्पना की। किसी ने क्रम से बारी बारी रात मे जाग कर चौकीदारी करने के प्रस्ताव पर विचार रक्खे कुछ अन्य ने शेर आने पर अपनी अपनी रणनीति का बखान किया! पर हमारे ड्राईवर महोदय को गायब हुए लगभग तीन घंटे हो चुके थे। आगे के सारे कार्यक्रम भी इस बजह से गड़बड़ा गए। टूर ओपरेटर पर संपर्क से ज्ञात हुआ कि हमारे बस के ड्राईवर टाइम पास करने एक अन्य टैक्सी ड्राईवर की कार मे गपशप करने लगे और बस की चाबी उसकी टैक्सी मे गिर गयी। टैक्सी ड्राईवर के बारे मे हमारे बस चालक को कोई जानकारी नहीं थी और न ही उसका कोई मोबाइल नम्बर था सिर्फ ये जानकारी थी कि वह चेरापूंजी की तरफ जाने वाला था। बस की चाबी ढूढ्ने के सभी निरर्थक प्रयास के बाद हमारे बस के चालक ने वही वॉटर फॉल के स्टाफ के  स्कूटर से  बड़े अनुनय विनय के बाद उस टैक्सी का पीछा किया। 30-35 किमी॰ के बाद टैक्सी चालक के क्षणिक चाय पान के कारण आखिर टैक्सी मिल ही गयी।  तब कहीं चार घंटे  बाद हमारे बस सारथी बापस आये। हमारे आगे के सारे कार्यक्रम यध्यपि  निरस्त हो चुके थे  पर सभी ने "गहरी नदिया, नाव पुरानी, केवटियाँ से मिले रहने" की नीति पर चलते हुए  अपने बस चालक से अनजाने मे हुई इस त्रुटि के लिए कुछ शिकायत नहीं की।

एक अति सुंदर प्राकृतिक ईश्वरीय रचना के यादगार दर्शन के  साथ हमारे ग्रुप की  सकारात्मक सोच ने ड्राईवर से  अनजाने मे हुए अपराध को क्षमा कर इस घटना को और भी यादगार बना दिया।

विजय सहगल                           

      

3 टिप्‍पणियां:

P.c.saxena ने कहा…

श्रीमान जी यात्रा आप के द्वारा की गई है लेकिन पूरा वृतांत पढ़कर ऐसा लग रहा है जैसे मैं स्वयं घूम कर आया हूं बहुत अच्छा लगा आप यूं ही लिखते रहिए धन्यवाद

बेनामी ने कहा…

सहगल जी आप अपनी यात्रा का ऐसा सुंदर सचित्र विवरण करते हैं कि यात्रा आँखों के सामने जीवंत हो जाती है ।

Deepti Datta ने कहा…

हमेशा की तरह बहुत ही सजीव एवं सुन्दर वर्णन...आपकी लेखनी अदभुत है sir ji..