गुरुवार, 15 दिसंबर 2022

दार्जिलिंग टॉय ट्रेन

 

"बटासिया लूप", "हैयर पिन कर्ब"- "दार्जिलिंग टॉय ट्रेन"










यध्यपि मैंने ऊटी मे नीलगिरी रेल, शिमला मे कालका शिमला ट्रेन देखी थी पर दार्जिलिंग टॉय ट्रेन के बारे मे भी काफी सुन रक्खा था। इसलिये जब 8 नवम्बर 2022 को दार्जिलिंग जाने का कार्यक्रम बना तो एक माह पूर्व मैंने ट्रेन संख्या 52541 न्यू जलपाईगुड़ी - दार्जिलिंग पैसेंजर के वातानुकूलित कुर्सियान मे अपना अग्रिम आरक्षण करा लिया। सन 1879 मे शुरू हुई इस ट्रेन को विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है।  आरक्षण कराते समय सिर्फ दो ही श्रेणी के डिब्बों का विकल्प बताया गया। प्रथम श्रेणी और वातानुकूलित कुर्सी यान। वातानुकूलन का विकल्प ले मुझे दार्जिलिंग के लिए  समयानुसर 8 नवम्बर 2022 को प्रातः 10 बजे के पूर्व  न्यू जलपाई गुड़ी पहुँचना था। मुझे 7 तारीख को  गुवाहाटी से अवध आसाम डिब्रुगढ़ एक्सप्रेस से न्यू जलपाई गुड़ी पहुँचना था। लेकिन दुर्भाग्य से उक्त ट्रेन तीन घंटे से ज्यादा लेट हो चुकी थी। मुझे चिंता ये हो रही थी कि यदि असम एक्सप्रेस लेट हो गयी तो महीनों पहले से टॉय ट्रेन से यात्रा करने की योजना पर पानी फिर जाएगा। पर आशंका के विपरीत 9.15 बजे हम न्यू जलपाई गुड़ी पहुँच गए और ट्रेन छूटने की अनहोनी से बच गए। हमे बताया गया था न्यू जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग यात्रा के दौरान न तो ट्रेन मे और न ही रास्ते के स्टेशनों पर कुछ खाने पीने को मिलेगा अतः मुझे  खाने-पानी की व्यवस्था करके ही ट्रेन मे चढ़ना था। स्वल्पाहार करना लाज़मी था। नाश्ते की तलाश मे दार्जिलिंग के प्लेटफॉर्म पर भारतीय रेल द्वारा संचालित रेल डिब्बे के आकार की कैंटीन ने मन मोह लिया और स्वल्पाहार करने हेतु मै अपनी पत्नी के साथ उक्त कैंटीन का आथित्य ग्रहण करने हेतु पहुँच गया। स्वादिष्ट स्वल्पाहार के उपरान्त हम लोग टॉय ट्रेन की सवारी हेतु प्लेट फोरम पर पहुँच गए

दार्जिलिंग टॉय ट्रेन अपने ठीक वक्त 10 बजे से 15-20 मिनिट पूर्व प्लेट फॉर्म पर लग गयी। इस दौरान सभी यात्री तसल्ली पूर्वक अपनी अपनी सीटों पर बैठ गए। टॉय ट्रेन  के गार्ड श्री लामा जी से मुलाक़ात हुई पर इस ट्रेन मे गार्ड साहब का कोई डिब्बा अन्य ट्रेनों की तरह अलग से  नहीं था। प्रथम श्रेणी मे ही एक सीट पर उनका कार्यकलाप चल रहा था। ट्रेन मे मौजूद टिकिट निरीक्षक महोदय द्वारा  सभी यात्रियों के टिकिट चैक करते ही  ठीक समय पर ट्रेन ने दार्जिलिंग स्टेशन से अपनी रवानगी शुरू कर दी। गर्मी के इस मौसम मे वातानुकूलन की सुविधा ने गर्मी से कुछ राहत थी पर  वातानुकूलन की ये सुविधा प्रथम श्रेणी मे उपलब्ध नहीं थी। दार्जिलिंग तक की 83 किमी॰ की  दूरी इस ट्रेन को पड़ने वाले 13 स्टेशन के माध्यम से 7.30 घंटे मे पूरी करनी थी। हमारी अपेक्षा के विपरीत शुरुआत कुछ अच्छी नहीं थी। पड़ने वाले 2-3 स्टेशन पर गंदगी का साम्राज्य था। हमने सोचा था  ऊटी या शिमला की टॉय ट्रेन की तरह हरियाली, नदी, पेड़ों के बीच से ट्रेन सीटी बजाती पहड़ों के बीच से गुज़रेगी। लेकिन शुरुआत बेशक ठीक न रही हो पर यात्रा का मध्य और कुछ हद तक अंत ठीक  था। सड़क मार्ग के समांतर लहराती-बलखाती रेल कभी सड़क के बाएँ से और कभी दायें से आरपार निकाल जाती। ट्रेन की सीटी सुन लोग रास्ता देने के लिए खड़े हो जाते। जैसे जैसे ट्रेन आगे बदती गयी बैसे-बैसे पहाड़ी रास्ते, ऊंचे ऊंचे पेड़, पहाड़ों से बहते झरने, घरों मैदानों मे खिले डहेलिया, गुलाब, गुलदाउदी, जीनिया, मैरिगोल्ड के फूल पौधे जगह जगह दिखाई दे रहे थे। ट्रेन ने पूरी यात्रा के दौरान लगभग 50 से भी ज्यादा बार सड़क को क्रॉस किया होगा। कुर्सियांग, घूम, दार्जिलिंग मे  मे तो ट्रेन सड़क के बीच मुख्य बाजार से हो कर गुजर रही थी। हम लोगो को और बाजार, सड़क के लोग हम यात्रियों को उत्सुकता और प्रसन्नता से एक दूसरे को देख रहे थे। ट्रेन जहां से निकल जाती लोग अपने मोबाइल से ट्रेन की हर एक झलक को अपने कैमरे से कैद कर रहे थे या वीडियो बना रहे थे। कभी ट्रेन लोगो के घरों के आगे से निकलती कभी ट्रेन लोगो के घर और आँगन के पीछे से सीटी बजाती निकल जाती। कभी कभी तो ट्रेन लोगो के वाहन और घरों के बीच बैरियर बन बाधा खड़ी कर निकाल जाती। रेल स्टाफ से बातचीत मे ट्रेन और सड़क चलते वाहनों के बीच किसी दुर्घटना के बारे मे पूंछने पर गार्ड साहब ने कभी भी किसी दुर्घटना से अपनी अनिभिग्यता प्रकट की जो कबीले तारीफ थी और ये दर्शाती थी कि सड़क पर चलने वाले वाहन और लोग सड़क पर ट्रेन के प्रथम अधिकार को  स्वीकार,  सम्मान और आदर प्रेषित करते है। तिनधारा और आगे कुर्सियांग स्टेशनों पर स्टाफ द्वारा पूर्व  सूचना देकर  ट्रेन को 10-10 मिनिट के लिए  चाय, स्वल्पाहार के लिए रोका गया। जहां तीनधारा स्टेशन पर दार्जिलिंग से आने वाली ट्रेन की क्रोस्सिंग थी साथ ही साथ इस स्टेशन ने  हम यात्रियों का स्वागत गरमागरम मोमोज से किया वही कुर्सियांग स्टेशन चारों तरफ भीड़-भाड़ और गहमा-गहमी भरे बाज़ार के बीच मे था जहां चाय के लिए बाजार मे जाना पड़ा।   इन स्टेशनों  को संयुक्त राष्ट्र की धरोहर का दर्जा प्राप्त हुआ है। घूम स्टेशन पर दार्जिलिंग रेल का एक छोटा सा म्यूजियम बनाया गया है। जहां पर पुराने कोयले/भाप के इंजिन, पुराने यात्री और मालगाड़ी के डिब्बे एवं अन्य उपकरण को दर्शाया गया था।

हैयर पिन कर्ब जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग स्टेशन तक की पूरी यात्रा के दौरान इस रेल मे एक अनोखी, इकलौती बेहतरीन इंजीन्यरिंग के नमूने  की  घटना देखने को मिली जो दार्जिलिंग ट्रेन को शेष  दुनियाँ से अलग रखती है वो है ट्रेन द्वारा पहाड़ों की ऊंचाई को हैयर पिन कर्ब के माध्यम से उपर चढाना!! इस प्रिक्रिया मे "N" आकार के पथ पर पहले ट्रेन को सीधे एक ऊंचाई तक ले जया जाता है। फिर वहाँ ट्रेन को रोक कर ड्राईवर रेल लाइन को बदल कर विपरीत दिशा मे पुनः ऊंचाई पर ले कर जाता है जहां पर एक बार रेल को रोक पुनः लाइन बदल कर अब इंजिन की दिशा मे एक बार फिर  ट्रेन घुमाव दार पहाड़ी  रस्तों पर आगे की यात्रा के लिए चल पड़ती है। पूरी यात्रा मे इस तरह के हैयर पिन कर्ब पर ट्रेन पाँच-छह बार आगे पीछे हो कर पहाड़ों की ऊंचाई को कम समय और दूरी से ऊपर चढ़ती जाती है।  स्वल्पाहार और लंच के समय तिनधारा और कुर्सियांग स्टेशन पर ठहराव के दौरान ट्रेन के  नियमों के साथ साथ यात्रियों और रेल स्टाफ के बीच आपसी सामंजस्य और सद्भाव की अनूठी मिशाल देखने को मिली। जब तक सभी यात्री बापस नहीं आ गये ट्रेन आगे नहीं बढ़ी।

बटासिया लूप भी दार्जिलिंग रेल का एक अद्भुद इंजीन्यरिंग का नमूना पेश करती है। बताते है कि 1919 मे अंग्रेजों द्वारा एक पहाड़ी पर से रेल पथ का निर्माण पूरा करने मे 360 डिग्री के गोल घेरे पर पहाड़ के चारों तरफ कवर करते हुए रेल लाइन का निर्माण करने की चुनौती थी। इस चुनौती को स्वीकार कर 140 फुट के इस घेरे मे बड़े चमत्कारिक ढंग से रेल ट्रैक को धीरे धीरे एक निश्चित तरीके से इस तरह नीचे लाया गया कि जहां से ट्रेन लाइन पहाड़ पर प्रवेश करती है उसी रेल लाइन के नीचे से होकर ट्रेन पहाड़ से नीचे उतर जाती है। बतासिया लूप दार्जिलिंग रेल का एक अद्भुद मानव निर्मित नमूना है जो दार्जिलिंग रेल के सुचारु संचालन मे सहयोग करता है। बैसे बटासिया का अर्थ है खुली जगह और लूप का अर्थ है गोल घेरा। इस छोटी सी मनोरम पहाड़ी एक ओर से बरफ से ढँकी कंचन जंगा की हिमालय रेंज दिखाई देती है वही दूसरी ओर दार्जिलिंग का मनोरम दृश्य भी दिखाई देता है। रेल लाइन के चारों ओर सुंदर आकर्षक फूलों की क्यारियाँ बनाई गई है जिनके बीच मे पैदल मार्ग से पहाड़ी मे चारों ओर जाया जा सकता है। गोरखा रेजीमेंट के बीर शहीदों की याद मे इस लूप के केंद्र मे बनाए गए  युद्ध स्मारक के कारण इस स्थान के  गौरव और प्रतिष्ठा की शान और  बढ़ गई है। यध्यपि रेल लाइन के किनारे अवैध रूप से वस्तुओं का व्यापार न केवल इस स्थान की कुरूपता को बढ़ाने और रेल लाइन के किनारे खड़े लोगो की जान जोखिम मे भी डालता है। शासन को इसे रोकने के लिए समुचित कार्यवाही करनी चाहिए।

इस तरह 8 घंटे लंबी लगभग 80 किमी की ये यात्रा का आरंभ धीमा, मध्य अति उत्साह और उमंग भरा था लेकिन अंत लंबी यात्रा के कारण कुछ कुछ उबाऊ रहा। पर हमे ज्ञात हुआ कि भारतीय रेल दार्जिलिंग मे भी इस टॉय ट्रेन की एक घंटे की यात्रा संपादित कराती है जिसमे भी इस ट्रेन का रोमांच और उत्साह का आनंद लिया जा सकता है। जिसका वीडियो मैंने इस ब्लॉग मे डाला है।

विजय सहगल  

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बहुत सुंदर और विस्तृत विश्लेषण । यात्रा तो मैंने भी इस ट्रेन से की है पर कई पहलू आपके इस लेख के माध्यम से ज्ञात हुए। धन्यवाद 🙏🙏🙏

विजय सहगल ने कहा…

धन्यवाद