शुक्रवार, 17 जून 2022

चैल (चायल), हिमाचल प्रदेश" -1

"चैल (चायल), हिमाचल प्रदेश" -1






मेरी जीवन यात्रा मे, कुछ ऐसे संयोग बने कि मै अपने देश की देवभूमि हिमांचल प्रदेश   की यात्रा से अब तक वंचित रहा। पर दिनांक 1 जून 2022 को कुछ ऐसे सुयोग बने कि इस पवित्र भूमि मे अपने 8-9 दिन के प्रवास पर प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण बहुत ही सुंदर और अद्भुद जगहों के दर्शन का लाभ ले सका। शिमला से शुरू हुई मेरी यात्रा चैल या चाईल, कुफ़री, नार्कण्डा, सराहन, रामपुर बुशहार, रिकाङ्ग्पिओ, कल्पा, चितकुल (छितकुल), मशोबरा, नालदेहरा, तत्तापानी पर समाप्त हुई। यह यात्रा देवभूमि हिमाचल प्रदेश की ज़िंदगी की पहली पर यादगार सुखद यात्रा थी।

31 मई 2022 को प्रातः लगभग 8.30 बजे  जब मुहाली, पंजाब से शिमला की ओर बढ़े तो मन उद्विग्न था क्योंकि पहली बार किसी पहाड़ी क्षेत्र की यात्रा बेटे साक्षी गोपाल और पत्नी रीता के साथ अपनी कार से कर रहा था। ऊंचे और पहाड़ी क्षेत्रों के घुमाव दार सड़कों के बारे मे सुन तो रक्खा था पर इससे पहले कभी पहाड़ों पर स्वयं अपनी कार ड्राइव नहीं की थी। पिंजोर से कुछ आगे तक तो सड़क अच्छी, चौड़ी और चार लाइन की थी। पर आश्चर्य हिमांचल मे जैसे जैसे आगे बढ़ते गए तो एन॰एच॰  5 की सड़क ऐसे ही शिमला तक अच्छी मिलती चली गयी। बैसे सोलन से आगे कसौली भी यात्रा की सूची मे था जो धर्मपुर से 11 किमी वायें एक सकरी सड़क से जुड़ा था, जिसकी ऊंचाई समुद्र ताल से लगभग 1800 मीटर थी। सड़क बस  इतनी चौड़ी थी कि सहजता से आमने सामने से कार गुजर सके। 3-4 किमी ही उपर चढ़ सका था कि जाम की स्थिति बन गयी। जाम बहुत लंबा नहीं था पर दिल्ली के कुछ अनुशासन और उदण्ड युवकों ने सामने से आ रही खाली सड़क मे अपनी गाडियाँ जबर्दस्ती घुसेड़ दी। अब तो स्थिति विकट और गंभीर हो गयी। मेरे ही कार के पीछे लगभग 1 किमी लंबी लाइन का जाम लग गया। मैंने एक थोड़े खुले स्थान से गाड़ी को बापस मोड़ कसौली जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया क्योंकि मै नहीं चाहता था कि हिमांचल प्रदेश मे यात्रा की शुरुआत अप्रिय अनुभव से हो। अतः हमने हिमाचल मे अपने पहले पढ़ाव चायल (चैल) की ओर बढ़ने  का निर्णय लिया।

यध्यपि शिमला को जाने वाले राष्ट्रीय राज मार्ग 5 के कंडीघट से चैल की दूरी 29 किमी थी। राष्ट्रीय राजमार्ग 5 को छोड़ हम दाहिने तरफ चैल जाने वाली सड़क पर मुड़े जो चौड़ाई के मामले मे कुछ सकरा जरूर था पर सहज था। सर्पाकार रूप मे पहड़ों पर  धीरे धीरे ऊपर उठने वाली सड़क पक्की, ठीक और अच्छी थी। चारों तरफ देवदार और चीड़ के घने वृक्षों के बीच मौसम बदलने के संकेत मिलने आरंभ हो चुके थे। चंडीगढ़ के मैदानी क्षेत्रों की गरम हवाएँ ठंडी हो कर मन को शीतलता का अहसास कराने लगी थी।  अब मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग के मुक़ाबले रास्ते मे मिलने वाले गाड़ियों का आवागमन भी काफी कम हो चुका था। चारों तरफ नीरव शांत वातावरण मे पक्षियों का कलरव स्पष्ट सुना जा सकता था। मैदानी क्षेत्रो के मार्गो के मुक़ाबले पहाड़ों पर सफर कुछ धीमा लगने लगा। एक-एक  किमी का रास्ता तय करने का अहसास होने लगा।  ऐसा प्रतीत होने लगा मानों पहाड़ो के रास्तों की पैमाइश मैदानी क्षेत्रों के मुक़ाबले   कुछ ज्यादा लंबी हो गयी हो। अचानक ही दूर पहाड़ों के बीच सुनहरे गुंबजों और केशरिया झंडों के बीच और एक मंदिर की आकृति दिखाई दी। दूर से ऐसा लगा मानो मंदिर रास्ते के किनारे ही स्थित होगा पर एक सड़क के संधि स्थल पर ज्ञात हुआ कि मंदिर के लिए अपने तय मार्ग से हट कर 2-3 किमी॰ जाना पड़ेगा। अतः हम सभी ने तय किया के चैल पहुँचने के पूर्व इस रमणीय  मंदिर के दर्शन अवश्य किये जाएँ और यू टर्न कर कार की दिशा चैल के विपरीत "बाशा" स्थान के लिये मोड़ दी। रास्ते मे कुछ ग्रामीण महिला पुरुष रास्ते के किनारे बैठे दिखे जो एक फलों के रस की फ़ैक्ट्री मे कार्यरत थे और कुछ क्षणिक विश्राम हेतु फ़ैक्ट्री के बाहर बैठे थे। नजदीक ही एक ऊंची पहाड़ी पर नयनभिराम मंदिर के दर्शन हुए। मंदिर की सुरक्षा मे तैनात हिमांचल प्रदेश पुलिस के सिपाही श्री नन्हें राम जी से भेंट हुई। उन्होने बताया कि कोई दिल्ली के महात्मा जी द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया जा रहा है जो कि अभी भी जारी था। विशेष विवरण मंदिर मे प्राप्त नहीं हुआ।

विशाल मंदिर परिसर  जितना बाहर से सुनहरे रंगों से सजे अनेकों गुंबजों और लाल रंग की स्टील चादरों और केसरिया ध्वजों से सुंदर दिखाई दे रहा था उतने ही मन को आनंदित कर देने वाले लोचन-सुखदायक ईश्वरीय प्रितिमाओं एवं अंदर से मंदिर के निर्माण और बनावट थी। लंबे गलियारे जिसमे लाल रंग का फर्श प्रवेश द्वार से अंतिम छोर तक बिछा था और  जिसके ऊपर सुंदर कालीन भी बिछाया गया था। गलियारे के दोनों ओर बड़े बड़े बरामदों मे पीतल धातु से बने भगवान राम दरबार, ब्रह्मा विष्णु महेश, भगवान परशुराम, शिव गणेश परिवार, राधा कृष्ण, माँ दुर्गा, माँ काली और शनि देव के स्वरूप विराजमान थे। देश काल की परिस्थितियों के अनुसार मंदिर को अंदर से उष्मरोधी रखने हेतु लकड़ी के  सुंदर तरीके से बनाया और सजाया गया था। भव्य और अलौकिक ईश्वरीय  प्रितिमाओं के दर्शन कर कुछ समय बैठ ईश्वर आराधन कर हम लोगो ने पुनः चैल की ओर प्रस्थान किया।

सुबह आठ बजे से लगातार कार की ड्राइविंग से उपजी थकावट के चिन्ह परिवार मे  सभी के चेहरे पर साफ झलक रहे थे पर चैल अब भी 7-8 किमी॰ दूर था। चैल की तरह ही  पहाड़ों मे गाँव, कस्बे या शहर प्रायः लंबाई मे सड़क के किनारे ही बसे होते है। गाँव मे प्रवेश करते ही एक जगह गाड़ी बंद हो गयी और बार बार स्टार्ट करने के बावजूद स्टार्ट न हुई तो कुछ खुशी और कुछ गम की मिली जुली प्रितिक्रिया मन मे थी। खुशी ये थी कि हम अपने गंतव्य के आस पास ही थे और डर इस बात का था कि इस छोटे से गाँव मे कार की खराबी कैसे ठीक होगी? पर मैंने कई घुम्मकड़ी और यात्रा ग्रुप मे पढ़ा था कि इंजिन गर्म होने और पहाड़ों पर ओक्सिज़न की कमी के कारण भी इंजिन बंद हो जाता है। घुम्माकड़ियों के अनुभव का लाभ  और ईश्वर के आशीर्वाद से कुछ समय गाड़ी को ठंडा होने के लिये छोड़ने के बाद पूरी यात्रा के दौरान कार ठीक ठाक चलती रही।


विजय सहगल  


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