बुधवार, 8 जून 2022

गरीबों के लिये "न्याय" का दावा

 

 

गरीबों के लिये "न्याय" का दावा

 




पिछले दिनों 19-20 अप्रैल 2022 को  महा नगर पालिका दिल्ली द्वारा  जहाँगीर पुरी दिल्ली मे अवैध और अनधिकृत अतिक्रमण के विरुद्ध चले अभियान ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। मेरे सहित आप सभी ने टीवी मीडिया पर चले इस अभियान को जीवंत देखा। पूरे अभियान मे सड़कों पर अवैध रूप से बनाई दुकानों, रेहड़ियों, आठ फुट की दुकानों के बाहर 18 फुट की टीन और बाँसों के अवैध निर्माणों को ही गिराया गया था जो 35-40 फुट की सड़क को 18-20  फुट तक की सड़क का आकार दे रहे थे। वाहनों के आवागमन मे अवरोध और प्रतिरोध को लोग अपनी नियति मान झेलने को मजबूर थे। महा नगर पालिका निगम की यह कार्यवाही कोई अवैधानिक नहीं थी। आम आदमी की सुहुलियत और यातायात को सुगम बनाने को ही थी। पर राजनैतिक दलों के अपने स्वार्थ और  वोट बैंक के चलते जिस द्रुत और तेज गति से  से सुप्रीम कोर्ट  मे बाद दायर कर एक अच्छी भली कार्यवाही को राजनैतिक रंग देकर मिनटों मे रोक दिया जिसको देख मै हतप्रभ था और जिसे देख मुझे उस घरेलु कामगर महिला की याद हो आयी, जिसे इस पुरुष प्रधान समाज ने कुछ ही मिनटों मे 25-30 हज़ार महीने की दिहाड़ी से हमेशा के लिए वंचित कर दिया। आश्चर्य इस बात का है कि मेरे द्वारा उक्त कामगार महिला की शिकायत, महिला आयोग और अनुसूचित जाति आयोग को लिखने के बावजूद उस महिला की कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई?        

मैंने दिनांक 20 जनवरी 2022 के अपने ब्लॉग "दान का कंबल" मे अनुसूचित जाति की एक घरेलू कामगार महिला भग्बती की आपबीती घटना का उल्लेख किया था, (https://sahgalvk.blogspot.com/2022/01/blog-post_20.html) कि कैसे एक फ्लेट ओनर की मूढ़ता के कारण उसे चंद मिनटों मे 25-30 हजार रुपए मासिक की मजदूरी से हाथ धोना पड़ा था। कैसे पुरुष सत्ता को चुनौती देना उसे भारी पड़ा और अपने बच्चों के जीवन यापन हेतु मजदूरी  से अचानक ही कुछ क्षणों मे वंचित होना पड़ा। सहसा ही मेरे मन मे उस  महिला जो कि नोएडा स्थित मेरे बेटे-बहू के घर मे पूरी ईमानदारी और मेहनत से पिछले 3-4 साल से  काम कर रही थी, के जीवन मे अचानक आये इस संकट मे सहायता करने का विचार आया। मैंने 20 जनवरी को ही  राष्ट्रीय महिला आयोग दिल्ली और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग को मेल कर उनके संज्ञान  मे इस घटना को ला, उसे न्याय दिलवाने हेतु निवेदन किया था। मुझे लालफ़ीताशाही और रागदरबारी भरे माहौल मे उम्मीद तो नहीं थी पर आशा की एक किरण मन मे कहीं थी कि  शायद महिलाओं और वो भी एक अनुसूचित जाति की महिला को शायद कोई सहायता मिल जाये जिससे उस महिला को न्याय मिले और अचानक से आयी इस विपदा से छुटकारा मिल सके एवं इन बड़े बड़े सरकारी संस्थानों की सार्थकता भी सिद्ध हो जाये। लेकिन दुर्भाग्य से मेरा पूर्वाग्रह सही साबित हुआ।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जन जाति आयोग ने तो उत्तर देने के भी कष्ट नहीं उठाया और राष्ट्रीय महिला आयोग ने उत्तर देने की औपचारिकता तो निभाई लेकिन प्र्त्योत्तर  मे जो भारी भरकम शिकायत का फार्म भर कर भेज देने का निर्देश दिया जिसको देख कर तो मेरा माथा ही ठनक गया। फॉर्म इतना लंबा और विस्तृत था कि साधारणतः कोई महिला इसे भर ही नहीं सकती थी। फार्म मे चार मुख्य शीर्षक के अंतर्गत शिकायत कर्ता (पीढ़िता से भिन्न), प्रतिवादी (जिसके विरुद्ध शिकायत की जानी है), पीढ़िता एवं शिकायत का विस्तृत विवरण मांगा गया था। इन चारों के उप शीर्ष मे नाम, पता, मोबाइल और मेल एड्रेस्स तो सामान्य थे पर परिवार वाद संख्या, जो कि आवश्यक उल्लेख शीर्ष मे थे भरना कठिन था। फिर डर ये था कि यदि पुलिस मे भी यदि शिकायत दी जाती है और  मै इस कदम को भी आगे बढ़ा भी  दूँ तो क्या वह पीढ़िता  क्या इतनी हिम्मत और समय दे सकेगी कि इस कानूनी पेचीदगियों और संस्थानों के चक्कर लगा सकेगी?

और अंतोतगत्वा ये सच है कि हमारे देश मे  न्याय पाना साधारण और गरीब आदमी के बशकी बात नहीं है ये कानून के दांव पेंच सिर्फ अमीर, सक्षम और राजनैतिक रसूख रखने वालों के लिये ही है। गरीब और निम्न वर्ग के तबके की नियति तो मात्र इस व्यवस्था के दो पाटों के बीच पिसना ही है।  

 

विजय सहगल    

 

 

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