"फूलों
की मंडी" (कहानी)

रतनगढ़ की फूलों के मंडी मे हर दिन की तरह आज
भी चहल पहल थी। शादी की सहालग होने के
कारण फूलों के भाव यूं भी कुछ ऊंचे हो जाते है। पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। लेकिन जब
से बीरु जैसे "कृषि विषय मे स्नातक" नौ जवान ने वैज्ञानिक तरीके उपयोग
कर फूलों की खेती का व्यवसाय शुरू किया रतन गढ़ मे फूलों की खेती का चलन बढ़ गया।
बीरु ने अपने जैसे कुछ युवा साथियों को जोड़,
खेती का स्वरूप ही बदल दिया। आसपास के कस्बों से भी अब फूलों का कारोबार करने बाले
व्यापारी फूलों की खरीददारी करने हेतु रतनगढ़
आने लगे थे। फूलों की उन्नतशील खेती के कारण फूलों के उत्पादक किसान बीरु के
नेतृत्व मे उन्नतशील बीज, खाद और कीटनाशक
के इस्तेमाल तो सीख ही चुके थे लेकिन अब फूलों के व्यवसाय मे आर्थिक मोल भाव और विभिन्न
तरह के फूलों के भाव के निर्धारण मे भी पारंगत हो गये थे। गाँव के पंडित जी से ज्योतिष
का पत्रा पढ़वा कर विवाह, त्योहार और अन्य
शुभ कारज की तिथियों की जानकारी भी ज्ञात कर अपने पास पहले से ही रखने लगे थे।
जिसके कारण रतन गढ़ के इन नौजवान फूलों के उत्पादक किसानों के संगठन के सदस्यों की
आमदनी मे अच्छा खासा इजाफा हो गया था और बीरु उन सब के बीच एक निर्विवाद नायक का
रूप ले चुका था। मंडी मे अब फूलों की आवक शादी विवाह या तीज त्योहारों मे बढ़ जाती
अन्यथा सामान्य दिनों मे फूलों की आवक भी सामान्य ही रहती।
पिछले दिनों बेमौसम की बरसात के कारण फूलों
के उत्पादन पर भी पड़ा। आज फूलों की आवक शादी की सहालग के बावजूद भी कम ही थी। मंडी
मे फूलों के भाव महंगे थे। व्यापारियों के बीच फूलों की मांग भी अच्छी थी बरसात का
उलाहना दे बीरु ने फूलों के दाम भी कुछ ऊंचे ही रक्खे थे। फिर भी व्यापारियों ने
अभी खरीद के लिए बोली लगाना शुरू ही किया थी कि बीरु की नज़र भीड़ से दूर खड़े एक सेना के सिपाही पर पड़ी जो
अपनी जेब से पैसे निकाल कुछ चिंतित
मुद्रा मे ग्रामीण साथियों के साथ हिसाब किताब लगा रहा था। बीरु के मन मे न जाने
क्या ख्याल आया कि वह चुपके से फूलों की बोली स्थल से निकल उस सैनिक के पास पहुँच
उसके चेहरे पर दीख रही चिंता की लकीरों का कारण जानने पहुंचा?
उस सैनिक ने कुछ झिझक और संकोच के साथ बीरु से कुछ बातचीत की। बातचीत के बाद उस
सैनिक और उसके साथ आये ग्रामीणों को
आश्वस्त कर बिदा लेने की मुद्रा मे हाथ
हिला, बीरु बापस अपने स्थल पर आ पहुंचा।
उसने अपने कुछ विश्वस्थ साथियों के कान मे
कुछ खुसुर-पुसुर की और अचानक ही फूलों की नीलामी रोक दी। विवाह मे फूलों की सजावट करने
वाले व्यापारियों ने सोचा खराब मौसम मे फूलों की कम आवक के कारण मौके का फायदा
उठाने हेतु फूल उत्पादक किसान,
फूलों के दाम बढ़ा कर अधिक लाभ कमाना चाहते है। फूलों के इन व्यापारियों मे अचानक
से फूलों की नीलामी रोके जाने से रोष था। कुछ व्यापारियों ने फूल उत्पादक किसानों
का लालच मे आकार इस तरह फूलों के दाम मे बढ़ोतरी कर मौके का फायदा उठाने पर अपना
आक्रोश प्रकट कर उन्हे भला बुरा भी कहा। व्यापारी आज फूलों की कुछ भी कीमत देने को तैयार थे लेकिन
बीरु और उसके साथी नीलामी रोकने के अपने निर्णय पर अडिग रह,
टस-से-मस न हुए। न केवल व्यापारियों अपितु फूल उत्पादक किसानों मे भी बीरु के इस
तरह अचानक फूलों की नीलामी रोके जाने के निर्णय पर आश्चर्य और अचंभित थे। अपने
मुखिया के प्रति आदर और सम्मान के भाव के चलते बीरु से इस मुद्दे पर सवाल-जबाब का
कोई प्रश्न ही नहीं था।
अचानक बीरु ने अपने सभी साथियों को फूलों की
पोटली बांध उसके साथ आने को कहा। अब तो मंडी मे खलबली मच गयी। फूलो के खरीददार
व्यापारियों मे बेचैनी तो थी पर अचानक इस
तरह किसानों का फूलों को बगैर बेचे,
बापस ले जाना आश्चर्य और कौतूहल उत्पन्न कर रहा था। सभी किसान फूलों की पोटली को
अपनी अपनी साइकल पर लाद बीरु के पीछे पीछे चल दिये। खोड़न गाँव
मे पहुँचते ही, वह सैनिक और
उसके ग्रामीण साथी जो बड़ी बेचैनी से बीरु की बाट ही जोह रहे थे गाँव के बाहर ही मिल
गये। बीरु और उसके किसान साथियों द्वारा साइकल पर लदी फूलों की पोटली को देख उस सैनिक की
सूखी आँखे नम हो गयी और चेहरे से चिंता की लकीरे गायब हो गायी। बीरु ने सैनिक को ढाढ़स बधाते हुए उसके साथियों द्वारा
लायी रंग बिरंगे फूलों की पोटलीयों को उस
सैनिक और उनके साथियों के सुपुर्द कर घर ले जाने के आग्रह के साथ बिदा कर वही खड़े हो
इंतज़ार करने लगे। सैनिक और उसके ग्रामीण साथी एक घर मे उन फूलों की पोटलियों को ले
गये जो गाँव मे ही वहाँ से चंद कदमों की
दूरी पर था। बीरु के साथियों को अब भी
अबूझ माजरा समझ न आया। तब बीरु ने अपने साथियों की जिज्ञासा और कौतूहल को शांत
करते हुए सारी घटना को कह सुनाया।
बीरु ने बताया कि आज सुबह जब उसने मंडी मे
उस चिंतित और परेशान सैनिक को देखा तो उसकी शंका और बेचैनी जानने हेतु उस सैनिक के
पास पहुंचा। उस सैनिक ने बताया कि उसकी रेजीमेंट का एक सिपाही देश की सीमाओं की
रक्षा करते हुए दुश्मनों से संघर्ष मे
शहीद हो गया है। उस वीर सैनिक की पार्थिव
देह उसके गाँव "खोड़न" लायी गयी
थी, जो रतन गढ़ से कुछ चंद किमी॰ ही दूर था। अंतिम
संस्कार की तैयारियों के बीच कुछ ग्राम वासियों के साथ वह सैनिक अपने शहीद
साथी के पवित्र देह पर फूलों की
पुष्पांजलि अर्पण हेतु मंडी मे फूलो को
क्रय करने आया था, पर मंडी मे फूलों के
ऊंचे भाव, कम आवक और व्यापारियों
का किसी भी कीमत पर फूलों की खरीदने की होड़
को देख वह चिंतित था। एक सैनिक के
सम्मान जनक अंतिम संस्कार मे फूलों को क्रय करने हेतु आवश्यक मुद्राओं की कमी
से उसके चेहरे पर उपजी चिंता की लकीरे स्पष्ट देखी जा सकती थी। जिसके कारण वह चिंतित एवं परेशान था। एकाएक यह सुन बीरु का
हृदय द्रवित हो उठा। सैनिक की बाते सुन लाख कोशिश के बावजूद उसकी नम आँखों के साथ उसका
चेहरा भावुक हो उठा!!
अपने आप को सम्हाल्ते हुए उसने आगे कहा,
"अपने देश और देशवासियों एवं हम सब
की सुख शांति और रक्षा के खातिर भारत माता के वीर सैनिक बेटे ने अपना जीवन बलिदान
कर दिया, उसके अंतिम संस्कार मे
हम सब के रहते हुए फूलों की कमी कैसे हो जाने देते?
अतः मैंने स्वतः ही आप सब की अनुमति के बिना ऐसा निर्णय ले लिया,
हमारे कारण आज आपको फूलों की बिक्री मे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा?
जिसके लिये मै आपसे, क्षमा प्रार्थी हूँ!! यह
सुन बीरु के सभी साथियों ने एक स्वर मे कहा,
"नहीं!! नहीं!! बीरु, तुम्हारा निर्णय
एक दम सही था"। "हमे तुम पर और तुम्हारे निर्णय पर गर्व है",
"बीरु"!!
अब तक वीर सैनिक के अंतिम संस्कार की
तैयारियाँ पूरी हो चुकी थी। पार्थिव देह को परिवार और रिश्तेदार अन्त्येष्टि हेतु
शमशान ले जाने के लिये तैयार थे। घर के शोक संतृप्त सदस्यों और रिशतेदारों के करुण
क्रंदन की आवाज यहाँ तक सुनी जा सकती थी। अचानक से वह सैनिक और उसके ग्रामीण साथी,
बीरु के पास आये और जेब से निकाल पैसों को बीरु की ओर बढ़ाते हुए कहा,
"भाई! इन पैसों से हम फूलों के दाम
की पूरी कीमत तो नहीं दे सकते पर तुम लोगो के नुकसान की कुछ हद तक भरपाई
इन पैसों से हो जाएगी"। "फूलों" के लिये हमारी चिंता,
दुःख और विषाद को सांझा करने के तुम्हारे अहसान से हम कभी उऋण नहीं हो सकते",
नम आँखों और भर्राई आबाज मे सैनिक ने कहा!!
उस वीर महानायक के बलिदान और आत्मोत्सर्ग के
सम्मान मे आँसू लिये बीरु ने बड़ी विनम्रता
और शिष्टता के साथ हाथ जोड़ उन लोगो को पैसे बापस करते हुए कहा,
"भाई!, हम लोग अब तक फूलों का
व्यापार करते रहे थे, पर आज पहली बार
हमने फूलों का "सच्चा सौदा" किया है!!
उस शहीद सैनिक की महान आत्मा को ये
हम सब की ओर से छोटी सी पुष्पांजलि है।
इतना कह बीरु के सभी साथी तमाम् शोकमग्न ग्रामीणणो के साथ बीर सैनिक की
अन्त्येष्टि मे शामिल हो, पीछे पीछे शमसान
घाट की ओर चल दिये!!
विजय सहगल