बुधवार, 27 अप्रैल 2022

20 फुट गहरा गड्ढा

 

"20 फुट गहरा गड्ढा"

 


भारत के लोकतन्त्र के सर्वोच्च सदन राज्यसभा के सदस्य महापुरुष श्री संजय राऊत ने पिछले  दिनों परोक्ष रूप से अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदी सांसद और विधायक राणा दंपति को धमकाते हुए  एक वक्तव्य दिया कि, "किसी ने भी यदि मातुश्री की तरफ टेड़ी  निगाह से भी देखा तो "20 फुट गहरे गड्ढे मे गाड़ देंगे"!! बड़े खेद और संताप का विषय है कि सांसद जैसे प्रतिष्ठित पदासीन जिम्मेदार राजनैतिक व्यक्ति कैसे अपने राजनैतिक प्रतिस्पर्धी को "20 फुट गहरे जमीन के नीचे गाड़ने" जैसे गैर जिम्मेदारान धमकी दे सकता है? एक सभ्य और प्रजातान्त्रिक देश मे कोई जनप्रतिनिधि  कैसे गली छाप शोहदे  की तरह किसी सांसद सदस्य/विधायक को तो छोड़िए किसी एक साधारण नागरिक को भी ऐसी अशोभनीय भाषा मे कैसे धमकी दे सकता है?  

किसी संस्था या व्यक्ति के लिए ऐसा अनुराग और प्रीति देख, मुझे गोस्वामी तुलसीदास की  उक्त कथा याद हो आयी। कैसे तुलसीदास जी अपनी ससुराल मे पत्नी प्रेम मे आसक्त हो भरी बरसात मे नदी मे बहती लाश को नाव समझ नदी पार कर, खिड़की पर लटके मरे साँप को रस्सी समझ जब रत्नावली के पास पहुंचे तो विदुषी पत्नी ने लज्जित हो ताना देते हुए कहा:-

"अस्थिचर्म मय  देह यह, तासौ  ऐसी प्रीत।"

"नेकु जो होती राम से, तो काहे भव भीत॥"      अर्थात

 

मेरे इस हाड़-मांस के शरीर मे जितनी तुम्हारी आसक्ति है, उसकी आधी भी यदि प्रभु श्री राम मे होती तो तुम्हारा जीवन सँवर गया होता।   

 

शिवसेना और मातुश्री के प्रति अपनी ऐसी ही निष्ठा और समर्पण का एकांश भी, "20 फुट गहरे गड्ढे मे गाड़ने" के अपने इस वक्तव्य को, देश पर टेड़ी निगाह रखने वाले द्रोहीयों और दुश्मनों  को चुनौती देते हुए कहा होता तो वे निर्विवाद रूप से एक राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नेताओं की श्रेणी मे होते!! लेकिन अफसोस और दुःख है ऐसा वक्तव्य दे कर वेशक वे शिवसेना प्रमुख के विश्वस्तों की सूंची मे तो आ सकते है लेकिन देश और देश के नागरिकों के समक्ष उनकी छवि मात्र एक चाटुकार और चापलूस नेता से ज्यादा नहीं हो सकती।

 

श्री संजय राऊत पहले भी "उखाड़ दिया", "गाड़ दिया" जैसे अशोभनीय कथन अपने राजनैतिक विरोधियों के लिये कह चुके है।  ऐसे अमर्यादित और असंस्कारित वक्तव्य उनका स्वभाव बन चुका है।  उम्र के इस पढ़ाव पर उनसे संस्कारित भाषा का  अपेक्षित  व्यवहार अब मात्र  शिवसेना प्रमुख  श्री उद्धो ठाकरे ही उन की जुबान पर अंकुश लगाने के आवश्यक निर्देश देने से ही हो सकता है। पर आज के इस राजनैतिक प्रदूषित माहौल मे क्या उनसे ऐसे  आवश्यक निर्देश की उम्मीद करना अतिरंजना न होगी?

 

विजय सहगल  

शनिवार, 23 अप्रैल 2022

चित्तौड़गढ़

"चित्तौड़गढ़"


















 

मेरा मानना है कि इतिहास के पन्नों मे "स्वर्णिम अक्षरों" मे नामांकन के लिये किसी राजवंश का राजा होना, बल एवं वैभवशाली या साहित्य, ज्ञान या अन्य कलाओं मे प्रवीण और निपुण  होने की पात्रता होना ही आवश्यक नहीं एक साधारण सेवक भी अपनी स्वामी भक्ति और सेवा समर्पण से भी अपना नाम स्वर्ण अक्षरों मे दर्ज़ करा सकता है। इतिहास मे इसका जीता जागता उदाहरण "पन्ना धाय माँ" है।      

स्वामी के इकलौते कुल चिराग को बचाने के लिये, पन्ना धाय द्वारा अपने पुत्र  का बलिदान एक सेवक द्वारा  स्वामी भक्ति का सर्वोच्च उदाहरण है। पन्ना धाय की इस कहानी को हमने बचपन मे अपनी पाठ्य पुस्तक "हमारे पूर्वज"  मे पढ़ा था। मेवाड़ राजवंश के कुल को दासी पुत्र  बनवारी के कोप से  बचाने हेतु, अपने पुत्र चन्दन को राजकुमारों के वस्त्र पहना, पलंग पर सुलाना और मेवाड़ राजकुमार उदय सिंह को बांस की टोकरी मे जूठे दोना पत्तलों के बीच छुपा कर महल के बाहर भेजने की अमिट कहानी आज भी मेरे मन मस्तिष्क मे स्पष्ट अंकित है। जब 6 मार्च 2021  को चित्तोडगढ़ के किले पर भ्रमण का कार्यक्रम बना तो सहसा ही "पन्ना धाय" की उक्त कहानी का स्मरण हो आया।

कल मेरे ऑटो सारथी रवि तिवारी जी से कार्यक्रम तय था। किसी कारणवश उनको  आने मे एक घंटे का विलंब हुआ लेकिन उनके मृद व्यवहार से मैंने दूसरा ऑटो उपलब्ध होते हुए भी रवि के साथ ही जाना तय किया। इस विलंबित काल का उपयोग मैंने कलेक्ट्रेट के सामने स्थित विनायक रेस्टोरेन्ट मे स्वल्पाहार ग्रहण करने मे किया। उत्तम एवं शुद्ध राजस्थानी नाश्ते की व्यवस्था तो थी यध्यपि हर जगह की तरह कम पराश्रमिक के चलते अच्छे सेवा भावी स्टाफ न होने के कारण नाश्ते परोसने की  सेवायें साधारण ही थी। जिलाधिकारी कार्यालय एवं शहर के हृदय स्थल होने के कारण तिराहे पर रौनक थी। कार्यालय प्रवेश द्वार के दोनों ओर मेवाड़ की राजवधू मीराबाई की विदाई के जीवंत चित्रण हाथी, घोड़ो और कहारों द्वारा डोली ले जाने का जीवंत चित्रण श्याम रंग की पाषाण मूर्तियों के माध्यम से किया गया था  जो सुंदर दिखाई दे रहा था। इसी बीच हमारे सारथी श्री रवि तिवारी जी अपना वाहन ले कर आ गये। इनकी सेवायें आप चित्तौड़गढ़  प्रवास के दौरान ले सकते है (मोबाइल न॰ 9166865014) आनंद आयेगा।

शहर के एक ओर पहाड़ी पर बना  चित्तौड़गढ़ किला अन्य दुर्गों की तरह ही बड़ी विशाल चहर दीवारी से घिरा था जिसके अंदर ही छोटा सा शहर वसा हुआ था। सात  बड़े दरवाजों जिन्हे क्रमश: पाडन पोल, भैरव, हनुमान, गणेश, जड़ेला, लक्ष्मण और राम पोल का नाम दिया गया है।  चहर दीवारी की अंदर रह रहे वासियों के पूर्वजों को रहने की राजाज्ञा ताम्र पत्र के माध्यम से प्रदान की गयी जो आज भी वैधानिक रूप से मान्य है। इन पोल अर्थात दरबाजों से  होते हुए चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर अल्प आवास एवं भ्रमण की राजाज्ञा  पुरातत्व विभाग द्वारा टिकिट के माध्यम से हमे दी गयी। दुर्ग मे प्रवेश करते ही उस महल के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ जहां पन्ना धाय द्वारा मेवाड़ राजवंश के राजकुमार उदय सिंह को बचाने के लिये अपने पुत्र चन्दन का बलिदान किया था। उस पवित्र धरा पर खड़े हो उस काल खंड को महसूस करना रोमांचकारी अनुभव था। यध्यपि कहीं कहीं महलों की छत्त और दीवारें ढह गयी थी फिर भी उन महलों की मजबूत नीव पर उन दिनों के वैभव को महसूस किया जा सकता था। किस तरह राज महलों मे चल रहे षडयंत्रों के कारण एक दासी पुत्र बनवीर ने मेवाड़ के कुल को समाप्त करने का कुत्सित प्रयास किया था लेकिन "पन्ना धाय माँ" द्वार अपने पुत्र के बलिदान के कारण उक्त अधम षड्यंत्र विफल हो गया।

एक अन्य स्थल "विजय स्तम्भ" के दर्शन का उत्सुकता भी मुझे बचपन से थी। जिसको देखना मेरे लिये बड़े कौतूहल और उत्साह का विषय था। 122 फुट ऊंची नौ मंज़िला वर्गाकार  इमारत भारतीय स्थापत्य कला की बारीक एवं सुंदर कारीगरी का अनमोल नमूना है। 1440 मे मेवाड़ के राजा राणा कुंभा द्वारा मोहम्मद खिलजी पर विजय पाने की स्मृति मे बनवाए गए इस स्तम्भ को विजय स्तम्भ का नाम दिया गया। सुरक्षा और अन्य कारणों से स्तम्भ मे प्रवेश तो  निषेध था पर स्तम्भ के बाहर, जहां तक दृष्टि जा सकती थी हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गयी है। किले के प्रांगढ़ मे कहीं से भी इस अद्भुद, आकर्षक विजय स्तम्भ के सौंदर्य को देखा जा सकता है।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग मे ही एक अन्य ऐतिहासिक मीरा बाई का मंदिर विजय स्तम्भ के नजदीक ही है। मीरा बाई के पति मेवाड़ राजवंश के राजा भोज राज के निधन के बाद राजसी वैभव से  विरक्ति धारण कर कृष्ण की भक्ति मे अपना शेष जीवन समर्पित कर दिया। मीरा बाई के कृष्ण भक्ति के  अनेक धार्मिक भजन और गीतों से देश का जन मानस अच्छी तरह परिचित है। उनकी कृष्ण भक्ति का गवाह ऐतिहासिक मीरा बाई मंदिर के दर्शन अपने आप मे दुर्लभ थे। दुर्ग परिसर मे स्थित समाधीश्वर मंदिर, एवं कुक्ड़ेश्वर मंदिर और कुंड भी आँखों को शीतलता प्रदान करने वाला था। बड़ी बड़ी मछलियों को आटे की गोलियां खिला उनके प्रकृतिक रूप को देखना, उनका अठखेलियाँ करना मन मे एक अलग ही सुख और संतोष को देने वाला था। सातबीस देवरी जैन मंदिर, जौहर कुंड, पद्मिनी महल, जैन कीर्ति स्तम्भ, महावीर जैन मंदिर, नील कंठ मंदिर का स्थापित्य, कला पुरातत्व के नायाब नमूने है। शायद इन्ही विशाल मंदिरों, महिलों और इमारतों के कारण ही इस  दुर्ग को भारत का सबसे बड़ा दुर्ग होने का  गौरव प्राप्त है।

किले के उत्तरी छोर पर स्थित मद्मनी महल सुसज्जित मेहराव युक्त प्रवेश द्वारों से घिरे महल ही रानी पद्मावती का महल है। इस महल की खिड़कियों से चारों तरफ तालाब से घिरे एक तीन मंजिला इमारत को देखा जा सकता है जिसे जल महल कहते है। यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है ये रानी पद्मावती वही रानी है जिनके उपर "रानी पद्मावती" नामक विवादास्पद चल चित्र पिछले दिनों जारी किया गया था। एक अन्य मांडू स्थित "जल महल" का उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग 17 दिसम्बर 2019 को किया था।( https://sahgalvk.blogspot.com/2019/12/2-28-2019-6.html ) वह भी अति सुंदर दर्शनीय स्थलों मे से एक था।      

इस तरह लगभग चार घंटे चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भ्रमण के बाद बापस अपने आश्रय स्थल की ओर रवाना हुए। चित्तौड़गढ़ दुर्ग की ऐतिहासिक और अविस्मरणीय यात्रा को अपनी यादों मे सँजोये रात की ट्रेन पकड़ने हेतु हम रेल्वे स्टेशन स्थित भोजनालय मे  पहुंचे ही थे कि ज्ञात हुआ कि रेल्वे कैंटीन का आज ही उद्घाटन हुआ है। ठेकेदार श्री गुप्ता जी को अनौपचारिक बधाई देने पर पता चला कि वह ग्वालियर के डबरा कस्बे के रहने वाले है। मेरा बैंक की सेवा का लगभग चार वर्ष डबरा प्रवास रहा था। उनके परिवार के लोगों से हमारा परिचय था। इस परिचय  और मुलाक़ात के बाद भोजनालय मे एक अलग ही महत्वपूर्ण आथित्य सत्कार गुप्ता बंधुओं द्वारा मुझे दिया गया जिसने इस यादगार यात्रा मे चार चाँद लगा दिये।  

विजय सहगल              

            




























बुधवार, 20 अप्रैल 2022

धार्मिक जलूसों पर हमले

 

"धार्मिक जलूसों पर हमले"





नव संबत्सर 2 अप्रैल 2022 से देश के विभिन्न शहरों मे पूर्व नियोजित तरीक़े से देश द्रोही और असामाजिक तत्वों द्वारा अचानक ही हिन्दू धार्मिक जलूस-जलसों पर आक्रमण किए गये। जिसमे राजस्थान के करौली कस्बे एवं मध्य प्रदेश मे खरगौन का शहर मुख्य तौर पर निशाने पर रहा। ब्लॉग लिखे जाने के दौरान दिल्ली के जहांगीरपुरी मे भी हनुमान जन्मोत्सव वाले दिन ऐसी ही घटना घाटी।  इन शहरों मे मुस्लिम बाहुल इलाकों मे कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा सुनोयोजित तरीक़े  से अशांति और अव्यवस्था फैलाने की कोशिश की गयी जिसमे कुछ हद तक ऐसे तत्व सफल भी रहे। दुर्भाग्य और शर्म की बात ये रही कि अधम सोच के अगुआ और रहनुमा श्री  असुद्दीन औवेसी एवं श्री दिग्विजय सिंह जैसे उम्रदराज और परिपक्व नेताओं के गैर जिम्मेदारन ब्यान आश्चर्यचकित और वेदना देने वाले थे। इन नेता द्व्य द्वारा  रामनौमी, संवत्सर, हनुमान जन्मोत्सव  के जलूस पर मुस्लिम बहुल इलाकों मे रह रहे चंद  असामाजिक कट्टरवादी तत्वों की अगुआई मे पत्थरबाजी की शुरुआत के बावजूद इन तत्वों को घटनाओं का पीड़ित और शोषित बताने का नीच निर्लज्ज प्रयास किया गया। दिग्विजय सिंह ने तो अपने ट्विटर अकाउंट पर एक तस्वीर पोस्ट कर लिखा था कि क्या तलवार-लाठी लेकर धार्मिक स्थल पर झंडा लगाना उचित है? क्या खरगोन प्रशासन ने इजाजत दी थी? लेकिन वो तस्वीर खरगोन या एमपी की न होकर मुजफ्फरपुर (बिहार) की थी!! इससे बड़ा झूठ कोई साधारण व्यक्ति ट्वीट करे तो उसकी बुद्धि और ज्ञान पर तो तरस खाया जा सकता है पर श्री दिग्विजय सिंह जो दशकों तक मध्य प्रदेश राज्य के मुख्यमंत्री रहे के बारे मे क्या कहा जाये विचारणीय प्रश्न है? पूर्व भारतीय रियासतों के राजाओं और राजकुमारों द्वारा अपनी त्रुटि को स्वीकार करना तो शायद उनके स्वभाव और संस्कृति मे ही नहीं और हम साधारण नागरिकों को इनसे इस बात की अपेक्षा भी नहीं करनी चाहिये?

श्री  असुद्दीन औवेसी द्वारा इन विघटन कारी तत्वों के निवास और संपातियों पर बुलडोजर चला ध्वस्त करने की  सरकारी मुहिम पर सवाल खड़े कर पूंछा कि किस कानून के तहत इन असामाजिक तत्वों की इमारतों को बुलडोजर द्वारा धरशाही किया जा रहा है? औवेसी जी ने विधि विषय मे वैरिस्टर की उपाधि जरूर हांसिल की है,  कानून के अच्छे ज्ञाता भी है, क्या इन गुंडा और समाज विरोधी तत्वों से भी वे  पूंछने की हिमाक़त  करेंगे कि किस कानून के तहत इन तत्वों ने शांतिप्रिय, बेकसूर नागरिकों के ऊपर पत्थरबाजी, हिंसा, आक्रमण और इनके घरों मे लूटपाट और आगजनी की है? जब इन उपद्रवी और बर्बर तत्वों को सामान्य नागरिकों के लिए शांति प्रिय जीवन जीने के विधि सम्मत  अधिकारों की चिंता नहीं तब कैसे इन हिंसक नरपिशाच  अपराधियों के मानव अधिकारों की पैरवी की जा सकती है? अनैतिक और अवैधानिक संसाधनों से अर्जित, अवैध संपतियों को धूलधूसरित कर नष्ट करने मे आपत्ति क्यों होना  चाहिये? अपराधी और द्रोहीयों का कोई धर्म ईमान नहीं होता, इनके विरुद्ध सख्त आपराधिक कार्यवाही ही एक मात्र उपाय है फिर वे किसी भी धर्म और संप्रदाय के हों। विकास दुबे "कानपुर वाला" इस बात का जीता जागता उदाहरण है। लेकिन इन दोनों राजनैतिक "श्रीमान पुरुषों" को अपने किए पर शायद ही कोई संकोंच या लज्जा हो?

करौली मे भी हुई सांप्रदायिक हिंसा मे राजस्थान सरकार के निष्ठुर मुख्य मंत्री श्री  अशोक गहलोत द्वारा  बगैर किसी जांच पड़ताल के हिंदुवादी संघटनों को दोषी एवं कुछ हिंसक मुस्लिम तत्वों को क्लीन चिट ठहरा कुकृत्य को समझा जा सकता है क्योंकि कॉंग्रेस के सत्तर दशकों से चली आ रही तुष्टीकरण की नीति का ही परिणाम है कि काँग्रेस की ये  दुर्गति  हुई है कि कभी सारे देश मे राज्य करने वाली काँग्रेस आज चंद राज्यों मे सिमट कर रह गयी है। ऐसी आशंका है कि आवश्यक सुधारात्मक बदलाव या उपाय नहीं किए गये तो शायद काँग्रेस सिर्फ इतिहास के पन्नों मे सिमट कर न रह जाय?  

लेकिन भा॰जा॰पा॰ को क्या कहा जाये जो बंगाल या अन्य राज्यों मे हुई हिंसा पर उनके मुख्य मंत्री सुश्री ममता बैनर्जी या श्री गहलोत को पानी पी-पी कर कोसने मे कोई कसर नहीं छोड़ती। उनके मुख्य मंत्रियों पर तुष्टीकरण का आरोप लगा इस्तीफे की मांग की जाती है। तो मध्य प्रदेश सरकार ने कैसे अतिवादियों द्वारा राज्य मे हिंसा को होने दिया? क्यों नहीं खुफिया विभाग द्वारा समय रहते सरकार को सचेत नहीं किया? यूपी मे योगी जी का अपराधियों के विरुद्ध सख्त संदेश और कार्यवाही के चलते कहीं कोई दंगे या झगड़े नहीं हुए, तब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज जी अपराधियों के दिल मे बैसा भय या डर उत्पन्न क्यों नहीं कर सके जो यूपी मे श्री योगी सरकार ने अपराधियों के विरुद्ध कर दिखाया? खरगौन मे लूटपाट, नागरिकों के घरों मे आगजनी, दंगे की स्थिति  कैसे उत्पन्न होने दी  और राज्य के शांतिप्रिय नागरिकों को हिंसा, आगजनी लूटपाट के कोप का भाजन क्यों होने दिया? इसका एक मात्र कारण मध्य प्रदेश शासन के प्रशासनिक अधिकारियों  का ढीला-ढाला एवं लचर रवैया ही एक मात्र कारण नज़र आता है, अन्यथा राज्य मे चाहे सुनोयोजित दंगे हों या  व्यापम जैसा घोटाले होते रहे सरकार को कोई खबर ही नहीं होती? हजारों-हजार  पढे-लिखे युवाओं का भविष्य व्यापम कांड मे चौपट न होता? ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य के अधिसंख्य  प्रशासनिक  अधिकारियों की निष्ठा और समर्पण राज्य मे सुशासन परस्त न होकर स्वार्थ परस्त प्रतीत होता है?

जब बंगाल और राजस्थान सरकार द्वारा दंगे रोकने मे कोताही के लिए निंदा और आलोचना की जाती हो, तो खरगौन मे साधारण लोगो के घरों मे लूटपाट और आगजनी रोकने मे असफल मध्य प्रदेश शासन  की आलोचना भी क्यों नहीं होना चाहिये? माननीय शिवराज जी को आम नागरिकों के धन संपत्ति के रक्षार्थ एवं राज्य मे सुशासन की अच्छी तरह स्थापना हेतु अपनी नीतियाँ, योजनाएँ और कार्यक्रम  भी बनाने पड़ेंगे? श्री मोदी जी कब तक आपके सत्ता और   शासन का "योग क्षेम" ("योगक्षेमं वहाम्यहम्") करते रहेंगे?  

इन सुनोयोजित दंगों पीएफ़आई एवं सीएफ़आई जैसे कततारपंथी संगठनों एवं मे षड्यंत्री कारी  विदेशी शक्तियों  और विदेशी फंडिंग की आशंका प्रकट की जा रही है जिससे इंकार नहीं किया जा सकता?  बंगला देशी और रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों का भी इन दंगों को फैलाने की साजिश मे  शामिल होने की शंकाएँ प्रकट की जा रही है। इन अपराधी तत्वों को विदेशी और विघटन करी तत्वों द्वारा धनापूर्ति की भी पूरी संभावना है।  अब वक्त आ गया इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और आम जनों को इन शरणार्थी हितों  से ऊपर उठ  देश हित मे संगठित हो आवाज उठानी होगी और इन अवैध घुसपैठियों को शक्ति पूर्वक देश के बाहर खदेड़ना होगा। स्वार्थ और धन  लोलुप राजनैतिक दलों से तो अब ऐसी उम्मीद व्यर्थ है?  

विजय सहगल

रविवार, 17 अप्रैल 2022

फूलों की मंडी

"फूलों की मंडी" (कहानी)






रतनगढ़ की फूलों के मंडी मे हर दिन की तरह आज भी  चहल पहल थी। शादी की सहालग होने के कारण फूलों के भाव यूं भी कुछ ऊंचे हो जाते है। पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। लेकिन जब से बीरु जैसे "कृषि विषय मे स्नातक" नौ जवान ने वैज्ञानिक तरीके उपयोग कर फूलों की खेती का व्यवसाय शुरू किया रतन गढ़ मे फूलों की खेती का चलन बढ़ गया। बीरु ने अपने जैसे कुछ युवा साथियों को जोड़, खेती का स्वरूप ही बदल दिया। आसपास के कस्बों से भी अब फूलों का कारोबार करने बाले व्यापारी फूलों की खरीददारी करने  हेतु रतनगढ़ आने लगे थे। फूलों की उन्नतशील खेती के कारण फूलों के उत्पादक किसान बीरु के नेतृत्व मे उन्नतशील बीज, खाद और कीटनाशक के इस्तेमाल तो सीख ही चुके थे लेकिन अब फूलों के व्यवसाय मे आर्थिक मोल भाव और विभिन्न तरह के फूलों के भाव के निर्धारण मे भी पारंगत हो गये थे। गाँव के पंडित जी से ज्योतिष का पत्रा पढ़वा कर विवाह, त्योहार और अन्य शुभ कारज की तिथियों की जानकारी भी ज्ञात कर अपने पास पहले से ही रखने लगे थे। जिसके कारण रतन गढ़ के इन नौजवान फूलों के उत्पादक किसानों के संगठन के सदस्यों की आमदनी मे अच्छा खासा इजाफा हो गया था और बीरु उन सब के बीच एक निर्विवाद नायक का रूप ले चुका था। मंडी मे अब फूलों की आवक शादी विवाह या तीज त्योहारों मे बढ़ जाती अन्यथा सामान्य दिनों मे फूलों की आवक भी सामान्य ही रहती।

पिछले दिनों बेमौसम की बरसात के कारण फूलों के उत्पादन पर भी पड़ा। आज फूलों की आवक शादी की सहालग के बावजूद भी कम ही थी। मंडी मे फूलों के भाव महंगे थे। व्यापारियों के बीच फूलों की मांग भी अच्छी थी बरसात का उलाहना दे बीरु ने फूलों के दाम भी कुछ ऊंचे ही रक्खे थे। फिर भी व्यापारियों ने अभी खरीद के लिए बोली लगाना शुरू ही किया  थी कि बीरु की नज़र भीड़ से दूर  खड़े एक सेना के सिपाही पर पड़ी  जो  अपनी  जेब से पैसे निकाल कुछ चिंतित मुद्रा मे ग्रामीण साथियों के साथ हिसाब किताब लगा रहा था। बीरु के मन मे न जाने क्या ख्याल आया कि वह चुपके से फूलों की बोली स्थल से निकल उस सैनिक के पास पहुँच उसके चेहरे पर दीख रही चिंता की लकीरों का कारण जानने  पहुंचा? उस सैनिक ने कुछ झिझक और संकोच के साथ बीरु से कुछ बातचीत की। बातचीत के बाद उस सैनिक और उसके साथ आये  ग्रामीणों को आश्वस्त कर बिदा लेने  की मुद्रा मे हाथ हिला, बीरु बापस अपने स्थल पर आ पहुंचा। 

उसने अपने कुछ विश्वस्थ साथियों के कान मे कुछ खुसुर-पुसुर की और अचानक ही फूलों की नीलामी रोक दी। विवाह मे फूलों की सजावट करने वाले व्यापारियों ने सोचा खराब मौसम मे फूलों की कम आवक के कारण मौके का फायदा उठाने हेतु  फूल उत्पादक किसान, फूलों के दाम बढ़ा कर अधिक लाभ कमाना चाहते है। फूलों के इन व्यापारियों मे अचानक से फूलों की नीलामी रोके जाने से रोष था। कुछ व्यापारियों ने फूल उत्पादक किसानों का लालच मे आकार इस तरह फूलों के दाम मे बढ़ोतरी कर मौके का फायदा उठाने पर अपना आक्रोश प्रकट कर उन्हे भला बुरा भी कहा। व्यापारी आज  फूलों की कुछ भी कीमत देने को तैयार थे लेकिन बीरु और उसके साथी नीलामी रोकने के अपने निर्णय पर अडिग रह, टस-से-मस न हुए। न केवल व्यापारियों अपितु फूल उत्पादक किसानों मे भी बीरु के इस तरह अचानक फूलों की नीलामी रोके जाने के निर्णय पर आश्चर्य और अचंभित थे। अपने मुखिया के प्रति आदर और सम्मान के भाव के चलते बीरु से इस मुद्दे पर सवाल-जबाब का कोई प्रश्न ही नहीं था।

अचानक बीरु ने अपने सभी साथियों को फूलों की पोटली बांध उसके साथ आने को कहा। अब तो मंडी मे खलबली मच गयी। फूलो के खरीददार व्यापारियों मे बेचैनी तो थी  पर अचानक इस तरह किसानों का फूलों को बगैर बेचे, बापस ले जाना आश्चर्य और कौतूहल उत्पन्न कर रहा था। सभी किसान फूलों की पोटली को अपनी अपनी साइकल पर लाद बीरु के पीछे पीछे चल दिये।   खोड़न गाँव  मे पहुँचते ही, वह सैनिक और उसके ग्रामीण साथी जो बड़ी बेचैनी से बीरु की बाट ही जोह रहे थे गाँव के बाहर ही मिल गये। बीरु और उसके किसान साथियों द्वारा  साइकल पर लदी फूलों की पोटली को देख उस सैनिक की सूखी आँखे नम हो गयी और चेहरे से चिंता की लकीरे गायब हो गायी। बीरु  ने सैनिक को ढाढ़स बधाते हुए उसके साथियों द्वारा लायी  रंग बिरंगे फूलों की पोटलीयों को उस सैनिक और उनके साथियों के सुपुर्द कर घर ले जाने के आग्रह के साथ बिदा कर वही खड़े हो इंतज़ार करने लगे। सैनिक और उसके ग्रामीण साथी एक घर मे उन फूलों की पोटलियों को ले गये जो गाँव मे ही वहाँ  से चंद कदमों की दूरी पर था।  बीरु के साथियों को अब भी अबूझ माजरा समझ न आया। तब बीरु ने अपने साथियों की जिज्ञासा और कौतूहल को शांत करते हुए सारी घटना को कह सुनाया।     

बीरु ने बताया कि आज सुबह जब उसने मंडी मे उस चिंतित और परेशान सैनिक को देखा तो उसकी शंका और बेचैनी जानने हेतु उस सैनिक के पास पहुंचा। उस सैनिक ने बताया कि उसकी रेजीमेंट का एक सिपाही देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए दुश्मनों  से संघर्ष मे शहीद हो गया है। उस वीर सैनिक की   पार्थिव देह  उसके गाँव "खोड़न" लायी गयी थी, जो रतन गढ़ से कुछ चंद किमी॰ ही दूर था। अंतिम संस्कार की तैयारियों के बीच कुछ ग्राम वासियों के साथ वह सैनिक अपने शहीद साथी  के पवित्र देह पर फूलों की पुष्पांजलि अर्पण  हेतु मंडी मे फूलो को क्रय करने आया था, पर मंडी मे फूलों के ऊंचे भाव, कम आवक और व्यापारियों का किसी भी कीमत पर फूलों की खरीदने की होड़  को  देख वह चिंतित था। एक सैनिक के सम्मान जनक  अंतिम संस्कार मे  फूलों को क्रय करने हेतु आवश्यक मुद्राओं की कमी से उसके चेहरे पर उपजी चिंता की लकीरे स्पष्ट देखी जा सकती थी।  जिसके कारण  वह चिंतित एवं परेशान था। एकाएक यह सुन बीरु का हृदय द्रवित हो उठा। सैनिक की बाते सुन लाख कोशिश के बावजूद उसकी नम आँखों के साथ उसका चेहरा भावुक हो उठा!!

अपने आप को सम्हाल्ते हुए उसने आगे कहा, "अपने देश और देशवासियों एवं हम  सब की सुख शांति और रक्षा के खातिर भारत माता के वीर सैनिक बेटे ने अपना जीवन बलिदान कर दिया, उसके अंतिम संस्कार मे हम सब के रहते हुए फूलों की कमी कैसे हो जाने देते? अतः मैंने स्वतः ही आप सब की अनुमति के बिना ऐसा निर्णय ले लिया, हमारे कारण आज आपको फूलों की बिक्री मे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा? जिसके लिये मै आपसे, क्षमा प्रार्थी हूँ!! यह सुन बीरु के सभी साथियों ने एक स्वर मे कहा, "नहीं!! नहीं!! बीरु, तुम्हारा निर्णय एक दम सही था"। "हमे तुम पर और तुम्हारे निर्णय पर गर्व है", "बीरु"!!

अब तक वीर सैनिक के अंतिम संस्कार की तैयारियाँ पूरी हो चुकी थी। पार्थिव देह को परिवार और रिश्तेदार अन्त्येष्टि हेतु शमशान ले जाने के लिये तैयार थे। घर के शोक संतृप्त सदस्यों और रिशतेदारों के करुण क्रंदन की आवाज यहाँ तक सुनी जा सकती थी। अचानक से वह सैनिक और उसके ग्रामीण साथी, बीरु के पास आये और जेब से निकाल पैसों को बीरु की ओर बढ़ाते हुए कहा, "भाई! इन पैसों से हम फूलों के  दाम की पूरी कीमत  तो नहीं दे  सकते पर तुम लोगो के नुकसान की कुछ हद तक भरपाई इन पैसों से हो जाएगी"। "फूलों" के लिये हमारी चिंता, दुःख और विषाद को सांझा करने के तुम्हारे अहसान से हम कभी उऋण नहीं हो सकते", नम आँखों और भर्राई आबाज मे सैनिक ने कहा!!

उस वीर महानायक के बलिदान और आत्मोत्सर्ग के सम्मान मे आँसू लिये  बीरु ने बड़ी विनम्रता और शिष्टता के साथ हाथ जोड़ उन लोगो को पैसे बापस करते हुए कहा, "भाई!, हम लोग अब तक फूलों का व्यापार करते रहे थे, पर आज पहली बार हमने फूलों का "सच्चा सौदा" किया है!!  उस शहीद सैनिक की महान आत्मा को  ये हम सब की ओर से  छोटी सी पुष्पांजलि है। इतना कह बीरु के सभी साथी तमाम् शोकमग्न ग्रामीणणो के साथ बीर सैनिक की अन्त्येष्टि मे शामिल हो, पीछे पीछे शमसान घाट  की ओर चल दिये!!

विजय सहगल        


गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

नादिया रेप कांड

 

"नादिया रेप कांड"




किसी महिला या बालिका के विरुद्ध अपराधिक जांच की मांग की पृक्रिया  को पटरी से उतारने का सबसे आसान और घिनौना तरीका उस महिला/बालिका के  चरित्र पर अंगुली उठा उसका चरित्र हनन करना होता है। 4 अप्रैल 2022 को बंगाल के नादिया जिले के हंसखाली ग्राम  मे 14 वर्षीय  एक नाबालिग पीढ़ित किशोरी की  रेप के बाद हत्या की जांच की मांग के जबाब मे माननीय मुख्यमंत्री सुश्री ममता बैनर्जी ने कुछ ऐसा ही  कुत्सित और अधम प्रयास मृतक पीढ़िता पर चारित्रिक दोषारोपण कर हत्या और बलात्कार की जांच को भटकाने का निर्लज्ज काम किया है। अमानवीयता और निष्ठुरता की पराकाष्ठा देखिये पीढ़िता के परिवार के घावों पर मलहम की बजाय मिर्च लगते हुए उनका कहना था कि, "आपको कैसे पता चलेगा कि उसके साथ रेप हुआ था? या वह गर्भवती थी? या उसका प्रेम प्रसंग था? या वह बीमार थी?  एक  पीढ़ित परिवार जिसकी 14 वर्षीय किशोर बेटी की सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्यों द्वारा रेप के बाद हत्या कर दी जाये और मृतिका के दोषियों को सजा देने की बात तो दूर उल्टा मृतक नाबालिग के चरित्र हनन के कुत्सित प्रयास कि वह गर्भवती थी!! उसका प्रेम प्रसंग था!! जैसे दोषारोपण करना एक पदासीन महिला मुख्यमंत्री को ये शोभा नहीं देता? ऐसी अधम सोच और नकारात्मक मानसिकता की महिला से नैतिकता की उम्मीद करना तो व्यर्थ है लेकिन विधिसम्मत मांग तो की ही जा सकती है कि वह अपने संवैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन मे उन बलात्कारियों, हत्यारों और अपराधियों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करें फिर भले ही उनका प्रेम प्रसंग ही क्यों न हो? क्या प्रेम प्रसंग करने वाले किशोर को ये अधिकार मिल जाता है कि वह नाबालिग किशोरी के साथ बलात्कार करे? या उसकी हिंसात्मक तरीकों से हत्या कर दे? कदापि नहीं!! माननीय महोदया कानून भी एक नाबालिग किशोरी से रिश्ते को अपराध की श्रेणी मे रखता है चाहे वह मामला यूपी का हो या बंगाल या देश के किसी भी हिस्से का।

किसी राज्य की कानून व्यवस्था को संचालित करने वाली एजन्सियों पर अविश्वास प्रकट कर जब कोई न्यायालय अपराध की जांच केंद्रीय जांच ब्यरों को सौपे तो इससे शर्मनाक बात क्या हो सकती है? न्यायालय की ऐसी टिप्पड़ियाँ समूचे शासन तंत्र पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है। पश्चिमी बंगाल मे पिछले कुछ समय से ऐसी ही स्थितियाँ निर्मित हो रही है। एक के बाद एक कई आपराधिक मामलों मे कलकत्ता हाई कोर्ट ने आपराधिक मामलों की जांच केंद्रीय एजन्सि को सौंपी है। बंगाल के हंसखाली रेप मामले मे भी ऐसा निर्णय कलकत्ता हाई कोर्ट ने हाल ही मे दिया है। किसी राज्य की मुख्य मंत्री अपने अनुयायियों और अनुगामियों के प्रति इतना आसक्त और  मोहग्रस्त कैसे हो सकती है कि उनकी अनैतिक और अन्यायी कारगुजारियाँ उसे दिखाई ही न दे? अन्यथा राज्य के आम नागरिकों के विरुद्ध  रेप और हत्या जैसे घिनौने कृत कोई मुख्यमंत्री कैसे सहन कर सकता है? यदि ममता बैनर्जी परिवार और राजनैतिक कार्यकर्ताओं के प्रति अनुराग  का एकांश भी राज्य के नागरिकों के साथ निष्पक्षता से करें तो राजधर्म के पालन करने वाली वे सर्वोत्तम लोक शासक हो सकती थी? पर दुर्भाग्य से ऐसा हो न सका अन्यथा माननीय न्यायालयों को लगातार राज्य मे घट रहे आपराधिक मामलों की जांच के लिये राज्य शासन की एजेंसियों से परे केंद्रीय  जांच ब्यरो को क्यों निर्देशित करना पड़ता।

सुश्री ममता बैनर्जी को जो पिछले कुछ समय से केंद्रीय राजनीति मे आने को लालायित है, निश्चित ही उन्हे आत्मचिंतन और आत्ममंथन करना होगा  कि इस सोच और मानसिकता के साथ  देश के सर्वसाधारण जन उनका नेतृत्व स्वीकार करेंगे?

विजय सहगल      

 


शनिवार, 9 अप्रैल 2022

एक युवा-श्री ओम प्रकाश शर्मा

 

"एक युवा-श्री ओम प्रकाश शर्मा"










मैंने अपने पूर्व के कुछ ब्लॉगस  मे ग्वालियर स्थित शारदा बाल ग्राम की पहाड़ी का जिक्र किया था (https://sahgalvk.blogspot.com/2020/11/blog-post_10.html)  प्रातः या संध्या  भ्रमण पर जाने वालों के लिए ये पहाड़ी श्री रामकृष्ण आश्रम प्रबंधन के सौजन्य  एवं प्रकृति द्वारा प्रदत्त अनमोल उपहार है। पहाड़, पगडंडी, जंगल के प्राकृतिक माहौल एवं मोर, तीतर, कोयल तोतो एवं अन्य अनेक  पक्षियों के कलरव के बीच अनाथ एवं निर्बल आदिवासी बच्चों को शिक्षित करने के लिए आवास की व्यवस्था भी संस्थान द्वारा इस बाल ग्राम मे की गयी है।  बाल ग्राम के आसपास रहने वालों एवं यहाँ भ्रमण के लिये आने वालों के लिये ये पहाड़ी अनमोल रत्न की तरह कोहनूर हीरा है।

इस प्राकृतिक गुणों से समृद्ध भ्रमण स्थल पर आप देवासुर संग्राम को एक साथ स्पष्ट रूप से  देख सकते है। देव और असुर दोनों ही स्वभाव के लोग नित्य इस स्थल पर आपको देखने मिल जायेंगे। जहां एक ओर असुर स्वभाव के कुछ घुमक्कड़ 2-3 फुट की नीम के बाल वृक्ष से उसकी हत्या कर दातुन तोड़, अपने कुरूप चेहरे की बत्तीसी साफ करते, चोरी के फूलों को तोड़ अपनी जेब या प्लास्टिक थैली मे भरते नज़र आएंगे, यही नहीं ये दानव प्रकृति के लोग अपने दुर्व्यसनों के पान मसाले, तंबाकू, चिप्स, चॉकलेट बिस्कुट के पाउच पूरे भ्रमण स्थल पर फेंकते मिल जायेंगे जिनको रास्ते के दोनों तरफ गंदगी फैलाते देखा जा सकता है। वही ठीक इस के विपरीत "देव" स्वभाव के श्रीमान पुरुष अप्रैल-मई के भयंकर गर्मी मे छोटे छोटे प्लास्टिक के पीपों से पेड़-पौधों को पानी देते या पक्षियों को दाना देते मिल जायेंगे।

इन आशा और निराशाओं की इन फुंसियों के बीच एक 90 बर्षीय सज्जन को देख उत्साह उमंग की प्रेरणा मिलती है, जिन्हे  मै पिछले सात-आठ माह से भ्रमण करते देख रहा हूँ। आज के अर्थप्रधान युग मे जब मनुष्य येन, केन, प्रकारेण धन प्राप्ति की अतृप्त लालसा मे निराशा और हताशा के बीच दुःख और शोक मे मग्न रहता हो, तो इन महानुभाव को सांसरिक माया मोह से दूर एक सच्चे निष्काम कर्मयोगी की तरह  भगवान की भक्ति मे रत् भ्रमण करते देखा जा सकता है। उम्र के इस पड़ाव मे प्रायः व्यक्ति बीमारियों और शारीरिक अक्षमताओं के चलते  हताश और निराश होकर अपने परिवारों पर आश्रित हो अपने भाग्य को नियति मान घर के दालान या पौर मे अपना जीवन व्यतीत करने लगता है। नब्बे वर्षीय इन साधारण और सरल प्रौढ़ सज्जन श्री ओम प्रकाश शर्मा  को शारदा बाल ग्राम मे सर्दी, गर्मी या बरसात के मौसम के परे, समाज या शासन से बिना किसी शिकवे-शिकायत या उलाहने के नित्य भ्रमण करते देखा जा सकता है। इस दौरान जैसे जैसे मैंने इन माननीय शर्मा जी के बारे मे जानने की कोशिश की बैसे बैसे  इनके उत्साह और उमंग के सामने मे नतमस्तक होता चला गया। ये बुजुर्ग सज्जन वास्तव न केवल मेरी अपितु प्रातः भ्रमण को आने वाले हर उस व्यक्ति की प्रेरणा के स्त्रोत है जो उन्हे अपनी धुन मे रत् मंथर गति से सैर करते देखता है।    

इस उम्र मे भी ईश्वर द्वारा प्रदत्त इस मानव काया को उम्र के इस पढ़ाव पर भी अनासक्त भाव से, जीवन रूपी इस चादर मे बिना किसी दाग-धब्बे  के  साफ सुथरी और स्वस्थ रक्ख  कबीर दास जी के उन पंक्तियों को चरितार्थ किया है कि:- "चदरिया झीनी रे झीनी......  ..........ज्यों की त्यों रख दीनी! ....चदरिया झीनी रे झीनी..........!

प्रातः पाँच साढ़े पाँच बजे भगवान कृष्ण और राधा के नाम का स्मरण करते हुए वे शारदा बाल ग्राम मे मिल जायेंगे। एक दिन जब सर्दियों की सुबह वे लंबा चौड़ा ओवर कोट, जिसका बजन 3-4 किलो से कम नहीं रहा होगा अपनी दुबली पतली काया पर ओढ़ भ्रमण पर मिले।  जिज्ञासा बस मैंने उनको प्रणाम कर उनके बारे मे जानने की उत्सुकता प्रकट की तो उन्होने बताया कि युवा अवस्था मे लगभग 35-40 साल उन्होने दिल्ली के करोल बाग मे अपने ऑटो पार्ट्स के व्यवसाय को चलाया। चार बेटियों की शादी कर अपने सामाजिक जिम्मेदारियों के निर्वहन के बाद भगवान कृष्ण की जन्म एवं कर्म स्थली  मे अपना  शेष जीवन भगवान कृष्ण और राधा की भक्ति मे बिताने के उद्देश्य से मथुरा के बरसाने गाँव मे अपना डेरा डाल दिया। इस तरह अपना जमा जमाया कारोबार समाप्त कर भगवान भक्ति मे रमा कर  वान प्रस्थ जीवन व्यतीत किया। पिछले कुछ समय से ग्वालियर मे अकेले एक किराये के मकान मे रह रहे है। जीवन यापन हेतु सारे कार्य वे स्वयं ही करते है। हर रोज लगभग 3-4 किमी के भ्रमण से ही उन्हे संतोष नहीं है वे अपने साथ लाये दाने को बाल ग्राम मे स्थित मोर, नीलकंठ चकोर, कोयल पक्षियों के साथ सांझा कर शायद हरिओम शरण के इस भजन की यादे ताजा करते है:- "नाचेंगे मोर बनकर हे श्याम तेरे द्वारे"।  "घनश्याम छाये रहना, बनकर के मेघ कारे"॥

इतना सब करने के बाद भी ऐसा लगता है कि अति वरिष्ठ ओम  प्रकाश जी जैसे युवा का मन नहीं भरा। किसी विद्वान ने सही ही कहा है कि उम्र महज एक संख्या है!! जिसे उम्र के किसी भी पढ़ाव पर ठीक उसी तरह उत्साह और उमंग के साथ जिया जा सकता है जैसे आप बचपन या किशोर अवस्था मे जीते थे। प्रातः घूमने के दौरान व्यायाम हेतु जिम के इस क्षेत्र मे प्रायः बच्चे और नौजवान किशोरों को ही कसरत करते हुए देखता था पर एक दिन बालग्राम मे लगे अनेक प्रकार के कसरत करने के यंत्रों के बीच मे ओम प्रकाश जी को जिम की मशीन के पास खड़े अपनी बारी की प्रतीक्षा करते देख मै चौंक गया। मुझे तो उम्मीद भी नहीं थी कि 90 वर्षीय कोई प्रौढ़ जिम के यंत्रों के साथ भी दो-दो हाथ कर सकता है। लेकिन मै गलत था। अपनी बारी आने पर ओम प्रकाश जी ने हाथों और पैरों की कसरत का जो नमूना पेश किया वो बेमिशाल था। पूरी ताकत से हाथों और पैरों को विपरीत दिशा मे शक्ति लगा अपने श्रम से जो गति पैदा की वो गति के नियम का एक आदर्श नमूना थी। इन्हे वीडियो मे देख आप भी रोमांच और आश्चर्य का अनुभव किए बिना नहीं रह सकेंगे।

मेरे सहित अनेक लोगो के प्रेरणा के स्रोत एक अजनबी श्री ओम प्रकाश शर्मा जी के स्वस्थ और दीर्घ जीवन की कामना करते है ताकि वे अनेक हताश और निराश लोगो को एक दीपक की तरह  अपनी आदर्श जिजीविषा से  प्रेरणा के स्रोत बन जीवन के प्रति प्यार के पथ को प्रकाशित करते रहे।    

विजय सहगल