रविवार, 31 अक्टूबर 2021

तुरतुक गाँव (लद्धाख)

 

"तुरतुक गाँव (लद्धाख)"







19 सितम्बर 2021 को हमारे ग्रुप के कार्यक्रम भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित गाँव थाँग एवं  तुरतुक को  देखने का था। हमारे टेम्पो ट्रेक्स के सारथी श्री पुंचुक थे जो 17 तारीख को हम लोगो के लेह पहुँचने के साथ ही हमारे गाइड एवं मार्ग दर्शक थे।

19 सितम्बर की सुबह थी, सुबह नींद जल्दी खुल गयी सोचा प्रातः भ्रमण के साथ बाहर गाँव की रूपरेखा देखी जाये साथ मे कहीं किसी खोमचे पर चाय आदि का रसास्वादन भी कर लेंगे।   प्रातः सुबह 5.30 बजे जब मै भ्रमण के लिए हंडर गाँव स्थित नुब्रा घाटी मे निकला तो ठंड तो इतनी विशेष नहीं थी पर गाँव की सड़कों मे वाहनों की इक्का दुक्का आवाजही के अतरिक्त कोई मनुष्य नज़र नहीं आया। मै दिल्ली या अन्य मैदानी क्षेत्रों की तरह चाय की तलाश मे किसी खोमचे या ठेले की तलाश कर रहा था पर कुछ परिंदों की आवाज के सिवा नीरव शांति छाई हुई थी। सुनसान गलियों मे उद्देश्यहीन विचरण करते हुए मुझे ऊंचे ऊंचे पहाड़ो की चोटियों पर सूरज की किरणे पर्वतों को स्वर्ण स्नान कराती नज़र आयी। हमने एक घर के सामने एक त्रिकोणीय लकड़ी मे गेरुई रंग मे रंगी  गोलाकार पत्थर को रक्खे देखा और नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ गया। आगे फिर इसी तरह की आकृति को देख मै ने बापस आकार उस घर के बाहर की तस्वीर  मोबाइल से निकाली। मुझे लगा मध्य भारत की तरह ही शायद यहाँ भी नीबू-मिर्ची की तरह कोई टोटका होता होगा पर जबाब देने के लिए घरों के बाहर कोई दिखा नहीं। शायद हमारे  सुधि पाठक इसका कोई सार्थक उत्तर खोजेने मे हमारी  मदद करेंगे?

नुब्रा घाटी मे प्रातः भ्रमण के दौरान मैंने एक और  खूबी देखी, पहाड़ों का साफ पानी छोटी-छोटी नहरों की तरह  पूरे गाँव मे  घरों के बाहर मे बह रहा था। ऐसा प्रतीत होता है मानों यहाँ की म्यूनिसिपल बोर्ड या पंचायत ने मैदानी इलाके मे नल से जल पहुँचने की तरह पूरे गाँव मे नहरों का जाल बिच्छा लोगो के घरों मे पानी पहुंचाने की व्यवस्था कर दी हो।  इस जल को ही लोग निस्तार के लिए छोटी छोटी कैपलरी के माध्यम से पानी को एकत्रित कर इस्तेमाल करते हों? पूरे गाँव मे होम स्टे, गेस्ट हाउस मे उपस्थित दो पहिये और चार पहिये वाहनों की संख्या दर्शा रही थी कि पर्यटकों की अच्छी ख़ासी संख्या उस दिन हंडर गाँव मे थी। लेकिन प्रातः छह बजे, गाँव का निस्तब्ध मौन बता रहा था कि पर्यटक गहरी थकान के बाद चैन की नींद ले रहे थे  ताकि पाकिस्तान की सीमा से लगे "थाँग" एवं "तुरतुक" गाँव के भ्रमण के लिये आज ऊर्जा एकत्रित की जा सके।

भ्रमण के दौरान चाय के लिए खोमचे के खोजने के असफल प्रयास के बाद   मै भी चाय के बिना हंडर गाँव  स्थित  अपने गेस्ट हाउस मे आ गया। ऐसा प्रतीत होता है कि गाँव की आर्थिक समृद्धि ग्रामवासियों को सुबह चाय बनाने जैसे  श्रम साध्य कार्य करने की इजाजत न देती हो। हम भी   नुब्रा घाटी के आखिरी गाँव "तुरतुक" के भ्रमण हेतु स्नान ध्यान करने के लिए अपने टेंट मे आ गये।              

आज का दिन बड़ा थका देने वाला होना था। हंडर से "थाँग" एवं "तुरतुक"  गाँव एवं बापसी कुल लगभग 340 किमी॰ की यात्रा टेम्पो ट्रेक्स जो होने वाली थी। सभी लोग कुछ अलसाये से उठ आठ बजे तक तैयार होकर होटल के रेस्टुरेंट मे नाश्ते के लिए एकत्रित हो चुके थे। महाराष्ट्र के मुंबई और पुणे के भी कुछ पर्यटकों से अभिवादन पश्चात संक्षिप्त परिचाय हुआ। नाश्ता उत्तर भारतीय परंपरा के अनुसार छोले पूड़ी, पोहा, आमलेट आदि स्वल्पाहार का मिश्रण था जो सभी को प्रिय लगा। लगभग साढ़े-आठ बजे हम लोगो ने तुरतुक गाँव की यात्रा के लिए प्रस्थान किया। गाँव मे ही कुछ सेव, केले एवं पानी का इंतजाम किया क्योंकि रास्ते मे बहुत अच्छी व्यवस्था नहीं मिलने के संकेत हमारे सारथी श्री पुंचुक ने पहले ही दे दिये था। पक्के रास्ते पर सरपट दौड़ती टेम्पो ट्रेक्स की गति सड़कों की दशा व्याँ कर रही थी। पक्की डम्मर रोड देख दिल बाग-बाग था कि देश के सीमावर्ती इलाकों मे इतना सुंदर और पक्का सड़क ढाँचा देश की प्रगति की कहानी कह रहा था। यध्यपि सीमा पर ढांचागत सड़कों के विकास को देख नाम लेने से बचने के बावजूद अपने को मोदी सरकार की तारीफ करने से न रोक सका। हंडर गाँव से बाहर निकलते ही मीलों दूर तक जगह जगह सैनिक छावनी और सीमा तक पहुँचने के साज़ों सामान को देख सेना और सैनिकों के प्रति नतमस्तक हो गया जो विपरीत परिस्थितियों मे हम देशवासियों को  चैन की नींद देने के लिए  अपनी रातों की नींद को कुर्बान कर रहे थे।       

दूर दूर उजड़े वीरान पहाड़ों के बींच कोलतार की डम्मर रोड ऐसी प्रतीत हो रही थी मानों रेगिस्तान के सीने को चीर कर बहती कोई काले पानी की जलधारा मजबूती के साथ बह रही हो।  रास्ते मे दूर दूर तक बीरने मे रेगिस्तान नज़र आ रहा था। पेड़-पौधों या हरी घास से रहित   ऊंची ऊंची चोटियों के बीच सड़क के साथ साथ कल कल बह रही श्योंक नदी रेगिस्तान मे अति सुंदर नखलिस्तान की तस्वीर पेश कर रही थी। सीमावर्ती गाँव थाँग से 4-5 किमी पहले सेना की चौकी पर आने वाले सभी वाहनों के कागज एवं यात्रियों की फोटो पहचान पत्र जाँचे गये और रजिस्टर मे प्रविष्टि के बाद आगे जाने दिया। थाँग गाँव से लगभग 1 किमी दूर भारत पाकिस्तान बार्डर  पर  देश को विभाजित करने वाली लोहे की काँटेदार दीवार भारत-पाक सीमा को स्पष्ट विभाजित करती दिखाई दे रही थी। भारत की तरफ तिरंगे झंडे के साथ लगातार पर्यटक की आवक जावक थी पर पाकिस्तान की तरफ से इस तरह के कोई निशान दिखाई नहीं दिये। थाँग गाँव के उसी स्थान पर कुछ स्वल्पाहार ग्रहण कर बापस हम लोग तुरतुक गाँव आये।  गाँव की तलहटी मे श्योंक नदी का पानी पत्थरों से टकरा कर बहुत ही सुंदर दृश्य पेश कर रहा था। तलहटी के उपर गाँव वसा हुआ था। छोटे-छोटे बच्चे पर्यटकों से आइस क्रीम की चाह मे पर्यटकों के आगे पीछे घूम रहे थे। घनी बसाहट के वीच गाँव मे पर्यटकों के भोजन और आहार हेतु एक रेस्टोरेन्ट भी अपनी सेवाएँ दे रहा था। जहां हमारे ग्रुप सदस्यों ने भोजन ग्रहण किया। गाँव मे पर्यटकों के आकर्षण का कोई स्थान आदि तुरतुक मे नहीं दिखाई दिया। पर तलहटी मे नदी की बहती धाराएँ बहुत ही मनोहारी चित्र प्रस्तुत कर रही थी।  

इसी  थाँग एवं तुरतुक गाँव को 1947 मे जिस पाकिस्तान ने धोखा  देकर अपने साथ मिला लिया था उसी तुरतुक ग्राम को सन 1971 के भारत पाक युद्ध मे हमारे देश की सेनाओं ने लेह स्काउट के साथ मिलकर पुनः बापस अपने कब्जे मे ले लिया। बाल्टिस्तान के अधिकतर वाल्टी रहवासी इस गाँव के निवासी है। पूरी 160 किमी॰ लंबी सड़क के एक ओर जहां ऊंची पहाड़ की चोटियाँ है वही साथ साथ श्योंक नदी की तीव्र वेग से बहती साफ सुंदर जलधार है। लेह लद्धाख की जीवन रेखा श्योंक और नुब्रा नदियां लेह को  धन-धान्य से सींचती हुयी कालांतर मे अभिन्न भारत के पाकिस्तान  सूबे को समृद्ध करती है और स्पष्ट संदेश देती है कि बेशक 1947 मे हमारे राजनैतिक रहनुमाओं ने देश को खंडित कर विभाजित कर दिया है पर आज भी पाकिस्तान कब्जे वाले कश्मीर सहित पूरे पाकिस्तान को भारत का अभिन्न  अंग मान बहने वाली "श्योंक" और "नुब्रा" नदियों  की धाराएँ अधिकार सहित देश की अभिवाज्य धरा पर बहती है और जिस तरह हमारी बहादुर सेना और सुरक्षा बालों ने 1971 के युद्ध मे कश्मीर के इस तुरतुक गाँव को बापस पाकिस्तान  छीना था शीघ्र ही पूरे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को बापस ले लेंगी।   

हंडर गाँव, नुब्रा घाटी  की बापसी हेतु हम लोग चार बजे बापस आये। थक कर बुरा हाल था और उपर से हमारे टेम्पो ट्रेक्स के ड्राईवर पुंचुक ने बताया बस खराब है और आगे नहीं जा सकती। अब तो सभी की हालत खराब थी। पर पुंचुक ने अन्य साथी बस ड्राईवर से बात कर हम 12 लोगो को दो बसों मे समायोजित कराया तब जा कर एक-डेढ़ घंटे इंतज़ार के बाद हम लोगो को हंडर गाँव पहुंचते-पहुँचते रात के आठ बज चुके थे। रात्री भोजन आदि कर कल पेंगोंक झील जाने हेतु हम लोग अपने-अपने टेंट्स मे चले गये।

विजय सहगल

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

डिस्किथ-गोम्पा-नुब्रा (लेह-लद्धाख)

 

"डिस्किथ-गोम्पा-नुब्रा (लेह-लद्धाख)"









नुब्रा के प्रवेश द्वार पर डिस्किट गाँव मे स्थित डिस्किट गोम्पा पर भगवान बुद्धा मैत्रेय के रूप मे एक पहाड़ी पर विराजमान मुद्रा मे है। 32 मीटर ऊंची उक्त रंग विरंगी आकर्षक, दर्शनीय  प्रतिमा एक प्राचीनतम तिब्बती बौद्ध मठ है। उक्त बौद्ध मठ श्योंक नदी के किनारे स्थित पहाड़ी पर पर्यटकों का आकर्षण का केंद्र है। खुले आसमान के नीचे विशाल प्रांगण मे पर्यटक प्रतिमा के साथ घाटी मे नदी किनारे हरे-भरे वृक्षों के बीच बौद्ध मतबलम्बियों बहुल "डिस्किथ गाँव" मे नज़र आते  छोटे छोटे मकान गाँव की आर्थिक समृद्धि की कहानी स्वतः ही व्यान करते है। यहाँ आवास हेतु होम स्टे और गेस्ट हाउस अच्छी संख्या मे उपलब्ध है। प्रतिमा के दाहिनी तरफ बहुमंज़िला सफ़ेद रंग इमारत मे लाल रंग के खिड़की, दरबाजे आकर्षक ढंग से नज़र आ रहे थे जो बौद्ध मठ के कार्यालय, छात्रावास, बौद्ध मठ के पठन पाठन के केंद्र हैं और जिसमे बौद्ध धर्म के अनुयायी शिक्षक और छात्र आदि निवासरत थे। बौद्ध प्रतिमा की परिक्रमा करते हुए उस  अविस्मरणीय मनोरम परिदृश्य को अपनी  यादों मे सँजोये बड़े बेमन से हम वहाँ से प्रस्थान हुए। मेरी हार्दिक इक्छा थी कि एक दिन का प्रवास उस गाँव मे करूँ पर जानकारी के अभाव मे अपने पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम मे परिवर्तन संभव न था।   

साफ सुथरे बौद्ध मठ के बाद हम लोगो का अगला पढ़ाव नुब्रा पहाड़ियों मे स्थित "रेत के टीले" थे। नुब्रा नदी के किनारे लगभग पाँच बजे हम सभी इन "sand dunes" अर्थात रेत बालू के टीले पर थे। पर्यटकों की अच्छी ख़ासी संख्या उस दिन यहाँ पर नज़र आ रही थी जिसका अनुमान नदी के मुहाने पर स्थित पार्किंग मे खड़ी सैकड़ों  गाड़ियों को देख कर भी लगाया जा सकता था। आसमान की ऊंचाई को छूती गगनचुंबी पर्वत चोटियाँ प्रकृतिक सौन्दर्य से समृद्ध शाली इस स्थान की स्पष्ट   दास्तां ब्याँ कर रही थी। इस दैवीय सौन्दर्य  मे विश्वप्रसिद्ध दो कूबढ़ वाले नुब्रा ऊंट नुब्रा नदी के  रेतीले मैदानों मे अपनी उपस्थिती दर्ज करा प्रकृति की खूबसूरती मे चार चाँद लगा रहे थे। ऐसा कहा जाता है कि दो कूबढ़ वाले ये सुंदर ऊंट दुनियाँ मे सिर्फ नुब्रा घाटी मे ही पाये जाते है। ये दो कूबढ़ वाले ऊंट  पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र था। ग्रुप के सभी सदस्य ऊंट पर बैठ कर सेल्फी लेने की दिली ईच्छा मन मे दबाये ऊंट पर सवार पर्यटकों को देख रहे थे। ऊंटों पर सवारी की  तीब्र  आकांक्षा और ईक्षा तो सवारी के लिये टिकटों की लंबी-लंबी लाइन देख कर पूरी होने की संभावना कम ही थी। क्योंकि घंटे दो घंटे की प्रतीक्षा सूची जो थी और एकाधा घंटे मे ही अंधेरा घिरने की संभावना जो थी।

यहाँ-वहाँ लोगो को ऊंट पर सवारी देख कर ही  मन को तसल्ली दी जा रही थी कि अचानक एक "बगैर पैसे के ऊंट" से मुलाक़ात हो गयी जो यूं ही रेत पर बैठ जुगाली कर जा रहा था। मैंने बचपन मे न्यूटन के गति का पहला नियम पढ़ा था जो कि इस बिना पैसे के ऊंट पर शत प्रतिशत लागू हो रहा था। जैसे गति के नियम के अनुसार "कोई स्थिर है तो स्थिर ही रहेगी और यदि चलायमान  रही है तो वह लगातार चलती रहेगी जब तक की उस पर कोई  बल प्रयोग न किया जाये। आप भी सोचते होंगे कि क्या फालतू की बकवास लेकर बैठ गये मिस्टर सहगल?? दरअसल इस नियम की व्याख्या मैंने कुछ यूं की कि यदि ऊंट बैठा है तो बैठा ही रहेगा या चल रहा है तो चलता ही रहेगा जब तक कि उसका मालिक उसे उठने-बैठने या रुकने  के लिये अपनी कूट भाषा (कोड-वर्ड) मे न कहे वह किसी के भी कहने पर न तो बैठेगा, न चलेगा!! इस बात की आजमाइश मैंने उसे हिला डुलाके देखा, हुट-उट्र, हुस्ट  आदि कह कर धकेला पर वह टस-से-मस नहीं हुआ!! फिर क्या था दोनों कूबढ़ के बीच पैर डाल कर मै बैठ गया और शानदार सेल्फी ली। मेरी देखा देखि सभी बारह सदस्यों ने उस बगैर पैसे के ऊंट पर बैठ कर अपनी-अपनी फोटो ली खिचवाई। आखिरी सदस्य उमा गुप्ता भाभी जी के फोटो निकलते ही उस ऊंट का मालिक न जाने  कहाँ से प्रकट हो गया और उसके एक इशारे से ऊंट उठ कर उसके साथ चला गया। इस तरह हम लोगो ने उस ऊंट को  बगैर पैसे के ऊंट के खिताब से अलंकृत कर दिया।         

अब तक रात्रि आगमन पर पूर्णिमा के चाँद की रोशनी मे चमकते ये टीले चाँदी के रेत की तरह प्रतीत हो रहे थे। "हंडर गाँव"  जहां "नुब्रा सराय" नमक होटल  के टेंटों मे हम लोगो के ठहरने की व्यवस्था थी। हम लोगो ने रात्रि विश्राम हेतु  होटल के लिये प्रस्थान किया।

घाटी मे बसे हंडर गाँव जो लगभग चारों चारों ओर पहाड़ों से घिरा है। गाँव के छोटे से बाज़ार मे आवश्यक वस्तुओं विशेषकर खाने पीने की वस्तुएँ सहज उपलब्ध थी।  प्रायः हंडर गाँव मे हर घर मे होम स्टे या टेंट के गेस्ट हाउस बने है जो पर्यटकों से होने वाली आय और गाँव की समृद्धि की शानदार कहानी कहते है। कैसे गाँव की पंचायत और गाँव के लोग मिलकर उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम दोहन कर पर्यटन उद्धयोग का  उपयोग साधारण जनता के हित मे कर सकते है ये इसका जीता जागता उदाहरण है।

विजय सहगल

शनिवार, 23 अक्टूबर 2021

लखबीर की सद्गति

 

"लखबीर की सद्गति"





अभी पिछले दिनों 14 अक्टूबर 2021 को दिल्ली के सिंघू बार्डर पर अनुसूचित जाति के एक सिक्ख युवक लखबीर सिंह की बड़ी नृशंस रूप से हत्या कर दी गयी। पिछले  नौ-दस महीने से अपनी मांगो के लिए आंदोलनरत  संयुक्त किसान मोर्चा के मुख्य मंच के नज़दीक  हुई इस जघन्य हत्या से किसान नेता श्री  हन्नन मुल्ला  एवं श्री राकेश टिकैत ने इस अमानवीय नृशंस हत्या से अपने संगठन का पल्ला यह कहते हुए झाड़ लिया कि "मृतक से हमारा कोई संबंध नहीं"।  बात तो सही है एक अनुसूचित जाति के गरीब अनपढ़ व्यक्ति से वैभव शाली, बलशाली  किसान नेताओं  का क्या संबंध? संबंध तो बराबरी वालों से होता है। कहाँ राष्ट्रीय स्तर के किसान नेता श्री टिकैत और कहाँ निम्न जाति का सेवादार कमजोर, कृषक मजदूर लखबिंदर? इसका  संबंध तो किसान नेताओं से हो ही नहीं सकता? जैसा कि एक कहावत भी  है "कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली?"

अरे लक्खी यदि तूँ आज जिंदा होता तो ये ही मंचाशीन किसान नेता तेरे को आवाज देकर मंच पर पानी मंगाते, चाय मंगाते, तेरे से तेल मालिश करा भारत बंद के आवाहन के लिये ऊर्जा एकत्रित करते? आपस मे चर्चा करते? क्योंकि तू तो सेवादार जो ठहरा?  आज जब तेरी मंच के नीचे जघन्य तरीके से अंग भंग कर हत्या हो रही थी? चित्कार चित्कार कर जब तू निर्दयी लोगो से, दया की भीख मांग रहा था? वेदना और दर्द से हृदय विदारक क्रंदन कर बेरहम हत्यारों से, रहम की भीख मांग रहा था? जिन दिलों मे थोड़ी भी दया, करुणा या मानवता थी, तुम्हारा  दर्दनाक विलाप, चित्कार लोगो के दिलों को चीर कर, दिल मे दर्द पैदा कर रहा था!! मानवता चीख-चीख कर इस वहशी घटना से शर्मसार हो रही थी, तब ये किसान नेता बालिश्त भर की दूरी पर नींद मे सोने का स्वांग कर रहे थे और  घटना होने के बाद सोने की दुहाई दे घटना से अनिभिज्ञ और अंजान होने का नाटक कर रहे थे। आज जब तेरी नृशंस हत्या हो गयी तो स्वाभाविक था इन जमींदार किसान मालिकों से तेरा क्या संबंध? यदि ये किसान नेता हनन मुल्ला  और टिकैत साहब लखबीर से मालिक-नौकर के से  संबंध  सार्वजनिक तौर पर  स्वीकारेंगे तो फिर इस बनावटी किसान-किसान, भाई-भाई के समाजवादी नीति के ढौंग का  क्या होगा? फिर किसान आंदोलन की आढ़ मे शासक और शोषित की सच्चाई दुनियाँ के सामने आने पर जग हँसाई नहीं होगी?     

अरे!! लक्खी, बेशक तेरी दर्दनाक और रक्त रंजित हत्या पर मानवता दृवित और शर्मशार हो रही थी तब इन घाघ, कपटी और धूर्त समाज के चेहरों  पर सिकन भी न थी क्योंकि ये मोटी खाल के लोग अच्छी तरह जानते है कि जिस जाति, कुल, समाज मे तूने जन्म लिया है उसकी यही नियति है और यही परिणति है!! अरे, लक्खी!! तेरी दर्दनाक मौत पर राजनैतिक दलों का  कोई नेता घड़ियाली आँसू भी नहीं बहाएगा क्योंकि तेरी मौत से उन्हे कोई राजनैतिक लाभ जो नहीं होने वाला? देखना!!, एकाधा दिन की सुर्खियों के बाद दुनियाँ को दहला देने वाली ये घटना सदा सर्वदा के लिये इतिहास के पन्नों मे दफन हो जायेगी?

अरे!! लखबीर तेरी दिन दहाड़े लहू-लुहान कर हुई हत्या पर इस व्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। तुमसे पूर्व तुम्हारे पूर्वजों पर भी सैकड़ों वर्षों से होते चले आ रहे अनाचार और अत्याचार ने तुम्हारे कुल को मानव समाज का हिस्सा भी मानने इंकार कर दिया तब कैसे हम तुझे अपना हिस्सा माने? और जब तूँ  हमारे समाज का हिस्सा ही नहीं, तो लखबीर!! तेरे से इन मठाधीशों का क्या संबंध? किसान नेताओं ने सही ही कहा है, रे!! "मृतक लखबीर का हमसे कोई संबंध नहीं!!" अरे!! यदि तुम कुछ ऐसा करते जैसा पंजाब मे रेल रोक कर किया गया? यदि तुम दिल्ली के बार्डर पर सड़क रोकते? यदि तुम 26 जनवरी को दिल्ली के लाल किले पर चढ़ाई करते? यदि तुम लखीमपुर मे आंदोलन करते हुए मारे जाते तो तुमसे संबंध होना स्वावभिक था! तब तुम्हारी मौत पर 40-50 लाख रुपए अनुग्रह राशि और सरकारी नौकरी की मांग भी की जाती? तुम्हारे बच्चों की परवरिश की चिंता की जाती? पर अफसोस लखबीर तुमने ऐसा कुछ किया ही नहीं। तब हे! लखबीरे, "तुमसे हमारा क्या संबंध"?

बैसे लखबीर तुम्हारी आत्मा नाहक ही अपनी तीन बच्चियों के लिए चिंतित है? सन् 1947 के बाद, देश की सारी सरकारें ने तुम्हारे वर्ग और जाति के कल्याण के लिये हजारों योजनाए बनायी और उन पर अरबों रुपए खर्च भी किये मगर तेरी चिंताएँ दूर न कर सकी? तुम्हारे दादे-परदादों की चिंताएँ भी  दूर न हो सकी? तो फिर अपनी संतानों की परवरिश की चिंता से तेरा क्या प्रयोजन रे!? जैसे तैसे लोगो की चाकरी कर दो वक्त की रोटी से अपना  गुजर-वसर कर ही लेंगी? तूँ भी तो यहाँ सिंघू बार्डर पर ऐसा ही बेगारी करने को मजबूर था रे!!

अरे लखबीर तुम्हें तो अपने भाग्य पर इतराना चाहिए, तकदीर को सराहना चाहिये  क्योंकि तू तो मात्र 34 वर्ष की आयु मे इस जरा-मरण के चक्र से मुक्त हो गया। तेरे बाप-दादों के ऐसे भाग्य कहाँ थे, रे? सारी उम्र, बीमारी-हारी मे भी लोगो का मैला ढोते, लोगो की चाकरी करते और जी हजूरी करते घिसट-घिसट कर इस लोक से मुक्त हुए? तूँ कितना सौभाग्य शाली है रे! लखबीर, देवदूतों द्वारा गठित अदालत ने तेरी मुक्ति के लिये न दलील, न वकील और न अपील के झंझट से तुझे मुक्त कर सीधे ही फैसला सुना दिया और तेरी किस्मत तो देख तुझे अपने ही पवित्र कर कमलों से जीवन-मरण के चक्र से मुक्त कर दिया!! तेरी तो सद्गति हो गयी लखबीरे!!!!

इसीलिए किसान नेताओं ने सच ही कहा रे!! लखबीर, तुम जैसी महान आत्मा से किसान नेताओं का कोई संबंध कैसे हो सकता है????     

विजय सहगल

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2021

सौ करोड़ का "टीका करण अभियान

 

"सौ करोड़ का "टीका करण अभियान"










जब पहले चरण मे 16 जनवरी 2021 को स्वास्थय कर्मियों से जब कोरोना टीकारण की शुरुआत हुई तो ऐसा प्रतीत हो रहा था कि इतनी विशाल जनसंख्या के बीच कोरोना टीकाकरण को कैसे सम्हाला जाएगा या कैसे इसको सुचारु रूप से संचालन किया जाएगा। लोगो मे अनेक भ्रांतियाँ और शंकाएँ थी जो स्वाभाविक थी। 130 करोड़ की आबादी मे 100 करोड़ की आबादी  को इस महामारी के विरुद्ध कोरोना टीकारण अभियान कोई आसान कम नहीं था। कैसे इतनी बड़ी संख्या मे टीकों का उत्पादन होगा? और हो भी गया तो लोगो के बीच वितरण और टीकारण कोई साधारण काम न था। पर जैसे तैसे एक शुरुआत स्वास्थ्य कर्मियों के बीच हो चुकी थी। लोगो को भरोसा नहीं था कि अभियान इतनी ईमानदारी पूर्वक चल भी पाएगा या नहीं। टीका करण की इस धारणा मे आग लगाने का काम सपा के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने ये ब्यान देकर किया कि "वे कोरोना का टीका नहीं लेंगे, क्योंकि ये भाजपा का टीका है"। देश के सबसे बड़े सूबे का मुख्य मंत्री इतना गैर ज़िम्मेदारी पूर्ण ब्यान  कैसे दे सकता है?

2 फरवरी को जब कोरोना योद्धाओं को टीकाकरण शुरू हुआ तब तक टीका करण अभियान की बुनियाद रक्खी जा चुकी थी। पर शंकाओं-कुशंकाओं का बाज़ार गर्म था। भारत की आबादी को देखते हुए ये इतना बड़ा अभियान था कि कई छोटे देश की आबादी हमारे उत्तर प्रदेश से भी कम थी। लेकिंन  प्रशंसा करनी होगी कोविन/आरोग्य एप्प की जिसने देश की 130 करोड़ की आबादी को लक्ष्य कर बनाये इस सूचना तकनीकि एप्प का निर्माण किया। इस एप्प के निर्माण मे जुड़ी संस्थाएं एवं उनके इंजीनियर भी बधाई के पात्र है जिनके बिना इस कार्यक्रम को सुचारु रूप से लागू करना संभव न हो पाता।  सरकारी योजनाओं मे बेईमानी भ्रष्टाचार की घटनाएँ आम होती है लेकिन कुछ छोटी मोटी कमियों को छोड़ कर टीका करण अभियान बिना किसी गड़बड़ी, भेदभाव या पक्षपात के पूरी ईमानदारी से आज भी जारी है जो काबिले तारीफ है।  प्राइवेट हॉस्पिटल मे जहां टीके की कीमत 790 रुपए है और जो सरकारी अस्पतालों मे निःशुल्क उपलब्ध कराये जा रहे है अतः सहज ही टीका करण पर होने वाले व्यय का अनुमान  लगाया जा सकता है। बीबीसी लंदन द्वारा कोरोना टीका करण की धीमी गति पर सवाल किए गए थे। काँग्रेस के पूर्व अध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने कहा था कि जिस गति टीका करण की चल रहा है उसको देखते हुए देश की कुल आबादी को सन  2024 तक भी टीके नहीं लगाये जा सकेंगे।

विपक्षी दलों के कुछ गणमान्य नेताओं का अल्प सोच तुच्छ  मानसिकता  भी इस अभियान मे देखने को मिली। इस अभियान मे कुछ राजनैतिक नेताओं और धार्मिक नेताओं ने अपने फौरी लाभ के लिये हर धर्म और संप्रदाय के लोगो को कोरोना टीकारण के खिलाफ भड़काकर अभियान को पटरी से नीचे उतारने की कोशिश की। आम जनों के बीच टीकाकरण के विरुद्ध अफवाहों को फैलाने मे कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी। कई राज्यों के मंत्रियों ने अपने बाहुबल का हवाला दे टीका उत्पादन कंपनी के मुखिया श्री पूनवाला को टीकों का ज्यादा कोटा  मांग करते हुए धमकियाँ भी दी, ये इन राज्यों के मंत्रियों की शिक्षा और संस्कारों को दर्शाता है कि वे किस माहौल मे रह कर राजनीति की शिक्षा ग्रहण किए है।  गैर भाजपाई राज्यों के मुख्य मंत्री चिल्ला-चिल्ला कर जमीन आसमान एक कर अभियान को केंद्र से राज्यों को देने का आग्रह किया। टीकों के वितरण मे गैरभजपाई राज्यों से पक्षपात के भी आरोप लगाये जिनमे दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल एवं पश्चिमी बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बैनर्जी प्रमुख थी। जब ज़िम्मेदारी ठीक से सम्हाली न जा सकी तो टीका की कमी का ठीकरा केंद्र के माथे पर फोड़ आगे ज्यादा दिन टीकाकरण अभियान न चला सके और अन्तोतगत्वा अपना पल्ला झाड़ कर खड़े हो गए। ये देश का दुर्भाग्य है कि विपक्षी दल सिर्फ विरोध के लिए विरोध कर रहे थे। हर रोज हजारों की संख्या मे हो रही मौतों के बावजूद देश के सबसे पुराने राजनैतिक दल काँग्रेस ने सार्वजनिक मंच से एक दिन भी आम जनों से कोरोना की वैक्सीन लेने का आग्रह नहीं किया? विपक्ष के सभी कद्दावर नेताओं ने चोरी-छुपे वैक्सीन लेने के बावजूद इस सूचना या फोटो को  समाचार पत्रों मे आम नहीं किया ताकि ये संदेश न जाए कि सरकार की कोरोना के विरुद्ध प्रयासों मे इन नेताओं का  भी सहयोग है? आज 21 अक्टूबर 2021 को 100 करोड़ के टीका करण के अवसर पर इस कार्यक्रम मे शामिल चिकित्सा कर्मियों का आभार और जनता को बधाई एवं अभियान की प्रशंसा के विपरीत कॉंग्रेस का ट्वीट शर्मसार और लज्जित करने वाला है जिसमे मोदी सरकार को निक्कमेपन और टीका करण मे आपराधिक लापरवाही का दोषी करार दिया!!

सारी दुनियाँ के रजनीतिज्ञों ने अपने अपने देश मे एक राय होकर इस महामारी से लोहा ले जब  एक जुट नज़र आये  पर कोरोना टीका करण के इस अभियान मे भारत के अधिकतर विरोधी राजनैतिज्ञ दल  टांग खींचू नीति के फलस्वरूप अपवाद थे।

कुछ जगहों मे टीके के तापमान को बनाए रखते हुए सुदूर गाँव मे पहुँचना कठिन राह थी। इन बाधाओं को भी इन स्वास्थ कर्मियों ने अरुणाचल, लेह लद्धाख, जम्मू-कश्मीर, झारखंड बिहार जैसे क्षेत्रों मे जहां रास्ते मे नदियां और पहाड़ बाधा थे वहाँ भी पैदल चलकर अभियान को सफल बनाने के प्रयास की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है।

अभियान की रफ्तार मे जब कभी ये समाचार मिलता कि एक दिन मे एक करोड़ से भी ज्यादा टीके सफलता पूर्वक लगाए गए तो भारत की क्षमताओं के नए आयाम देख अत्यंत खुशी का अनुभव होता था कि भारत आत्मनिर्भरता और आपदा मे अवसर खोजने की क्षमताओं के दोहन मे भी अग्रणी कदम बढ़ा रहा है।

कोरोना की द्व्तिय लहर मे जब सारे देश मे ये  महामारी चरम पर थी। ओक्सिजन के अभाव मे लोग कालकावलित हो रहे थे तब कुछ धन लोलुप समाज एवं देश द्रोही  लोगो ने अव्यवस्था फैलाने के कुत्सित प्रयास किए। इन लोगो ने रेमडेसिविर इंजेक्शन  की काला बाजारी मे भी अपने हाथों मे कालिख पोती पर सरकार के निरंतर प्रयास ने ऑक्सीजन  की कमी को दूर तो किया लेकिन अफसोस अनेकों नागरिकों की जान की कीमत पर। तमाम घरों,  लोगो ने अपने स्वजनों को सदा-सदा के लिए खो दिया। घरों के इकलौते चिराग बुझ गये पर यहाँ भी राजनैतिक रोटियाँ सेकने मे इन निर्लज्ज लोगो ने कोई कसर नहीं छोड़ी।       

आज दिनांक 21 अक्टूबर 2021 का दिन वास्तव मे जश्न मनाने का दिन है, हर्ष उल्लास का दिन है जब देश के चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े डॉक्टर, नर्स और टीका करण से जुड़े सभी  कर्मियों ने  कोरोना के विरुद्ध लड़ाई मे 100 करोड़ लोगो का टीकाकरण करके एक बहुत बड़ी  एवं अति महत्वपूर्ण उपलब्धि हांसिल की। आइये इस अवसर देश के सामान्य जनों के अतिरिक्त टीकाकरण कार्यक्रम से जुड़े चिकित्सकों, नर्सों, एवं अन्य प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से जुड़े स्वास्थ्य, सुरक्षा मे लगे कर्मियों का अभिनंदन और धन्यवाद ज्ञपित करें।

विजय सहगल     

 

रविवार, 17 अक्टूबर 2021

लेह-नुब्रा वैलि

                                                              "लेह-नुब्रा वैलि"








लेह लद्दाख की यात्रा देश के अन्य पर्यटक केन्द्रों की तरह उत्साह उमंग से जरा हट के है। यहाँ के पर्यटन मे प्रसन्नता के साथ रोमांच, उत्तेजना एवं कुछ कुछ कठिनाइयाँ लिए पर प्रकृतिक सौन्दर्य से भरपूर है। एक ओर जहां  समुद्र तल से सर्वाधिक ऊंचाई होने के कारण जहां सुंदर प्रकृतिक दृश्यों के अनंत भरपूर भंडार है वहीं ओक्सिजन की कमी के कारण स्वांस संबंधी कुछ थोड़ी बहुत परेशानियाँ भी है। लेकिन एक-दो दिन रहने एवं आराम करने से यहाँ के मौसम के अनुकूल अभ्यस्त हुआ जा सकता है। लेह लद्धाख मे "डायमोक्स " दवाई जो सर्वसुलभ होने के कारण अति ऊंचाई की बीमारी से बचाने मे सहायक है। हर छोटी कस्बे या गाँव मे सरकारी चिकिसकीय सेवाएँ उपलब्ध है। राज्य सरकार की डिस्पेन्सरी/अस्पताल एवं सेना की मेडिकल कोर के केंद्र भी पर्यटकों के बीच लेह लद्धाख की इस सामान्य श्वांस संबन्धित इस अति ऊंचाई की बीमारी से बाकिफ है और इसके बीमारी के विरुद्ध उपलब्ध साधन सहायक सिद्ध होते है।  इसलिये इस भय से बहुत ज्यादा घबराने या डरने की आवश्यकता भी नहीं क्योंकि इस बर्फीले रेगिस्तान के प्रकृतिक दृश्यों का सम्मोहन आपका ध्यान स्वतः ही छोटी-मोटी  बाधाओं से हटा जो लेता है।

दिनांक 18 सितम्बर 2021 को हम छः परिवारों के बारह सदस्यों ने लेह से नुब्रा वैलि के लिए टेम्पो ट्रेक्स सी प्रस्थान किया जहां हमारा दो दिन का प्रवास था। लेह से नुब्रा घाटी की दूरी लगभग 160 किमी थी। घुमाव दार पहाड़ी रस्तों मे इस यात्रा की अवधि 6-7 घंटे की थी जिसमे 5-6 अधिकृत   विराम शामिल थे  जिसमे नाश्ता, खाना या कुछ प्रसिद्ध पर्यटक केन्द्रों के अतरिक्त रुकना तय था किन्तु ग्रुप की दो महिला सदस्यों का घुमाव दार पहाड़ी रस्तों मे यात्रा के अभ्यस्त न होने से लगातार उल्टी के के कारण 5-6 अतरिक्त विराम लेने पड़े। लेकिन श्रीमती उमा गुप्ता एवं श्रीमती रति वर्मा की तारीफ करनी होगी कि उल्टी की इन बाधाओं के बावजूद मजाल है, कि इनके  नुब्रा वैली, तुरतुक एवं पेंगोंग झील घूमने के उत्साह मे कहीं कोई लेश मात्र भी कमी आयी हो?

पहला पढ़ाव लेह शहर के बाहर की ऊंची पहाड़ियो पर था जहां से लेह शहर के सहज और सरल दर्शन हुए। दूर वर्फ से ढंकी पहाड़ियाँ दिखाई दी। आगे करीब 39-40 किमी पर खरदुंगला  पास पर जाना हुआ जो नुब्रा वैलि एवं श्योंक वैली का प्रवेश द्वार है साथ ही साथ ये दुनियाँ का सबसे ऊंचा (समुद्र ताल से 17982 फुट ऊंचाई) ऑटो वाहन मार्ग है। खरदुंगला  मार्ग पर उम्मीद थी कि शायद बर्फ के पहाड़ और चोटियाँ नजदीक से दिखाई देंगी और ऐसा हुआ भी लेकिन उस छोटी सी सड़क पर बहुतायत बुलेट मोटरसाइकल सहित दो पहिया और चार पहिया वाहनों, कारों, बसों एवं सेना के ट्रकों सहित गाड़ियों की इतनी ज्यादा रेलम-पेल थी कि पैदल भी चलना मुश्किल हो रहा था ट्रैफिक जैम की सी स्थिति थी। दिल्ली के चाँदनी चौक सी  भीड़ जैसा दृश्य आँखों के सामने हो आया। लघु शंका की समुचित व्यवस्था न होने के कारण लोग जहां तहां लघु शंका से निवृत्त हो रहे थे। ऐसे ही स्थानों के आसपास ही बर्फ के साथ फोटो की ललक-लालसा मे लोग विभिन्न भरतनाट्यम की शास्त्रीय मुद्राओं मे फोटो खींच और खिंचवा रहे थे। चारों तरफ वाहनों से निकले डीजल धुएँ की दुर्गंध आ रही थी। हालत इतने बेकाबू थे कि सीमा सड़क संगठन द्वरा दुनियाँ की सबसे ऊंची सड़क के मील के पत्थर के साथ सेल्फी और फोटो लेने वालों की आपस मे होड मची थी। मैंने दुनियाँ के सबसे ऊंची सड़क के उपर बर्फ़ीली रास्तों की जो कल्पना की थी, वास्तविकता इसके ठीक  विपरीत थी।            

रास्ते मे चाय पान हेतु खलसार जगह पर रुकना हुआ। गर्म चाय के साथ समोसे की उपलब्धता ने मन को मोह लिया। फिर क्या था गरम-गरम समोसे का ऑर्डर दे दिया। सुदूर उत्तर के लद्दाख मे समोसे की उपलब्धता इस व्यंजन के अंतराष्ट्रीय होने का प्रमाण है। चाय समोसे का वो स्वाद की सोच आज भी मुँह मे पानी आ गया। पहाड़ों पर जीवन कितना कठिन है इसकी झलक वहीं पास मे उस महिला द्वारा सिर पर लदे बोझे को उतरते समय महसूस किया, जहां पर एक लद्दाखी महिला को जीवन की आपाधापी से जूझते देख उससे बात की। कठिनाई ये थी मुझे लद्दाखी नहीं आती थी और उसे हिन्दी!! संकेतों और इशारों से उसको अपने सिर पर बोरी मे लिये वस्तु की जानने की उत्कंठा हुई। मै धाराप्रवाह हिन्दी मे सवाल पूंछता वह धाराप्रवाह लद्दाखी मे जबाब दे रही थी। दोनों के पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था। आखिर उसके बोरे को खोल कर देखा तो जंगल मे याक के गोबर के सूखे टुकड़ों को उसने एकत्रित कर बोरे मे भर रखा  था। उस महिला द्वारा सर्दियों मे ईधन को एकत्रित करने की जिजीविषा के कठिन प्रयास को देख नतमस्तक था।  उसने जाड़ों मे इसके  उपयोग के लिये याक के गोबर को दूर दराज पहाड़ों से एकत्रित किया था। जब मैंने कुछ धनराशि दे उसकी फोटो खींची तो "जूले-जूले" कह कर उस वृद्ध महिला ने अभिवादन किया। लद्दाखी मे मै "जूले" शब्द से परिचित था जिसका अभिप्राय  "अभिवादन" से था जिसे सुन कर मन अति प्रसन्न था।

यहाँ से नीचे घाटी का रास्ता शुरू हो चुका था और श्योंक नदी की धारा सड़क के साथ साथ चलती नज़र आ रही थी। खलसार मे अल्पाहार के लिए रुके कुछ नौजवान लड़के एवं परिवारों के साथ आए छोटे बच्चे  इस नदी की छोटी धारा मे ही अठखेलियाँ कर बहती नदी की धारा का आनंद ले रहे थे।  ( नुब्रा घाटी का शेष भाग अगले अंक मे.............क्रमश:)

विजय सहगल

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2021

एक विलुप्त-दशहरा

 

"एक विलुप्त-दशहरा"






यूं तो देश मे दशहरा अलग अलग रीति रिवाज से अलग अलग प्रान्तों मे मनाया जाता है। लेकिन बचपन से मैंने एक अलग ही तरह के दशहरे को देखा और लगातार अपने युवाकाल मे अनेकों वर्षों तक शामिल होने का सौभाग्य मिला है। ये अनूठी परंपरा समाज मे गरीब-अमीर से परे सबके लिए समान थी और बिना किसी आर्थिक आडंबर के समाज के सभी परिवारों की पहुँच मे थी।

ऐसे ही 1980-90 के दशक तक  झाँसी के खत्री समाज मे दशहरा मिलन समारोह प्रति वर्ष कुछ अलग ढंग से मनाया जाता रहा था। जिसकी प्रशंसा समाज के अन्य गणमान्य व्यक्ति भी करते थे। झाँसी शहर पुराने समय मे किले की चारदीवारी के अंदर ही वसा था। अधिकतर खत्री परिवार किले की परकोटा के अंदर ही कुछ मुख्य स्थानों  मे  छह-आठ-10  परिवार के समूह मे रहते थे। इन स्थानों  मे मानिक चौक, गंज, खत्रियाना, टंकी, पारेश्वर मुहल्ला मुख्य थे पर अन्य स्थानों  पर भी इक्का-दुक्का परिवार रहते थे।   इस तरह लगभग 70-80 परिवार जिनमे अधिकतर  व्यवसाय मे रत थे  तथा कुछ परिवार पेशे से वकील और डॉक्टर भी थे जो समाज एवं शहर  मे गणमान्य स्थान रखते थे।  यध्यपि मै जब  दस-ग्यारह साल की उम्र का था तब  शायद मै पहली बार समाज के दशहरा मिलन कार्यक्रम मे शामिल हुआ था। मै नहीं जानता ये दशहरे की परंपरा हमारे पूर्वजों ने कब शुरू की थी क्योंकि परंपरागत रूप से हम इसे अपने होश सम्हालने से देखते आये थे।  मेरे पापा बताया करते थे कि उन्हे भी नहीं मालूम कि इस अनूठे दशहरे की परंपरा कब से चल रही है। वे भी ऐसे ही अपने बड़ों का अनुसरण करते शामिल होते रहे थे। मेरा अनुमान है कि दशहरे की ये परंपरा निश्चित ही सौ वर्ष से भी ज्यादा पुरानी रही होगी।    

दशहरे के त्योहार को लोग बेशक अपने-अपने तरीके से भिन्न-भिन्न रीति रिवाजों से मनाते थे पर हर समारोह और कार्यक्रम मे "पान" आवश्यक रूप से शामिल रहता। झाँसी शहर मे स्थित खत्री समाज के हर घर से कम-से-कम एक व्यक्ति बड़ा बाज़ार स्थित गोपाल जी के मंदिर मे आवश्यक रूप से 7-8 बजे तक एकत्रित होते थे। उन दिनों समाज के कुछ बुजुर्ग स्व॰ श्री रामदास कंचन (जो मंत्री जी के नाम से विख्यात थे), नगर के बड़े व्ययसाई स्व॰ मोती लाल सहगल, स्व॰ देवेंद्र शिवानी, एडवोकेट, श्री राम रतन जी साहनी ( 94-95 वर्ष के एक मात्र जीवित समाज के गौरव) उन दिनों समाज के हर घर मे जाने की मार्ग नक्शा तैयार करते थे। मार्ग निर्धारण मे पहले उन घरों-परिवारों  मे जाने का कार्यक्रम तय किया जाता था जिनके यहाँ पिछले दशहरे से इस दशहरे की बीच कोई व्यक्ति दिवंगत हो गया हो। इस तरह गोपालजी के मंदिर से 60-70 लोगो का समूह जिसे आपसी बोलचाल मे सभी लोग "पंच" (पंच परमेश्वर) कहते, वह  पहले उन घरों मे पहुंचते जहां पिछले दशहरे से अब तक कोई दिवंगत होता था।  दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उस परिवार के यहाँ से दशहरे के प्रतीक पान का एक-एक  सादा पत्ता (बगैर मसाले या चूना कत्था के, जैसा चित्र मे दिखाया गया है) उपस्थित समाज के सभी पंचों द्वारा  ग्रहण किया जाता। समाज के मंत्री जी स्व॰ श्री राम दास जी  अपनी विशेष वक्तृत्व  शैली मे  उन सभी परिवारों को ढांढस बँधाते  जिनके प्रियजन पिछले एक साल के दौरान दिवंगत हुए थे। मै मंत्री जी की बोलने की उस शैली का बड़ा कायल था।

जब सभी दिवंगतों के घर जा, दिवंगतों को श्रद्धांजलि का कार्यक्रम हो जाता  तब क्रमशः समाज के जिस-जिस  सदस्य का घर रास्ते मे पड़ते, तो समाज के सभी  70-80 "पंचों" का समूह उनके घर पहुँच कर उस सदस्य को दशहरे की बधाई देता  एवं दशहरे के प्रतीक सादा पान के पत्ते  को ग्रहण करता। इस तरह शहर के सभी खत्री बंधुओं के घरों मे जा कर दशहरे की एक दूसरे को बधाई दी जाती। इस पूरे नगर भ्रमण मे लगभग 5-6  किमी॰ के परिक्रमा पथ पर  चलना तो हो  ही जाता था और इस मेल जोल एवं भ्रमण मे लगभग 2 से तीन घंटे तो लग ही जाते थे। जो बुजुर्ग चलने मे असमर्थ होते वह अपने-अपने घरों मे ही बैठ पंचों के आने का इंतज़ार करते। बापसी पर लोग पुनः गोपालजी के मंदिर मे एकत्रित होते जहां मंत्री जी उपस्थित युवा, बच्चों और बुजुर्गों का धन्यवाद ज्ञपित कर दशहरे त्योहार के कार्यक्रम के समाप्ती की घोषणा करते। ये ही क्रम हर बर्ष दोहराया जाता था। 1980-90 के दशक तक ये दशहेरा त्योहार झाँसी के खत्री समाज द्वारा अनवरत रूप से मनाया जाता रहा।  

इस दशहेरा पर्व को मनाने की पृष्ठभूमि मे बहु आयामी  संदेश समाज के बीच प्रसारित होता था। जो सबसे बड़ा संदेश इस दशहरा मिलन कार्यक्रम से जाता वह यह था कि हर  परिवार समाज मे सम्मान-स्वाभिमान और बराबरी महसूस करता था। हर छोटे-बड़े  परिवार के मन मे ये भावना रहती कि उनके सुख-दुःख मे समाज के सभी लोग सांझीदार है। एक मनोवैज्ञानिक भावना हर परिवार मे रहती कि समाज के सभी लोग एक-जुट हो बराबर है। दूसरा संदेश भी बड़ा स्पष्ट था कि दशहरे का प्रतीक पान का सादा पत्ता ही लेने-देने का रिवाज था, क्योंकि पान के पत्ते मे चूना-कत्था या मसाले लगे पान 60-70 लोगो  की संख्या मे हर घर मे  खाना खिलना असंभव भी था और खर्चीला भी। उन दिनों 1-2 रुपए मे एक सैकड़े सादे पान आसानी से उपलब्ध हो जाते थे। इस तरह गरीब-अमीर पर आर्थिक बोझे को नगण्य करने के लिए ही शायद इस तरह सादा पान के पत्ते को  आदान-प्रदान का चलन  हमारे पूर्वजों ने बड़े सोच समझ कर रक्खा हो?

समाज के सभी घरों मे पैदल भ्रमण जहां एक ओर तो नयी और पुरानी पीढ़ी का आपस मे नाम और शक्ल-सूरत से परिचय भी करा देता था तथा समाज के सदस्यों के घरों की भौगोलिक स्थिति से भी अवगत करा देता था ताकि लोग किसी भी  सदस्य के सुख-संताप मे तुरंत ही उसके  घर पहुँच सके। चाय-पान, फल-फूल भेंट जैसी औपचारिकता एवं आडंबर को इस प्रथा से दूर रक्खा गया ताकि कम समय मे सभी के घर पहुँचने के लक्ष्य को पाया जा सके। 

घरों के बुजुर्ग और असक्त महिलाए, बच्चे और अन्य सदस्य घर के बाहर देर रात तक जाग कर, घरो के बाहर प्रकाश की व्यवस्था करते, चबूतरों पर चादर बिछा और रंगोली बना "पंचों" के स्वागत  हेतु  उनका इंतजार करते  ताकि साल के इस पावन त्योहार मे सभी एक दूसरे का यथोचित सम्मान, अभिवादन, चरण वंदन  कर मिल-जुल कर एक दूसरे का कुशल क्षेम पूंछ और जान सके। प्रतीक्षा के दौरान दीगर समाज और अड़ौस-पड़ौस के अन्य शुभचिंतक और मित्र गण भी घरों के बाहर बैठे लोगो को दशहरे का स्नेह वंदन कर एक दूसरे को बधाई देते। इस तरह समाज का दशहरा-मिलन कार्यक्रम एक सच्ची-भावना से  एक घर के प्रत्येक  सदस्य का  परिचय समाज के सभी घरों और उनके सदस्यों से परिचय  करा देता  था जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाये कम थी। बेशक अपनी नौकरी या पेशेगत व्यस्तता के चलते लोग साल भर न मिल पाते हों पर दशहरे पर वे आपस मे अवश्य मिल लेते थे।            

उन दिनों सही मायने मे दशहरा त्योहार  खत्री झाँसी मे वास्तविक समाजवाद का प्रतीक था। परंतु शहर के विस्तार और स्थानीय परिवारों के आवासीय परिगमन के कारण,  समाज के आत्मकेंद्रित और संकुचित दृष्टिकोण के कारण एवं तथाकथित विकास,  समय के बदलाब, आपसी भाई चारे एवं समयाभाव ने वर्षों से प्रचलित उक्त दशहरा मिलन की प्रथा को खत्री समाज के लोग जारी न रख सके। समय के साथ आवश्यक संशोधनों को भी स्वीकार न किया जा सका  और इस तरह दशकों से जारी एक अच्छी सामाजिक  दशहेरा मिलन प्रथा झाँसी-खत्री समाज  से सदा-सदा के लिये विलुप्त हो गयी।

दशहरा के इस पावन पवित्र पर्व पर अपने सुधि पाठकों एवं स्नेहीजनों को हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई।    

विजय सहगल