सोमवार, 27 सितंबर 2021

पांचो बुआ

 

"पांचो बुआ"


पांचो बुआ छुन्ना के  घर के पास ही  स्थित बाड़े  मे रहा करती थी। एक साधारण सी स्थूलकाया  प्रौढ़ महिला थी, पांचों बुआ। यूं तो हाते के सभी आस-पड़ौस के घरों से उनका मेल जोल और उठना बैठना था। लेकिन जब हाते के सभी महिलाएं अपने अपने घरों के कार्यों मे व्यस्त होते तो कुछ शैतान बच्चे उन्हे बुआ राम राम कह कर चिढ़ाते थे। "बुआ राम-राम" कहते ही पांचों बुआ उन बच्चों और उनके माँ-बाप को कोसती थी। आठ साल का छुन्ना भी जो उसी बाड़े मे अपने माँ बाप के साथ रहता था मौका देख बच्चों की मंडली मे शामिल होकर उनके घर के सामने खड़े होकर "बुआ, राम-राम कह कर खिजाता था। बुआ जो हर समय एक छोटा पतला लगोदा (छड़ी) रखती और बच्चों को छड़ी का भय दिखाती जिससे डर कर बच्चे अपने अपने घरों मे दुबक कर भाग जाते। पांचों बुआ बच्चों के "राम-राम" कहने से क्रोधित हो फटकारती पर डांटने का अंदाज क्रोधाभाव से परे होता था। कोसते समय भी उपहास और अपमान जनक भाषा ईतर उलाहना प्रेम भरा होता था। बुआ द्वारा बच्चों को  पांचों पहर, "राम-राम" कहने पर कोसने के कारण लोग उन्हे बुआ से "पांचो बुआ" बुलाने लगे थे।  

छुन्ना भी बच्चों की शरारतों मे शामिल रहते हुए पांचों बुआ को राम-राम कह कर चिढ़ाता था। छुन्ना  एक बार अपनी मित्र मंडली के साथ मेला देखने जाने वाला था। इस हेतु वह माँ से कुछ पैसे मांगने हेतु बाहर आया, किन्तु माँ तो महिला मंडली मे बैठी थी जिसमे पांचों बुआ भी शामिल थी। अब तो छुन्ना की हिम्मत ही न हुई कि वह मंडली मे बैठी माँ से पैसा मांग सके। उसको डर था कि माँ के पास ही बैठी पांचो बुआ उसकी ढिठाई की शिकायत उसकी माँ से कर देगी! लेकिन दबाब था कि यदि छुन्ना नहीं आता तो बाल मंडली उसके बिना मेला देखने निकल जायेगी। इसी कारण हिम्मत करके उसने महिलाओं के बीच मे अपनी माँ को पुकारा। माँ ने भी बेटे को देख उसके पास आकार पूंछा क्या बात है? छुन्ना की माँ के चेहरे पर कुछ चिंता भरे भाव को देख पांचो बुआ ने आवाज लगाई। श्यामा!! अब तो छुन्ना की हालत खराब थी कि पांचो बुआ ने उसकी शिकायत करने के लिए ही  माँ को आवाज दी है! उसका डर और घबड़ाहट के मारे बुरा हाल था। पर आशा के विपरीत बड़े प्यार और वात्सल्य से छुन्ना की माँ से  पूंछा, क्या बात है? सब ठीक तो है? इतनी परेशान क्यों हो? माँ ने कहा कुछ नहीं बुआ, छुन्ना बच्चों के साथ मेला देखने जाना चाहता है! कुछ पैसे मांग रहा है। मै घर से पैसे लाकर अभी आती हूँ! पांचों बुआ ने तुरंत अपनी साड़ी के पल्लू से दो रूपये का नोट निकाल कर छुन्ना को देते हुए कहा, "ले रख दोस्तों के साथ मेले मे  कुछ खा पी लेना!! माँ ने कहा, बुआ ये तो बहुत ज्यादा है? बुआ ने बड़े प्रेम भरी झिड़की देते हुए कहा, "कुछ ज्यादा नहीं है मेरे छुन्ना के लिये"। श्यामा ने कहा, "बुआ, मै आपको घर से पैसे ला अभी देती हूँ।  बुआ ने साधिकार उलाहना देते हुए कहा, "कोई जरूरत नहीं पैसे लौटाने की"! क्या छुन्ना के उपर मेरा कोई हक नहीं? छुन्ना मेरा भी तो बेटा है!

छुन्ना ये सब देखकर  और सुनकर आश्चर्य चकित था कि जिस "पांचो बुआ" को वह दिनभर "बुआ, राम-राम" कह कर चिढ़ाता था, दूसरे बच्चों के साथ परेशान करता था उसके दिल मे उसके लिये इतना प्यार और हमदर्दी है।  बुआ के इस ममता मयी माँ के रूप को देख उसकी आँखों मे आत्मग्लानि और अपराध बोध का भाव जाग्रत हो उठा! आँखों के कोने मे आँसू उभरने ही वाले थे कि उसने बुआ का आभार जताते इंतजार कर रही बाल मंडली की ओर दौड़ लगा दी और बच्चों के साथ मेला देखने रवाना हो गया। उस रात उसके दिल  मे पांचों बुआ के प्रति सम्मान और आदर के भाव उमड़ पड़े और भविष्य मे दुबारा ऐसी ढिठाई न करने की सौगंध खाई।      

समय बीतता गया और छुन्ना उर्फ क्षेत्र पाल सिंह  ने स्नातक की परीक्षा पास कर जो रेलवे  की नौकरी हेतु फॉर्म भरा था उस नौकरी का आज बुलावा, पत्र के माध्यम से आ गाय था। कल उसे नौकरी जॉइन करने हेतु लखनऊ जाना था। सारी तैयारी हो चुकी थी। तैयारी पूरी हो चुकी थी, कपड़े और आवश्यक सामान, प्रमाण पत्रों, कागजों के साथ एक सन्दूक मे जमा लिये थे। बाड़े के गेट पर तांगा आ चुका था। छुन्ना ने अपने माता-पिता के पैर छू आशीर्वाद ले तांगे की ओर बढा ही था कि अचानक पीछे से आवाज आयी, बेटा, छुन्ना!! बुआ को "राम-राम" नहीं करोगे? उसने पीछे मुड़ कर देखा! पांचो बुआ अपने घर के दरबाजे के पास खड़े हो उसको निहार रही थी। छुन्ना तेजी से पीछे मुड़ा और बुआ के पैरों की तरफ झुका ही था कि पांचों बुआ ने छुन्ना को गले से लगा लिया!! पांचो बुआ ने प्यार और वात्सल्य से सिर पर ममतामयी चपत लगते हुए कहा अब मुझे, बुआ राम-राम कौन कहेगा? सुनते ही छुन्ना की आँखों मे पश्चाताप के आँसू आ गये! छुन्ना बोला बुआ अनजाने मे बचपन मे बार-बार "राम-राम" कह कर चिढ़ाने की मेरी शैतानियों को माफ करना, बुआ!

बुआ ने प्यार भरी झिड़की देते हुए कहा, हट पगले!! बो तो मै यूं ही तुम बच्चों को कोसती फटकरती रहती थी ताकि तुम बच्चे भगवान "राम" के नाम  का सुमरिन करो और तुम बच्चों को जबाब देने के लिये मै भी भगवान श्री राम के  नाम का स्मरण बारबार करती रहूँ!! मै तुम बच्चों को देख मन ही मन बड़ी खुशी और आनंद का अनुभव करती हूँ!! तुम बाल गोपालों के कारण ही मै भगवान राम का सुमरिन करती रहती हूँ ताकि इह लोक से परलोक के लिए मुझ  जैसी अभागिन को मुक्ति मिल सके? मै सुन कर हतप्रभ था!! ये सुन मै एक बार फिर बुआ के पैरों को नमन करने से न रोक सका!! कैसे एक साधारण सी दिखने वाली बुआ की आध्यात्मिक विद्ध्या  का स्तर हमारी अकादमिक  शिक्षा से कितना श्रेष्ठ था!! जिसमे सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय का वास्तविक संदेश छिपा था!!           

इतना सुन  जैसे ही मै स्टेशन की  ओर जाने के लिये तांगे की ओर बढ़ा, बुआ ने हाथ पकड़ अपनी साड़ी के पल्लू से दो रूपये देते हुए कहा, "तूँ कितना भी बड़ा अफसर बन जाये पर मेरे लिये तो तूँ नन्हा से छुन्ना ही रहेगा"!! "ये रूपये रख ले अपने लिये कुछ खाने की चीज ले लेना"। छुन्ना आँखों मे आँसू लिये दो रूपय का नोट अपनी मुट्ठी मे रख, तांगे की ओर बढ़ चला!!  

विजय सहगल


4 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बहुत भावपूर्ण मन पड़ कर भावुक हो गया। सच में पहले मुहल्ले में एक दो लोग ऐसे हुआ करते थे।

Unknown ने कहा…

मनः को छू गया अब तो जमाना बदल गया। न मुहल्ले में वैसे बच्चे रहे न वैसी महिलाओं का ग्रुप जो मिलकर एक दूसरे का दुख सुख बांट सकें ।

Ganguli ने कहा…

अति उत्तम ऐसे प्राणी अब विलुप्त हो गए हैं

Unknown ने कहा…

बहुत ही भावपूर्ण मर्मस्पर्शी कहानी।