"अफगानी तालेबान को मान्यता?
2 सितंबर 2021 को श्री भरत कर्नाड का नव भरत टाइम्स दिल्ली मे अफगानिस्तान मे तालिबानों को मान्यता देने पर एक लेख "तालिबान से बात करने मे हर्ज ही क्या है" छापा था। इस पर मैंने अपनी प्रतिक्रिया रीडर्स मेल मे प्रकाशनार्थ प्रेषित की थी। चूंकि समाचार पत्र मे स्थानाभाव के कारण संपादक की अपनी सीमाएं होती है अतः भाव और भावना को स्थान देने के बाद हमारे पत्र का प्रकाशन तो हुआ लेकिन सामाग्री संक्षित करने के बाद। मैने अपने सुधि पाठकों को पत्र का सम्पूर्ण विवरण आपके लिए प्रस्तुत किया है। बैसे मैने 28 अगस्त 2021 को भी अफगानिस्तान के तालिबानियों पर अपना ब्लॉग लिखा था जिसका लिंक इस प्रकार है ( https://sahgalvk.blogspot.com/2021/08/blog-post_28.html ) कृपया पर भी गौर फरमाये:-
_______________________________________________________
रीडर्स मेल मे प्रकाशनार्थ पाठक के विचार
श्रीमान संपादक, 02.09.2021
नवभारत टाइम्स
नई दिल्ली
महोदय,
आपके समाचार पत्र दिनांक 02.09.2021 मे श्री भरत कर्नाड द्वारा लिखित "तालिबान से बात करने मे हर्ज ही क्या है" पढ़ा। उक्त विषय मे लेखक का अंतर्द्वंद स्पष्ट उजागर होता है। वे एक ओर तो भारत सहित अन्य देशों के इस डर का उल्लेख करते है कि "तालिबान चाहे जो वादे कर रहा हो वह अपने वादे के बावजूद अलकायदा, इस्लामिक स्टेट, लश्करे ए तैयबा और जैश जैसे आतंकी गुटो से हाथ मिला सकता है"। "वे कश्मीर मे दिक्कत बढ़ा सकते है" और "पाकिस्तान मे तहरीक ए तालिबान के जरिए चरम पंथ को हवा दे सकते है"। वहीं आगे वह "भारत को तुरंत अफगान अमीरात को मान्यता देने" की उताबली दिखाते है। वे अफगानिस्तान को मान्यता देने को इस तरह बेताब नजर आते है मानों तालिबान कोई आधुनिक, प्रगतिशील और आध्यात्मिक सोच का अजूबा संगठन हो! लेखक इसी लेख मे जब लिखता है कि "मान्यता देने पर तालिबान भारत का अहसान मानेगा" और भारत के हितों का ध्यान रखेगा!! तब लेखक महोदय की भारत देश की सेना और सुरक्षा बलों की "शक्ति" और "नीति" के बारे मे सोच पर दया, करुणा और सहानुभूति होती है। एक लुटेरे और क्रूर आतंकी संगठन तालिबान को मान्यता देकर उसके साथ खड़े होने पर भारत देश के कौन से हितों का तालिबान ध्यान रक्खेगा? पूर्णतः अविश्वसनीय इस संगठन के लोग 12 साल से उपर की लड़कियों को बलपूर्वक अपने लड़ाकों से शादी कराने, बलात्कार लूट और हत्या जैसे क्रूर कृत मे शामिल इस अतिवादी संगठन को मान्यता के अहसान से नबाजने पर क्या भारत की जग हँसाई नहीं होगी? यत्र नार्यस्तु पूज़्येंन्ते.... जैसे नीति वाक्यों की विरासत वाले भारत देश की छवि को महिलाओं पर कोड़े वरसना, महिलाओं को पत्थरों से मार कर हत्या जैसे पाशविक कृत्यों करने वाले तालेबानियों के साथ खड़े होने से देश और दुनियाँ मे क्या संदेश जाएगा? पाशविक जंगली कानून के विधान को लागू करने वाले तालेबानियों के साथ खड़े होने मे भारत देश को कोई यश, मान या प्रतिष्ठा प्राप्त होने से रही!! अपितु इसके विपरीत इनके साथ खड़े होने पर भारत देश को समस्त संसार के समक्ष अपकीर्ति का सामना करना पड़ेगा और जैसा की श्रीमद्भगवद गीता मे भगवान श्री कृष्ण, अर्जुन से कहते है कि :-
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
संभावितस्य
चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते। (अध्याय 2 श्लोक 34) अर्थात
(सब प्राणी भी तेरी सदा रहनेवाली अपकीर्ति का कथन अर्थात निंदा
करेंगे। वह अपकीर्ति सम्मानित मनुष्यके लिये मृत्युसे भी बढ़कर दुःखदायी होती है।)
हमे अपनी सेना और सुरक्षा बालों पर दृढ़ विश्वास है कि दुश्मनों की टेढ़ी निगाह को भी बलपूर्वक कुचल देने का दम-खम रखते है, फिर चाहे वो तालेबान हो या पाकिस्तान। अतः इस विषय मे भारत को अपनी निश्चयात्मक निर्णय से तालेबानियों को अवगत करा अर्जुन की तरह सारे संशयों को समाप्त कर युद्ध के लिये खड़े होने के संकल्प जता देना चाहिये: -
तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः।
छित्त्वैनं
संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।। (अध्याय 4 श्लोक 42) अर्थात
इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन ! हृदय में स्थित इस अज्ञान से उत्पन्न अपने
संशय का ज्ञानरूप तलवार से छेदन करके योग मे स्थित हो जा, और युद्ध के लिये खड़ा हो जा।)
हमे ये याद रखना होगा कि ये वही संगठन है जो महिला अधिकारों के हनन के लिये कुख्यात रहा है। निरीह महिलाओं और पुरुषों को सरे आम फांसी, कोड़े और पत्थर मारने जैसे पाशविक विधान को मानने वाला है। अभी हाल ही मे हुए आत्मघाती बम्ब धमाकों मे 13 अमेरीकन सैनिकों और सैकड़ों निरीह अफगानी नागरिकों का हताहत होने की घटना दुनियाँ भूली नहीं है। आश्चर्य और अचंभित करने वाली इस घटना मे तालेबानी संगठन के एक भी सदस्य को खरोंच भी नहीं आयी? फिर कैसे इस संगठन पर विश्वास किया जा सकता है। भारत को तालिबान के अतीत और वर्तमान पर भलीभाँत विचार मंथन के बाद ही "मान्यता जैसे" भविष्य का निर्धारण करना चाहिये।
विजय सहगल




कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें