"विक्टोरिया टर्मिनस-बॉम्बे"
मुंबई सपनों का शहर, चका चौंध से भरी फिल्मी सितारों की नगरी। 60-70 के दशक का समय बॉलीवुड पर एक से एक धांसु फिल्मे बनती और सारे देश मे जिनकी चर्चा घर घर मे होती। संयुक्त परिवारों पर बनी कहानियों पर भी फिल्मे खूब बनी, कमोवेश कहानी सबकी एक ही होती। कहीं जमींदार परिवार का लड़का अभिनेत्री से प्रेम के चक्कर मे घर से निष्काषित कर दिया जाता। ठेला, रिक्शा चलाना, मजदूरी करना, प्रायः भूंखे सोना उसके जीवन का हिस्सा होता। पतिव्रता पत्नी ऐसी फिल्मों मे साहूकार के यहाँ मंगल सूत्र जरूर गिरवी रखती थी। ये फिल्म का आवश्यक हिस्सा होता था। बाद मे झक मारकर हीरो का बाप साहूकार को रुपए देकर "मंगल सूत्र" छुड़ाता है। दया, करुणा और दर्द से भरी मर्मस्पर्शी कहानी मे अभिनेत्री की गलती न होने के बावजूद वो यहाँ अपने पति के साथ पिता के पैर छूये, जैसे ही उसने यहाँ डायलोग बोला, "बाबूजी मुझे माफ कर दो", मुझसे भूल हो गयी तैसे ही वहाँ हाल मे दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट और महिला दर्शकों के नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहने लगती तभी पर्दे पर "द एंड" का शीर्षक उभर आता है। थिएटर मे महिलाएं की रुलाई छूटना फिल्म की सफलता का पैमाना होता था। ऐसे ही तमाम किस्सों पर ढेरों चलचित्र बनाये जाते थे, इस फिल्मी शहर बॉम्बे मे।
उन दिनों मे मुंबई
शिवाजी टर्मिनस को बॉम्बे वीटी
(विक्टोरिया टर्मिनस) बोला जाता था। मै छटी कक्षा मे रहा हूंगा लगभग 12 साल उम्र
होगी। जब स्कूल की गर्मियों की छुट्टी मे आपको यदि बॉम्बे घूमने जाने का ऑफर मिले
तो क्या कहना!! ऐसा ही कुछ हुआ था उन दिनों मेरे साथ। खुशी का ठिकाना न रहा। दरअसल
मेरे पापा उन दिनों झाँसी रेल्वे स्टेशन पर बुकिंग ऑफिस मे थे। गर्मियों मे बॉम्बे
जैसे महानगरों मे रेल्वे पर कार्य का अतरिक्त
बोझ बढ्ने के कारण अन्य छोटे स्टेशन से स्टाफ को बुलाया जाता था। उन दिनों
बॉम्बे सेंट्रल रेल्वे का मुख्यालय हुआ करता था। इसी क्रम मे मेरे पापा की ड्यूटि
भी बॉम्बे मे वीटी (विक्टोरिया टर्मिनस) स्टेशन पर लगी थी। बॉम्बे मे रहना एक सबसे
बड़ी चुनौती थी। इस हेतु रेल्वे बाहर से आये कर्मचारियों के रहने की व्यवस्था उन
दिनों प्रचलित प्रथम श्रेणी के डिब्बों मे करता था। जिसके कुछ रैक वीटी स्टेशन के
आखिरी प्लेटफॉर्म पर खड़े किये गये थे। क्योंकि बॉम्बे वीटी या आसपास आवास की उपलब्धता
न के बराबर थी। उक्त प्रथम श्रेणी डिब्बे जो सीधे ही प्लेटफॉर्म पर खुलते थे। आश्यक
सेवाये जैसे पंखे,
लाइट, टॉइलेट,
बर्थ और दो या चार बड़ी खिड़कियाँ रोशनी और हवा उपलब्ध कराने मे सहायक होती। सबसे
बड़ी बात एक दरबाजे को अंदर से बंद कर यदि दूसरे
दरबाजे पर आप बाहर ताला डाल दे, तो एक वन रूम
सेट की तरह इस डिब्बे को बखूबी इस्तेमाल किया जा सकता था। रेल विभाग दो बर्थ के डिब्बे मे एक
स्टाफ को और चार बर्थ के डिब्बे मे दो स्टाफ को ठहराता था। पापा को भी दो बर्थ
वाला प्रथम श्रेणी कंपार्ट्मेंट रहने के लिए मिला हुआ था। डिब्बों मे पर्याप्त मात्र
मे पानी और लाइट की व्यवस्था विभाग द्वारा उपलब्ध हो जाती थी। जब बॉम्बे के हृदय
स्थल वीटी स्टेशन पर ठहरने/रहने की व्यवस्था
हो जाए तो क्या कहना। बड़े से बड़े करोड़ पति अभिनेता या व्यवसायी के भाग्य मे भी
वीटी जैसे क्षेत्र मे रहना एक दिवा स्वपन जैसा
था तब अपने जैसे लोगो को फ़र्स्ट क्लास डिब्बे मे रुकने की सुन,
मन प्रसन्नता और खुशी के भाव से आनंदित हो उठा। चूंकि ऐसी जगह परिवार सहित रुकना
समुचित न था तो पापा ने मुझे और मेरे बड़े भाई प्रदीप को बॉम्बे बुलाने की खबर
भेजी।
उन दिनों 24 घंटे की रेल
यात्रा पर दोनों बच्चों को अकेला भेजने मे माँ ने तो इंकार कार दिया पर अपन तो भाई
के साथ जाने तैयार थे। पर उन्ही दिनों हमारे पड़ौस के श्री सूरज चाचा जो ठाणे मे
आरपीएफ़ मे कार्यरत थे झाँसी स्थित अपने घर आये हुए थे। फिर क्या था इस अकेले जाने
की समस्या से भी छुटकारा मिल गया और हम दोनों भाई उनके साथ ठाणे तक पहुँच गए। उनके
घर पर फ्रेश, स्नान-ध्यान और भोजन कर
हम अपने गंतव्य बॉम्बे वीटी पहुँच गए। अब तक रेल की पटरियों को एक दिशा से दूसरी
दिशा तक मीलों दूर जाते देखा था पर वीटी स्टेशन पर पटरियों की समाप्ती देख आश्चर्य
हुआ और तभी ही "टर्मिनस" शब्द के
अर्थ से रु-ब-रु भी हुआ था। तदुपरान्त पापा के साथ अपने सपनों के महल मे
बोरी विस्तरा जमाया जो आगे 15-20 दिन के लिये हमारे रहने का ठिकाना होने जा रहा
था। एक छोटे कस्बे से निकल बॉम्बे महानगर अबूझा और अलग सा था। पहला दिन तो अपने
डिब्बे की खिड़की से बैठ वीटी जैसे बड़े
स्टेशन पर गाड़ियों का आना जाना देखते रहे।
बैसे भी बचपन मे उन दिनों हर बच्चे को आसमान मे उड़ते हवाई जहाज और जमीन पर दौड़ती रेल गाड़ियों का आते-जाते देखना सबसे प्रिय शगल होता था। एक-दो दिन तो
पापा रात मे हम दोनों भाइयों के साथ रुके पर शिफ्ट की ड्यूटि के कारण उन्हे भी रात
की ड्यूटि करनी पड़ी। रात मे आवश्यक निर्देश ये था कि लक्ष्मण रेखा की तरह किसी भी सूरत मे कंपार्ट्मेंट की कुंडी नहीं
खोलना, चाहे कुछ भी हो जाये। पहली रात हम दोनों
भाइयों ने यूं ही कुछ जागते सोते काटी और हर समय अंदर से बंद की जाने वाली कुंडी
पर निगहे टिकाई रक्खी कि कहीं कुंडी स्वतः ही अपने आप न खुल जाये?
साथ मे सब्जी छीलने और काटने वाले चाकू भी सिरहाने रख लिये कि किसी मुसीबत मे
मुक़ाबला किया जा सके ठीक उस गीत की तर्ज़ पर "छोटा बच्चा जानके मुझसे मत टकराना
रे ...... "। देर रात तक इसी उधेड़-बुन मे जागने के कारण सुबह कब नींद लग गई
पता ही न चला।
पापा के साथ एक-दो दिन
पूर्व वीटी स्टेशन के बाहर कुछ आवश्यक
वस्तुओं जैसे दूध, ब्रेड,
मिट्टी का तेल और राशन की दुकानों को हम देख आये थे। अकेले रहने के अगले दिन हम
दोनों भाई सबसे पहले दूध लेने अकेले बाहर निकले। बड़े सहमते अजनबियों की तरह हम
दोनों ने वीटी स्टेशन के बाहर दूध की दुकान से दूध लिया और वही से ब्रेड लेकर बापस
अपने ठिकाने पर पहुंचे। रात के मौसम भी कुछ गरम था नींद भी ठीक से पूरी नहीं हुई
थी। डिब्बे मे एक कोने मे स्टोव जला चाय बनाई और डिब्बे के बाहर खुले प्लेटफॉर्म
पर चाय की चुस्कीयों का आनंद लिया। लगभग दो घंटे बाद नाश्ता तो क्या बनता क्योंकि
कुछ बनाना आता नहीं था पर पराँठे और सब्जी बनाने मे माहिर थे। पराँठे मे नमक मिर्च
और जीरा डाल कर पराँठे बनाए। पराँठे के आकार प्रकार को छोड़ दे तो स्वाद मे पराँठे
ठीक थे। घर से लाये अचार के साथ अपने हाथ के बनाए पराँठों का स्वाद पहली बार लिया।
अब तक रेल का डिब्बा हम लोगो के लिये घर का सा हो गया था। ठंडे पानी के लिये
प्लेटफॉर्म के उपर एक कार्यालय मे लगी मशीन (वॉटर कूलर) से ले आते थे। वही पहली
वार हम लोगो ने लिफ्ट को बड़े आश्चर्य और कौतूहल से देख सवारी की। वीटी लोकल और अन्य
यात्री ट्रेन के स्टेशन अलग अलग थे। एक दिन टहलते हुए लोकल के
प्लेटफॉर्म पर भी जा पहुंचे। बापसी मे एक टीसी ने हम लोगो को आराम से टहलते हुए
देख टिकिट मांग लिया। इस आफत के बारे मे तो सोचा ही नहीं था। जब उन्हे पूरी कहानी
बताई और बॉम्बे वीटी पर अपना घर दिखाया तो उन्हे विश्वास हुआ। तब तो रेल का डिब्बा
हमारा घर और वीटी स्टेशन हमारे घर के आँगन सा हो गया था जहां हम स्व्छंद पूर्वक
घूमते और आते जाते रहते।
अब तक जैसे नवांकुर
पंछियों के "पर" आसमान मे स्व्छंद उड़ने के लिये तैयार होते हम लोग भी
सुबह दूध लेने के पूर्व जहाँगीर आर्ट गैलरी तक पैदल चले जाते लेकिन गेटवे ऑफ इंडिया उम्र के लिहाज से कुछ ज्यादा दूर पड़ता
अतः वह हमारी पहुँच के बाहर ही रहा। साप्ताहिक अवकाश पर जब पापा के साथ पहली बार ताज होटल,
गेटवे ऑफ
इंडिया देखा तो आश्चर्य और अचरज से उसे देखता ही रहा। पहली बार बहु मंजिली ऊंची ऊंची इमरते देख विस्मित हो एकटक निहारता ही
रहा। इन बहुमंज़िली इमारतों की गिनती उपर से नीचे कुछ इस तरह करता रहा जैसे बचपन मे
स्टेशन से गुजरती मालगाड़ी के डिब्बे गिनने की कोशिश करता था। नरीमन पॉइंट,
मेरीन ड्राइव, हंगिंग गार्डन मुंबा
देवी मंदिर, मछ्ली घर,
देखने के बाद चौपाटी पर समुद्र किनारे टहलना हम दोनों भाइयों के लिये अजूबा था। हम
पहली बार इतनी विशाल जलराशी को समुद्र मे देख रहे थे। वीटी स्टेशन के बाहर से शुरू होने
वाले फुटपाथ बाजार के बारे मे सुन रक्खा था। यहाँ के जेब कतरों के किस्से कहानी
बाल मंडली मे चटखारे लेकर सुन चुका था पर ऐसा कुछ न देखा न अनुभव किया इसका एक
मुख्य कारण शायद हम जैसे फक्कड़ बच्चों का जेब कतरों की सूची से बाहर रखना रहा
होगा। एक अन्य छुट्टी मे हम कुछ परिचित लोगो के घर भी मिलने गये जिन्हे मेरे पापा
जानते थे। इनमे हमारे कुटुंब के एक बाबा स्व॰ श्री छोटे लाल भी थे। जिन्हे हमने
पहली बार देखा था। सुना था वे अपने जवानी के दिनों मे मावा के व्यवसाय के सिलसिले मे मुंबई आ गये थे। हम
बच्चे उन्हे बंबई वाले बब्बा कहते थे। उनकी खोली मे जब पहुंचे तो उन्होने दिल
खोलकर हम दोनों भाइयों का स्वागत किया। हमने पहली बार अरबी के पत्तों की रोल कर
बनाई भाजी खाई, जो बड़ी ही स्वादिष्ट थी
और हमारे लिये एक नयी डिश थी। पापा ने बताया कि उन दिनों मुहल्ले के उनकी उम्र के लड़के
बंबई भाग कर घूमने के लिये प्रायः उनकी ही खोली मे ठहरते थे।
मुंबई प्रवास धीरे धीरे
समाप्ती की ओर था। अब तक हम प्रथम श्रेणी डिब्बे मे रहने के आदि हो चुके थे पर एक रात
जब हम डिब्बे मे सोये हुए थे कि अचानक
हमारे डिब्बों की ट्रेन वीटी स्टेशन से
चलने लगी। अब तक तो हमारे रहते ट्रेन स्थाई तौर पर प्लेटफॉर्म पर खड़ी रहती थी पर
अचानक आज चलने से हम दोनों घबड़ा कर जाग गये। पापा को कहीं कोई खबर देने के साधन भी
नहीं था। हम दोनों भाई डरे सहमे अंदर बैठे रहे। गनीमत रही कि कुछ दूरी तक जाने के
बाद ट्रेन रुकी और फिर बापस दूसरे प्लेटफॉर्म
पर आ गयी। हम दोनों भाइयों की जान मे जान आयी। बाद मे ज्ञात हुआ कि रहने
वाले स्टाफ के डिब्बे के नीचे पड़े मल-मूत्र की सफाई के लिये ट्रेन को हटाया गया
था।
अब तक बॉम्बे की यात्रा और
वीटी स्टेशन पर रेल कंपार्ट्मेंट मे रहने
की सुनहरी यादों के बीच हमारी
बॉम्बे की यात्रा एक यादगार यात्रा बन चुकी थी जिसकी मधुर स्मृति मेरे ज़िहन मे आज
भी ताजा है।
विजय सहगल


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