"यादगार
हवाई यात्रा"
यध्यपि इससे पहले मै दो बार हवाई यात्रा कर
चुका था पर दोनों यात्राएं यादगार तो थी लेकिन आनंद,
प्रसन्नता के विपरीत अप्रसन्नता दायि एवं विरक्ति से परिपूर्ण थी,
जिसका उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग https://sahgalvk.blogspot.com/2021/07/blog-post_17.html
मे किया था। अब तक तीसरी यात्रा के समय हम
भी हवाई यात्रा की बारीकियाँ और चालाकियाँ सीख चुके थे या यूं कह ले कि हम भी हवाई
यात्रा मे अनुभवी और परिपक्व हो चुके थे। अब तक हमे ये भी ज्ञान हो चुका था कि खिड़की की सीट
कैसे लेनी है और किन-किन लाइन को छोड़ कर टिकिट बुक करानी है ताकि वायुयान के पंख
(डेने) खिड़की के सामने न पड़े । भौगोलिक विज्ञान का अब हमे पूरा ज्ञान था अर्थात
किस दिशा मे और किस समय के हिसाब से बाएँ या दायें वाली सीटे चुननी है। ऐसा इसलिये
कि अल सुबह यात्रा के समय पूर्व दिशा से
निकलने वाले सूर्य देवता की तेज चकाचौंध वाली किरणे यदि हवाई जहाज की खिड़की से पर
पड़ेंगी तो चकाचौंध के कारण हवाई जहाज की
यात्रा का मजा खिड़की होने के बावजूद किरकिरा हो जायेगा।
यात्रा के समय "दिशा" के महत्व का
एक किस्सा आपके साथ सांझा करूंगा। उन दिनों ग्वालियर डबरा के बीच दैनिक यात्रा के समय हम बस से यात्रा
करते थे। ग्वालियर से डबरा के लिये लगभग डेढ़
घंटे की यात्रा थी जो दक्षिण दिशा की ओर थी।
भरी गर्मियों का समय था। बस ग्वालियर बस स्टैंड से प्रातः सात बजे रवाना होती थी।
स्टैंड पर बसें बेतरतीब सी खड़ी रहती थी।
मै अपने एक दो साथी के साथ बस मे चढ़ा और उस खिड़की की ओर अपना बैग रखा जहां पर अभी तेज
धूप आ रही थी और बाहर खड़े हो बस चलने का इंतज़ार करने लगा। एक सौम्य-सुशील पर अङ्ग्रेज़ी परस्त महिला भी उसी समय बस मे चढ़ी और भूगोल ज्ञान के अभाव मे छाया दार सीट पर बैठ गई। छाया
दार वाली सारी सीटे लगभग भर चुकी थी। एक-दो सीट खाली पड़ी थी उस सौम्य महिला ने कुछ
उपहास भरी दृष्टि से अपने ज्ञान और विवेक पर इतराते हुए हम लोगो को भी छाया दार
खिड़की की तरफ बैठने की नसीहत दी। बस चली और 10-15 मिनिट बाद चौराहों,
रस्तों पर दायें-बाएँ मुड़ के शहर को पीछे छोड़ मुख्य डबरा/झाँसी रोड की ओर बढ़ी ही थी,
अब तक बस की बाएँ तरफ की खिड्कियों मे सूर्य की तेज किरने पड़ने लगी थी। हम लोग जो दायीं
ओर बैठे थे मजे मे झपकी आने का इंतजार कर रहे थे,
तभी अर्ध इंग्लिश महिला फुसफुसा कर बोली आप लोग "सही जगह" पर बैठे है,
"जेण्टलमेन"!! मैंने भी धीरे से चुटकी लेते हुए कहा "मेडम बचपन मे भूगोल पढ़ी होती तो आज आप भी "सही
जगह" बैठी होती"!!
इन सारी चतुराईयों,
चालाकियों एवं दिशा ज्ञान के भूगोल का इस्तेमाल मैंने तिरुपति से चेन्नई जाने वाली
हवाई यात्रा मे भी किया था। यात्रा 40-50 मिनिट की ही छोटी सी थी पर जिसको इस बार
हम यादगार बनाना चाहते थे। 31 दिसम्बर 1988 को तिरुपति बालाजी के दर्शन करने के
बाद हम परिवार सहित तिरुपति शहर स्थित हवाई अड्डे पर प्रातः छह बजे पहुँच गए। छोटा
सा हवाई अड्डा था। पत्नी और चार साल के बेटे के साथ मैंने वायुदूत कंपनी के काउंटर
पर तीनों का टिकिट प्रस्तुत किया। भीड़ न के बराबर थी। मुझे लगा,
बाकी यात्री पहले ही प्रवेश कर चुके है। मुझे फिर लगा आज भी कही खिड़की की सीट छोड़
बीच की सीटों पर फिर न बैठना पड़े। फिर पिछली दो यात्राओं के दौरान का खराब अनुभव
पुनः घटित न हो जाये। मन ही मन मे कुछ बेचैनी हो रही थी। टिकिट की जांच के बाद
स्टाफ ने सामान आदि का बजन कर जांच आदि पूरी की। हाथ के सामान मे टैग लगाया। अब तक
बेचैनी चरम पर थी मैंने अपने आपको सयंत कर काउंटर स्टाफ को कहा।" कि मुझे दो
सीट खिड़की की तरफ दे तो उत्तम रहेगा",
"अन्यथा कम से कम एक सीट तो खिड़की की अवश्य ही मिलनी चाहिये"। काउंटर पर
बैठे कर्मचारी ने कुछ रहस्यमय हंसी के साथ सहमति मे सर हिलाया पर बोला कुछ नहीं। चुप-चाप
बोर्डिंग पास मेरे आगे बढ़ा दिया। उसने अब मेरी बेचैनी को और बड़ा दिया। सामान आदि
की औपचारिकता के साथ सुरक्षा जांच मे स्टाफ ने बड़ी तेजी दिखाई और हम तीनों हवाई
पट्टी से हो सीधे हवाई जहाज की ओर बढे। मुझे ऐसा लगा कि शायद स्टाफ हमारा ही
इंतज़ार कर रहा था? यध्यपि मै हवाई यात्रा
के नियत समय से काफी पहले आ चुका था।
मै जिस हवाई जहाज की कल्पना कर खिड़की,
सीट, दिशा आदि की योजना बना रहा था पर सामने
जिस हवाई जहाज को देखा तो कुछ चौका!! ये
बोइंग विमान न था अपितु 19 सीटों वाला वायुदूत
कंपनी का एक छोटा विमान था। कौतूहल और जिज्ञासा अब भी मन मे रह-रह कर उठ रही थी कि
पता नहीं कितने यात्री पहले से बैठे होंगे। खिड़की की सीट मिलेगी भी या नहीं?
इसी उहाँ-पोह की स्थिति मे हम परिवार सहित विमान मे सवार हुए। वायु यान मे प्रवेश करते ही मै हतप्रभ था! मैने
चारों ओर निगाह दौड़ाई! हवाई जहाज के अंदर
का नज़ारा देख मै हैरान था!! एक बार फिर से हमारी चालाकियाँ,
होशियारी और भौगोलिक शिक्षा, ज्ञान तिरोहित हो चुका थी। मुझे अपने ज्ञान,
कौशल और हवाई यात्रा के अनुभव पर हंसी आ रही थी। हमारी खुशी की सीमा तब न रही जब मैंने हवाई जहाज को पूरा
खाली देखा!! खिड़की की सीट, दिशा आदि की कोई
भी समस्या नहीं थी क्योंकि हवाई जहाज मे हमारे परिवार के अलावा कोई अन्य सहयात्री
था ही नहीं!! मेरा खुशी के मारे बुरा हाल था कि कहाँ एक अदद खिड़की चाहता था,
पूरा विमान ही मेरा था!! प्रायः वायु यान पूरे यात्रियों को किराये पर ले जाते है
और यहाँ, मै था जो आज पूरे वायु यान
को ही किराये पर ले जा रहा था। बिल गेट्स,
वॉरेन बफेट, अंबानीयों और टाटाओं के
अपने निजी विमान से परिवार सहित यात्रा करने के किस्से सुने और पढे थे,
आज कुछ बैसी ही फीलिंग इस विमान मे बैठ हो रही थी। धनी-मनी,
दौलतमंद सा अहसास!! एक व्यक्तिगत निजी वायुयान अर्थात "मेरा चार्टर्ड
"एरोप्लेन"।
2X2 सीट की पाँच छह लाइन मे सारी खिड़कियाँ हमारा इंतजार कर रही थी। कुछ ही देर मे हवाई जहाज आसमान मे था। दो चालक दल के सदस्यों एवं एक सेवादार के अलावा वायु यान मे अन्य कोई यात्री न होने की शानदार, सुखद एवं यादगार यात्रा के दौरान विमान "परिचारक" ने जब गरमा गर्म कॉफी वितरित की तो यात्रा की प्रसन्नता दुगनी हो गई। खिड़की से शहरों की सड़के ऐसे दिखाई दे रही थी जैसे कोई इठलाती, बलखती नदी निडर निर्भय हो बह रही हो। कार, बस, ट्रक छोटे-छोटे चलते फिरते खिलौने लग रहे थे। घरों की छत्त पर टहलते लोग, सड़क पर चलते-फिरते इंसान छोटे से पुतलों की तरह लग रहे थे। छोटे छोटे घर, पुल, सैकड़ों पेड़, वृक्ष, फूल पौधे कुछ कुछ सपनों मे पारियों के देश सा अहसास करा रहे थे। उड़ते बादलों के बीच हवाई जहाज ऐसे लगता मानों आसमान मे स्थित हम अपने छोटे से घर मे बैठ वहाँ से निकल रहे बादलों से बात कर रहे हों। मै मन ही मन सोच रहा था कि कहाँ आज एक अदद खिड़की वाली सीट की ईक्षा की थी और कहाँ ईश्वर ने पूरा वायुयान ही हमारे हवाले कर दिया था। किसी ने सच ही कहा है-:
"बिन मांगे
मोती मिले, मांगे मिले न भीख।
इस तरह मेरे जीवन की तीसरी "हवाई
यात्रा" एक स्वर्णिम सुखद, आनंद दायक
यात्रा बन गयी जिसे मै "पहली" रमणीय,
मनोहारी और सुहावनी "हवाई यात्रा"
के रूप मे याद रखना पसंद करता हूँ।
विजय सहगल



1 टिप्पणी:
🙏🙏🙏🙏
एक टिप्पणी भेजें