"बंटवारा-? क्यों
स्वीकारा-?"
मेरे
पास हमारे पुरखों की मुझ से उपर लगभग दस
पीढ़ियों की वंशावली है। हम लोगो का कुटुंब बहुत बड़ा है जिनके ज्ञात पूर्वज श्री
चन्द्र सेन खत्री है। उनके पूर्व के पूर्वजों का विवरण उपलब्ध नहीं। लगभग दो सौ वर्ष पूर्व शायद हमारे पूर्वज झाँसी आये होंगे
ऐसा हमारा अनुमान है। क्योंकि जहां हम लोगो के घर है उसके आमने-सामने एवं अगल-बगल
चार-पाँच घर हमारे कुटुंबी जनों के ही परिवार है और घरों की बनावट सौ-सवा सौ वर्ष
पूर्व की अवश्य ही रही होगी। एक विशेषता हमारे घरों की और थी कि वे सभी अंदर से एक
दूसरे से जुड़े थे। लेकिन यहाँ मै एक विशेष
प्रयोजन के लिये अपने परदादा का उल्लेख करूंगा। मेरे परदादा स्व॰ श्री हरचरण लाल
थे जिनके तीन पुत्र स्व॰ श्री कालू राम जी,
स्व॰ श्री चतुर्भुज एवं स्व॰ श्री सरमन लाल थे। स्व॰ श्री चतुर्भुज के सिर्फ आठ पुत्रियाँ
ही थी कोई पुत्र नहीं था, कालू राम जी के
दो बेटे थे एक बेटी एवं स्व॰ श्री सरमन लाल जी (मेरे दादा) के एक पुत्र (मेरे पिता
स्व॰ श्री विष्णु नारायण) एवं दो पुत्रियाँ (मेरी बुआएँ थी) मेरा यहाँ अपने कुटुंब
का परिचय देने का कोई ऐसा प्रोयजन नहीं था
कि वे कोई बहुत बड़े व्यवसायी या उद्योग के स्वामी
या नगर के प्रसिद्ध व्यक्ति थे। निश्चित ही हमारे पूर्वज महारानी लक्ष्मी
बाई के काल खंड मे भी रहे होंगे पर राजा गंगाधर राव राज परिवार से निकटता का कोई
प्रमाण नहीं अतः मेरा ये मानना है कि हमारे परदादा भी हम जैसे एक साधारण मध्यम वर्गीय परिवारों के एक सुसंस्कृत
व्यक्ति रहे होंगे। लेकिन जो सबसे बड़ी विशेषता या खूबी उनमे थी कि कैसे परिवार मे
आपसी एकता, मेलमिलाप एवं समाज मे
स्थापित मूल्यों को कैसे परिवार के बीच कायम रक्खा जाये। इसी बात का उदाहरण परदादा
जी के आचार-विचार, व्यवहार और जीवन के आचरण मे लाये गुणों से परिलक्षित
होता है। परिवार के सदस्यों की आवश्यकता के अनुरूप घर के उपयोग के लिए जगह प्रदान
कर दी गयी। मेरे दादा के एक भाई जिनके कोई पुत्र न होने के कारण आज भी उनके हिस्से
मे उनकी पौत्रियों के परिवार वैधानिक भागीदार तो है ही। किसी के हिस्से उपर
की संपत्ति है तो नीचे परिवार के अन्य सदस्य की जायदाद इसके ठीक उलट किसी का
हिस्सा नीचे है तो अन्य सदस्य की परिसंपति उपर। कहने का तात्पर्य है कि तत्कालीन
परिस्थिथितियों मे आपसी प्रेम और भाई चारे के संस्कार के फलीभूत,
आवश्यकताओं के अनुरूप स्थान का उपयोग होता रहा पर कोई लिखित विभाजन आज भी नहीं है।
आपको आश्चर्य होगा कि परंपरा से प्राप्त उक्त
संपत्ति के आज की तारीख मे डेढ़ सौ-दो सौ से ज्यादा वैधानिक वारिस होंगे। यदि एकाध सदस्य की महत्वाकांक्षा के कारण कुछ आपसी मन-मुटाव और भेद भाव को नज़रअंदाज़ कर
दे तो कुल मिला कर स्थिति आज तक भी
सौहद्र्पूर्ण है। यहाँ उक्त आख्यान लिखने का मुख्य प्रयोजन ये बताना है कि परिवार की
आवश्यकताओं का सम्मान एक दूसरे की भावनाओं के सम्मान से होता है न कि बंटवारे के
कारण।
अब मूल विषय पर आते है। स्वतन्त्रता वाले दिन 15 अगस्त 1947 मे जब देश के बहुतायत नागरिक अपने घरों मे चैन की नींद सो रहे थे तब पूर्वी बंगाल, पश्चिमी क्षेत्र मे पंजाब, गुजरात, कश्मीर राजस्थान के लोग विभाजन से उपजी विपदा और विभीषका से दो-चार हो रहे थे। करोड़ो लोग इस विभाजन रूपी दंश से सताये अपना घर परिवार छोड़कर एक अनिश्चित भविष्य की यात्रा करने को मजबूर किए गए। गांधी जी के उस कथन को कि "देश का बंटवारा मेरी लाश पर होगा", दरकिनार कर अंग्रेजों और भारतीय राजनैतिज्ञों विशेषकर काँग्रेस द्वारा देश के बँटवारा स्वीकारने के क्रूर निर्णय के कारण कुछ ही दिनों दोनों ओर से शरणार्थियों का पलायन हुआ। लगभग एक करोड़ सिक्ख, पंजाबी और सिंधियों जिसमे अधिकतर हिन्दू थे को हँसती खेलती ज़िंदगी को शरणार्थी के रूप मे सड़क के दो राहे पर ला खड़ा किया। लाखों लोग दंगे मे अकारण काल कवलित हो गये। बँटवारे के एक ऐसे राजनैतिक निर्णय ने इन बेघर हुए लोगो को दाने-दाने के लिये मुंहताज कर दिया जो अब तक सुख और वैभव का जीवन व्यतीत कर रहे थे। इन अभागे लोगो को दो वक्त के खाने के भी लाले पड़ गये!! संकट के इन दुर्दिनों की वेदना को पंजाब, सिंध, गुजरात और बंगाल के कुछ हिस्सों को छोड़ कर कदाचित ही किसी अन्य क्षेत्र या प्रांत ने या कोई अन्य देशवासी ने इस विभीषिका को महसूस किया हो? ऐसे महा विपदा को सिर्फ और सिर्फ बँटवारे की मनोव्यथा से पीढ़ित भुक्त-भोगी शरणार्थी ही समझ सकते है। किशोर अवस्था मे मेरे बचपन के सहपाठी देवेंद्र दुआ के पिता श्री एवं माता जी से इस संबंध मे कई बार बात करने का सौभाग्य मिला था। कैसी वेदना और लाचारी के भाव थे उनके चेहरे पर!! माताजी तो बात करते करते अपने घर की यादों कहीं खो गयी थी। उनके मुँह से निकले शब्दों से कहीं ज्यादा दर्द उनके चेहरे से झलक रहा था। बाबूजी और माताजी के चेहरे पर उपजे उस दर्द और पीढ़ा को मै आज भी नहीं भुला पाया। क्या गुनाह था उनका जो उन्हे उनकी जड़ों से विलग कर जन्मभूमि/मातृभूमि से वंचित हो पलायन के लिए मजबूर किया गया था। रातों रात अपनी धन संपत्ति, व्यापार-वैभव जस का तास छोड़ सुरक्षित जीवन की तलाश मे अपनी जड़ो से जुदा होना पड़ा।
देश की स्वाधीनता संग्राम मे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, बिस्मिल, अशफाकुल्लाह जैसे क्रांतकारी सदस्यों के बलिदान और योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। अन्य दलों के साथ काँग्रेस से संबद्ध महात्मा गांधी सहित नेहरू, सरदार पटेल एवं अन्य अनेक सेनानियों के स्वतन्त्रता मे योगदान की हम सभी भूरि-भूरि प्रशंसा करते है। पर जहां एक ओर हम काँग्रेस के स्वतन्त्रता मे किये योगदान के लिये अच्छे निर्णय की आदर और स्तुति करें तो क्या काँग्रेस पार्टी द्वारा अंग्रेजों के देश के बँटवारे के निर्णय को स्वीकारने पर आलोचनात्मक टिप्पड़ी और चर्चा नहीं की जानी चाहिये?
क्यों हम सभी के जेहन मे कभी ये सवाल नहीं आया कि 15 अगस्त 1947 मे जब देश का बँटवारा हुआ तो तत्कालीन राजनैतिक पार्टी कॉंग्रेस सहित अन्य राजनैतिज्ञों ने क्यों नहीं इस बँटवारे का विरोध किया? जब महात्मा गांधी ने देश के अवाम को ये भरोसा दिया था कि हिंदुस्तान का बंटवारा उनकी "लाश" पर होगा, तो अग्रेजों की इस बांटो और राज करो नीति का विरोध करने के लिये देश की सबसे बड़ी और सक्रिय राजनीतिक पार्टी काँग्रेस आगे क्यों नहीं आयी? उन्होने विभाजन को क्यों स्वीकार किया? क्या उन्हे विभाजन की विभीषिका का अहसास नहीं था? या फिर विभाजन का समर्थन करने वाले लोगो को सिर्फ अपनी गद्दीनाशीन होने की तीव्र ललक, लालसा और अति महात्वाकांक्षा ने बँटवारे की इस मानव निर्मित आपदा को नजजरंदाज कर दिया? ये चिंतन-मनन का विषय है।
यदि तकालीन नेताओं ने समावेशी रवैया अपनाया होता और जिन्ना की तदर्थ प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा को संतुष्ट कर दिया होता तो शायद बंटवारा न होता। लेकिन यदि पंडित नेहरू सभी लोगो को साथ लेकर स्वयं की अभिलाषा और आकांक्षा को दरकिनार कर दूसरों की भावनाओं और सम्मान का समावेश कर महत्व देते एवं महात्मा गांधी ने विभाजन के विरुद्ध अपने वचन और कथन पर दृढ़ और कठोर रवैया अपनाया होता तो देश को विभाजन की विभीषका से बचाया जा सकता था। क्योंकि कालांतर मे लोकतान्त्रिक प्रणाली के तहत चुनी गयी सरकार सत्ता और शासन मे अपनी भागेदारी सुनिश्चित करती। हर मत और संप्रदाय के लोगो की सत्ता मे भागेदारी से आपसी मतभेदों के बावजूद लोग साथ रहने को मजबूर होते। तब शायद कल का अखंड भारत एवं आज का पाकिस्तान आतंकवादियों का अड्डा न बनता। पाकिस्तान मे अल्पसंख्यक हिंदुओं, सिक्खों के पूजा स्थलों को आए दिन धर्मभीरु लोगो द्वारा नहीं तोड़ा जाता और कश्मीर की समस्या तो उत्पन्न ही न होती। क्या मजाल थी कि पिछले दिनों सिरफिरे लोगो द्वारा लाहौर मे महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा को क्षति पहुँच पाती? भारत का विशाल भूखंड अखंड भारत का रूप ले देश की जनता के विकास और उन्नति के पैमाने पर दुनियाँ मे एक अलग स्थान रखता। देश की भूगर्भीया सम्पदा, पर्यटन और प्रकृतिक सम्पदा से देश मे चहुं ओर खुशाली होती पर दुर्भाग्य से राजनैतिक नेताओं के अंतर्द्वंद और अति महावकांक्षा ने ऐसा होने नहीं दिया जिसके फलस्वरूप बँटवारे की इस विभिषका मे लगभग 10 लाख लोगो को अपनी जान न गंवानी पड़ती। लोगो को अपनी जड़ों से विलग होने के दंश से न गुजरना पड़ता। अपने ही देश मे शरणार्थियों की तरह रहने के लिये बाध्य न होना पड़ता। एक कहावत है "देर आयद, दुरुस्त आयद"। देर से ही सही 1947 के विस्थापितों द्वारा झेले गये दुःख और संताप को महसूस करने और उस वेदना मे देश के सभी नागरिकों को सहभागी हो एकाकार होने मे इस वर्ष सरकार ने "14 अगस्त 2021 को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस" के रूप मे मनाने का कदम सराहनीय है। काश महात्मा गांधी के कहे अनुसार देश का "बंटवारा न स्वीकारा" होता तो आज देश का समृद्धशाली, वैभव शाली और गौरव शाली इतिहास होता।
विजय सहगल



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