मंगलवार, 31 अगस्त 2021

श्री नाथ जी मंदिर

 

"श्री नाथ जी मंदिर"






राजस्थान के उदयपुर से लगभग 46 किमी दूर "नाथ द्वारा" या श्रीनाथ जी का मंदिर  एक विश्व प्रसिद्ध तीर्थ स्थान जो भगवान श्री कृष्ण का प्रकट्य पवित्र क्षेत्र के रुप मे पहचाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि प्रभु श्री नाथ जी द्वारा चिन्हित जगह पर 17वी शताब्दी मे मंदिर का निर्माण कराया गया जिसे लोकप्रिय रूप मे  श्रीनाथ जी की हवेली कहा जाता है। देश विदेश से दर्शनार्थी इस पवित्र स्थान मे भगवान श्री नाथ के दर्शन हेतु पूरे साल आते रहते है। 28 फरवरी 2021 को हमने भी परिवार सहित मंदिर दर्शन हेतु प्रस्थान किया।  देश दुनियाँ से आ रहे इस छोटे से कस्बे मे श्रद्धालुओं और वाहनों की रेलम-पेल को अनुशासित तरीके से नियंत्रित करने ले लिये यहाँ के  यातायात विभाग ने  शहर के प्रवेश द्वार पर ही एक बहुत बड़े क्षेत्र मे वाहन पार्किंग की व्यवस्था बना रक्खी थी। जिसमे हजारों वाहनों को रखने की व्यवस्था थी। इसी पार्किंग के पास बन रही भगवान शिव की अति विशाल प्रतिमा को दूर-दूर से देखा जा सकता है।  स्थानीय सार्वजनिक वाहनों के अलावा बाहर से आये वाहनों का पार्किंग क्षेत्र के आगे प्रवेश निषेध था जिसके कारण श्री नाथ द्वारा कस्बे मे वाहनों की अव्यवस्था देखने को नहीं मिली। स्थानीय ऑटो, टेम्पो भी एक निश्चित जगह पर दर्शनार्थियों को छोड़ रहे थे जहां से मंदिर तक पैदल ही प्रवेश करना था जो बहुत ज्यादा दूर नहीं है। श्री नाथ द्वारा क्षेत्र मे  यातायात की  कुछ ऐसी ही व्यवस्था शासन प्रशासन द्वारा देश के अन्य पर्यटन और तीर्थ स्थलों पर करना चाहिये।    

श्री नाथ द्वारा मंदिर मे  भगवान श्री कृष्ण के बालक  रूप  (आठ वर्ष) के दर्शन होते है। स्वामी बल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ जी ने नाथद्वारा मे श्री नाथजी जी की पूजा को संस्थागत रूप दिया। यहाँ पर भगवान का मंदिर एक अति प्राचीन हवेली के रूप मे स्थित है। एक आदर्श ग्रहस्थ की ही  तरह ही यहाँ रसोई, बैठका, भंडार घर, जलघर अश्वशाला आदि इस हवेली के अलग अलग हिस्से है। नाथद्वारा मे भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप और किशोर रूप मे दो मूर्तियाँ अलग अलग बैठका  मे विराजमान है।

इस छोटे से कस्बे मे भगवान श्री नाथ जी के चित्रों के पेपर और कपड़े पर शानदार तरीके से रंगो से उकेर कर बहुत ही खूबसूरत चमकदार मोती, गोटे और मोतियों से श्रंगार कर पेंटिंग बनाई जाती है। शहर मे दुकानों पर मुख्यतः श्री नाथ जी के इसी तरह के छोटे-बड़े चित्रों को सजाया गया है। दर्शनार्थी अपने विवेक और आर्थिक क्षमता अनुसार श्री नाथ जी के चित्रों को अपने घर और प्रतिष्ठानों मे प्रतिष्ठापित करने हेतु ले जाते है। बड़ी संख्या मे तीर्थ यात्रियों के आगमन के कारण ठहरने के छोटे बड़े इंतजाम किये गए है।

श्री नाथ जी मे एक मान्यता है कि जब औरगंजेब नाथ द्वारा मंदिर को क्षति पहुँचाने के उद्देश्य से नाथ द्वारा आया तो वह अंधा हो गया। श्रेष्ठियों के सुझाव अनुसार उसने अपनी दाड़ी से मंदिर की सीढ़ियाँ साफ करते विनती की कि उसकी आँखों की रोशनी बापस आ जाये इस तरह   उसकी आँखों मे पुनः रोशनी आ गयी। इसके बाद औरंगजेब ने एक कीमती हीरा श्री नाथ जी को भेंट किया तभी से भगवान श्रीनाथ जी की ठोढ़ी पर शोभयमान है जिसे आज भी लगा देखा जा सकता है। हर वर्ष होलिका दहन के अगले दिन बादशाह की सवारी निकाली जाती है इस सवारी मे बादशाह का स्वांग रच रहा व्यक्ति मंदिर की सीढ़ियों को अपनी दाढ़ी से बुहारता है।      

किशोर रूप मे स्थापित मूर्ति मन को मोहने वाली अति सुंदर रूप लिए है। स्थानीय पुरोहित की दर्शन हेतु निमित्त माध्यम बनने के आग्रह अनुसार हम अपने परिवार सहित दोपहर के "उथापन दर्शन" (दोपहर 3.30 से 3.45 तक) हेतु मंदिर प्रांगढ़ मे निर्धारित समय से पूर्व पहुँच गए। दर्शन हेतु लंबी लाइन देख कर चिंता तो हुई पर पुरोहित जी के साथ होने के कारण हम निश्चिंत थे। निर्धारित समय पर शंख ध्वनि के साथ हुए उद्घोष ने उथापन  दर्शन शुरू होने के संकेत दिये जिसको मंदिर के आसपास एवं दूर तक सुना जा सकता था। निर्धारित समय की  समाप्ती के 7-8 मिनिट पूर्व जब लाइन समाप्त की ओर थी तब पुरोहित जी के आदेशानुसार हम लोगो ने दर्शन हेतु प्रस्थान किया। पहले से ही लाइन मे लगी भीड़ समाप्त हो जाने के कारण हम लोग सीधे मंदिर के मुख्य मंडप मे उपस्थित थे।

लगभग 60-70  फुट लंबे मंडप मे पुरोहित के सुझाव अनुसार हम लोग सबसे पीछे की लाइन मे दीवार के सहारे खड़े हो भगवान श्री नाथ जी के मनभावन दर्शन हेतु खड़े रहे। अद्भुद नयनभिराम मुख मण्डल से निगाहें  नहीं हट रही थी। सिर पर मोर मुकुट लगा हुआ था। मुकुट पर सफ़ेद मोतियों की लड़ी भगवान के चेहरे के ओज और सौन्दर्य मे चार चाँद लगा रही थी। गले मे स्वर्णभूषणों और सफ़ेद चमकीले मोतियों की माला शोभयमान थी। ठोढ़ी मे लगा हीरा दूर से ही अपना प्रकाश बिखेर रहा था। माथे पर केशर-चन्दन का तिलक और पूरे शरीर पर विभिन्न दिव्य अलंकारों से युक्त पोशाक पहने अपने बाएँ हाथ को उपर उठाए होने की मुद्रा मे भगवान श्री नाथ जी के दर्शन (गोबर्धन पर्वत उठाए होने की मुद्रा मे) मन को भाव विभोर करने वाले थे। चारों तरफ वातावरण मे केशर चन्दन से युक्त पुष्पों की सुमधुर गंध एवं धूप-दीप की खुशबू से मंदिर का मंडप सहित श्री नाथ जी की पूरी हवेली  विशिष्ट  गंधों से सुगंधित हो रही थी। दिव्य दर्शन की अद्भुद, आध्यात्मिक  अनुभूति का संचार पूरे शरीर मे महसूस  किया जा सकता था और जो मन को पुलकित कर आनंद का एक अलग ही अनूठा अनुभव  करा रहा  था।  दर्शन के लिए निर्धारित समय की समाप्ति  तक हम लोग अन्य दर्शनार्थियों के साथ भगवान श्री नाथ जी को एकटक निहारते खड़े रहे।

मंडप मे बाहर आने के पश्चात पुनः छोटी बैठका मे भगवान के बाल रूप दर्शन हेतु आगे बढे जिसके दर्शन का समाप्ति समय मुख्य मदिर के समय से दस मिनिट बाद तक था। भगवान के बाल रूप को झूले मे बैठाया गया था। कुछ समय तक ठाकुर जी की हवेली मे भ्रमण एवं   औपचारिकता के पश्चात प्रसाद प्राप्त किया जो कि एक आकर्षक और सुरक्षित  पैकिंग  मे श्रद्धालुओं को उपलब्ध कराया जा रहा था। श्री नाथ द्वारा शहर छोटी छोटी गलियों मे बंटा कस्बाई बाजार कुछ-कुछ वृन्दावन के बाँके बिहारी मंदिर की गलियों सा था। जहां अधिकतर दुकाने भगवान श्री नाथ जी के छोटे-बड़े सुंदर चित्रों से सुसज्जित थी। स्वादिष्ट मिष्ठान की दुकाने हम जैसे शुगर पीढ़ितों को मुंह चिढ़ा रही थी।  पुरोहित को यथोचित दक्षिणा एवं समुचित अभिवादन पश्चात स्थानीय बाज़ार के भ्रमण, दर्शन करने के बाद  अपने गंतव्य उदयपुर की ओर बापस जाने का निश्चय किया।      

विजय सहगल

 

शनिवार, 28 अगस्त 2021

अफगान तालेबान

                                                         "अफगान तालेबान"




लोकतान्त्रिक अफगानिस्तान देश का इससे ज्यादा दुर्भाग्य क्या होगा कि उसके आज़ादी के दिन 19 अगस्त 2021 की पूर्व संध्या पर इस्लामिक आततायी तालेबानियों ने उसकी आज़ादी का बलात हरण कर लिया। अफगानिस्तान का दुर्भाग्य रहा है कि विभिन्न कबीलों मे बंटे इस देश मे कभी स्थायित्व नहीं रहा। 300 ईसपूर्व वर्ष मे यहाँ बुद्ध धर्म लोकप्रिय था। शकों, गजनी, गोरी,लोदी, मुगल, अब्दाली वंशो  का इस देश पर विभिन्न कालखण्डों पर शासन रहा। 1793 के आसपास सिखों ने  महाराज रणजीत सिंह के नेतृत्व मे अफगानिस्तान पर लंबे समय तक शासन किया। तदुपरान्त ब्रिटिश हुकूमत और उसके बाद का इतिहास इन विभिन्न अफगानी काबाइलों के आपसी युद्धों से अभिशप्त रहा। जिसके  परिणाम स्वरूप  15 अगस्त 2021 को  चीन और पाकिस्तान की शह, समर्थन और सहायता  से 20 वर्ष बाद एक बार फिर पुनः कब्जा कर अफगानिस्तान को तालेबानियों के कठरपंथियों मुल्ले मौलवियों ने गुलाम बना लिया।

20 वर्षों तक अमरीकन फौजों की बंदूक की नाल से डरे सहमे डरपोक तालेबान के लड़ाके पहाड़ों और जंगलों मे चूहों की तरह अपने बिल मे छुपे सहमे बैठे रहे। अमरीकन, भारतीय सहित विभिन देशों की सरकारों ने इस अभिशप्त देश अफगानिस्तान के नागरिकों के जीवन मे विकास, शिक्षा और स्वस्थ के लिए अपने काफी संसाधन झौंके पर अमरीका मे बौद्धजीवियों के दबाब के कारण अपने सैनिकों की जानमाल और संसाधनों को एक अकृतज्ञ राष्ट्र के लिए यों ही जाया करने के निर्णय पर पुनर्विचार ने, अमरीकन फौजों को अफगानिस्तान से बापस बुलाने की नीति का एलान कर दिया। जिसके नतीजे के कारण भारी संसाधन और धनराशि व्यय करने के बावजूद अफगानी नागरिकों को फिर उसी दो राहे पर खड़ा कर दिया जहां से उन्होने विकास, शिक्षा और संस्कार के लिए दौड़ भरी थी। अफगानी नागरिकों को बीच मँझधार मे छोड़ने पर जहां एक ओर अमेरिकन फौज जिम्मेदार है वही स्वयं अफगानी नागरिक, उनकी सरकार और सेना भी कम जिम्मेदार नहीं।

भारत की  फिल्मी दुनियाँ के बिके हुए निर्माताओं और अभिनेताओं ने "पठान" के रूप मे एक बहुत बड़ा झूठ भारतियों  के बीच परोसा गया जिसमे पठान की एक बहादुर, ईमानदार और देश भक्ति  की छद्म  छवि प्रस्तुत की गयी थी। आज उस झूठ और फरेब  का  हिंदुस्तान सहित सारी दुनियाँ के सामने पर्दाफाश हो गया। इनके राष्ट्र प्रमुख एवं  तथाकथित सेना ने बड़े ही कायरना और आकंठ भ्रष्टाचार मे डूबी इनकी फौज ने लड़ना तो दूर चाँदी के चंद टुकड़ो की खातिर अपना "दीन", "ईमान" बेच अपने ही हथियार आतंकी तालेबानियों के सुपुर्द कर भाग खड़े हुए। इनकी (पठान की) बहदुरी का ये आलम है कि सारे के सारे पठान अपनी माँ, बहिन, बेटियों और बीबियों को घर मे तालेबानियों के भरोसे छोड़ अमेरिका मे शरणार्थी बनने को आकुल और व्याकुल है। रही ईमानदारी तो वाह रे!! पठान  आधुनिकतम हथियार और प्रशिक्षण के बावजूद आकंठ भ्रष्टाचार मे डूबी अफगानी सरकार और सेना ने पलायन और समर्पण कर इस्लामिक तालेबानियों कठरपंथियों के समक्ष बिना युद्ध लड़े ही घुटने टेक दिया। बाकि "देशभक्ति" के दर्शन तो अफगानी राष्ट्रपति द्वरा रातों रात देश छोड़ भागने और जिस सेना पर देश और देश के नागरिकों की रक्षा की ज़िम्मेदारी थी उसने तालेबानियों के सामने बगैर लड़े ही समर्पण कर दिया या भाग खड़े हुए। वाह रे!! "पठान", तुम्हारी बहदुरी, ईमानदारी और देश प्रेम के साक्षात दर्शन अफगानिस्तान मे हो गये!! अब और कुछ देखने को बाकी नहीं रहा!!

तालेबानियों आतंकियों का  अफगानिस्तान मे कब्जा कुछ ऐसा ही है जैसे लुटेरों डाकुओं द्वारा किसी गाँव पर कब्जा कर गाँव की पंचायत का प्रशासन आपने हाथ मे लेना!! कुछ अधिसंख्य अनपढ़, गंवार कट्टरपंथि तालेबानियों द्वारा शरीयत के अनुसार शासन करना कुछ बैसा ही है जैसे पंचतंत्र की कहानी मे  रोटी के लिये आपस मे लड़ रही बिल्लियों को बंदर द्वारा  न्याय देना। जिन तालेवानियों को इस्लाम का क॰ ख॰ ग॰ भी नहीं मालूम वे अपनी मनमर्जी और पाशविक सोच को ही अपना कानून प्रतिवादित कर शरीयत का शासन बता रहे है!! इन अतिवादियों पर वो कहावत एक दम उपयुक्त होगी कि "अनपढ़ दोस्त से अच्छा पढ़ा लिखा दुश्मन"। स्वचालित हथियारों से सुसज्जित उस  मूढ़, मंदबुद्धि अतिवादी द्वारा देश के  नागरिकों से सामान्य व्यवहार की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? जिसकी पाशविक सोच 12 वर्ष से बड़ी बच्चियों की शादी अतिवादी तालेबानियों लड़ाकों से कराने की हो?? अमेरिका द्वारा आफगानी सेना को दिये हथियारों का इन तालेवानियों के हाथ लग जाने की आशंका का  अभिप्राय है कि किसी मूर्ख के हाथ मे किसी शक्ति या अधिकार का देना? अफगानी नागरिकों के लिये ये कुछ बैसा ही है जैसे बंदर के हाथ मे उस्तरा!!

अमरीकी फौज के आने के पूर्व इन तालेबानियों के शासन मे अत्याचार, निरंकुश शासन और हैवानियत के किस्से दुनियाँ भूली नहीं है। ड्रग तस्करी, लूट, हिंसा आतंक एवं अपहरण मे रत इन तालेबानियों के झूठे आश्वासन, वायदे और विश्वास मे दुनियाँ अब आने वाली नहीं है। इनकी सोच और स्वभाव मे अब तक कुछ भी बदलाब नहीं आया है। सारी दुनियाँ सामान्यतः और भारत विषेशतः जनता है कि इन तालेबानियों रूपी "कुत्ते की पूंछ को बारह साल तक भी नलकी मे रखने के बाद भी टेढ़ी की टेढ़ी रहेगी!!  

इन तालेबानियों के कुछ पैरोंकार हमारे देश मे भी है। हमारे देश के विपरीत बुद्धि एक नेता, एक मनहूस शायर और एक तथाकथित धार्मिक विद्वान सभ्य समाज मे रहने के बावजूद इनकी सोच और स्वभाव अभी भी पाशविक परिवेश मे पले बढ़े तालेबानियों की तरह ही है। सारी शर्मोहया छोड़ इन निर्लज्जों ने  तालेबानियों को  "मुबारक" पेश किया? ये महाश्य दूर बैठ तालेबानियों की हिम्मत और हौसले पर "सलाम" पेश कर रहे थे!! इन "आँख के अंधे नाम नयन सुख" रूपी अभद्र जनों को किसी भी कीमत पर अफगानिस्तान छोड़ने के लिए अपनी जान की परवाह किए बिना, हवाई जहाज के पंखों और पहियो पर लटक कर यात्रा मे अपनी जान देने वाले नौजवानों का वीडियो भी दृवित न कर सका। एक सांसद इन धूर्त तालेबानियों की तुलना देश के स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों से कर रहा था!! इस कठोर, पत्थर दिल व्यक्ति  के दिल मे उन माँओं की  तस्बीर  भी करुणा न भर सकी  जो अपने कलेजे के टुकड़े "नन्हें-मुन्हे मासूम बच्चों को अजनबी अमेरिकन फौजों के हवाले करने मे संकोच नहीं कर रही थी क्योंकि उन माँओं को इन मासूमों का भविष्य तालेबानी आततियों के बीच रहने से ज्यादा सुरक्षित प्रतीत हो रहा था। जब इस दल विशेष के सांसद की ये सोच है तो आप समझ सकते है कि इस दल के हाथों मे देश का भविष्य कैसा होगा??  इनमे एक  मूढ़ मंदबुद्धि सूरमा, "मनहूस" शायर इन दो टके के तलवानी हैवानों की तुलना "अंगुली माल" से हृदय परिवर्तित "आदि ऋषि" से कर रहा था? वो वनमानुष ये भूल रहा है कि "अंगुली माल" का  हृदय परिवर्तिन उनके चहुंओर  ज्ञानी जनों, ऋषियों, साधु-महात्माओं द्वारा निर्मित धर्म, अध्यात्म और संस्कारों से पोषित दिव्य वातावरण प्राप्त था इसके विपरीत साधू पुरुषों के संगत की अपेक्षा इन कलुषित क्रूरकर्मी तालेबानियों को मिल रहे "वातावरण" और मनहूस शायर जैसे सलाहकारों, पैरोकारों के रहते कदापि नहीं की जा  सकती।  इन  जैसे असुर पृवृत्ति के लोगो को घुटने तक कीचड़ मे खड़े अफगानी नागरिक, महिलाएं, बच्चे  नहीं दिखाई दिये जो तालेबानियों से मुक्ति के लिये किसी भी कीमत पर अपना देश छोड़ने पर अमादा  है। दिल कचोटने वाली उस किशोरी की  चित्कार इन अमानवीय लोगो के कान मे सुनाई नहीं दी जो अमेरिकन फ़ौजियों को रो-रो कर "हेल्प"...हेल्प... की  आवाज लगा रही थी।     

पिछले दिनों काबुल हवाई अड्डे पर आत्मघाती बम धमाकों मे सैकड़ों निरीह नागरिकों की हत्या से संदेश स्पष्ट है कि इन आतंकियों का धर्म-मज़हब से कोई सरोकार नहीं अन्यथा अपने ही इस्लामी मताबलम्बियों के प्रति ही करुणा दया और प्रेम के "भाव" का आभाव इनके दिलों मे  नहीं होता? फिर कैसे ये पाशविक सोच के तालेबानी दूसरे अन्य मज़हब के प्रति सहिष्णु होंगे?  न केवल हमे बल्कि सारी दुनियाँ को अफगानिस्तान पर इन तालेबानियों के अन्यायपूर्वक हथियायी सत्ता और शासन का विरोध करना चाहिये।

विजय सहगल                

मंगलवार, 24 अगस्त 2021

पक्षपात रहित पारदर्शी समाचार की अपेक्षा

 

पक्षपात रहित पारदर्शी समाचार की अपेक्षा 




श्रीमान संपादक,                                      24.08.2021

नवभारत टाइम्स                         

नई दिल्ली

 

महोदय,

 

आपके आपके समाचार पत्र दिनांक 24.08.2021 के पृष्ठ संख्या 2 पर समाचार 'शरजील के भाषणों में हिंसा करने के लिए उकसाने जैसा कुछ नहीं ' पढ़ा। शीर्षक को देख कर ये भ्रम उत्पन्न  होता है कि मानो ये टिप्पड़ी किसी न्यायालय के माननीय न्यायाधीश महोदय द्वारा शरजील इमाम के विधिक प्रकरण मे की गयी, जबकि समाचार पढ़ने पर उक्त टिप्पड़ी शरजील की जमानत हेतु उनके वकील की न्यायालय के समक्ष दलील थी। ऐसा आचरण आपके संवाददाता द्वारा  शरजील जैसे अपराधी  के पक्ष मे घृणित मानसिकता को उजागर करता है जो नवभारत टाइम्स जैसे गौरवशाली  राष्ट्रीय समाचार पत्र के लिये प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकती। कृपया संबन्धित संवाददाता को समाचार प्रेषित करते समय निष्पक्ष एवं पारदर्शी व्यवहार के लिये निर्देशित करें।  

 

विजय सहगल

सोमवार, 23 अगस्त 2021

सौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज को चली

"सौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज को चली"





सोसाइटी मे हमारे मित्र कहें या पितातुल्य संरक्षक, 84 वर्षीय, श्री इंदर राज शर्मा जी से  रोज प्रातः भ्रमण पर मुलाक़ात हो जाती है। भ्रमण के दौरान कुछ समय धर्म, अध्यात्म या राजनीति पर भी चर्चा हो जाती है। आईआईटी खड़गपुर से स्नातक और कलकत्ता मे हिंदुस्तान मोटर्स से महा प्रबन्धक पद से सेवानिवृत्त शर्मा जी कुछ दिन पूर्व साठ-सत्तर के दशक के कलकत्ता के बारे मे सुना रहे थे कि स्वतन्त्रता के समय से ही कलकत्ता देश का सबसे बड़ा औध्योगिक शहर रहा है। वे बताते है कि जब वे हाबड़ा से ट्रेन द्वारा  निकलते थे तो मीलों दूर तक रेल्वे लाइन के दोनों ओर बड़ी बड़ी फैक्ट्री, कारखानों और उनकी चिमनियों से निकलते धुएँ को मीलों दूर तक ट्रेन से देखा जा सकता था।  दशकों बाद  वामपंथियों और तृणमूल के शासन मे अब एक भी उध्योग नज़र नहीं आता है। इन दलों की यूनियन सांस्कृति, टोला बाजी, और कट मनी ने इस प्रदेश को विकास की दौड़ मे दशकों पीछे धकेल दिया। 

पिछले दिनों पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी अचानक केंद्र की राजनीति मे अपनी दिलचस्वी और आत्मीयता दिखाने के लिये दिल्ली मे थी। जिस दिन से उन्होने संसद के मानसून सत्र 2021 के दौरान पार्लियामेंट  मे भी "खेला होबे" का आवाहन किया है तब से तृणमूल कॉंग्रेस के सांसदो का उच्छृंखल व्यवहार देश भर मे किसी से छिपा नहीं है। मंत्री से पेपर छीन फाड़ना उनके "खेला होबे" मिशन का ही एक हिस्सा था। किस तरह कुछ सांसदों ने जुलाई-अगस्त के संसद के मानसून अधिवेशन का हरण कर पूरे सत्र को नहीं चलने दिया। दोनों सदनों मे विपक्ष इन कुछ सांसदों ने लोकतन्त्र की मर्यादा का गला घोंट दिया।   पश्चिमी बंगाल मे विजयी होने के बाद दिल्ली मे अचानक बीजेपी के विरुद्ध विपक्षी दलों का प्रधानमंत्री के पद पर सर्वमान्य प्रत्याशी के दावे को सुस्थापित करने  और अपने इसकी  पुष्ट करने का एक प्रयास है। एकाएक वर्तमान सरकार से  लोकतन्त्र और देश की रक्षा हेतु उनकी चिंता जाहिर करना घोर आश्चर्य दिखाने वाला है। कल तक बंगाल मे लोकतन्त्र को ताक पर रख अपने अनुयायियों के माध्यम से दल विशेष एवं संप्रदाय विशेष के लोगो के विरुद्ध  हिंसा, आगजनी और हत्या तक मे मौन रहने वाली ममता बैनर्जी से लोकतन्त्र की रक्षा की अपेक्षा करना कुछ बैसा ही है जैसे "सौ सौ चूहे खा के बिल्ली का हज पर जाना!!

बड़ा खेद और अफसोस का विषय है कि कैसे किसी राज्य का एक मुख्यमंत्री अपने दंभ, अहंकार और घमंड मे आकार अपने राज्य के करोड़ो किसानों और आम जनों को केंद्र सरकार की योजनाओं से मिल रहे लाभ से वंचित कर सकती है? केंद्र और राज्यों के मतभेदों, मतांतरों से इन्कार नहीं किया जा सकता परंतु हम अपने गरुर और ठसक  मे इतने मग्न हो जाये कि प्रदेश के गरीब किसानों और मजदूर वर्ग के हितों को भी ताक पर रक्ख दे? किसी कल्याण कारी राज्य के प्रमुख से ऐसी अपेक्षा कैसे की जा सकती है?? लेकिन दुर्भाग्य से पश्चिमी बंगाल मे ऐसा पिछले सात सालों से लगातार हो रहा है। पश्चिमी बंगाल मे केंद्र सरकार की किसानों को दी जा रही छह हजार रुपए बार्षिक की "किसान सम्मान निधि" और गरीबी रेखा के नीचे रह रहे परिवारों को स्वास्थ और बीमारियों के इलाज़ के लिये पाँच लाख तक की राशि के चिकित्सा बीमा की "आयुष्मान योजना" से वंचित रक्खा जा रहा है। ये सिर्फ और सिर्फ राज्य की मुख्य मंत्री ममता बैनेर्जी अपने अहंकार और दंभ की आत्मतुष्टि की पूर्ति हेतु कर रही है। ऐसा बचकाना व्यवहार एक मुख्यमंत्री अपने राज्य के लोगो के साथ कैसे कर सकता है?  इस योजना का लाभ बाकी देश के किसान और गरीब परिवार ले और एक राज्य के लोगो को इससे वंचित रक्खा जाये ऐसा कोई कैसे कर किया जा सकता है? लेकिन पश्चिमी बंगाल मे दुर्भाग्य से ऐसा हो रहा है जो अत्यंत दुःखद है।  

एक ऐसा प्रदेश जिसकी सीमाएं बंगला देश से लगी हों और अवैध घुसपैठियों की समस्या एक विकराल रूप धारण कर चुकी हो। सीमांत इलाकों मे एक सुनोयोजित षणयंत्र के तहत जनसांख्यिकि बदलाब किये जा रही है जो एक चिंताजनक बात है। खेद का विषय है कि राज्य की मुख्यमंत्री का इस समस्या मे सहायक होने के चलते इस चुनौती को स्वीकार करने मे लेश मात्र भी दिलचस्वी नहीं है। पिछले दिनों अपने दिल्ली प्रवास पर जब उनके मुँह से दिल्ली मे सड़क परिवहन मंत्री श्री नितिन गडकरी से सड़कों के निर्माण की बात कहना, प्रदेश मे इंडस्ट्रीज़ की स्थापना के लिये उधयोगपतियों का आवाहन सुन कर अनायास सिंगूर मे टाटा समूह द्वारा अपनी छोटी "नैनो" कर के निर्माण हेतु अधिगृहीत जमीन को बापस लेने और फ़ैक्ट्री  के विरोध की नीति याद हो आयी। कैसे विकास की राह मे रोड़े अटकाकर लोगो को बरगला कर नैनो कार के कारखाने को बंद करा पश्चिमी बंगाल के नौजवानों, छोटे-बड़े व्यापारियों, मजदूरों  को रोजगार से बंचित किया गया था।  आज वही ममता बैनर्जी प्रदेश मे विकास के लिये ऊधयोग स्थापित करने की मांग कर रही है!! इसे कहते है घड़ियाली आँसू बहाना!  इससे विस्मयकारी मांग क्या हो सकती है। एक दशक तक निरंकुश शासन के समय उन्हे प्रदेश के विकास की लेश मात्र भी चिंता नहीं हुई? विस्तृत विवरण सुनेने के लिये इस लिंक को क्लिक करे-: (https://www.livehindustan.com/videos/national/west-bengal-cm-mamata-banerjee-meets-union-minister-nitin-gadkari-in-delhi-1-4271549) 

कानून व्यवस्था का दंभ भरने वाली ममता बैनर्जी शायद भूल गयी कि अभी हाल ही मे बंगाल मे चुनाव के पश्चात हुई हाई कोर्ट के आदेश पर हिंसा की जांच करने पहुंचे मानवाधिकार आयोग को जांच करने देने से रोकने के लिये कैसे कैसे हथकंडे आजमाये गए, कैसे पुलिस की उपस्थिती के बावजूद जांच मे उपस्थित हुए लोगो उपर असामाजिक तत्वों द्वारा हिंसा की गयी यहाँ तक कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जांच करने वाले सदस्यों के साथ भी असहयोग कर उनके कार्य मे बाधा उत्पन्न की गयी। अपने राजनैतिक विरोधियों के विरुद्ध हिंसा, हत्या और बलात्कार की सुर्खियां अभी धुंधली नहीं हुई। ममता बैनर्जी द्वारा एक संप्रदाय विशेष के लोगो से उन्हे वोट करने के आवाहन पर चुनाव आयोग द्वारा दो दिन प्रचार करने से रोकने की सजा दी गयी। आयोग की चेतावनी इस बात को स्पष्ट दर्शाती है कि चुनाव विजयी के लिये कैसे-कैसे और क्या-क्या हथकंडे आजमाये गये। लोकतन्त्र मे असहमति पर इतने निम्नस्तरिय अधोपतन कारी सोच एक राष्ट्रीय स्तर के राजनैतिक नेता को शोभा नहीं देती। ममता बैनर्जी जैसे जमीनी नेता जिन वामपंथियों की अनीतियों और ध्वंसकारी मनोवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष कर सत्ता मे आयी थी उन्ही दुष्प्रवृत्ति की पुनरावृत्ति कर वे पुनः शासन मे आएँगी ऐसी अपेक्षा देश के बुद्धिजीवियों द्वारा कदापि नहीं की गयी थी। वामपंथियों के जिस पौंजी स्कीम घोटाला, कट मनी, टोला बाज़ी टैक्स  और संगठित गुंडागर्दी के विरोध के चलते ममता बैनर्जी ने सत्ता प्राप्त की थी अपने समर्थकों के माध्यम से उन्ही बुराइयों की पुनर्स्थापना कुछ उसी तरह थी जैसे "नई बोतल मे पुरानी शराब"।

पिछले दिनों राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने ममता सरकार को चुनाव बाद हिंसा, लूटपाट, बलात्कार एवं हत्या की घटनाओं के लिए दोषी ठहरती रिपोर्ट हाई कोर्ट मे प्रस्तुत की जिसके आधार पर आज 19 अगस्त 2021 को हाई कोर्ट कलकत्ता ने चुनाव बाद टीएमसी के अराजक एवं असामाजिक तत्वों द्वारा हत्या, लूट बलात्कार  के समस्त मामलों मे सीबीआई और एसआईटी से जांच कराने के आदेश दिये है। बड़ा अफसोस होता है  कि राजनैतिक असहमति के कारण किसी राज्य का मुखिया अपने ही प्रदेश के लोगो पर अत्याचार, हत्या, बलात्कार एवं हिंसा  को बढ़ावा दे!! सर्व सम्मति से  हाई कोर्ट कलकत्ता के जजों की पीठ ने हत्या हिंसा, लूट और बलात्कार के सारे मामलों की जांच के आदेश देकर ठीक ही किया। चुनाव बाद ही लोगो ने पश्चिमी बंगाल की इस कुत्सित एवं घृणित "सोच" की आशंका को कलकत्ता हाई कोर्ट ने जांच के आदेश दे "सच" मे परिवर्तित कर दिया।  

मैंने स्वयं दो बार पश्चिमी बंगाल मे वामपंथियों की उस संगठित गुंडागिर्दी को 24 घंटे के बंद के आवाहन को भुक्तभोगी की तरह भुक्ता है। दोनों ही बार न खाने-पानी के व्यवस्था और न चाय पानी के इंतजाम के बिना बच्चों बूढ़ों को परेशान होते देखा है। एक बार राजीव गांधी की हत्या पर खड़गपुर रेल्वे स्टेशन पर और दूसरी बार अंडमान की यात्रा के समय कलकत्ता हवाई अड्डे पर। दोनों बार 24 घंटे के बंद से उत्पन्न परेशानियों दिक्कतों के  पलों की यादें  आज भी हमारे जेहन मे  ताजा है।  आशा है केंद्रीय अन्वेषन व्यूरों अपनी निष्पक्ष जांच कर चुनाव हिंसा के पीढ़ित लोगो के साथ न्याय संगत कार्यवाही कर उपद्रवियों को कड़ी सजा दिलाएगा।

विजय सहगल   


शनिवार, 21 अगस्त 2021

रे मन मूरख जनम गँवायौ

 

"रे मन मूरख जनम गँवायौ.........."

 






मेरा मानना है कि हर आम या खास आदमी की ज़िंदगी मे खुशियाँ चारो तरफ बिखरी पड़ी है आवश्यकता है इन खुशियों को पहचान उनके साथ चलने की। खुशियों के साथ चलने/दौड़ने मे आपको त्वरित निर्णय के साथ अपने पद प्रितिष्ठा के "छद्म नकाब" को भी परे रखने की जरूरत है, अन्यथा आप अपनी स्वाभाविक जीवन मे पल-पल मिलने वाली खुशियों से वंचित रहेंगे!! कोरोना काल के पूर्व लगभग एक साल तक जब निर्माण कार्य मे लगे माजदूरों के बच्चों के साथ जुड़ा तो झोपड़ पट्टी मे रह रहे उन बच्चों को अक्षर ज्ञान देने के काम मे जो खुशी मिली उसको व्यक्त नहीं किया जा सकता। ऐसा ही आज कुछ मेरे साथ घटित हुआ।

आज सुबह जब प्रातः भ्रमण के लिए निकला तो काफी तेज बारिस की आवाज सुनाई दी। बाहर निकला तो दिल्ली एनसीआर मे आज झमा झम बारिस हो रही थी। सोसाइटी की 13वी फ्लोर पर ही स्थित गैलरी मे भ्रमण करता रहा। अपनी आदत के अनुरूप विविध भारती की राष्ट्रीय प्रसारना सेवा पर प्रातः छह बजे के समाचार के बाद रामचरित मानस की चौपाइयों का मधुर संगीत के साथ हो रहे वाचन को सुनता रह। ये मेरे नित्य दिनचर्या का एक अंग है। घूमने के निर्धारित समय की पूर्ति के बाद आज व्यायाम की छुट्टी थी क्योंकि फ्लोर की गैलरी पर हाथ पैर चारों तरफ चलाना संभव नहीं था। अतः नोएडा स्थित घर से कुर्सी निकाल सड़क की ओर आने-जाने की सीढ़ियों पर बैठ बरसात का आनंद ले भजन सुन रहा था और सामने घनघोर बरसात हो रही थी। बादलों के बीच कड़कती बिजली मे दूर से लाइट देख कर ही आभास हो सकता  था कि मेट्रो ट्रेन जा रही है। पानी इतना तेज था कि मेट्रो ट्रेन पूरी तरह नज़र नहीं आ रही थी। ऊपरी  मंजिल पर हवा का वेग कुछ ज्यादा ही होने लगा था। हवा के झोंके से कभी पानी की फुहार चेहरे और कपड़ो पर भी पड़ जाती। अचानक प॰ भीम सेन जोशी की मधुर आवाज मे सूर दास जी के भजन की सुरीली ध्वनि  कानों मे सुनाई दी:-

"रे मन मूरख जनम गँवायौ"।
"करी अभिमान विषय को राच्यो, नाम शरण नहीं आयौ"॥
"मन मूरख जनम गँवायौ, रे मन मूरख जनम गँवायौ"............॥

प॰ भीम सेन जोशी की आवाज का मै दीवानगी की हद तक कायल हूँ। उनका  गाया कोई  भी भजन या शास्त्रीय संगीत/गीत की आवाज मुझे  सब कुछ छोड़ उन्हे सुनने को बाध्य कर देती है।  आज भी जब उनकी आवाज मे उक्त भजन को सुन रहा था और सामने घनघोर घटाओं को बरसते देख मन प्रफ़्फुलित जो हो रहा था। यद्यपि भजन के अर्थ तो बड़े गूढ और अध्यात्म से ओत-प्रोत हो विषय-वासना से दूर "ईश्वर की शरण" मे जाने का संदेश दे रहे थे। पर न जाने क्यों मेरे को लगा कि सूरदास जी पंडित भीम सेन जोशी की आवाज के माध्यम से जैसे कह रहे हों, "रे मूर्ख, ईश्वर द्वारा रचित इस सृष्टिचक्र के साक्षात दर्शन, भगवान तुझे कराने तत्पर है और एक तू है कि यहाँ बरसात से बच के बैठा है। चल उठ और ईश्वर का साक्षात्कार कर प्रकृति के साथ एकाकार हो जा!!

मेरे मन मे आनंद का उद्वेग हिलोरे मार मुझे बचपन के दिनों मे बरसात मे नहाने की याद दिलाने लगा। नाली मे वह रहे  जल राशि के साथ प्रवाहित कागज की नाव के पीछे भागते हुए झाँसी मे घर से दूर बनी पुलिया मे बरसाती पानी से बने सरोबर की ओर ले जाने की विस्मृत घटनाओं को पुनः स्मरण कर आनंद और उत्साह से भर गया। बचपन ही नही युवा अवस्था मे स्कूल और कॉलेज से भीगते हुए घर आने की घटनाओं से मिली खुशी और उल्लास का बार-बार  स्मरण अचानक आज हो आया। फिर क्या था भजन की समाप्ति के तुरंत बाद मोबाइल को अपने फ्लैट मे रख शीघ्र नीचे सोसाइटी के मैदान मे उतर आया और बिना एक मिनिट की देरी के मै सोसाइटी के अंदर बने रास्ते पर मस्ती के साथ घूम रहा था। 4-5 मिनिट के भ्रमण मे ही पानी से सराबोर था। सोसाइटी मे लगभग आधा घंटे बरसात मे  घूमने से मिले हर्ष और उल्लास को आज शब्दों मे व्याँ करना कठिन हो रहा था।

बैसे  मै "सेल्फी" रूपी बीमारी से अछूता हूँ पर आज प्रातः मे मिले इस आनंद को कैमरे मे कैद करने की बड़ी ख्वाहिश तो थी पर मोबाइल तो घर पर ही रक्खा था। चूंकि आजकल देश की हवा मे बगैर प्रमाण के किसी घटना की प्रामाणिकता के पुष्टि नहीं की जा सकती थी। राजनीति से लेकर अर्थनीति मे बगैर प्रमाण के कोई भी कार्य अप्रामाणिक ही माना जाता है। फिर चाहे घटना "एयर स्ट्राइक" या आज के आनंद, उमंग और खुशी की ही क्यों न हो? बिना एक दो चित्रो के भावनाओं की अभिव्यक्ति हेतु भी आनंद की प्राणिकता अधूरी थी। अतः मैंने सोसाइटी के प्रवेश और निकासी द्वार मे तैनात गार्ड से अनुरोध किया जिनहोने एक छोटा वीडियो और दूसरे ने कुछ फोटो ग्राफ लिये जिन्हे मै आप के साथ सांझा कर रहा हूँ।   

यध्यपि श्रीमती जी द्वारा बरसात मे भीगने कि इस घटना को बुढ़ापे मे उपजे इस आनंद पर कुठराघात किया तो अपन भी अमिताभ बच्चन की स्टायल मे जबाब देने से कहाँ चूकने वाले थे कि "बूढ़ा होगा............ (वाकि तो आप समझ ही गये होंगे)। पर वास्तव मे आज "रैनी डे" मनाने से मिले आनंद को भुलाया नहीं जा सकता। आज के आनंद की जय!!   

विजय सहगल        


बुधवार, 18 अगस्त 2021

माननीय की बेबसी

 

"माननीय की बेबसी"



पिछले दिनों बैंक ने अपने परिपत्र दिनांक 20.07.2021 के माध्यम से सेवानिवृत्त साथियों को निर्देशित किया गया कि वे वर्ष 2020-21 मे बैंक द्वारा प्रदत्त पेंशन   और अन्य भत्तों के भुगतान का फॉर्म 16 अपनी पेंशन भुगतान शाखा से प्राप्त कर ले। लेकिन शाखा मे  तकनीकी कमी के चलते फॉर्म 16 सिस्टम से नहीं निकाले जा सके थे। 

इस संबंध मे सेवानिवृत्त साथियों की सहायता हेतु बैंक द्वारा नियुक्त अधिकारी श्री ऋतु राज जी से जब फॉर्म 16 के संदर्भ मे मोबाइल पर चर्चा की। उनको शाखा द्वारा फॉर्म 16 के निकालने मे हो रही परेशानियों का उल्लेख करते सहायता करने का निवेदन किया था। श्री ऋतुराज जी ने  बगैर मेरा नाम, पीएफ़ नंबर, मोबाइल नंबर, सेवानिवृत्ति का बैंक, पद आदि पूंछे बड़े ही चलताऊ ढंग से इस संबंध मे कार्यवाही करने का आश्वासन दिया। मै तभी समझ गया था कि बैंक द्वारा रिटाइरी स्टाफ की सेवा मे नियुक्त इस अधिकारी का सेवानिवृत्त अधिकारियों के साथ कैसा व्यवहार होगा!! इसी कारण मैंने उनके दिये गए मेल आईडी पर फॉर्म 16 की मांग करते एक मेल दिनांक 23 जुलाई 2021 को किया था। तत्पश्चात 28 एवं 31 जुलाई के मेल के बाद बड़े टरकाऊँ ढंग से पेंशन शाखा से संपर्क करने कि हिदायत दी। तभी लगा था कि लालफ़ीताशाही से ग्रसित मानसिकता का ये दीर्घसूत्री अधिकारी क्या ही सेवानिवृत्त साथियों  की सहायता करेंगे?

3 अगस्त और 6 अगस्त को रिटाइरी हेल्प डेस्क (प्रति ऋतुराज को देते हुए) को भी फॉर्म 16 के लिये निवेदन किया जो अब तक अनुतरित्त है।

बाध्य होकर 3 अगस्त एवं 9 अगस्त 2021 को माननीय अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक को मेल के माध्यम से सहायता करने की गुहार लगाई जिसकी  प्रति को भी श्री ऋतुराज एवं रिटाइरी हेल्प डेस्क को प्रेषित किया गया, पर मामला वही "ढांक के तीन पात"। हमारे इन मेल को कस्टमर केयर ने शिकायत संख्या PC1108202113292401 के रूप मे दर्ज़ कर समाधान हेतु पुनः 15 दिन का समय मांगा।

अबतक मुझे लग चुका था कि मेरी समस्या लाल फीताशाही के चंगुल मे फंस चुकी है। उच्चतम पद पर बैठे माननीय सीएमडी सर की  लाचारी  और बेबसी  को देखते हुए  अंततः थक हार कर मैंने व्यवस्था के सामने समर्पण करते हुए अपनी शिकायत संख्या PC1108202113292401 बापस ले ली जिसका मज़मून इस प्रकार है :-


माननीय
श्रीमान अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक 18.08.2021
पंजाब नेशनल बैंक
प्रधान कार्यालय
नई दिल्ली (मेल-आईडी- md@pnb॰co॰in)

महोदय,

विषय-       फोरम 16 के संबंध मे शिकायत क्रमांक PC1108202113292401 बापस लेने हेतु


महोदय, प्रधान कार्यालय द्वारा जारी परिपत्र फॉर्म 16 के परिपत्र दिनांक 20 जुलाई के  जारी होने के बाद  मैंने फॉर्म16 की मांग लगभग एक माह पूर्व शाखा से की थी। तकनीकी समस्या के कारण शाखा मे फॉर्म 16 नहीं निकाला जा सका था। पुनः फॉर्म 16 हेतु समय समय पर सेवानिवृत्त स्टाफ की सहायता हेतु नियुक्त अधिकारी श्री ऋतुराज (मेल id - ritu.raj2@pnb.co.in) एवं हेल्प डेस्क (मेल id-   retireeshelpdesk@pnb.co.in) को भी इस समस्या के समाधान हेतु अनेकों बार निवेदन किया। लेकिन खेद है समस्या का समाधान अब तक अनिर्णीत है।   

जब समस्या का समाधान शाखा एवं सेवानिवृत्त स्टाफ की सहायता  हेतु नियुक्त अधिकारियों द्वारा नहीं किया गया तो समस्या के  समाधान हेतु आपको  मेल दिनांक 03.08.2021 एवं 09.08.2021 के माध्यम से लिखने हेतु बाध्य होना पड़ा। जिसे आपके कार्यालय care@pnbcoin  द्वारा शिकायत के रूप मे शिकायत  क्रमांक  PC1108202113292401 के अंतर्गत दर्ज़ कर पावती सुनिश्चित की गई।

बड़े खेद और अफसोस के साथ लिखना पड़ रहा है कि प्रधान कार्यालय के परिपत्र के अनुसार जब फॉर्म 16  दिनांक 20 जुलाई 2021  से  स्टाफ को   उपलब्ध कराये जा रहे थे तो पुनः समस्या के समाधान हेतु ग्राहक सेवा केंद्र द्वारा  15 दिन मांगना कुछ कुछ लाल फीताशाही का स्मरण कराता प्रतीत होता है, कि कैसे दीर्घसूत्री मानसिकता के  बाबू/अधिकारी किसी काम मे कोताही वरत लबे समय तक काम को लटका कर लोगो को परेशान करते है।

एक छोटी सी समस्या के समाधान मे बैंक के माननीय अध्यक्ष एवं प्रबंधनिदेशक स्तर के माननीय की बेबसी, लाचारी एवं असहायता को  देख मै आत्मग्लानि से ग्रसित हूँ और आप जैसे श्रेष्ठी की राह मे रोड़ा न बनते हुए अपनी शिकायत बापस लेता हूँ ताकि शिकायत के समाधान हेतु आपको किसी धर्म संकट मे न पड़ना पड़े एवं आपको अपनी ऊर्जा इस साधारण सी शिकायत मे व्यर्थ  न गंवाना पड़े। हम जैसे सेवानिवृत्त स्टाफ का क्या, हम लोग तो फ्यूज़ बल्ब की तरह मरते-खफते कैसे भी अपना काम फॉर्म 16 के बगैर भी चला ही लेंगे। यूं भी हम सेवानिवृत कर्मचारी संस्थान के लिये अनुत्पादक सम्पत्तियों एवं विकास की राह मे अवरोध जो  है।

मेरा ईश्वर से अनुरोध और प्रार्थना है कि आपको इन दीर्घ सूत्री एवं लालफ़ीताशाही की  मानसिकता से ग्रसित  बाबुओं/अधिकारियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करें। शायद इसी विवशता और लाचारी के कारण ही स्व॰ श्री श्रीलाल शुक्ल ने राग दरबारी जैसी काल जयी रचना (उपन्यास) लिखने के लिये बाध्य होना पड़ा होगा और   संत कबीर जैसे महात्मा को को निम्न दोहा लिखने के लिये विवश किया होगा:-


"बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।"
"पंथी को साया नहीं, फल लागे अति दूर॥"

कष्ट के लिये क्षमा!

आदर और अभिवादन सहित।

विजय सहगल       

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सोमवार, 16 अगस्त 2021

बड़े भाई साहब

"बड़े भाई साहब"






कृपया शीर्षक पढ़ कर आप मुंशी प्रेमचंद की कहानी के पात्र "बड़े भाई साहब" के बारे मे भ्रमित न हों। मात्र "शीर्षक" मे ही समानता है, कथानक एकदम अलग है। "बड़े भाई साहब" कहानी  के पात्र का आचरण हमारे बड़े भाई साहब से एक दम विपरीत एक आज्ञाकारी पुत्र और बुद्धिमान विध्यार्थी का था। हमारे बड़े भाई श्री शरद सहगल  जिन्हे हम सभी भाई बहिन एवं परिवार के अन्य सदस्य "भाई साहब" नाम से सम्बोधित  कर बुलाते है। भाई साहब हम छः भाई बहिनों मे सबसे बड़े है। पापा का रेल्वे मे समय-वे समय दिन-रात, लाइन पर चलने की नौकरी की बजह से रोज की दिनचर्या मे सहयोग नहीं कर पाते थे जिसकी पूर्ति बड़े होने के कारण भाई साहब पर आती। ज़िम्मेदारी के अहसास के कारण  दैनिक कार्यों मे, किसी बाहरी व्यक्ति से बातचीत, बिजली, पानी, राशन, मिट्टी के तेल आदि लाने मे बचपन से ही मैंने उन्हे जूझते और सामना करते देखा था। हम निश्चिंत होकर सिर्फ खाने पीने और अन्य भाइयों से खाने पीने की चीजों मे ज्यादा हिस्सा पाने की जुगत मे लगे  रहते। मै बचपन मे घर के काम आदि मे पूरी तरह निक्कमा  और काम से जी चुराने वाला था, जिसकी एक मुख्य बजह, न तो मै घर मे सबसे बड़े था और न ही सबसे छोटा,  पर हाँ लड़ाई झगड़े मे अव्वल थे, फिर लड़ाई चाहे घर मे हो या आस पड़ौस से!! घरेलू काम  चाहे सब्जी-भाजी हो या राशन और केरोसिन तेल की लाइन मे लग समान लाना हो तो ये सब काम बड़े भाई साहब के हिस्से ही आते  लेकिन अनीति या अन्याय से  झगड़ालू स्वभाव के कारण खराब वस्तुओं को दुकानदार से बदलना या बापस करने की ज़िम्मेदारी मेरी रहती।  

बड़े भाई साहब जैसे जैसे ऊंची कक्षाओं मे प्रोन्नत होते गये मुझे अपनी पढ़ाई की भी चिंता होती। पर इस चिंता पर गोली-कंचे, गिल्ली-डंडा, लंगड़ी, गैड़ी, क्रिकेट, पतंग  हमेशा हावी हो जाती और पूरा दिन खेलने के बाद शाम को आत्मग्लानि के कारण पढ़ाई से  उपजी चिंता से ग्रसित हो जाता।  जो सुबह होने तक फिर काफ़ूर हो जाती थी। बहुत दिनों तक रोज यही क्रम दोहराया जाता रहा। पर भाई साहब अपनी पढ़ाई लिखाई मे हमेशा गंभीर और अव्वल रहते। उन दिनों आज की तरह मेडिकल की संयुक्त प्रवेश परीक्षा नहीं होती थी अतः हर मेडिकल कॉलेज की परीक्षा के लिये उस शहर जाना पड़ता था जो एक दुरूह कार्य था। इंटर के बाद भाई साहब ने  यध्यपि मेडिकल के प्रवेश के लिये प्रयास किये पर मै जनता हूँ कि संयुक्त परिवार मे  आर्थिक ज़िम्मेदारी को सांझा करने की चाह उनमे ज्यादा थी तभी तो हाई स्कूल के बाद से ही उन्होने अँग्रेजी टायपिंग, शॉर्ट हैंड सीखने क्लास जॉइन कर ली थी। उन्ही के पदचिन्हों पर चलते हुए मैंने भी अपनी पढ़ाई के साथ इस अतरिक्त योग्यता को हांसिल करने के प्रयास शुरू कर दिये थे। उन दिनों 70-80 के दशक मे हर मध्यम वर्गीय परिवार मे एक कमाने वाले व्यक्ति पर परिवार के 7-8 व्यक्तियों के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी होती थी। हर परिवार मे  बड़े  नौजवान सदस्य  की कमोवेश यही ईक्षा रहती की शीघ्र अति शीघ्र कैसे भी नौकरी कर अपने परिवार की  जिम्मेदारियों को सांझा किया जाये। शायद इसी उद्व्येग और आकुलता ने विज्ञान विषय मे स्नातक के बाद उन्हे नौकरी की तलाश के लिये व्याकुल किया। उन दिनों सीमित विभागों मे रोज़गार की सीमित साधन होने से संघर्ष अधिक था। सेवा पाने मे ज्यों-ज्यों विलंब हुआ त्यों-त्यों उन्होने रोज़गार पाने के प्रयासों मे तेजी लाते हुए बी॰एड॰ और एलएलबी भी कर लिया। कुछ माह वकालत की प्रैक्टिस मे भी हाथ आजमाया। दिन भर कोर्ट मे दौड़ धूप के बाद  शाम को चेहरे पर रोज़गार का निर्धारित लक्ष्य हांसिल न हो पाने की कसक उनके चेहरे पर स्पष्ट झलकती थी।

कुछ आर्थिक लाभ हो इसके लिये त्योहारी व्यवसाय के अंतर्गत दीपावली त्योहार के दो-तीन दिन का आतिशबाज़ी का व्यवसाय भी किया। जिसे हम भाइयों ने मिलकर 4-5 साल चलाया। 60-70 के दशकों मे कोई भी सरकारी कार्य बगैर घूस और रिश्वत के कराना असंभव था। आतिशबाज़ी के व्यवसाय हेतु मिलने वाले लाइसेन्स मे भी कलेक्ट्रेट के  बाबुओं, पुलिस विभाग मे रिश्वत का एक पैसा न देने के लिये भी चालबाज बाबुओं की टालामटोली के विरुद्ध  संघर्ष किये। इस हेतु उच्च अधिकारियों से शिकवे शिकायत एवं संपर्क कर लाइसेन्स हर साल बगैर किसी घूस और परितोषण के प्राप्त किया।  प्रायः हर  मध्यम वर्गीय परिवारों के लोगो ने इस घूस और बेईमानी के कारण अपने बच्चों की  सुख सुविधाओं मे कटौती कर और कभी कभी तो खुशियों से  वंचित  हो कर भी अपने मेहनत और ईमानदारी से कमाये पैसों को घूस के रूप मे दिया। उस दौरान पली-बढ़ी, पीढ़ी के हर सदस्य को  इस रिश्वत रूपी नासूर से कभी न कभी, कहीं न कहीं अवश्य दो-चार होना पड़ा होगा जिसको लिखने मे कोई अतिश्योंक्ति न होगी।       

जब एक दिन खुश खबरी मिली कि भाईसहब को कैंटॉन्मेंट बोर्ड, बबीना से नौकरी का बुलावा आ  गया तो घर मे खुशी का ठिकाना न रहा। संघर्ष से मिली  सफलता ने न केवल भाई साहब के  अपितु पूरे परिवार के  सदस्यों  के चेहरे पर खुशी ला दी, जिसे स्पष्ट  महसूस किया जा सकता था। बबीना था तो झाँसी से 25-30 किमी॰ पर पर रोज आने जाने मे व्यय होने  वाले समय ने मानो इस दूरी को सौ-दो सौ किमी॰ से भी ज्यादा दूर कर दिया था। प्रातः छह बजे की पैसेंजर ट्रेन को पकड़ने के लिये घर से 5.15-5.30 बजे सुबह तो निकालना ही पड़ता था। ऑटो-टैक्सी न तो इतने सहज और सस्ते थे कि उनकी सेवाए ले सके और तांगे समय की कसौटी पर खरे न उतरते थे। मै भाई साहब को रोज  साइकल से स्टेशन छोड़ने जाता था जो कि घर से 4-5 किमी॰ दूर था। नित्य स्टेशन छोड़ने मे प्रत्यक्ष रूप से न सही पर परोक्ष रूप से परिवार की इस सांझा ज़िम्मेदारी का हिस्सा बनने पर एक अलग ही खुशी होती थी। इस खुशी का  एक पहलू और भी था जो सुबह-सुबह मानिक चौक मे शंकर हलवाई की गरमा-गरम जलेबी का रसास्वादन करने को मिलता था। जलेबी के  लोभ से मिलने वाली खुशी भी इस परवारिक ज़िम्मेदारी से कम न थी। शाम को बापसी मे भी पैसेंजर जो 7 बजे आती थी कभी कभी लेट हो 8-9 बजे तक पहुँचती। एक दिन तो हद हो गई पैसेंजर से जल्दी पहुँचने की चाह ने उन्हे मालगाड़ी से शीघ्र घर पहुंचेने के अनुमान  ने उलझन मे डाल दिया। दूरसंचार के साधन न के बराबर ही थे। मालगाड़ी झाँसी के एक स्टेशन पहले बिजौली मे निरस्त हो गई और 3-4 घंटे वहीं खड़ी रही।  घर पर माँ सहित परिवार मे सभी सदस्य चिंतित हो जागते रहे। देर रात लगभग 12 बजे भाई साहब बिजौली से किसी तरह  झाँसी पहुंचे और फिर जैसे तैसे स्टेशन से घर तब, सारे घर की जान मे जान आयी।  

प्रायः घर के बड़े सदस्य की  सफलता-असफलता, जय-पराजय पर ही परिवार के अन्य सदस्यों की शिक्षा-संस्कार का निर्धारण होता है फिर भी ऐसी कोई परिभाष नहीं।  लेकिन हमारे परिवार मे घर के सदस्यों को शिक्षा-दिक्षा के दिशा निर्देशन  देने का काम बड़े भाई साहब ने बखूबी पूरी ज़िम्मेदारी, निष्ठा और समर्पण से किया। सुनहरे भावि भविष्य के निर्माण हेतु संघर्ष की जो राह, भाई साहब ने बनाई, जो  दिशा तय की और जो मंजिल हांसिल की उस राह पर चल कर हम सभी भाई बहिनों को अपने भविष्य निर्माण मे ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा।

आज 16 अगस्त, भाई साहब का जन्मदिन है। हम सभी परिवार के सदस्य और विशेष रूप से मै उनके दीर्घ और स्वस्थ जीवन हेतु कामना करते है। जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई, भाई साहब!

विजय सहगल