"श्री नाथ जी
मंदिर"
राजस्थान
के उदयपुर से लगभग 46 किमी दूर "नाथ द्वारा" या श्रीनाथ जी का
मंदिर एक विश्व प्रसिद्ध तीर्थ स्थान जो
भगवान श्री कृष्ण का प्रकट्य पवित्र क्षेत्र के रुप मे पहचाना जाता है। ऐसी
मान्यता है कि प्रभु श्री नाथ जी द्वारा चिन्हित जगह पर 17वी शताब्दी मे मंदिर का
निर्माण कराया गया जिसे लोकप्रिय रूप मे
श्रीनाथ जी की हवेली कहा जाता है। देश विदेश से दर्शनार्थी इस पवित्र स्थान
मे भगवान श्री नाथ के दर्शन हेतु पूरे साल आते रहते है। 28 फरवरी 2021 को हमने भी परिवार
सहित मंदिर दर्शन हेतु प्रस्थान किया। देश
दुनियाँ से आ रहे इस छोटे से कस्बे मे श्रद्धालुओं और वाहनों की रेलम-पेल को
अनुशासित तरीके से नियंत्रित करने ले लिये यहाँ के यातायात विभाग ने शहर के प्रवेश द्वार पर ही एक बहुत बड़े क्षेत्र
मे वाहन पार्किंग की व्यवस्था बना रक्खी थी। जिसमे हजारों वाहनों को रखने की
व्यवस्था थी। इसी पार्किंग के पास बन रही भगवान शिव की अति विशाल प्रतिमा को
दूर-दूर से देखा जा सकता है। स्थानीय
सार्वजनिक वाहनों के अलावा बाहर से आये वाहनों का पार्किंग क्षेत्र के आगे प्रवेश
निषेध था जिसके कारण श्री नाथ द्वारा कस्बे मे वाहनों की अव्यवस्था देखने को नहीं
मिली। स्थानीय ऑटो, टेम्पो भी एक निश्चित जगह पर दर्शनार्थियों को छोड़ रहे थे जहां से मंदिर
तक पैदल ही प्रवेश करना था जो बहुत ज्यादा दूर नहीं है। श्री नाथ द्वारा क्षेत्र
मे यातायात की कुछ ऐसी ही व्यवस्था शासन प्रशासन द्वारा देश
के अन्य पर्यटन और तीर्थ स्थलों पर करना चाहिये।
श्री
नाथ द्वारा मंदिर मे भगवान श्री कृष्ण के
बालक रूप
(आठ वर्ष) के दर्शन होते है। स्वामी बल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ जी ने
नाथद्वारा मे श्री नाथजी जी की पूजा को संस्थागत रूप दिया। यहाँ पर भगवान का मंदिर
एक अति प्राचीन हवेली के रूप मे स्थित है। एक आदर्श ग्रहस्थ की ही तरह ही यहाँ रसोई, बैठका, भंडार घर, जलघर अश्वशाला आदि इस हवेली के अलग अलग
हिस्से है। नाथद्वारा मे भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप और किशोर रूप मे दो
मूर्तियाँ अलग अलग बैठका मे विराजमान है।
इस
छोटे से कस्बे मे भगवान श्री नाथ जी के चित्रों के पेपर और कपड़े पर शानदार तरीके
से रंगो से उकेर कर बहुत ही खूबसूरत चमकदार मोती, गोटे और मोतियों से श्रंगार
कर पेंटिंग बनाई जाती है। शहर मे दुकानों पर मुख्यतः श्री नाथ जी के इसी तरह के
छोटे-बड़े चित्रों को सजाया गया है। दर्शनार्थी अपने विवेक और आर्थिक क्षमता अनुसार
श्री नाथ जी के चित्रों को अपने घर और प्रतिष्ठानों मे प्रतिष्ठापित करने हेतु ले
जाते है। बड़ी संख्या मे तीर्थ यात्रियों के आगमन के कारण ठहरने के छोटे बड़े इंतजाम
किये गए है।
श्री
नाथ जी मे एक मान्यता है कि जब औरगंजेब नाथ द्वारा मंदिर को क्षति पहुँचाने के
उद्देश्य से नाथ द्वारा आया तो वह अंधा हो गया। श्रेष्ठियों के सुझाव अनुसार उसने
अपनी दाड़ी से मंदिर की सीढ़ियाँ साफ करते विनती की कि उसकी आँखों की रोशनी बापस आ
जाये इस तरह उसकी आँखों मे पुनः रोशनी आ
गयी। इसके बाद औरंगजेब ने एक कीमती हीरा श्री नाथ जी को भेंट किया तभी से भगवान
श्रीनाथ जी की ठोढ़ी पर शोभयमान है जिसे आज भी लगा देखा जा सकता है। हर वर्ष होलिका
दहन के अगले दिन बादशाह की सवारी निकाली जाती है इस सवारी मे बादशाह का स्वांग रच रहा
व्यक्ति मंदिर की सीढ़ियों को अपनी दाढ़ी से बुहारता है।
किशोर
रूप मे स्थापित मूर्ति मन को मोहने वाली अति सुंदर रूप लिए है। स्थानीय पुरोहित की
दर्शन हेतु निमित्त माध्यम बनने के आग्रह अनुसार हम अपने परिवार सहित दोपहर के
"उथापन दर्शन" (दोपहर 3.30 से 3.45 तक) हेतु मंदिर प्रांगढ़ मे निर्धारित
समय से पूर्व पहुँच गए। दर्शन हेतु लंबी लाइन देख कर चिंता तो हुई पर पुरोहित जी
के साथ होने के कारण हम निश्चिंत थे। निर्धारित समय पर शंख ध्वनि के साथ हुए
उद्घोष ने उथापन दर्शन शुरू होने के संकेत
दिये जिसको मंदिर के आसपास एवं दूर तक सुना जा सकता था। निर्धारित समय की समाप्ती के 7-8 मिनिट
पूर्व जब लाइन समाप्त की ओर थी तब पुरोहित जी के आदेशानुसार हम लोगो ने दर्शन हेतु
प्रस्थान किया। पहले से ही लाइन मे लगी भीड़ समाप्त हो जाने के कारण हम लोग सीधे
मंदिर के मुख्य मंडप मे उपस्थित थे।
लगभग
60-70 फुट लंबे मंडप मे पुरोहित के सुझाव
अनुसार हम लोग सबसे पीछे की लाइन मे दीवार के सहारे खड़े हो भगवान श्री नाथ जी के
मनभावन दर्शन हेतु खड़े रहे। अद्भुद नयनभिराम मुख मण्डल से निगाहें नहीं हट रही थी। सिर पर मोर मुकुट लगा हुआ था।
मुकुट पर सफ़ेद मोतियों की लड़ी भगवान के चेहरे के ओज और सौन्दर्य मे चार चाँद लगा
रही थी। गले मे स्वर्णभूषणों और सफ़ेद चमकीले मोतियों की माला शोभयमान थी। ठोढ़ी मे
लगा हीरा दूर से ही अपना प्रकाश बिखेर रहा था। माथे पर केशर-चन्दन का तिलक और पूरे
शरीर पर विभिन्न दिव्य अलंकारों से युक्त पोशाक पहने अपने बाएँ हाथ को उपर उठाए
होने की मुद्रा मे भगवान श्री नाथ जी के दर्शन (गोबर्धन पर्वत उठाए होने की मुद्रा
मे) मन को भाव विभोर करने वाले थे। चारों तरफ वातावरण मे केशर चन्दन से युक्त
पुष्पों की सुमधुर गंध एवं धूप-दीप की खुशबू से मंदिर का मंडप सहित श्री नाथ जी की
पूरी हवेली विशिष्ट गंधों से सुगंधित हो रही थी। दिव्य दर्शन की
अद्भुद, आध्यात्मिक अनुभूति का संचार
पूरे शरीर मे महसूस किया जा सकता था और जो
मन को पुलकित कर आनंद का एक अलग ही अनूठा अनुभव
करा रहा था। दर्शन के लिए निर्धारित समय की समाप्ति तक हम लोग अन्य दर्शनार्थियों के साथ भगवान
श्री नाथ जी को एकटक निहारते खड़े रहे।
मंडप
मे बाहर आने के पश्चात पुनः छोटी बैठका मे भगवान के बाल रूप दर्शन हेतु आगे बढे
जिसके दर्शन का समाप्ति समय मुख्य मदिर के समय से दस मिनिट बाद तक था। भगवान के
बाल रूप को झूले मे बैठाया गया था। कुछ समय तक ठाकुर जी की हवेली मे भ्रमण
एवं औपचारिकता के पश्चात प्रसाद प्राप्त किया जो कि
एक आकर्षक और सुरक्षित पैकिंग मे श्रद्धालुओं को उपलब्ध कराया जा रहा था।
श्री नाथ द्वारा शहर छोटी छोटी गलियों मे बंटा कस्बाई बाजार कुछ-कुछ वृन्दावन के
बाँके बिहारी मंदिर की गलियों सा था। जहां अधिकतर दुकाने भगवान श्री नाथ जी के
छोटे-बड़े सुंदर चित्रों से सुसज्जित थी। स्वादिष्ट मिष्ठान की दुकाने हम जैसे शुगर
पीढ़ितों को मुंह चिढ़ा रही थी। पुरोहित को
यथोचित दक्षिणा एवं समुचित अभिवादन पश्चात स्थानीय बाज़ार के भ्रमण, दर्शन
करने के बाद अपने गंतव्य उदयपुर की ओर
बापस जाने का निश्चय किया।
विजय
सहगल













