"कुचेसर
का किला"
कभी कभी किसी शहर या कस्बे की छवि अपने किसी प्रिय जनों या विश्वस्त साथियों के साथ घटित अप्रिय घटना के कारण नकारात्मक छवि की तरह आपके मन मे बन जाती है। उस स्थान के लोगो के बारे मे भी कमोवेश आपके मन मे छवि सकारात्मक नहीं रहती। ऐसे ही कुछ छवि हमारे एक अभिन्न साथी श्री विपिन गर्ग जी की एक शाखा मे प्रबन्धक रहते उनकी शाखा मे घटित डकैती की घटना के कारण उस कस्बे की बनी। 1984 तक मै श्री गर्ग के साथ हज़रत गंज लखनऊ शाखा मे कार्यरत था। लखनऊ से मेरे स्थानांतरण के बाद श्री विपिन गर्ग जी के साथ दुबारा तो नहीं रहा पर उनसे सतत संपर्क बना रहा। कुछ समय अंतराल के बाद वे भी जिला बुलंदशहर मे कुचेसर शाखा के प्रबन्धक के पद पर स्थान्तरित हो लखनऊ से चले गये। उन दिनों आज की तरह फोन आदि की इतनी आम सुलभ सुविधाएं न थी। चिट्ठी पत्री के माध्यम से कभी कभी संपर्क हो राजी खुशी के संदेश आते जाते मिलते रहे थे।
एक बार उन्होने सन् 1988 (साल के बारे मे
सुनिश्चित नहीं कुछ आगे पीछे भी हो सकता है) पत्र के माध्यम से कुचेसर के एक छोटे
लेकिन समृद्धशाली कस्बे के रूप मे जिक्र
किया था। लेकिन एक दिन उन्होने पत्र के माध्यम से अपनी शाखा मे पड़ी डकैती की चर्चा
करते हुए पत्र लिखा था कि कैसे कुछ बदमाश शाखा मे आये और बैंक से नगदी की लूटपाट कर
घटना को अंजाम दिया गया था। उन्होने जब लिखा कि उन्होने बदमाशो को घटना के अंजाम देने के पश्चात बापसी मे भागते समय एक गुंडे को स्टूल फेंक कर मारा था, जिसके जबाब मे उसने क्रोधित हो उन पर
गोली चला दी थी। उस गोली की घटना मे वे बाल बाल बच गये। उन्होने लिखा था गोली उनके कंधे
को छूती हुई निकल गयी थी। गर्ग साहब के निडर स्वभाव
से मै हजरतगंज शाखा से ही परिचित था जहां वे सेकंड मैन के रूप मे पदस्थ थे। शाखा
मे भी प्रायः उनकी एक यूनियन नेता जी से काम की बजह से कहा सुनी हो जाती थी। वे
नेताजी के द्वारा काम मे कोताही वर्तने पर उनको अपना काम पूरा किये बिना न जाने की नसीहत दे अक्सर टोक दिया करते थे, जिसके कारण नेताजी को बुरा लगता था। बगैर आगा पीछा
सोचे अन्याय के विरुद्ध भिड़ पड़ना उनका स्वभाव था। उनके इस व्यवहार के कारण ही हमारी
पाँच लोगो की मित्र मंडली मे हम लोग हमेशा उन्हे आदर और सम्मान की दृष्टि से देखते भी थे और
बैसी ही श्रद्धा और सत्कार भी करते थे। डकैती की घटना मे कितनी धनराशि आदि लूटी गई थी अभी तो
स्मरण नहीं। इस घटना के बाद उनका
स्थानांतरण मेरठ हुआ था जहां उनके घर एक दिन के आथितित्य पर मै परिवार सहित उनके घर मेरठ भी गया
था। वहां पर हमने गर्ग साहब को पुनः ऐसे किसी भी दुस्साहस को न करने का अनुरोध भी किया था। बाद मे उक्त बदमाश उनके द्वारा बताये हुलिये के कारण पकड़े भी गये थे।
तभी से कुचेसर कस्बे के बारे मे मेरी मन मे
एक नकारात्मक छवि बन गई थी। कुछ ऐसा संयोग बना कि फरबरी 2018 मे बैंक के कार्यवश मुझे दिल्ली से दो दिन कुचेसर शाखा मे जाने का सुयोग बना। शहर/कस्बे के
नाम से तो मै परिचित था ही लोगो के बारे मे भी कोई सकरत्मक अच्छी राय न थी। लंच के
बाद यूं ही कुछ चहल कदमी के इरादे से शाखा के बाहर स्थित सड़क पर एक दिशा मे
उद्देश्यहीन टहलता रह। छोटा सा कस्बा जो हापुड़ रोड से दाहिने सैदपुर मार्ग पर
स्थित था। मुख्य सड़क के दोनों ओर बमुश्किल आधा-एक किमी॰ मे बसाहट थी लेकिन इस छोटे से कस्बे मे स्थित दुकानों
और दूर दूर तक फैले हरियाली से परिपूर्ण खेतों को देख कस्बे और क्षेत्र की संपन्नता
का अहसास करना कठिन न था। शाखा के बगल मे ही एक छोटे रास्ते के मुहाने पर
"राव राज विलास" का सूचना पट दिखाई दिया। शाखा प्रबन्धक ने बताया कि
रास्ते के अंदर ही कुचेसर फोर्ट है। जिसे देखने की जिज्ञासा मन मे रही। दूसरे दिन पुनः लंच मे
जब अंदर जाकर देखा तो सहसा विश्वास नहीं हुआ कि इस साधारण से गाँव मे इस जगह पर इतना पुराना और वैभव समेटे कोई आलीशान किला
भी इस कस्बे मे हो सकता है। प्रबन्धक महोदय ने उस किले की देख भाल करने बाले
आकर्षक व्यक्तित्व बाले सज्जन जिनका नाम मै भूल रहा हूँ को भी बुला लिया। किले के
मुख्य हाल के बाहर बने गोलाकार सफ़ेद खंबों की बनावट न्यू दिल्ली मे कॉनाट प्लेस के इन्नर सर्कल मे बने बरामदे के
खंबों जैसी दिखाई दे रही थी। किले के
अंदर एक बहुत ही सुंदर महल जो अपने आप मे वास्तु का उत्क्रष्ट नमूना लिये आकर्षक
मेहराव, शानदार दरबाजे एवं खूबसूरत फ़र्निचर के सुंदर रख रखाव के
साथ प्रदर्शित किया गया था। महल रूपी किले के बाहर सुंदर ढंग से बाग बगीचे को रख-रखाब
किया गया था जो किले की सुन्दरता मे चार
चाँद लगा रहा था। भारतीय परंपरा मे बने
मुख्य खुले आँगन के केंद्र मे भव्य फब्बारे किले की वैभवता की कहानी ब्याँ कर रहे
थे। आँगन के चारों ओर बने मेहरावदार वृहद बरामदे के बाद कमरे बने हुए थे। एक खुले
बड़े से आँगन मे स्विमिंग पूल बना हुआ था। जिसके चारों ओर बैठने के लिये बेंचे पड़ी थी।
कुल मिला कर ये कहना मुश्किल था कि बाहर से दीख रहे एक साधारण से कस्बे मे इतना
आकर्षक और वैभवपूर्ण वास्तु और आकर्षक स्थापत्य कला से निर्मित एक सुंदर शानदार किला भी
हो सकता है। किले के उन सज्जन ने बताया कि किले को एक पुरानी विरासत रूपी होटल (heritage
होटल) मे तब्दील किया गया है जो समस्त सुविधाओं से युक्त
है। जिसमे कि प्रायः जर्मनी, फ्रांस एवं अन्य
पश्चिमी देशो के पर्यटक ऑन लाइन बुकिंग करा कर ग्रुप मे यहाँ आते है। कुचेसर रियासत
स्थित इस किले के वंशज और वारिसान दिल्ली और मेरठ मे निवासरत् है।
करीब 35 वर्ष पूर्व हमारे मित्र गर्ग साहब के साथ बैंक मे घटी अप्रिय डकैती घटना के कारण मेरे मन मे कुचेसर के बारे मे स्वतः निर्मित पूर्वधारणा को कुचेसर और वहाँ के वासिन्दों ने गलत साबित कर दिया था।
विजय सहगल







2 टिप्पणियां:
उस समय मैं मेरठ प्रा का में पोस्ट था और विपिन गर्ग को वहां ऑफिशियेट करने गया था। वे बहुत मस्त और जानदार व्यक्तित्व होने से मेरे मित्र भी है, आज सभी पुरानी यादें ताजा हो गई। किले के बारे में ज्ञान न होने से मैं देख नहीं सका। जहां तक मुझे पता है विपिन जी और उनके भाई अशोक देहरादून सेटल है। धन्यवाद
पढकर बहुत अच्छा लगा
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