"खिलौने
वाला"
आज
भी रोज की तरह प्रोफेसर साहब कॉलेज के दैनिक रूटीन से निवृत्त होकर रेल्वे स्टेशन
पहुँच गए। उनकी रिहाइश डबरा मे थी। ग्वालियर से दैनिक आवागमन कर सुबह की गाड़ी पकड़
ग्वालियर पहुँचते एवं शाम की गाड़ी से बापस चालीस किमी॰ की यात्रा कर डबरा पहुँच
जाते। ये ही उनकी दिनचर्या थी।
सभी दैनिक यात्री स्टेशन से रोज आते रहने के कारण मांगने वाले, खोमचे वाले, दुकानदार और ट्रेन मे चलने वाले अन्य अधिकृत और अनधिकृत बेन्डर से जान पहचान न होने के बावजूद भी उनके व्यवसाय और शक्ल-सूरत से सभी आपस मे एक दूसरे से परिचित हो ही जाते है। इन तमाम अनधिकृत बेन्डर मे एक खिलौने बेचने वाला बच्चा भी था। प्रोफेसर साहब इस मेहनती बच्चे के स्वभाव और स्वाभिमान से अच्छे खासे प्रभावित थे। उस अभागे बारह बर्षीय बच्चे का नाम राजू था। घर मे माँ के अलावा एक छोटा भाई और छोटी बहिन थी उसके परिवार मे। बारह वर्षीय राजू ही इस परिवार का मुखिया था। पिता का देहांत सात वर्ष पूर्व एक दुर्घटना मे हो गया था। उसके अवचेतन मन मे पिता की शक्ल के साथ कुछ कुछ स्मृतियाँ शेष थी। उसका स्कूल मे दाखिला हो गया था। उस अभागे दिन उसके पिता साइकल पर बैठा, उसकी स्कूल यूनिफ़ोर्म दिलाने जा रहे थे। तभी एक कार ने उनकी साइकल मे पीछे से ज़ोर दर टक्कर मारी थी। उस मनहूस दिन मानो उसके उपर मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा। उसके उपर परिवार की ज़िम्मेदारियों का बोझ जो आन पड़ा था। माँ ने मजबूरी वश लोगो के घरों मे काम करना शुरू किया था पर इन दिनों बुखार से ग्रस्त हो चारपाई पर पड़ी थी। परिवार का वोझ ढोने के लिये उसके कंधे यद्यपि इतने मजबूत न थे लेकिन पुरुष प्रधान समाज मे घर का मुखिया होने के नाते परिवार माँ, भाई, बहिन की सारी ज़िम्मेदारी राजू के कंधों पर ही थी। राजू को खिलौनों से प्यार था पर जिन खिलौनों से उसे खेलना था दुर्भाग्य ने उसे खिलौने तो दिये पर खेलने के लिये नहीं, बेचने के लिये!! एक परिचित ने रेल्वे स्टेशन पर खिलौने बेचने वाले ठेकेदार से कह उसको स्टेशन पर ट्रेनों मे खिलौने के डिब्बे बेचने के लिये लगवा दिया। एक सौ रूपये का डिब्बा बेचने पर उसे प्रति डिब्बा दस रूपये कमिशन मिल जाता। राजू खुश था दिन भर खिलौनों को जी भर कर देख संतुष्ट हो लेता और प्रति डिब्बा दस रूपये की मुनाफा भी हो जाती जिस की सहायता से घर खर्च मे भी वो हिस्सा बंटा लेता।
अपनी
दिनचर्या के अनुरूप प्रोफेसर साहब डबरा घर बापसी मे आज भी एक डिब्बे मे कुछ जगह
खाली देख बैठ गये। कुछ कॉलेज के नौजवान भी
उसी डिब्बे मे पीछे से शायद दिल्ली से आ रहे थे। उनकी आपसी बात चीत से लगा शायद
उन्हे इसी उत्कल एक्सप्रेस से सागर जाना था। बातचीत का सिलसिला जारी था। उनमे से
एक युवा ने कहा स्टेशन पर सामान बेचने वाले ये वेंडर बड़े बदमाश होते है, ट्रेन के
प्लेट फोरम से शुरू होने पर ये लोगो से
पैसे लेकर गाड़ी चलने पर यात्रियों को वस्तु नहीं देते या पैसे बापसी का नाटक कर
पैसे बापस नहीं करते। ऐसा!! दूसरे साथियों ने एक स्वर से कहा। चलो आज इन्हे मजा चखाया
जाये। गाड़ी के चलने का समय हो चुका था। हरे रंग के सिंगनल ने गाड़ी के चलने का संकेत दे दिया था। अचानक उस खिलौना बेचने वाले को देख इन नौजवानों ने आवाज
देकर बुलाया। आवाज सुन, खिलौने बेचने की चाह ने उसके चहेरे
पर एक अलग ही चमक और रौनक ला दी। वो सहज भाव से उन यात्रियों की तरफ लपका। नौजवान
यात्रियों ने डिब्बे मे रक्खे छोटे छोटे खिलौनों की कीमत पूंछी। उसने बड़े उत्साह
और उमंग से बताया। "नमस्ते", सर!! "केवल सौ
रूपय", "बहुत अच्छे खिलौने है सर"! उसके चहरे पर खुशी दुगनी हो गई जब उन यात्रियों
ने खिलौनों के दो डिब्बा लेने की बात कही। उसने हाथ मे लिये एक डिब्बे को उनकी ओर
बढ़ाते हुए दूसरा डिब्बा लाने की कह, पीछे भागा। अचानक गाड़ी
प्लेट फोरम से रेंगने लगी। बच्चे के लिये ये कोई नई बात नहीं थी, ऐसी परिस्थिति तो रोज बनती थी। वो भाग कर अपने बैग से दूसरा डिब्बा लेने
दौड़ा और कुछ ही समय भागते भागते दूसरा डिब्बा भी लाकर उन नौजवानो की ओर बढ़ा दिया।
नौजवानों ने पाँच सौ का नोट दिखा तीन सौ रुपए बापस मांगे। बच्चे के लिये स्थिति अब
विकट होने वाली थी। जेब मे पैसे नहीं थे। युवा यात्रियों ने पर्स से खुले पैसे
निकालने का बहाना बना कभी इस जेब से उस जेब मे तलाशी शुरू की, तभी दूसरे साथियों ने भी जेब टटोलने का कामयाब अभिनय दिखाते रूपये तलाशे, तब तक गाड़ी की गति तेज हो चुकी थी। बच्चा पीछे और पीछे छूटता गया और कुछ
ही पलों मे आँखों से ओझल हो गया।
अब
उन नौजवनों के चेहरे पर मक्कारी मिश्रित हँसी थी। आपस मे बात कर उनका मनहूस हंसी
से हंस-हंस कर बुरा हाल था। वे अपनी धूर्त, कपटपूर्ण
और चालबाजी पर खुश हो रहे थे। डिब्बे के खिलौने देख उन्हे अपनी होशियारी पर गरुर जो
था। एक बोला, "क्या सबक सिखाया"!! इन बदमाशों को! दूसरा बोला, आज इन लोगो को पता चलेगा कि शेर को सवा शेर
मिला!! अब इनको अपनी औकात पता चलेगी, भोले भाले यात्रियों को
लूटते थे! भले घर के दीख रहे इन नौजवानों के इस हैरत भरे व्यवहार पर प्रोफेसर भी हैरान, चकित और हतप्रभ थे। कैसे ये युवा एक नन्हें बच्चे के साथ धोखा-धड़ी कर खुश
थे!!
प्रोफेसर
अपने गंतव्य "डबरा" मे उतर कर घर चले गये, पर प्रोफेसर साहब को उस सारी
रात नींद नहीं आयी। उन्हे रह रह कर राजू
के साथ हुई ज्यादती और जुल्म की वो घटना बार बार आँखों के सामने कौंध जाती। उन्हे
उन उद्दंड नौजवानों की मूर्खता और दुर्बुद्धि पर तरस तो आ ही रहा था। रह रह कर
प्रोफेसर साहब बच्चे के साथ उस शाम दो सौ रुपए के नुकसान से चेहरे पर उपजी चिंता की
लकीरों और दुःख की वेदना को उनके चेहरे पर स्पष्ट देखा जा सकता थे। सुबह जल्दी से
तैयार होकर ग्वालियर जाने के लिए दिन की पहली गाड़ी पकड़ने, वे
घर से निकल पड़े। सुबह की पहली गाड़ी होने से पैसेंजर मे ज्यादा भीड़ नहीं थी।
क्योंकि लोगो के पास बुंदेलखंड एक्सप्रेस और उत्कल एक्सप्रेस के भी विकल्प थे। प्रोफेसर की चिंता और बेचैनी उन्हे जल्दी से जल्दि
ग्वालियर पहुँचने के लिये बेकरार कर रही थी। ग्वालियर मे पहुँचते ही प्रोफेसर की
निगाहे प्लेटफॉर्म के एक सिरे से दूसरे सिरे तक राजू को ढूंढने के लिये व्याकुल
थी। प्लेटफॉर्म नंबर 2-3 पर तलाशी के बाद उन्होने प्लैटफ़ार्म नंबर एक की ओर रुख
किया। सौभाग्य से प्लैटफ़ार्म के आखिरी सिरे पर नल के नीचे राजू उनींदा लेटा पड़ा था
शायद कोई गाड़ी इस प्लैटफ़ार्म पर आने वाली थी।
"हे
राजू कैसे हो"?, प्रोफेसर ने आवाज लगाई!
सहसा
राजू भय और डर से हड़-बड़ा कर जाग पड़ा, उसे लगा शायद ठेकेदार पैसे के लिये
उसे ढूँढता हुआ यहाँ आ पहुंचा। पर प्रोफेसर को देख उसे तसल्ली हुई कि ठेकेदार के
आने की जिस कुशंका से वह भयग्रस्त था वास्तव मे ऐसा नहीं था।
"बाबूजी
आप"!! राजू ने कुछ चैन की सांस लेते हुए कहा!
"हाँ राजू", क्या तुम
आज घर नहीं गये? प्रोफेसर ने पूंछा।
"कैसे जाता"?, राजू
बोला। "कल बहुत ही मनहूस दिन था", "साहब"!
शाम को उत्कल एक्सप्रेस पर मै खुश था कि एक के बजाय दो डिब्बे खिलौने बिक रहे है। मेरे
पास खुल्ले पैसे नहीं थे। उन लड़कों ने मुझे धोखा दे, दो डिब्बे
खिलौने के ले लिये। "बाबूजी जी", "सारी रात आँखों
मे आँसू लिये रोता रहा मै"!!, मुझे रह रह कर अपने आप पर
क्रोध आ रहा था, दो सौ रूपये का नुकसान जो हो गया था! मै छोटा
हूँ न, क्या कर सकता था"। इतना कह वह फिर सुबकने लगा था।
"अब इस खामियाजे की सजा तो मुझे भुगतनी
ही थी", राजू बोला। घर जाता तो ठेकेदार
गलियाँ दे पैसे की मांग कर झूठा और बेईमान कहता!! इस सबसे बचने के लिये ही मै घर
नहीं गया। हर खिलौने के डिब्बे पर मिलने वाले दस रुपए के कमीशन से जब तक बीस
डिब्बे नहीं बेंच लेता तब तक दो सौ रुपए नुकसान की भरपाई कैसे होती?
"बो तो ठीक है",
"लेकिन तुम्हारी माँ और भाई बहिन भी सारी रात तुम्हारे न आने पर चिंतित और
परेशान नहीं हुए होंगे"? प्रोफेसर ने कहा।
ठेकेदार का हिसाब कैसे करता बाबूजी आप ही
बताइए!! उसकी आवाज मे नुकसान से ज्यादा अपने स्वाभिमान की चिंता थी। कैसे भी
ठेकेदार को उसकी पूरी कीमत दे दूँ भले ही इस सौदे मे उसे एक पैसे भी न मिला हो! उसने
उत्साहित हो कहा, "सारी रात जाग कर मैंने सोलह डिब्बे बेच लिये", "अभी मात्र चार डिब्बे बेचना बाकी है"!! "जब तक चार डिब्बे
और नहीं बेंच लेता तब तक घर नहीं जाऊंगा", उसकी आँखों मे
एक दृढ़ निश्चय दिखाई दे रहा था। "माँ, भाई बहिन परेशान तो हुए होंगे पर ठेकेदार की निगाह मे मै बेईमान कहलाने
से तो बच जाऊँगा"? ऐसा कहते हुए उसने प्रोफेसर को कल की पूरी घटना कह सुनाई।
सारी बाते सुन प्रोफेसर ने कहा, "हाँ, मुझे मालूम है"!!
राजू ने आश्चर्य चकित हो पूंछा, "
कै....कै...., कैसे, बाबूजी"!
"अरे! राजू कल मै उसी डिब्बे मे बैठा
था जिस मे वे युवा लड़के यात्रा कर रहे थे। तुम्हारे खिलौने देख मै समझ गया था कि
तुम्ही होगे जिसके साथ ये घटना हुई। जब मैंने उन युवा यात्रियों को बताया कि मै
यहाँ से दैनिक आवा-गमन करता हूँ और मै उस खिलौने वाले बच्चे को जानता हूँ! इतना
सुनते ही उन यात्रियों ने खिलौने के डिब्बों की वो कीमत दो सौ रूपये मुझे दे दी!!
इतना सुनते ही राजू के चेहरे पर खुशी की
सुनहरी चमक आ गयी, और बरवश ही उसके मुंह से निकला, "सच मे
बाबूजी"?
प्रोफेसर ने अपनी जेब से दो सौ रूपये निकाल
कर राजू के हाथ मे देते हुए कहा "हाँ राजू", "सच"!
उसकी आँखों मे आँसू आ गये, मै नाहक ही
उनको भला-बुरा कह रहा था, वे तो "बड़े भले लोग थे", उसे अब अपनी अधम सोच पर पश्चाताप हो रहा था। "आज के जमाने मे ऐसे लोग कहाँ मिलते
है", "बाबू जी"। "भगवान उनको खुश
रक्खे"!! "गलती मेरी ही थी, मुझे आगे से और सावधान
होना होगा"। राजू ने निश्छलता से कहा। उसने आभार जताते हुए कहा, "बाबूजी यदि आप न होते तो इस नुकसान की भरपाई
कभी न होती"।
राजू की आँखों मे चमक थी। अब उसे ठेकेदार से
झिड़की नहीं सुननी पड़ेगी। उसने जल्दी जल्दी अपना चेहरा साफ किया और बैग को बंद कर
जल्दी से झुग्गी की ओर भागा जहां उसकी
व्याकुल माँ, अपने दोनों बच्चों के साथ सारी रात जाग राजू का इंतजार कर रही थी। राजू
को झुग्गी की ओर भागता देख, प्रोफेसर की आँखों के कोने मे
खुशी और संतोष के आँसू की एक बूंद झलक आयी।
विजय सहगल



2 टिप्पणियां:
अती सुंदर लेख मुझे पसंद आया.
धन्यवाद.
बहुत सुंदर लेख । सहगल जी आपके लेखनी में रोचकता बढ़ती जा रही है ।
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