"साईकिल"
आज से पाँच दशक पूर्व साईकिल मध्यम वर्गीय परिवार का एक महत्वपूर्ण अंग हुआ
करती थी। प्रत्येक घर मे आवश्यक रूप से कम से कम एक साईकिल तो अवश्य ही होती थी
जिस पर नौकरी या व्यवसाय करने वाले परिवार के मुखिया का ही हक होता था ताकि वह
अपने नौकरी या व्यवसाय के स्थान से घर तक का सहज सुलभ संपर्क रख सके। ग्रामीण
क्षेत्र से ग्रामीणों का अपने दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति आदि के लिये साईकिल ही
एक माध्यम हुआ करती थी। जिन घरों मे एक से अधिक साईकिल होती या हर वयस्क के पास
अपनी साईकिल होती उन्हे आर्थिक रूप अधिक सम्पन्न माना जाता था।
उन दिनों साईकिल पर लाइसेंसे फीस वार्षिक आधार पर नगर पालिका ठेकेदारों के
माध्यम से बसूल करती थी जिनका शिकार अधिकतर ग्रामीण वासी हुआ करते थे। जो उन दिनों
शायद बारह आने या एक रुपया थी उस समय उक्त फीस के भुगतान मे हीला हुज्जत भी खूब होती
थी। बसूली मे जो भी जबर पड़ जाता। ठेकेदार भारी पड़ा तो लाइसेंसे फीस बसूल हो जाती
और यदि कोई ग्रामीण साईकिल वाला मारने-पीटने मे जबर हुआ तो ठेकेदार के कारिंदे उसे
चेतावनी देकर अगली बार फीस बसूलने की हिदायत दे छोड़ देते। कुल मिला कर "जिसकी
लाठी उसकी भैंस" अर्थात जबर, ज्यादती और
जबर्दस्ती का सौदा था, जिसकी जीत हो जाये?
बचपन मे अधिकतर स्कूल या अन्य किसी भी जगह पैदल
ही आना-जाना होता था। घर मे एक ही साईकिल थी जिसे प्रायः पापा अपनी ड्यूटि मे इस्तेमाल
करते, रेल्वे की नौकरी मे शिफ्ट की ड्यूटि थी,
साईकिल मिलने के चान्स कम ही होते थे। एकाध दिन पापा के छुट्टी पर रहने पर साईकिल घर पर होती तो बड़े होने के नाते भाई साहब का साईकिल
से कॉलेज जाने का अधिकार उनका रहता। घर की पुरानी
"मेड इन इंग्लैंड" साईकिल काफी जीर्ण सीर्ण हालत मे थी अतः एक नई
साईकिल "ए-वन" खरीदी गई। घर मे एक अलग ही खुशी और उल्लास का वातावरण था।
जब साईकिल घर पर आई तो ये जानते हुए कि हमारा नंबर इसको ले जाने का शायद ही मिले
पर घर मे साईकिल आने की जो खुशी मिली वो कलांतर मे स्कूटर और कार लेने मे भी नहीं
हुई। नई साईकिल के आने से पुरानी साईकिल
की उपयोगित और पूंछ-परख मे कमी आनी स्वाभाविक थी। पड़ौस मे एक भगवनदास साईकिल वाले
की दुकान थी जिसे साईकिल सुधारते अक्सर देखा करते,
न जाने क्या धुन सवार हुई पुरानी साईकिल की पूरी ओवरहौलिंग करने की सूझी। इसमे
हमारे दोनों बड़े भाइयों के सहयोग ने उत्साह और भी बड़ा दिया। पूरे नट बोल्ट खोल दिये। हैंडेल,
फ्रेम, आगे पीछे के दोनों पहिये,
मड गार्ड, ब्रेक,
चैन सारे एक ढेर के रूप मे पड़े थे। वही हाल हुआ जिसका डर था अर्थात "बिच्छू
का मंत्र न जाने, चले साँप के बिल मे हाथ
डालने"। चक्रव्यूह मे साईकिल के साथ घुस तो गये पर निकले तो अकेले। साईकिल चक्रव्यूह
मे ही ढेर की तरह पड़ी रही, जो फिर कभी चक्र
व्यूह से बाहर न आ सकी।
भाई साहब भी एलएलबी के उच्च शिक्षा हेतु
कॉलेज जाने लगे। रात्रि कक्षाएं थी अतः 2-3 साल बाद एक और साईकिल लेने का बजट यहाँ
वहाँ से जोड़-तोड़ कर बना तो खुशी इस बात की थी कि दूसरी साईकिल आने से हमे भी अपने कॉलेज
साईकिल से जाने के रोज तो नहीं लेकिन कभी कभी तो मौका मिल ही जायेंगे। लेकिन ये
खुशी ज्यादा दिन न चल पायी। भाई साहब की रात्रि क्लास के दौरान ही बुंदेलखंड
डिग्री कॉलेज, झाँसी से एक रात्रि चोरो ने साईकिल चुरा ली। पुलिस
रिपोर्ट आदि हुई पर "ढाँक के वही तीन पात"। बहुत बड़ा बज्राघात था मेरे
लिये। सारा परिवार दुःखी था। नई साईकिल को लिये हुए बमुश्किल एकाध महीना ही हुआ
था। उस दिन "गरीबी मे गीला आटा" की कहावत का दुःखद अहसास हुआ था।
साईकिल चोरी का दुःखद संयोग से सालों बाद मेरे
पुत्र को भी 2009-10 मे अपनी उच्च शिक्षा हेतु अमेरिका के अल्बामा शहर मे रु-ब-रु
होना पड़ा। एक दिन जब वह मार्टिन लूथर किंग सेवा केंद्र मे सामाजिक सेवा कार्य मे
सहयोग देने हेतु गया था, बापसी मे उसकी
भी साईकिल वहाँ से चोरी हो गई। इसे कहते है "होम करते हाथ जलना", मुझे उन दिनों तक अमेरिका जैसे समृद्ध शाली देश
मे साईकिल जैसी चीजों की चोरी की उम्मीद न थी।
खैर झाँसी मे कुछ महीनों बाद फिर से नई साईकिल
आ तो गई पर कहते है न कि "दूध का जला,
छांछ भी फूँक-फूँक के पीता है" एक
बड़े अतरिक्त बेढब ताले और मोटी लोहे की चैन साईकिल के गले मे डाल दी गई। साईकिल मे
मोटी देशी चैन और बड़ा अलीगढ़ी ताला देखने मे खराब तो लगता पर "मारता क्या न करता",
साईकिल की सुरक्षा जो करनी थी।
बचपन मे विध्यालय एवं किशोर अवस्था मे इंटर
कॉलेज और युवावस्था मे डिग्री कॉलेज तक प्रायः पैदल ही जाना होता। विपिन बिहारी
डिग्री कॉलेज मे पहली बार सह-शिक्षा प्रणाली मे पढ़ने का मौका जो मिला था। अपनी भी
कुछ इज्जत थी, महीने दो महीने मे एकाध
बार डिग्री कॉलेज मे साईकिल उपलब्ध हो जाती तो कॉलेज ले जाने का एक मात्र उद्देश्य
क्लास के छात्र-छात्राओं को दिखाना रहता कि अपने पास भी साईकिल है।
साईकिल का एक और किस्सा मै सांझा करना
चाहूँगा, दरअसल एक बार मै साईकिल
लेकर कॉलेज गया। सभी की तरह साईकिल स्टैंड पर साईकिल रख क्लास मे शामिल होने चला
गया। रोज की तरह ब्रेक मे अपने कुछ मित्र मंडली जिसमे उमेश,
योगेश, वेद,
सुरेन्द्र शामिल थे के साथ मूफली खा पी कर शाम को योगेश के साथ गपियाते घर को चल
दिये जो मेरा कॉलेज बापसी का नित्य का क्रम था। योगेश मेरे घर के कुछ पहले ही रहता
था, हम निसफ़िकर अपने घर पहुँच गये। रात मे जब
पापा नाइट ड्यूटि जाने के लिये तैयार हुए तो देखा साईकिल घर पर न थी। माँ ने सभी
को उठा साईकिल के बारे मे पूंछा। मुझे भी गहरी नींद से जगाया गया। जब साईकिल के
बारे मे पूंछा तो मेरी तो हालत खराब। क्योंकि मै तो कॉलेज साईकिल स्टैंड पर ही भूल
गया था। एक बार साईकिल चोरी की घटना मेरे मन
मस्तिष्क पर फिर छा गई,
जिसने मुझे सारी रात सोने न दिया। रात उस दिन कुछ ज्यादा ही बड़ी नज़र आ रही थी।
जैसे तैसे रात काटी, सुबह समय से पूर्व,
मै तमाम आशंकाओं-कुशंकाओं के बीच कॉलेज साईकिल स्टैंड पहुंचा!! पर ईश्वर को
अनेकानेक धन्यवाद। साईकिल अपनी जगह सलामत खड़ी थी जैसे निपट वीराने मे बिताई तन्हा
रात की शिकायत कर रही हो। स्टैंड वाले ने बताया कि वह भी पिछली दिन तुम्हारी साईकिल
के कारण देर तक स्टैंड पर इंतजार करता रहा
पर जब कोई धनी साईकिल लेने न आया तो स्टैंड का ताला डाल वह भी घर चला गया।
साईकिल मिलने की खुशी मे देर तक स्टैंड पर इंतज़ार का कुछ तो परितोषिक उसका भी बनता
था, मैंने स्टैंड वाले को मिठाई के पैसे दिये। मुझे अपार खुशी थी कि साईकिल चोरी होने से बच गई।
विजय सहगल



3 टिप्पणियां:
बहुत सुंदर लेख लिखा है, मै इस बात को जाणता हू मेरे भी हालत ईसी तरह थी, पचास पैसे घंटा किराये पर सायकल लेते थे, कॉलेज पैदल जाते थे, दसवी कक्षा तक चप्पल नहीं.
मैं अपके लेख से भाऊक हू. अती सुंदर 🙏 किशोर मधुकर हेडाऊ, सर्कल सहस्त्र मुंबई सिटी
Sehgal ji meri bhi cycle chori ho gayi thi jab mai kurukshetra university me 1978 me M Com. kar rahs tha. Aap ne bahut hi sahi tarike se pesh kiya ha. Muje bhi ghar (Karnal) jane ke baf bar bar cycle ke bare me hi puchh rahe the jiska mere pas koi jawab nahi tha.
अति सुंदर लेख!
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