मंगलवार, 29 जून 2021

स्टाफ ट्रेनिंग कॉलेज की ट्रेड मिल

 

 

"स्टाफ ट्रेनिंग कॉलेज की ट्रेड मिल"





कुछ गतिविधियों का शौक किसी व्यक्ति को बचपन से ही लग जाता है और इस के लिये कोई देश, काल या पात्र अर्थात समय, स्थान या व्यक्ति इसके लिये प्रेरणा का हेतु बनता है। बचपन मे अपने बड़े भाई साहब शरद सहगल की प्रेरणा से उनके साथ लक्ष्मी व्यामशाला, झाँसी  जाना शुरू किया था। कालांतर मे स्व॰ श्री सीता राम गुप्ता जी के सानिध्य मे कॉलेज स्तर पर मलखम सीखा। झाँसी मे स्वास्थ और व्यायाम का जो सिलसिला बचपन मे शुरू हुआ था पठन पाठन के पश्चात सेवारत होने के साथ लखनऊ, ग्वालियर, रायपुर, भोपाल, दिल्ली नोएडा होते हुए आज भी निरंतर जारी है।

सन् 2001 मे ग्वालियर पदस्थपना मे इसी व्यायाम की प्रवृत्ति के बशीभूत एक पैदल/दौड़ने वाली बालबेयरिंग युक्त रोलर पर फिसलने वाली मानवीकृत ट्रेड मिल खरीदी। चूंकि बिजली  मोटर से युक्त ट्रेड मिल महंगी थी तथा दाम मे दुगने से अधिक का अंतर था। इस तरह की मानवीकृत रोलर पर फिसलने वाली ट्रेड मिल का अनुभव मै वर्षों पूर्व 1987-88 मे  बैंक के स्टाफ ट्रेनिंग कॉलेज मे देख चुका था जो कि बहुत अच्छा नहीं था। 2-3 दिन उपयोग के पश्चात हमे लगा कि इस पुरानी तकनीकि की ट्रेड मिल उपयोग मे सरल और मित्रवत न होने के कारण ये यूं ही अनुपयोगी पड़ी रहेगी और  इसका पैसा यूं ही बेकार जाया होगा। यध्यपि उन दिनों वेतन इतना ज्यादा नहीं था कि बीस-बाईस हजार की राशि के बड़े व्यय को अचानक झेल सके। लेकिन मरता क्या न करता आठ-नौ हजार की मानवीकृत ट्रेड मिल के अपव्यय से बचने के लिये मजबूरी मे विधुत  मोटर की ट्रेड मिल लेनी पड़ी। लेकिन उस समय उक्त बड़े व्यय का निर्णय सही रहा क्योंकि उस विधुत मोटर युक्त ट्रेड मिल का भरपूर उपयोग अब तक लगातार परिवार द्वारा  होता आ रहा है।

ठीक ठाक तो याद नहीं लेकिन स्टाफ प्रशिक्षण कॉलेज न्यू फ़्रेंड्स कॉलोनी के बाद  नोएडा मे शुरू हो चुका था और मै पहली बार इस महाविध्यालय मे शायद 1987-88 मे प्रशिक्षण हेतु आया था। परिसर के अंदर तो सब ठीक था लेकिन कॉलेज परिसर के बाहर सुनसान बियाबान जगल सा प्रतीत होता था। शाम के झुरमुटे से लोगो का आना जाना बंद हो जाता था। गार्डस  की  सख्त हिदायत थी कि शाम के बाद परिसर के बाहर न निकले। असामाजिक तत्व लूटपाट के इरादे से हिंसा या राहजनी कर सकते है। भोजन आदि के पश्चात रात्रि मे परिसर के अंदर ही घूमना घामना हो जाता था। प्रशिक्षण महाविध्यालय यूं तो ठीक था पर कमरे की बनावट कुछ अजीब थी। एकल व्यक्ति के लिये बने कमरे तो ठीक थे पर शौचालय एवं स्नानालय को दो कमरों के बीच सांझा करना पड़ता था। टॉइलेट मे दोनों ही कमरों के  दरवाजे खुलते थे। जब एक व्यक्ति टॉइलेट का इस्तेमाल करता तो दूसरे दरबाजे को भी अंदर से लॉक करना पड़ता था। जब कभी कोई  व्यक्ति टॉइलेट के उपयोग के बाद दूसरे दरबाजे को अनलॉक करना भूल जाये तो पहला व्यक्ति शौचलाय के उपयोग से वंचित रह जाता। ऐसी समस्या प्रायः होती। कालांतर मे जब समस्या बड़ी तो फिर हॉस्टल के कमरों के वास्तु मे बदलाव कर छोटे छोटे एकल कमरों के बीच की दीवार  को तोड़ कमरों को  दो व्यक्तियों के सांझा उपयोग हेतु परिवर्तित किया गया। इस पुनर्निर्माण मे निश्चित ही लाखों रुपए  का अपव्यय हुआ होगा। जिससे टॉइलेट की समस्या का निराकरण हो गया।   

परिसर काफी बड़े क्षेत्र मे हरियाली से परिपूर्ण था। हरे घास के मैदान के चारों ओर बनी पक्की सड़क के दोनों ओर बड़े बड़े पेड़ परिसर की खूबसूरती मे चार चाँद लगते थे। योगा की क्लाससेस भी शायद लगती थी। प्रशिक्षण कक्ष आधुनिक तकनीकी से सुसज्जित पूर्णतः वातानुकूलित थे। भोजन कक्ष भी आधुनिक सुख सुविधाओं से परिपूर्ण था। मनोरंजन कक्ष मे टेबल टेनिस, शतरंज और कैरम की भी व्यवस्था थी जो उत्तम गुणवत्ता लिये बने थे।  एक तरफ एकांत मे जेनरेटर रूम की व्यवस्था भी की गई थी। उसके बगल मे ही प्रशिक्षणार्थियों के स्वास्थ की चिंता का समाधान भी बैंक ने "जिम" (व्यायामशाला) के माध्यम से कर रक्खी थी ताकि व्यवयमशाला के उपयोग से स्टाफ अपने बैंक की सेवा के साथ अपने स्वास्थ पर भी ध्यान दे सके। इस जिम को हम अन्य सुविधाओं की तरह आधुनिक कदापि नहीं कह सकते थे।

जिम मे कुछ डंबल, वेट लिफ्टिंग सेट, साइकलिंग मशीन, पुशअप बेंच थी। सबसे अजीब ट्रेड मिल थी। उक्त ट्रेड मिल मोटर से नहीं अपितु अनेकों बाल बेयरिंग यक्त रोलर के माध्यम से फिसल कर चलने वाली थी। जिम के उपकरण कॉलेज की अन्य सुविधाओं के विपरीत पुराने ढर्रे के थे। जिम की हालात देख कर ऐसा लगता था मानों प्रबंधन को स्टाफ के स्वास्थ के प्रति कोई रुचि नहीं, जिम को रखना शायद रिजर्व बैंक या अन्य विभागीय नीतियों के अनुरूप उनकी वैधानिक मजबूरी रही होगी। हर वर्ष शाखाओं की तरह ट्रेनिंग कॉलेज का भी निरीक्षण होता होगा पता नहीं क्यों, निरीक्षकों ने साल दर साल के निरीक्षण मे जिम की स्थिति पर कोई टिप्पड़ी नहीं की या टिप्पड़ी को लगातार नज़रअंदाज़ किया जाता रहा??

ट्रेनिंग के आखिरी सत्र मे ट्रेनिंग प्रोग्राम समन्वयक के साथ  प्रधानाचार्य या प्रबंधन के उच्च अधिकारी से साक्षात्कार होता। जिसमे प्रशिक्षण कार्यक्रम के औचित्य, आवश्यकता और बैंक की कार्य प्रणाली पर प्रशिक्षण के महत्व पर चर्चा के साथ महाविध्यालय मे उपलब्ध सुविधाओं पर प्रशिक्षुओं का विचार, प्रतिपुष्टी (फीडबैक) भी लिया जाता था। खानपान, रहन सहन, ट्रेनिंग का मैट्रियल पर भी लोगो की राय ली जाती थी। ठेकेदार को कम पैसे की प्रतिपूर्ति के कारण खान पान पर पहले ही कोई टिप्पड़ी न करने के लिये आग्रह किया जाता था।  मुझे याद है मैंने जिम मे उपयोग मे चलन के बाहर पुराने उपकरण, आदि पर राय दे उन्हे आधुनिक मशीनों मे बदलने का अनुरोध किया था जैसे उन दिनों नजदीक ही बने  "नॉर्थन स्टेट ट्रैनिग कॉलेज मे उपलब्ध कराई गई थी। तत्कालीन अधिकारियों ने जिम को उन्नतशील बनाने का आश्वासन दिया था। उसके बाद अनेकों बार जब जब प्रशिक्षण पर आना हुआ हर बार मैंने जिम के हालात, उसकी प्रचलन के बाहर पुरानी मशीनों और दरिद्र रख रखाब  बारे मे अपना दुःख प्रकट किया तब तब हर बार मुझे अगली बार जिम मे बदलाब करने का आश्वासन मिला। 

स्वस्थ कर्मचारी-स्वस्थ बैंक की विचारधारा के विपरीत उच्च प्रबंधन के किसी भी अधिकारी ने इस ओर ध्यान तो दूर शायद ही जिम को देखने की जहमत उठाई हो? मुझे स्वस्थ स्टाफ का एक किस्सा याद आ रहा जिसे आपसे सांझा करूंगा, कृपया हल्के मे लें!! एक बार एक शाखा के मैनेजर का बार्षिक चिकित्सा बिल प्रादेशिक कार्यालय मे स्वीकृति हेतु आया जो उन दिनों दो हजार रुपए था। पर्सनल डिपार्टमेंट के अधिकारी ने उक्त बिल को अपनी अनुशंसा के साथ स्वीकृति हेतु प्रादेशिक प्रबन्धक को प्रस्तुत किया। बिल को देख प्रादेशिक प्रबन्धक भड़क उठे और पर्सनल विभाग के प्रमुख को बुलवा भेजा और पूंछा तुमने चिकित्सा बिल को अच्छी तरह देखा? स्टाफ डिपार्टमेंट के अधिकारी ने कहा, "जी अच्छी तरह जांच कर  बिल देखा, बिल मे  रसीद है, डॉक्टर का पर्चा एवं चिकित्सकीय जांच रिपोर्ट भी है जो डॉक्टर द्वारा प्रमाणित  बिल के साथ सलग्न है। प्रादेशिक प्रबन्धक फिर भड़के, "बोले क्या खाक देखा? ये लो देखो रिपोर्ट मे ब्लड शुगर?-नॉर्मल, ब्लड प्रैशर?-नॉर्मल, हीमो ग्लोबिन?-नॉर्मल, कोल्लेस्ट्रोल?-नॉर्मल, ईसीजी? नॉर्मल, अरे जिस व्यक्ति की सारी रिपोर्ट "नॉर्मल" बो क्या खाक बैंक की परवाह करेगा??  झुंझला कर बोले, "ऐसा व्यक्ति मैनेजर पद पर रहने लायक ही नहीं, जिसकी सारी मेडिकल रिपोर्ट "नॉर्मल" हो!! ऐसे  व्यक्ति को तुरंत ब्रांच मैनेजर के पद से हटा कर सेकंड मैन बना कर भेजो!! या  स्टेशनरी गोडाउन भेजो!! विभाग का अधिकारी प्रादेशिक प्रबन्धक की बात सुन आश्चर्य से हक्का-बक्का था!!  

इसे सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य सेवानिवृत्ति का आखिरी महीना और आखिरी दिन भी मैंने स्टाफ ट्रेनिंग कॉलेज मे स्थित शाखा के निरीक्षण मे बिताया।  मैंने अपनी सेवा के 38-39 वर्ष पर दृष्टिपात किया और मनन किया कि  बैंक का आकार एवं व्यवसाय पहले के मुक़ाबले अनेकों गुणा बढ़ गया, स्टाफ बढ्ने के साथ प्रोन्नतियाँ हुई। बैंक शाखाओं के आकार मे भी अनेकों गुना वृद्धि हुई। शाखाओं की संख्या, मे भी भारी बदलाब हुए पर जो नहीं बदला सो नहीं बदला वह था स्टाफ ट्रेनिंग कॉलेज का "जिम" अर्थात "व्यायामशाला" और उसमे स्थित "ट्रेड मिल"!!।  निश्चित ही बैंक की लाभप्रदत्ता मे इस दौरान इतनी तो वृद्धि हुई ही होगी कि जिम के नए उपकरण एवं   विधुतिकृत ट्रेड मिल आ जाती।

विजय सहगल  

शुक्रवार, 25 जून 2021

हल्दीघाटी

 

"हल्दीघाटी"

 










28 फरवरी 2021 मेरी ज़िंदगी का एक अहम दिन था। इस दिन हल्दी घाटी की चिरप्रतीक्षित यात्रा का सौभाग्य जो मिलने जा रहा था। बचपन मे  कक्षा छटी या सातवी  की किताब मे राणा प्रताप के घोड़े पर  श्री श्याम नारायण पांडेय द्वारा रचित वो अविस्मरणीय पंक्तियाँ आज भी कंठस्थ है। जिसमे हल्दी घाटी के युद्ध मे चेतक की भूमिका को सराहा गया था:-  

रण बीच चौकड़ी भर भर कर,
चेतक बन गया निराला था।
राणा प्रताप के घोड़े से,
पड़ गाया हवा का पाला था॥
वो तनिक हवा से बाग हिली,
लेकर सवार उड़ जाता था।
राणा की पुतली फिरी नहीं,
तब तक चेतक मुड़ जाता था॥.............

वास्तव मे बचपन मे पढ़ी इन पंक्तियों मे महाराणा प्रताप की वीरता और बलिदान तथा इस कालजयी युद्ध मे चेतक घोड़े की हल्दीघाटी  के युद्ध मे महत्वपूर्ण भूमिका ने मन को उद्वेलित कर दिया था। हल्दीघाटी  की यात्रा मेरे लिये कोई साधारण पर्यटन यात्रा नहीं थी अपितु हल्दीघाटी  मेरे लिये किसी तीर्थ यात्रा से कम न थी। भारत और भारतीय स्वाभिमान के विजय का संदेश देता हल्दीघाटी का युद्ध महारणा प्रताप के महान पराक्रम, बल और पौरुष के साथ ही भारतीय सांस्कृति और सभ्यता और स्वाभिमान  को पुनर्स्थापित करने करने की बीर गाथा थी। 18 जून 1576 को कुछ घंटे चले इस युद्ध मे महारणा प्रताप के बहादुर 3000 घुड़सवारों और कुछ सैकड़ा भील जनजाति के बीर योद्धाओं ने मुगल शासक अकबर की दस हजार सैनिकों  की सेना को उसके अहंकार और दंभ को चकनाचूर कर नाकों चने चबवा दिये थे। हल्दी घाटी का युद्ध एक मायने मे भारत के गौरव और आत्मसम्मान के लिये इसलिये और भी  महत्वपूर्ण है कि महारणा प्रताप के शौर्य, पराक्रम के इस युद्ध की घटना से प्रेरित होकर ही छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुगलों के विरुद्ध अपना युद्ध  कौशल और पराक्रम का प्रदर्शन किया।  मेरे कोमल बाल मन पर उंकरी उन पंक्तियों की पूर्णाहुति दिनांक  28 फरवरी 2021 को पूर्ण हुई जब इस दिन हमने अपने परिवार सहित इस तीर्थ स्थल के दर्शन किये और इस धरा की माटी को अपने मस्तक पर धारण किया।   

एक सकरी सी पहाड़ी घाटी जिसके दोनों ओर हल्दी जैसी पीली माटी के पहाड़ से घिरी पीली रज के तिलक और चन्दन से महाराणा प्रताप के बीर योद्धाओं और भील जनजाति के पराक्रमी सैनिकों ने एक नया इतिहास रच इस स्थान को  देश के गौरवपूर्ण  एवं महत्वपूर्ण स्थानों मे सुमार कर दिया। इस पवित्र घाटी के पास ही महाराणा प्रताप के चेतक घोड़े की समाधि भी बनी है। हल्दीघाटी के युद्ध मे चेतक का एक पैर बुरी तरह घायल होने के बावजूद भी चेतक घोड़े ने 26 फुट के नाले के पार छलांग लगा महराणा  प्रताप को रणभूमि से सुरक्षित निकाल अपने प्राणों की आहुति दी थी। एक घोड़े की अपने स्वामी के प्रति  भक्ति की ऐसी मिशाल देखने को नहीं मिलती।

हल्दिघाटी के पास ही महारणा प्रताप म्यूजियम भी दर्शनीय है। इस म्यूजियम का दृश्य और श्रव्य का विशेष कार्यक्रम देखने लायक है। इस म्यूजियम मे आदमक़द प्रतिमाओं के माध्यम से घटनाओं का चित्रण किया गया है और पृष्ठभूमि से आती आवाज के माध्यम से घटना का संक्षिप्त पर जीवंत रूप दिया गया है मानों प्रतिमाएँ आपस मे बातचीत कर रही हों। भारतीय सांस्कृति और सभ्यता मे महिलाओं के सम्मान का एक दृश्य जिसमे  दिखाया गया कि महारणा प्रताप के सैनिकों द्वारा युद्ध मे अकबर के सेनापति अब्दुल रहीम खान ए खाना सहित  उनके पूरे परिवार को गिरफ्तार कर जब उनके समक्ष पेश किया गया तो महारणा प्रताप ने महिलाओं को इस तरह गिरफ्तारी पर अपनी नाराजी प्रकट की और उन्हे ससम्मान रिहा कर उनके शिविर मे बापस भिजवाया। कदाचित मुगल शासकों के झूठ, फरेब, धोखे के बहाने प्रतिपक्षी राजाओं को कैद करने की घटनाओं का समुचित मूल्यांकन इतिहासकारों ने इस घटना को सामने  रख किया होता।

किलेनुमा प्रतिरूप के अंदर म्यूजियम के प्रवेश करते ही चेतक घोड़े की आकर्षक  प्रतिमा देखते ही बनती है। महारणा प्रताप की सेना और भील जाति के सैनिक की आदम कद ताँबे सी चमकती प्रतिमाए एवं  छत्रपति शिवाजी सहित अन्य सैनिकों की प्रतिमाएँ दर्शनीय है।  राजस्थान की जन जातियों का सजीव चित्रण और ग्रामीण परिवेश की राजस्थान मे प्रचलित  बैल गाड़ीयों  की झाकियाँ, गौ पालन, बढ़ई और लोहार का कार्य करने वाली राजस्थानी जन जातियों की प्रतिकृति एक आदर्श गाँव का चित्रण करती नज़र आती है। हल्के फुल्के स्वल्पाहार, भोजन के साथ ही राजस्थानी वस्त्र उत्पाद, शिल्प, हैंडिक्राफ्ट के विक्रय की व्यवस्था भी म्यूजियम मे की गई थी।

इस तरह भारत के इतिहास मे एक अहम महत्वपूर्ण  स्थान रखने वाली "हल्दीघाटी" के दर्शन और  तीर्थाटन से प्राप्त पुण्य को शिरोधार्य रख हमने  अपने अगले गंतव्य के लिये प्रस्थान किया।    

विजय सहगल     


मंगलवार, 22 जून 2021

ट्वीटर की "सीनाजोरी

 

"ट्वीटर की "सीनाजोरी"!!"






आज के इस तेज सूचना प्रोधौगिकि जीवन मे सूचनाओं की मानों बाढ़ आ गयी। सोशल मीडिया के माध्यम से हर व्यक्ति के पास आने वाली हजारों हज़ार सूचनाओं का विश्लेषण आसान काम नहीं रहा। जहां एक ओर सकारात्मक, शिक्षाप्रद और ज्ञानवर्धक संदेशो  ने इन मंचों की सार्थकता को बढ़ाया है वही इसके विपरीत  इस सूचना तकनीकि ने अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ मे असामाजिक तत्वों, येन केन प्रकारेण सत्ता हथियाने की इन राजनैतिक दलों की लालसा एवं विदेशी आर्थिक सहायता पाने वाले निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा छद्म, झूठे, भड़काऊँ एवं आपसी वैमनस्य और सद्भाव बिगाड़ने वाले संदेशों, फोटो एवं वीडियो ने  सामाजिक माध्यमों के  इस्तेमाल को दूषित और प्रदूषित किया है। व्हाट्सप, ट्वीटर जैसे सोशल माध्यमों पर विध्वंसक पोस्ट, फोटो, वीडियो की सूचनाओं के प्रेषण और पुनः प्रेषण (forward) से ये पता करना असंभव हो गया है कि बदनीयती से प्रेषित, कूट रचित पोस्ट का स्त्रोत क्या है? किस अपराधी व्यक्ति ने सामाजिक माधुर्य को बिगाड़ने का संदेश सबसे पहले प्रेषित कर सद्भाव को बिगाड़ने का कुत्सित कृत किया? मानसिक रूप से विक्षिप्त ऐसी सोच के मूल उद्गम स्थल वाले व्यक्तियों और सोशल मीडिया मंचों की  जबाबदेही के अभाव मे ऐसे तत्वों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही एक दुरूह और कठिन कार्य हो गया है। सूचनाओं के इस सैलाब मे ये जान पाना कठिन हो गया है कि माहौल बिगाड़ने की तह मे कौन लोग है?  कभी कभी तो ऐसा प्रतीत होने लगा है कि इन सोशल माध्यमों को सदुपयोग से ज्यादा दुर्पयोग होने लगा है। तब सवाल उठता है कि सामाजिक माध्यमों के इन मंचों पर कैसे नियंत्रण किया जाये?? सामाजिक ताने बने को अक्षुण और आपसी सद्भाव कायम रखने के प्रयास के तहत, क्यों न एक विकल्प के रूप मे इन सोशल माध्यम मंचों पर देश मे प्रतिबंध लगाने पर विचार किया जाना चाहिये?? 

अभी हाल ही मे पिछले दिनों गाजियाबाद के मुस्लिम वृद्ध अब्दुल समद के एक वाइरल वीडियो मे देखने को मिला जिसमे उससे "भगवान श्री राम" और "वन्देमातरम" कहलवाने के नाम पर एक राजनैतिक दल के उम्मेद पहलवान ने एक वीडियो बना धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने और उन्माद फैलाने की असफल कोशिश की। पुलिस द्वारा त्वरित कार्यवाही करने से उक्त कुत्सित कृत का भंडाफोड़ समय रहते हो गया।  भारत सरकार ने सूचना तकनीकि कानून मे संशोधन कर सोशल मीडिया को ऐसे संदेशों, वीडियो या फोटो के मूल स्त्रोत अर्थात उद्गम स्थल से संबन्धित  व्यक्ति की सूचना, कानून व्यवस्था के पालन करने वाली एजेन्सी के साथ सांझा करने की बाध्यता को लागू किया है। ट्वीटर, व्हाट्सप, इंस्तग्राम जैसे मंचों पर  भड़काऊ और वैमनस्य फैलाने वाले संदेशों के उस अपराधी व्यक्ति की सूचना एवं इन संदेशो को  आगे बढ़ाने और  फैलाने वालों की सूची को पुलिस और अन्य कानूनी एजेंसी को देने की बाध्यता के निर्देश दे कर ठीक ही किया है। साथ ही व्हाट्सप, फ़ेस बुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम को भी निर्देशित किया है कि उन्माद और वैमनस्य फैलाने वाले इन झूठे, अप्रामाणिक फोटो, वीडियो को अपने मंचों से तत्काल हटा देश के कानून का पालन सुनिश्चित करें।   

बड़ा खेद और अफसोस है कि ट्वीटर ने गाजियाबाद के अब्दुल समद के  उस झूठे एवं मनगढ़ंत वीडियो को पुलिस के निर्देश के बावजूद नहीं हटाने का दुष्कृत, अक्षम्य कार्य  किया। चोरी और सीनाजोरी की कहावत को चरितार्थ करती  ट्वीटर की निर्लज्ज टिप्पड़ी अखबारों मे देख मन आक्रोशित हो पीढ़ा से भर गया!! ट्वीटर के अधिकारियों द्वारा ये कहना कि हम अपनी कंपनी की सोच, रीतियों-नीतियों को भारतीय कानून से परे  वरीयता देते है। उक्त ब्यान खीज़ और गुस्सा दिलाने वाला है। संसदीय समिति के समक्ष उक्त वक्तव्य एक संप्रभु एवं सार्वभौमिक राष्ट्र को खुली चुनौती है। सरकार को बगैर किसी देरी के ट्वीटर के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही जिसमे ट्वीटर को देश मे प्रतिबंधित करना एवं जुर्माना लगाना भी शामिल है जैसी कड़ी कार्यवाही करने मे कोई झिझक नहीं होनी चाहिए।

पिछले दिनों जिस  ट्वीटर ने अमेरिका मे 9 जनवरी 2021 को "कैपिटल हिल कांड" पर  पूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के अकाउंट पर रोक लगा ऐसे भड़काऊ संदेशों को ब्लॉक कर दिया था।   जिसके कारण लोगो द्वारा अमरीकी संसद का अंदर और बाहर घेराव कर बंधक बनाया गया था।  आज वही ट्वीटर अपने "दोहरे चरित्र" और "दोगली नीतियों" के तहत लाल किले पर 26 जनवरी को किसान आंदोलन की आड़ मे हिंसात्मक अतिक्रमण और गाजियाबाद मे अब्दुल समद के समाज मे धार्मिक  वैमनस्य फैलाने वाले खोटे और जाली वीडियो को अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर हटाने से इंकार करता है। सरकार को ट्वीटर या अन्य सोशल मीडिया को "अननथेबैल" जैसा निरंकुश व्यवहार करने की छूट कदापि नहीं दी  जानी चाहिये। उन्हे ये बलपूर्वक याद दिलाना चाहिये कि "देश के कानून के तहत ट्वीटर को बदलना होगा", "न कि ट्वीटर की नीतियों की  बजह से देश का कानून"!! 

ट्वीटर, व्हाट्सप जैसी सोशल मीडिया कंपनियों को इस मुगालते मे नहीं रहना चाहिये, उन्हे ये  स्मरण रखना होगा  कि कंपनियाँ  आएंगी और चली जाएंगी, बनेंगी और मिट जाएंगी पर हमारा देश एक सारभौमिक, संप्रभु राष्ट्र है, "वसुधैव कुटुम्बकम" और सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया"  जिसकी विरासत है, आचार्यों, ऋषि-मुनियों के गहन गूढ  अध्यन से प्राप्त उपदेश एवं शिक्षाएं जिसके मूल आधार है, वे हमे अभिव्यक्ति की आज़ादी का पाठ पढ़ाएंगे??

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर हमे आंखे दिखा, नसीहत देने  वाले  ट्वीटर पर क्यों न सरकार को पिछले वर्ष जून और सितम्बर 2020 मे  177 चीनी एप्प्स पर प्रतिबंध की तरह भारतीय कानून न मानने वाले एप्प्स पर देश मे प्रतिबंध लगा देना चाहिये ताकि इनकी गलत फहमी को दूर किया जा सके कि चीनी एप्प्स की तरह ट्वीटर, व्हाट्सप्प के बिना भी देश आगे बढ़ सकता है और अच्छी तरह प्रगति के पथ पर चल सकता है।

जो लोग सोशल मीडिया और मंचों को जीवन का एक अभिन्न अंग मानने लगे है वे ये नहीं जानते कि व्हाट्सप, फ़ेस बुक, ट्वीटर वास्तव मे ज्ञान, सूचना तकनीकि के मंच से परे एक नशे का रूप ले चुके है। एक व्यसन और लत के रूप मे इन्होने हमारे दिल और दिमाक पर कब्ज़ा कर लिया है। दृढ़ निश्चय और कड़े संकल्प के साथ इन व्यसन रूपी मंचों से छुटकारा हमारे स्वास्थ और सामाजिक रिश्तों की पुनर्स्थापना के लिये आवश्यक है।  मुझे  गायत्री परिवार के एक छः दिवसीय कार्यक्रम मे मुनस्यारी (पिथोरागढ़ का सीमांत क्षेत्र)  मे बगैर किसी सूचना तकनीकि या मोबाइल के शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। बिना किसी व्हाट्सप्प, फ़ेस बुक, ट्वीटर यहाँ तक कि जब बिना मोबाइल के उपयोग के छह दिन निकाले जा सकते है तो छह माह निकालना भी "आसमान से तारे तोड़ने" से कठिन तो नहीं ही हो सकता है!! वहाँ हमने जाना कि  जिन सोशल माध्यमों के  बिना हम एक मिनिट जीवन की कल्पना भी न कर सकें, हमारे ज्ञान कौशल मे उनके बिना भी बढ़ोतरी हो सकती है?? और एक शानदार, शांति और सुखमय जीवन व्यतीत किया जा सकता है, बस आवश्यकता है एक दृढ़ निश्चय और कड़े संकल्प की!!

दुनियाँ के समस्त कार्यकलाप किसी  व्यक्ति या वस्तु के होने या न होने के बावजूद यूं ही  चलते  रहेंगे? आपके लिये मात्र "समय" ही गौढ़ है, अनिवार्य है, अपरिहार्य है पर समय के लिये न तो आप गौढ़ है, न ही अनिवार्य है और न ही अपरिहार्य!!! तब सामाजिक माध्यमों के मंच आपके जीवन के अनिवार्य अंग कैसे हो सकते है??

अतः हम सभी को हमारे देश के कानून और अस्तित्व को चुनौती देने वाले "ट्वीटर" को तुरंत बंद करने या देश के कानून मानने के लिये, सरकार से आग्रह करना चाहिये ताकि दूसरी देश विरोधी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हमारे राष्ट्र के कानून को चुनौती देने का दुस्साहस पुनः न कर सके!!  आदि ऋषि बाल्मीकि एवं गोस्वामी तुलसी दास जी के रामचरित मानस मे निम्न  पंक्तियाँ सामयिक एवं बड़ी प्रासंगिक है -

"विनय न मानत जलधि जड़, गये तीन दिन बीत।"
"बोले राम सकोप तब, भय बिन होय न प्रीत॥"

विजय सहगल    

 

रविवार, 20 जून 2021

मेरे पापा" (पितृ-दिवस पर विशेष)

 

"मेरे पापा" (पितृ-दिवस पर विशेष)"



यू तो हर शख्स  की ज़िंदगी मे उसके पिता उसके आदर्श पुरुष होते है, ऐसा हमारी ज़िंदगी मे भी था। हमे याद है हम जब सभी भाई बहिन जब छोटे थे हमारे पापा की पोस्टिंग उस समय राजा की मंडी आगरा मे थी। वो वीकेंड मे घर आते थे, बचपन मे सप्ताह के अन्य दिनों मे यध्यपि संयुक्त परिवार मे बड़े घर के बावजूद न जाने क्यों रात मे सोते समय अदृश्य डर लगता पर सप्ताहांत पापा के आने पर निर्भय नींद आती थी। यध्यपि मेरी बहुत ज्यादा  बात उनसे नहीं होती थी फिर भी मन मे  सुरक्षा का  अहसास और एक अजीब उत्साह एवं खुशी बनी  रहती  थी  कि पापा घर मे है। यह अहसास उनके जीवनपर्यंत तक जब कभी नौकरी के दौरान अपने पैतृक घर झाँसी या  ग्वालियर मे रहने के दौरान उनके  अंतिम दिनों  मे   जब वो हमारे साथ ग्वालियर मे थे हम महसूस करते रहे। उनका देहांत चलते-फिरते अचानक ग्वालियर मे हुआ। उनके निधन  के बाद एक घटना उनके बारे मे हमे हमारे पारवारिक सदस्य  श्री सूरन चाचा से ज्ञात हुई जो आज भी पूरे शहर के परिवारों के बीच सूचनाओं का आदान प्रदान करते है और समाज के हर परिवार और व्यक्तियों के वारे मे गहरी जानकारी रखते है। उनके द्वारा बताई।  उस घटना ने हमारा सिर अपने पापा के प्रति गर्व और सम्मान से  और भी ऊंचा हो गया जो शायद और अन्य लोगो से उन्हे अलग करती है। श्री सूरन चाचाश्रीमती रामकली चाची हमारे समाज के अभिन्न अंग है एवं विशेषता: हमारे परिवार मे हमारे माता पिता की तरह ही सम्मानीय  है जिनके बिना हमारे घर या समाज मे कोई भी सुख/दुख: आदि  का कार्य नहीं होता। जिनसे मिल  कर हमे आज भी  हमेशा अपनी माँ/पिता से मिलने की सी खुशी मिलती है। सूरन चाचा ने जो की शुद्धि संस्कार के पश्चात बैठक मे हमारे घर  आए जैसे कि  समाज मे  परंपरा है।

उन्होने हमारे पापा की शादी  का एक प्रसंग बताया कि जब तुम्हारे पापा की शादी (सन्-1953) हुई तो शादी की एक रश्म "कुँवर कलेऊ" होती  है। उसमे वर एवं उसके परिवार के सदस्य  को मंडप मे बधू पक्ष के घर भोजन कराया जाता है। उक्त  कार्यक्रम मे परिवार के सदस्यों के अलावा उनके  अभिन्न मित्र स्व॰ श्री गनेशी लाल जी भी थे। श्री गनेशी चाचा जीवन पर्यान्त हमारे परिवार के अभिन्न सदस्य रहे एवं जिनकी उपस्थिती हमारे परिवार के हर सुख/दुःख मे अपरिहार्य थी। उस जमाने मे रूढ़िवादिता और जातिवाद काफी प्रचलित था।  हमारे ननिहाल पक्ष के लोगो को उनके मित्र जो कि समाज के कमजोर वर्ग अर्थात अनुसूचित जाति  से थे का "कुँवर कलेऊ" कार्यक्रम मे सबके साथ भोजन करना पसंद नहीं आया और उन लोगों ने उनकी मंडप मे उपस्थिती पर एतराज़ किया। लेकिन हमारे पापा ने अपने मित्र के  बिना कुँवर कलेऊ  मे भोजन करने से इंकार कर दिया।  हार कर हमारे मामा एवं ननिहाल के परिवार को उनके मित्र को साथ मे बैठा कर उक्त कार्यक्रम को पूरा किया। उस समय मे प्रचलित दक़ियानूसी सोच के विरुद्ध हमारे पापा की सोच ने तत्कालीन समाज मे जो भी क्रिया या प्रतिक्रिया दी हो पर उनके उक्त साहसिक कदम के बारे मे जान कर  हमारा सिर गर्व से ऊंचा हो गया।

प्रगतिशील सोच और आर्थिक विकास  के वर्तमान युग की  नौजवान पीढ़ी ने  इस सामाजिक भेदभाव को काफी हद तक कम कर दिया है। तत्कालीन समय मे देश काल और पात्र के बीच उनकी प्रगतिशील सोच को हम नमन करते है!! उनके द्वारा प्रतिपादित  संस्कार हमारे परिवार की आज भी थाती हैं। पितृ दिवस पर हम आज उन्हे अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनको याद करते है। पापा हम सभी आपको प्यार करते है !! सादर नमन्!!

 

विजय सहगल

 

शुक्रवार, 18 जून 2021

पहला शिकार

"पहला शिकार"




"पहला शिकार"

अस्सी  के दशक मे भारतीय मध्यम वर्गीय संयुक्त परिवारों मे बच्चों का जीवन बड़ा कठिन हुआ करता था। अधिकतर परिवार जहां एक कमाने बाला हो और पूरा परिवार खानपान से पढ़ाई लिखाई तक का उपभोग कर    आश्रित हो बड़ा संघर्ष पूर्ण जीवन जीता था।  विज्ञान के अन्य अनेकों छात्रों की तरह हमने डॉक्टर या इंजीनियर के सपने अपनी आँखों मे नहीं संजोय थे।  उन दिनों सिर्फ और सिर्फ एक ही सपना आँखों मे कौंधता था कि किसी भी तरह एक अदद ठीक ठाक  नौकरी मिले ताकि परिवार की आर्थिक आवश्यकताओं मे कुछ हाथ बंटा सके। उन  दिनों उच्च वर्ग के विध्यार्थी जब विज्ञान के विषयों के साथ हाई स्कूल और  इंटर मीडियेट कक्षाओं मे  कोचिंग लेते थे ताकि पीएमटी या पीईटी की परीक्षा मे अव्वल आकार डॉक्टर या इंजीनियर बन अपनी मंजिल को हांसिल कर सके, पर इन क्लासों मे हमारी मंजिल टायपिंग और शॉर्ट हैंड सीख कर एक अदद नौकरी हांसिल करना था। इन अतिरिक्त अर्हताओं के कारण स्नातक परीक्षा के साथ नौकरी मिलना सामान्य अभ्यर्थियों के मुक़ाबले कुछ आसान हो जाता है अतः जल्दी ही हमे लखनऊ स्थित बैंक  मे नौकरी मिल गई और ऐसा लगा मानों ज़िंदगी की बहुत बड़ी मंजिल हांसिल हो गई हो।

जहां एक ओर स्नातक तक की पढ़ाई मे जेब मे 2-4 रूपये से ज्यादा नहीं देखे थे नौकरी की पाँच सौ रूपये की पहली तनखा ने मानो हमे आसमान पर बैठा दिया, लगा मानो हमसे ज्यादा दौलतमंद इस दुनियाँ मे कोई भी नहीं। हाल तक जो नौजवान वेशक  कॉलेज से निकल कर  किसी संस्थान मे नौकरी मे आ गया हो पर कॉलेज की खुमारी इतनी जल्दी कहाँ उतरने बाली थी। शुरुआती दिनों मे कार्यालय के माहौल मे ढलने का प्रयास हो रहा था। दिन ठीक ठाक गुजर रहे थे। कॉलेज के माहौल को भुला कार्यालीन माहौल मे संतुलन बनने लगा था। एकाधा साल यूं ही निकल गया समय व्यतीत होता रहा।

कार्यालय मे हमारा कार्य था अधिकारियों द्वारा हाथ से लिखे पत्रों को ऑफिस के लेटर हैड पर टाइप करना। एक दिन हमारे अधिकारी महोदय ने एक पत्र लिख कर टाइप करने के लिया दिया। जैसा कि होता है हमने उक्त पत्र को टाइप कर संबन्धित अधिकारी को दे दिया। पर कुछ देर बाद पुनः हाथ से लिखा वही पत्र उक्त अधिकारी ने हमे टाइप के लिए दिया तो हमे लगा शायद दुबारा लिख कर भूलवश उन्होने हमे फिर से दे दिया! जब हमने उन अधिकारी महोदय को कहा सर आपने ये पत्र दुबारा दे दिया है मै पहले ही उक्त पत्र को टाइप कर दे चुका हूँ। तब उन्होने कहा नहीं मै ये पत्र तुम्हें पहली बार लिख कर दे रहा हूँ।

मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था कि उनके आदेश कि अवहेलना कर रहा हूँ। ऑफिस मे ऐसा कई बार होता है एक पत्र मे दुबारा संशोधन होता है तो कभी कभी कई कई संशोधन के बाद टाइप किया पत्र मूर्त रूप लेता है, पर ऐसे मामले मे पहले टाइप किये पत्र मे ही संशोधन कर पुनः पत्र टाइप के लिये आते हैं। उक्त पत्र जो दुबारा आया था उसके साथ पहले टाइप पत्र नहीं था।  आजकल की तरह कम्प्युटर तो थे नहीं कि पत्र के सेव कर रखा जा सके। कुछ जवानी का जोश था कॉलेज से हाल ही मे निकले थे, मैंने अधिकारी महोदय को कहा सर वेशक दिन भर मे पचासों पत्र टाइप करें पर  विषय या मैटर देख कर याद तो रहता ही है कि हम ये पत्र पहले ही टाइप कर चुके हैं, दुबारा टाइप करने मे आपत्ति नहीं है पर मै ये पत्र पहले टाइप कर चुका हूँ।

उन अधिकारी महोदय ने इसे अपनी प्रतिष्ठा और  सम्मान का प्रश्न बना कर पुनः कहा नहीं मै ये पत्र तुम्हें पहली बार ही टायपिंग के लिये  दे रहा हूँ। उनके चेहरे पर क्रोध के लक्षण एवं अधिकारी होने के श्रेष्ठता के  भाव स्पष्ट थे। अधिकारी महोदय के  व्यवहार मे एक अधीनस्थ कर्मचारी द्वारा अधिकारी से बहस मुसाहिबा करने की  धृष्टता  स्पष्ट परिलक्क्षित हो रही थी। मैंने भी इसे स्वाभिमान का प्रश्न मान कर ऑफिस के बाहर फाड़े गये कागज़ के कचरे के ढेर मे छानबीन की तो उक्त पहले टाइप किया पत्र टुकड़ो मे कटा-फटा मिल गया। वास्तव मे उस पत्र मे कुछ संशोधन किया गया था जिसे  हमे पुनः टाइप करने के लिये दिया गया था। जब मैंने उन अधिकारी महोदय को उक्त पत्र दिखाया तो ऑफिस मे सभी स्टाफ सदस्यों के सामने उन्हे अपनी तौहीन महसूस हुई।  कुछ दिन बाद इस दुस्साहस के कारण उन अधिकारी महोदय ने हमारा ट्रान्सफर अन्य स्थानीय शाखा मे करा दिया। चूंकि एक सत्य से परे आरोप मे मेरा ट्रान्सफर हुआ तो बहुत बुरा लगा। वास्तव मे हमे इस ट्रान्सफर से ओफिसियेटिंग भत्ते के रूप मे मिलने बाले कुछ अतरिक्त आर्थिक लाभ से भी वंचित होना पड़ रहा था। मैने भी इस कृत  का विरोध अपने तरीके से किया।

एक स्थानीय यूनियन लीडर को भी इस स्थंतरण को बापस लेने के प्रयास के तहत निवेदन किया पर उन्होने अपनी असमर्थता जताते हुए अपने तर्क दिये कि स्थानीय ट्रान्सफर बैंक का विवेकाधिकार है जिसका हम विरोध नहीं कर सकते। बाद मे पता चला इसके लिये उनकी मौखिक  सहमति पहले ही ली जा चुकी थी। ऑफिस मे हमारे साथी जो हमारी बात से सहमत तो थे पर इस अन्याय के विरुद्ध हमारे साथ खड़े नहीं थे??

बैंक के दो साल के कार्यकाल मे  हमने महसूस किया कि हमारे बैंक मे कर्मचारी संगठन के पदाधिकारी और बैंक प्रबंधन एक सिक्के के दो पहलू है, जिनके बीच एक बहुत बारीक झीना पर्दा है। इनमे किसी एक से निकटता स्वतः ही दूसरे की निकटता का धोतक है इसके विपरीत एक पक्ष से आपकी वैमनस्यता स्वतः ही दूसरे पक्ष से आपका वैरभाव प्रकट करेगा। दुर्भाग्य से हम बैंक के  अपने पूरे सेवाकाल मे सिक्के के इन दोनों पहलुओं के कभी इतने करीब न आ सके कि किसी एक पक्ष की भी प्रशंसा सूची  मे अपना नाम दर्ज़  करा संगठन या प्रबंधन के  कृपा पात्र बन सकूँ। 

मेरी ज़िंदगी का ये पहला लेकिन "बड़ा सबक" था, पर ये सबक हमे गहरी सीख दे गया  कि ये कॉलेज लाइफ नहीं है जहां सारे छात्र अन्याय के विरुद्ध संगठित हो संघर्ष करें?  ज़िंदगी मे आने बाले हर संघर्ष को आपको सिर्फ और सिर्फ अकेले ही  लड़ना होगा। ये आदमी के जीवन संघर्ष की  कड़वी सच्चाई थी जिससे मै रु-ब-रु हुआ। लोग आपके साथ रहेंगे, बहुत अभिन्न रूप से आपसे जुड़े रहेंगे पर संघर्ष मे आपके साथ खड़े नहीं होंगे। इस तरह के संघर्ष मे आपको अपने अस्तित्व की लड़ाई खुद ही लड़नी होगी। इस तरह शतरंज की बिसात पर जीवन के संघर्ष की पहली लड़ाई मे, सच के बाबजूद मुझे  एक कमजोर मोहरे के रूप मे एक झूठे, धूर्त और मक्कार वज़ीर ने अपना पहला शिकार बना डाला।

विजय सहगल               

रविवार, 13 जून 2021

अपहरण

 

"अपहरण"




अनेकों बार हम लोग भी वही गलती दोहराते है जो दूसरे करते है। बुद्धिमानी इसी मे है कि आप दूसरों की गलती से सीख ले अपने स्तर पर उस त्रुटि को जल्द से जल्द आवश्यक सुधार और संशोधन कर ले। ऐसा ही कुछ सबक हमने अपनी डबरा (मध्य प्रदेश) पद स्थापना के दौरान लिया। दरअसल हम लोग ग्वालियर से डबरा आवागमन किया करते थे। आवागमन प्रायः बस से होता लेकिन ट्रेन का मासिक पास (एमएसटी) भी साथ आकस्मिक आवश्यकता हेतु  रखते थे। जल्दी बापसी और यात्रा मे बचने वाले समय को देख  कई बार हम लोग बस को छोड़ प्राइवेट कार जो सवारियों को आवाज देकर बुलाते थे से भी कभी कभी ग्वालियर की यात्रा कर लेते थे।    ये प्राइवेट जीप या कार शेयरिंग के आधार पर उतना ही किराया लेती जो बसे लिया करती थी, लेकिन प्राइवेट कार, बस से यात्रा मे लगने वाले समय से आधे  समय मे बगैर रुके हमे 35-40 मिनिट मे  हमारे गंतव्य ग्वालियर मे छोड़ देती थी। समय की बचत के एक इसी आकर्षण के कारण जब तब कभी मौका मिलता तो उसके उपयोग से हम कभी न चूकते।

प्राइवेट कार से ग्वालियर जाने के इस आकर्षण मे छुपे खतरे से बेपरवाह हम लोग तब तक यात्रा करते रहे जब तक आवागमन मे हमारे एक बैंक के साथी के साथ घटे  हादसे की खबर हम लोगो को न मिलती। प्राइवेट कार से बस के मुक़ाबले मे आधे समय और उसी किराये  मे गंतव्य तक पहुंचाने के लुभावने प्रस्ताव से सभी दैनिक यात्री प्रभावित थे। ऐसे ही एक दिन स्टेट बैंक के हमारे एक साथी को शाम के समय कुछ देर होने के कारण बापसी मे प्राइवेट कार का ड्राईवर ग्वालियर जाने की आवाज लगाता मिल गया। जल्दी पहुँचने की चाह मे हमारे उन साथी ने बस की जगह प्राइवेट कार से जाने का निर्णय ले लिया। यूं भी शाम के समय बसों की आवाजाही कुछ कम हो जाती थी। प्रायः प्राइवेट कार का उपयोग करने के कारण किसी आशंका-कुशंका की गुंजाइश  नहीं थी न ही किसी खतरे की अंदेशा था। दरअसल हम लोग दस्यू प्रभावित इस क्षेत्र की कानून व्यवस्था को जानते हुए भी सुरक्षा के नियमों की अवेहलना कर रहे थे। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। किसी अपराधी गिरोह ने पूर्वनियोजित तरीके से बैंक के उस अधिकारी को अपनी प्राइवेट कार मे बैठा लिया। साथ मे बैठी जिन सवारियों को हमारे साथी सहयात्री समझ रहे थे वास्तव वे सभी उस गेंग या गिरोह के सदस्य थे।

दुर्भाग्यपूर्ण उस रात ने हमारे साथी के जीवन को संकट मे डाल दिया। रास्ते मे उनका बलपूर्वक अपहरण हो गया था। देर रात तक घर न पहुँचने के कारण उनके परिवार ने  बैंक के अन्य स्टाफ से पूंछ तांछ करने एवं सकारात्मक उत्तर न मिलने पर पुलिस प्रशासन को सूचना और  सहायता ली गयी। अगले दिन समाचार पत्रों मे उनके अपहरण की सूचना और फिरौती की मांग की दिल दहल वाली खबर से हम लोग हतप्रभ थे। 6-8 दिन पुलिस की  कड़ी कार्यवाही और बड़ी  जद्दो जेहद के बाद उनको मुक्त किया गया। इन 10-12 दिनों मे बैंक के उक्त अपहरित साथी का जीवन संकट मे रहा। जरा सोचिये परिवार के सदस्यों की क्या हालत रही होगी, कितने मानसिक संकटों से उन्हे गुजरना पड़ा होगा। फिरौती की रकम के बारे मे समाचार पत्रों मे कोई स्पष्ट सूचना नहीं आयी। लेकिन कानाफूसी और अपुष्ट खबरों से पता चला कि एक बड़ी धन राशि फिरौती के रूप मे अपहरणकर्ताओं को दी गयी। बैंक ने भी शायद ही इस संकट की घड़ी मे अधिकारी की कुछ आर्थिक मदद की हो ज्ञात नहीं?                         

अपहरण की उस घटना के बाद  हम लोगो ने जीवन मे अपरचित प्राइवेट कारों से  किसी भी कीमत पर यात्रा न करने का निश्चय किया। प्राइवेट कारों मे पिछली यात्राओं मे जीवन को संकट मे डालने का  स्मरण आज भी  दिल मे डर और दहशत का संचार कर जाता है तो उस अपहृत साथी के दिल पर कैसी गुजरी होगी? इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। एक अन्य अपहरण की घटना आगे किसी ब्लॉग मे पुनः।

विजय सहगल

मंगलवार, 8 जून 2021

लैपटॉप

 

"लैपटॉप"



अनेकों बार शासन, सत्ता या पद से प्राप्त शक्तियों के मद मे व्यक्ति अपनी बुद्धि, विवेक और कौशल से अनाधिकृत कार्य को (ही) "यह अधिकृत" है ऐसा मान लेता है। वह साधारण सोच अधिकारी ये मान कर चलते है कि उनके द्वारा निर्णित कार्य ही अधिकृत, सत्य और नियमानुसार है, इसके विपरीत वास्तव मे ऐसे कार्य अनधिकृत, अकारण और अनैतिक होते है।  ऐसे ही व्यक्तियों के वारे मे श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 18, श्लोक संख्या 32 मे व्याख्या की गई है :-

 

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी।।18.32।।

अर्थात तमो गुण से घिरी हुई बुद्धि, अधर्म को (भी) "यह धर्म है" ऐसा मान लेती है तथा इसी तरह संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है।      

सेवाकाल के दौरान एक कार्यालय मे एक घटना का उल्लेख करना चाहूँगा। इस कार्यालय मे स्टाफ सदस्यों को कार्यालय के कार्य हेतु लैपटॉप दिये गये थे जिनके उपयोग वे बैंक के कार्य हेतु अपनी ड्यूटि के दौरान करते थे। पाँच या  छः पुराने लैपटॉप पड़े हुए थे, जो थे तो ठीक ठाक पर नवीन तकनीकी के अन्य नये लैपटॉप आने के कारण पुराने लैपटॉप  चलन से बाहर हो गये थे और उपयोग के बिना कार्यालय मे पड़े हुए थे। विभाग प्रमुख ने कार्यालय मे  पड़े उक्त  पुराने लेपटोपों को बट्टे खाते मे डालने  (राइट ऑफ) की सिफ़ारिश उच्च प्रबंधन से की। उन्होने सिफ़ारिश मे ये लिखा कि ये लैपटॉप तकनीकी की द्रष्टि से पुराने और प्रयोग के लिये  अनुपयुक्त है। कम्प्युटर इंजिनियर ने इन पुराने लैपटॉप की कीमत (ठीक से याद नहीं) शायद 1200/- या 1300/- रूपये प्रति लैपटॉप आँकी थी। विभाग प्रमुख ने अपनी  सिफ़ारिश मे ये भी लिखा कि तकनीकि विशेषज्ञ द्वारा निर्धारित कीमत पर विभाग के स्टाफ सदस्य उन लैपटॉप को क्रय करने के इक्षुक है। अतः उक्त प्राचीन लैपटॉप को निर्धारित कीमत पर इक्षुक स्टाफ सदस्यों को क्रय कर देने हेतु सहमति प्रदान करे। आवश्यक औपचारिकताओं के बाद उच्च प्रबंधन से लैपटॉप को स्टाफ सदस्यों के बीच बिक्रय की अनुमति हमारे कार्यालय को प्राप्त हो गई। इस आशय का पत्र पढ़ मेरे सहित अन्य स्टाफ भी पुराना लैपटॉप लेने को आतुर हो गये क्योंकि उन दिनों लैपटॉप की भारी कीमत हुआ करती थी।

सभी स्टाफ सदस्य  इंतजार करने लगे कि इस प्रक्रिया मे आवश्यक धनराशि जमा कर कैसे शामिल हों? इसी बीच विभाग प्रमुख द्वारा उक्त  पाँच-छः लेपटोपों की कुल रकम परिसर मे स्थित शाखा के  समुचित मद मे जमा करा दी गई। तब भी हम स्टाफ सदस्य यही सोचते रहे और  इंतज़ार करते रहे कि शायद लैपटॉप क्रय करने के इक्षुक स्टाफ से अलग अलग धनराशि एकत्र कर लैपटॉप के  वितरण पर चर्चा पश्चात एकाध लेपटोप कार्यालय प्रमुख रख शेष  लेपटोप  स्टाफ के सदस्यों को दे दिये  जायेंगे। मै भी एक "लेपटोप" क्रय करने का इक्क्षुक था।  पर इंतज़ार के धैर्य की सीमा शाम के समाप्त हो गई जब बगैर किसी चर्चा के  अधीनस्थ  स्टाफ द्वारा उक्त सारे पुराने लैपटॉप को साहब की कार मे रखवा दिये  गये और हम सभी स्टाफ परिस्थितिजन्य कारणों और कार्यालय की गंदी राजनीति के चलते विभाग प्रमुख के मदांध व्यवहार के फलस्वरूप मुँह टापते रह गये। उस दिन मेरे सहित सारा स्टाफ  स्व॰ कवि  नीरज की उन पंक्तियों को याद कर मन मसोस कर रह गये कि :-

  "और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे।"                                          "कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे।" 

विजय सहगल   

   

शनिवार, 5 जून 2021

विनाश काले विपरीत बुद्धि

 

"विनाश काले विपरीत बुद्धि"

 





"उधौ, मन न भए दस बीस"।
"एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस"॥

भक्त कवि सूरदास जी की उक्त पंक्तियाँ ओलम्पियन कुश्ती पहलवान सुशील कुमार पर पूर्णतः सही और माकूल बैठती है। जिसके अनुसार, गोपियाँ, अपने मन को  कृष्ण के विरह मे खोये रहने के कारण उलाहना दे, कहती है,

"उधौ"! मन तो हमारा एक ही है, दस बीस मन तो हैं नहीं, कि एक को किसी मे लगा दे और दूसरे को किसी और मे.........

अंतर्राष्ट्रीय कुश्ती पहलवान सुशील कुमार भी अगर अनेकों मन के मालिक होते तो एक मन से अपनी प्रसिद्धि, कीर्ति और यश को सम्हालने दूसरे से असामाजिक तत्वों के सरगनाओं और माफियायों  से मिलके अपनी ताकत और  शौर्य का प्रदर्शन लोगो की  पिटाई और हिंसा से  पैसा बसूली कर डॉन बनने की कोशिश करते। लेकिन हा! दुर्भाग्य और दुर्योग मन तो एक ही था जो अनैतिक, अवैधनिक और पतित कार्यों मे लिप्त था फिर ऐसे मे सदाचार और नैतिक संस्कारों की उम्मीद कैसे की जा सकती थी।    

वो विरले लोग ही होते है जिन्हे देश की तरफ से ओलम्पिक या एशियाड मे खेलने का शुभ संयोग मिलता है और वे तो और भी सौभाग्यशाली व्यक्तित्व है जिन्हे इन अंतरराष्ट्रिय खेल समारोह मे सफलता हांसिल होती है। पहलवान सुशील कुमार उन दुर्लभतम व्यक्तियों मे थे जिन्होंने न केवल कुश्ती खेल मे तमाम राष्ट्रीय और अंतर राष्ट्रीय पदक जीते अपितु खेल की दुनियाँ की सर्वोच्च प्रीतियोगता ओलम्पिक मे भी दो पदक जीत कर भारत देश का गौरव बढ़ाया। कॉमन वेल्थ खेलों मे स्वर्ण पदक,  कुश्ती मे विश्व चैंपियन एवं एशियाड खेल मे भी कुश्ती मे भारत का नाम रोशन कर सर्वोपरि सफलता पायी। ये सौभाग्य चंद भाग्यशाली व्यक्तियों के नसीब मे होता है सुशील कुमार उनमे से एक सर्वोत्तम उदाहरण थे। इन्ही सफलताओं के आधार पर भारत सरकार ने उन्हे अर्जुन खेल रत्न पुरस्कार एवं पदम्श्री सम्मान से सम्मानित किया था।

ऐसा कम ही देखने को मिलता है जब एक साधारण परिवार की पृष्ठभूमि मे पले-बड़े व्यक्ति को ईश्वर की दैवीय कृपा एवं विशेष अनुग्रह अपनी मेहनत, परिश्रम और लगन के बल पर कुश्ती खेल की दुनियाँ के सर्वोच सम्मान और पुरुस्कारों से नाबाजा गया हो। जीवन मे अनेक सफलताओं और सम्मानों के साथ मात्र एक  धैर्य और सहनशीलता के गुण के अभाव ने आज उस सफल कुश्ती बाज पहलवान को अपने साथी पहलवान की हत्या के मामले मे असफलता की निम्नतम सीढ़ी पर ला खड़ा कर दिया। पहलवानी से मिली अपनी ताकत के अहंकार मे वे ये भूल गये कि देश का कानून हर व्यक्ति के लिये समान होता है फिर वह चाहे कुश्ती के  खेल की दुनियाँ का सूर्य के सदृश्य चमकने वाला  दैदीप्यमान तारा सुशील कुमार  हो या एक आम साधारण नागरिक। जिस देश की जनता ने उनको गौरव और सम्मान देकर, पलक पाउणे बिछाकर अपने सिर आँखों पर बैठाया था लेकिन दुर्भाग्य सुशील कुमार इस गौरव, सम्मान और सफलता को बनाये न रख सके।  सुशील कुमार को मिली ये यश, कीर्ति, गौरव और  प्रतिष्ठा को एक साथी पहलवान की हत्या मे शामिल होने के कारण एक सेकंड मे आसमान से जमीन पर  ला पटका। जो पहलवान अपने शारीरिक सौष्ठव और कौशल के बल पर पेचीदा दाँव लगा  विरोधी पहलवान को चित्त कर धूल चटा देता था आज कुश्ती का कोई भी दाँव पेंच उन्हे अपने ही साथी पहलवान की हत्या के केस  से न बचा सका। बड़ी मेहनत और यतन से प्राप्त सम्मान, यश, कीर्ति काम न आयी  और चंद मिनटों मे कानूनी दाँव पेंच ने न केवल उन्हे परास्त कर धूल धूसरित कर दिया अपितु जेल के सींखचों के पीछे ला दिया।

कुश्ती पहलवान सुशील कुमार अपनी संगत-सौवत के कारण अपनी स्थिति को कायम न रख सके। खेलों मे पायी सफलता ने उन्हे जिस क्षत्रसाल स्टेडियम का निदेशक बनाया था,  शारीरिक ताकत और बल के मद मे चूर उन्होने उस स्टेडियम को सामान्य जनों के उत्पीढन का अड्डा बना डाला जिसका संचालन और समन्वयन गुंडों और सरगनाओं के हाथ मे था। एक विश्व प्रिसद्ध खिलाड़ी जुर्म, अपराध और गुनाह की दुनियाँ का बादशाह बन गया।

जिस धन दौलत को कमाने के लिए सुशील कुमार ने अपराधियों का साथ लिया वे भूल गये कि जो सोहरत, प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा उन्होने अपनी मेहनत और खेल कौशल से अर्जित की थी उसे दुनियाँ की सारी दौलत पा कर भी नहीं प्राप्त किया जा सकता था। दुनिया सहित देश की हर आम और खास जनता ने ओलिम्पिक सहित अन्य खेल प्रतियोगिता मे मिली सफलता के कारण उन्हे अपनी सिर आँखों पे बैठाया था। देश के प्रथम नागरिक  माननीय राष्ट्रपति महोदय, प्रधानमंत्री और देश की अन्य राजनैतिक हस्तियों का वरद शुभस्थ उन पर था।  अलग अलग क्षेत्रों के गणमान्य व्यक्तियों ने उनकी खेलों मे मिली सफलता को सराहा था एवं जो लोग उनके साथ खड़े होने पर अपने को गौरवान्वित समझते थे तब  देश के आम नागरिक उनके लिए क्या सम्मान रखते होंगे इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।  ऐसा  पद प्रतिष्ठा, यश और गौरव विरले लोगो के मुकद्दर मे ही होता है, सुशील कुमार उन खुश नसीब लोगो मे थे। पर हा!! दुर्भाग्य मात्र एक अपराध मे शामिल होने के कारण अब कदाचित ही कोई गणमान्य या साधारण नागरिक उनके साथ खड़े होने या मिलने मे अपने सौभाग्य को सराहेगा।  

सुशील कुमार ने कुश्ती और पहलवानी के दांव-पेंच के साथ कुछ नैतिक शिक्षाओं और संस्कृति के भी दांव सीखे होते या उनके गुरु ने कुश्ती मे प्राप्त सफलता को धैर्य, सहनशीलता और आत्मसंयम  से ईश्वरीय उपहार के रूप मे स्वीकारने की शिक्षा दी होती तो शायद वे अपने पथ  से न भटकते।

सफलता को सहजता से स्वीकारने की कला के अभाव के कारण ही हमारे ऋषि महात्माओं ने  "विनाश काले विपरीत बुद्धि" के नीति वचन को उद्धृत किया था। विश्व प्रसिद्ध कुश्ती पहलवान सुशील कुमार खेलों की दुनियाँ से प्राप्त सफलता, यश और गौरव को अक्षुण्ण बनाए रखने मे कामयाब न रख सके और "विनाश काले विपरीत बुद्धि" के नीति वचन के तहत खेलों की दुनियाँ से अर्जित पराक्रम, शूर-वीरता और बहादुरी  को चंद मिनटों मे ही गंवा बैठे।  

विजय सहगल