शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

गैर निष्पादित परिसंपत्तियाँ

 

"गैर निष्पादित परिसंपत्तियाँ"



मैंने दिल्ली को पदस्थपना या निवास हेतु अपनी प्राथमिकता सूची मे सबसे आखिरी पायदान पर  रखा था। दिल्ली की भीड़भाड़, बेदिल लोग और प्रदूषण की पराकाष्ठा ने हमे यहाँ रहने या वसने के लिये  कभी आकर्षित नहीं किया। पर 2015 मे प्रादेशिक निरीक्षणालय नई दिल्ली की  पदस्थपना से मै बहुत ज्यादा प्रसन्न तो नहीं था पर नौकरी तो नौकरी थी, बैंक का आदेश सिरोधर्य मान मैंने कार्य ग्रहण किया। दिल के किसी  कोने मे थोड़ी बहुत तसल्ली इस बात की थी कि हम जैसे गाँव, कस्वे मे पले  बढे   व्यक्ति  अपनी प्रौढ़ अवस्था मे चका-चौंध वाले दुनियाँ मे प्रसिद्ध कॉनाट प्लेस के हृदय स्थल  जैसे  स्थान पर कार्यरत है।

सेवानिव्रत्ति तक का लगभग तीन साल का दिल्ली प्रवास, कुछ खट्टे मीठे अनुभव मिश्रित रहा, पर देश की राजधानी दिल्ली की अच्छी बुरी कार्य संस्कृति से मेरा परिचय बखूबी हुआ और एक नई कार्य पद्धति को जानने समझने का मौका मिला। इसमे कोई भी संशय नहीं कि आर्थिक रूप से विकसित इस शहर मे बैंकिंग व्यवसाय की असीमित संभावनायेँ इस क्षेत्र मे है जिसका लाभ जहां एक ओर बैंक के व्यवसायगत पक्ष को मजबूत करता है वही दूसरी ओर यहाँ कार्यरत स्टाफ को प्रोन्नति के अनेक अवसरों को भी खोलता है। यदि आपकी तारतम्यता या संवाद  उच्च अधिकारियों से अच्छे से बैठ जाये? तो उच्च और उच्चतम अधिकारियों के संपर्क एवं सानिध्य का लाभ भी गाहे बगाहे यहाँ पदस्थ स्टाफ विशेष कर अधिकारी स्टाफ  को अनेकों बार प्रोन्नति मे स्वाभाविक रूप से सहायक रहा है।  दिल्ली एवं महानगरों मे पदस्थ स्टाफ के मुक़ाबले देश के छोटे और पिछड़े क्षेत्र मे पदस्थ स्टाफ को अपनी कड़ी मेहनत और समर्पण के बावजूद उच्च अधिकारियों के संपर्कों और स्वाभाविक रूप से महानगरों के आर्थिक विकास के अवसरों  के लाभ से वंचित रहना पड़ता है जिससे प्रायः छोटे शहरों मे पदस्थ स्टाफ को प्रोन्नति के अवसरों मे भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। इस असमानता को मैंने अपने दिल्ली कार्यकाल मे नजदीक से देखा और महसूस किया।

एक बड़े आश्चर्य की बात मैंने कार्यालय मे देखी।  एक मुख्य प्रबन्धक पदासीन आकर्षक व्यक्तित्व  जो सुबह-शाम  समय-वेसमय कार्यालय मे अमिताभ बच्चन स्टाइल मे आते। अपनी टेबल कुर्सी पर करीने से विभिन्न दबाइयों को सजा कर नुमाइश लगाते। अधिवार्षिकी के नजदीक पैर मे नसों की खिचाब होने के कारण धीरे-धीरे महानायक की स्टाइल मे चलते। उनकी चलने की स्टाइल पर कुर्बान होने का दिल करता। दिल मे आता अपने पैर को तोड़ कर उनकी चलने की अदा को अपना ले!! पर महानायकों की अदा सबके नसीब मे कहाँ?

उनकी टेबल पर फोन, कम्प्युटर, टेलीफ़ोन, प्रिंटर सब अपनी जगह चुस्त और दुरुस्त। क्या मजाल कहीं कोई कमी बेशी हो। जरा भी साफ सफाई मे कमी होती तो अशोक को बुला सफाई कराते। तत्पश्चात नीचे या कैंटीन मे नाश्ते चाय का आदेश हो जाता। तुर्रा ये कि कार्यालय का काम हो या न हो पर एक सबस्टाफ उनकी सेवा मे चाहिये ही!! ये सब करते कराते ग्यारह साढ़े ग्यारह बज जाता।  रजिस्टर मे उपस्थिती दर्ज कर कॉनाट प्लेस की हर फ्लोर पर स्टाफ से  मिलना जुलना होता। कुछ चर्चा आदि के बाद दोपहर के भोजन का समय हो जाता। लंच मे चार खंड का टिफिन प्लेट, चम्मच आदि उनकी टेबल पर लग जाती। किसी नवागंतुक स्टाफ के प्रथम परिचय मे खुले दिल से स्वागत सत्कार कर आवभगत कर "प्रथम-प्रभाव" डालने मे उन्हे महारथ हासिल थी।  

एक-डेढ़ बजे लंच से फ्री हो यहाँ वहाँ फोन आदि पर जनसम्पर्क। तत्पश्चात जनसुनवाई एवं दिनभर के कार्यकलापों पर उपसंहार पश्चात शाम की चाय पर चर्चा और इस तरह  कार्यालय मे कार्य की समाप्ती की घोषणा। टेबल पर पड़े समान को सलीके से बंद करना उनकी नित्य की दिनचर्या मे समाहित था। इस तरह बैंक के एक कार्य दिवस का अवसान अर्थात दिहाड़ी पक्की। उपस्थिती रजिस्टर मे हस्ताक्षर के बाद शायद ही पेन अगले दिन की उपस्थिती दर्ज़ करने के पूर्व खुले। छुट्टी का कोई समुचित रेकॉर्ड नहीं। लीव लगाना न लगाना उनकी मर्जी पर था।  उक्त आकर्षक व्यक्तित्व मुख्य प्रबन्धक, का ये रूटीन विना किसी विशेष फेर-बदल के उनके सेवानिवृत्ति तक जारी रहा।

जानकार हैरानी होती है देश की राजधानी मे स्थित पूर्व प्रधान कार्यालय परिसर मे एक मुख्य प्रबन्धक पदासीन अधिकारी की दिनचर्या लगभग एक वर्ष मैंने ऐसी ही देखी।  इसके पूर्व के कार्यकाल के कार्यकलापों  का हमे कोई ज्ञान नहीं। लेकिन इस लगभग  एक साल के कार्यकाल के आधार पर विद्वजनों को उनके भूतकाल के कार्यकलापों का अनुमान लगाने मे किंचित भी कठिनाई नहीं होनी चाहिये? सवाल ये नहीं कि हर व्यक्ति मे कार्य के प्रति ज़िम्मेदारी के दायित्व का बोध हो या ये भी नहीं कि कोई व्यक्ति का कार्यव्यवहार अचानक एक दिन मे बदला हो, निश्चित ही ऐसे व्यक्ति पूर्व मे भी अपने ऐसे आचरण के लिये सुविख्यात रहे होंगे? अफसोस इस बात का है कि इस तरह के लोग लगातार स्केल वन से स्केल फोर तक पहुंचे कैसे??  क्या उच्च अधिकारियों ने परितोषित के रूप मे ऐसे व्यक्ति को प्रत्येक स्केल मे  प्रोन्नति दे अपने अधिकारों का दुर्पयोग नहीं किया? या संबन्धित अधिकारियों ने हर स्केल पर  एक अधिक योग्य व्यक्ति/अधिकारी को प्रोन्नति के अधिकार  से वंचित कर उसके प्रति अन्याय और अपराध नहीं किया??  क्या कुशल श्रेष्ठ जनों को इस अन्याय और अपराध के विषय मे चिंतन मनन नहीं करना चाहिये?? क्या ऐसे कृत्य बैंक के समामेलन और बैंक को इतिहास के काल खंड का हिस्सा बनाने के लिये दोषी नहीं है?? क्या इन  सारे पहलूँओं पर चिंतन मनन की आवश्यकता नहीं होनी चाहिये? आइये मंथन करें।

विजय सहगल        

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

Kam mat
karo Kam ka dhikhwa karo