"देवदूतों
का प्रातः भ्रमण"
मै जितने दिनों ग्वालियर प्रवास पर रहा,
नियमित रूप से प्रातः भ्रमण के लिये
ग्वालियर वासियों को अमूल्य व वेशकीमती,
प्रकृतिक रूप से परिपूर्ण धरोहर, शारदा बाल ग्राम
की पहाड़ियों पर सैर के लिये अवश्य जाता। पगडंडी के रास्ते उबढ़-खाबड़ मार्ग से उपर
पहाड़ी पर चढ़ना किसी जंगल ट्रेक्किग या "पर्वतारोहण"
से कम नहीं लगता। इस आरोहण मे व्यय होने
वाली ऊर्जा आपको एक निपुण पर्वतारोही का अहसास करा देती है। "चोटी विजय"
के साथ "देवालयों के देव दर्शन" का लाभ आपको "प्रसन्नचित
भावों" से भर देता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति मे व्यय हुई ऊर्जा को जब
आप मंदिरों के सामने बनी सीमेंट की बेंचों
पर कुछ क्षण के विश्राम के लिये बैठते है तो सारी थकावट कहाँ तिरोहित हो जाती पता
भी नहीं चलता। इस विश्रांति से मिलने बाले
सुख, आनंद और सौभाग्य की कल्पना ही की जा सकती
है। पहाड़ी से चारों तरफ दिखने बाले नयनभिराम प्राकृतिक दृश्यों,
चहचहाते पक्षियों का कलरव, मोरों का प्रणय नृत्य
घने जंगलों का अहसास कराते वृक्षों झड़ियों
और उनके बीच सूर्योदय के दर्शन एक सुखद और सुन्दर
अहसास कराते है (देखे मेरा ब्लॉग- https://sahgalvk.blogspot.com/2019/10/blog-post_30.html)।
चित्र १.
रामकृष्ण
आश्रम द्वारा संरक्षित और सुरक्षित इस पहाड़ी मे आश्रम द्वारा विध्यालय के संचालन
के साथ समाज के निराश्रित बालक बालिकाओं
के शिक्षा एवं आवास, सघन वृक्षा रोपण,
गौ पालन, सहित अन्य अनेक
गतिविधियों का संचालन किया जाता है। लगभग डेढ़-दो किमी लंबी इस पहाड़ी पर आश्रम के
संचालकों द्वार सघन वृक्षा रोपण अभियान चलाया गया है। इस सद् कार्य मे अनेक समाज
सेवी एवं श्रम सेवी सहयोग कर रहे है।
ग्वालियर स्थित शारदा बाल ग्राम की पहाड़ी मे जब आप प्रातः भ्रमण के लिये जायेंगे तो पहाड़ी पर यूं तो सैकड़ों लोग घूमते दिखेंगे पर उनके कृत कर्मों के आधार पर उक्त भ्रमणकारियों को तीन भागों मे विभक्त किया जा सकता है। एक तो अधिकतर हम जैसे लोग जो अपने स्वस्थ के प्रति सजग है पर शारदा बालग्राम के पर्यावरण आदि के विकास मे योगदान शून्य है। दूसरे वे लोग जो अपने स्वस्थ के प्रति जागरूक है पर बालग्राम की पहाड़ी के पर्यावरण मे छोटे छोटे नीम के शैशव अवस्था के पेड़ से दातौन एवं नीम की नरम कोपल का भक्षण कर वृक्ष हत्या का पाप करते है और वेलपत्री एवं बालग्राम के फलफूल की चोरी कर भगवान को अर्पित करते है कदाचित ही भगवान ऐसे अधम लोगो द्वारा चोरी के फूल और पत्तों को स्वीकार करता होगा?? ऐसे लोगो का बालग्राम की पहाड़ी के पर्यावरण विकास मे नकारात्मक योगदान है। एक अन्य दुर्लभतर तीसरे श्रेणी के लोग जो बहुत कम संख्या मे प्रातः भ्रमण के लिये मिलेंगे जो न केवल अपने स्वस्थ के प्रति सजग और जागरूक है बल्कि दूसरों एवं आने वाली पीढ़ियों के भी स्वास्थ एवं पृथ्वी के पर्यावरण के प्रति भी सजग और जागरूक है। ऐसे देवदूतों की पहचान प्रातः भ्रमण कारी मनुष्यों मे बड़ी सहजता और सरलता से की जा सकती है। ऐसे परोपकारी, लोकोपकारी व्यक्तियों को भ्रमण के साथ साथ प्लास्टिक के छोटे बड़े डिब्बों से या पोलिथीन की थैली मे पानी लिये पेड़, पौधों को पानी देते देखा जा सकता है (चित्र 2 एवं 3)। ये लोग बृक्षारोपण के बाद पेड़ के संरक्षण और पोषण कर बड़ा करने के कार्य मे जी जान से जुड़े है। पानी देने वालों मे हर उम्र और वर्ग के लोग इस सद कार्य मे सहभागी हो पेड़ों की सुरक्षा एवं संरक्षा मे लगे है ताकि आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध एवं स्वच्छ पर्यावरण उपलब्ध कराया जा सके। इनको देख कर मै सोचने को मजबूर हुआ कि पौधो को पानी दे बड़ा करने का विचार हम जैसे अन्य अनेकों भ्रमण पर आये लोगो के मन मे क्यों कर नहीं आया? इनमे से कुछ लोगो का परिचय मै चंदे दिनों के भ्रमण मे पा सका उनमे श्री वर्मा (सेवानिवृत अधिकारी एजी ऑफिस, श्री कुशवाह (सेवानिवृत्त जिला जज), श्री राजावत जैसे वरिष्ठ एवं श्री दीपक वेदी जैसे युवा और सूरज, हरेन्द्र, नवीन, यादव जैसे किशोर भी है। ऐसे अन्य अनेक लोग जो भ्रमण के साथ शारदा बालग्राम की पहाड़ी को हरभरा बनाने के प्रयास मे रत है और जिनसे मै परिचय प्राप्त न कर सका वृक्षों के पोषण और पालन के वृहद उद्देश्य की प्राप्ति के लिये प्रयासरत है। इन जैसे अनेकों अनाम बुजुर्ग, युवा, किशोर और बच्चों जो पहाड़ी पर रोपित हजारों पौधों को वृक्षों बनाने के भागीरथी प्रयास मे संलग्न है उनके इस विचार और मूर्तरूप प्रयास के कारण ही मै इन महानुभावों को "देवदूत" के नाम से संबोधित करने के लिये बाध्य हूँ।
बगैर किसी पद प्रतिष्ठा की परवाह किए विना किसी झिझक, हिचकिचाहट और संकोच के, "कि लोग क्या कहेंगे"? या "कि क्या सोचेंगे"? के ये सच्चे निष्काम कर्मयोगी बिना किसी स्वार्थ और ख्याति की अपेक्षा के पानी के डिब्बों मे पानी ले पूरी पहाड़ी पर फैले पौधों को पानी देते नज़र आएंगे।
इन फरिश्तों द्वारा पौधों को पानी के साथ ही उपलब्ध अधिकतम संसाधनों के उपयोग से उन पौधों की जानवरों से सुरक्षा के प्रयास देख मै हतप्रभ था। कुछ लोग छोटे छोटे पौधों की रक्षा लोहे की जाली के साथ ही उसके उपर आड़ी-तिरक्षी लकड़ियाँ बांध कर करते दिखे, कुछ ने बबूल के काँटों भरी टहनी से ढँक एवं छोटे बड़े पत्थरों से मजबूत बाउंड्री बना कर पौधों की रक्षा के प्रयास किए एवं ऊंचे पौधों को लकड़ी के डंडों पर लोहे की जाली से ऊंचा उठा पेड़ों की जानवरों से रक्षा के उनके ये प्रयास वंदनीय एवं प्रशंसनीय है (चित्र-4)। पिछले एकाध हफ्ते के भ्रमण के दौरान मैंने संपर्क मे आये ऐसे प्रत्येक फरिश्ते को उनके उक्त परमार्थ कार्य की प्रशंसा कर उनको नमन किया। पर मनुष्यरूपी आदमखोर जो नीम जैसे शैशव अवस्था के पेड़ों से दातौन और नरम कोपलों के भक्षण कर असमय कालकवलित होते देख दुःख और वेदना से भर जाता हूँ?
इसमे से कुछ लोगो की तस्वीर तो मैंने बगैर उनकी जानकारी के स्वतः ही ली है पर किशोरों के एक समूह को जो बगैर किसी प्रत्याशा के अपने कार्य मे रत थे मेरे आग्रह पर ही समूह मे फोटो देने पर तैयार हुए। हरेन्द्र, सूरज और उनके टीम मेम्बर्स की फोटो लेते समय पर्यावरण के प्रति उन किशोरों की निष्ठा और समर्पण, विचार और परवारिक संस्कारों के प्रति मै श्रद्धा सम्मान के भाव के साथ नमन करता हूँ।
जिनसे मैंने परिचय प्राप्त किया था उन कुछ लोगो के नाम और पद, प्रथिष्ठिता को छोड़ भी दे तो इनमे से अधिकांश कौन है? और क्या करते है?, कहाँ रहते है? मै नहीं जनता। क्या इनकी आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक पृष्टभूमि है? ये भी नहीं जानता। जहां तक इन वीर पुरुषों की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक पृष्ठ भूमि की बात है तो कृश काय एवं साधारण दिखने वाले इन लोगो का पृथ्वी को पेड़ पौधों से अलंकृत कर उसका श्रंगार कर आने वाली पीढ़ियों को परिष्कृत वातावरण उपलब्ध कराना किसी धन-कुबेर के ही बूते की बात होगी। कदाचित ही फोर्बस पत्रिका मे प्रकाशित धनी मानी व्यक्तियों की सूची के नाम भी इन पर्यावरण प्रेमी परोपकार व्यक्तियों से ज्यादा सम्पन्न होंगे? तमाम महानायकों और देश के सर्वोच्च उद्धयोग साम्राज्य के स्वामी भी अपने आचरण से समाज को जो राह न दिखा सके इन वृक्षों के संरक्षकों ने अपने कठिन परिश्रम और सीमित साधनों के बावजूद अपनी एकनिष्ठ लगन और दृढ़संकल्प से पौधो को रोप वृक्ष बनाने के संकल्प से जो राह दिखाई वो अतुलनीय है। ये सच्चे निष्काम कर्मयोगी की तरह पर्यावरण के विकास के अपने सद् कार्य मे व्यस्त थे पर मैंने ही आगे बढ़ उनके कार्य मे क्षणिक व्यवधान डाल उनसे उनके वृक्षा रोपण रूपी श्रेष्ठ कार्यों की देश और समाज की आने वाली पीढ़ियों के सुखद भविष्य के लिए उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट किया था।
इस शानदार पहाड़ी पर पेड़ों के झुरमुटे से आपको कोयल की कूक, मोरों का प्रणय नृत्य, तोतों की टांय-टांय एवं अनेक पक्षियों की सुरीली तानों की बीच ही आपको पौधों को पानी देते प्रौढ़, युवा एवं किशोर निश्चल और निष्काम कर्मयोगी टूटे फूटे प्लास्टिक डिब्बों मे सौ-डेढ़ सौ मीटर दूर से पानी ला-लाकर पेड़ों कि सिंचाई करते मिलेंगे। श्रीमद्भगवत गीता के मूल आधार "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" मे निष्ठा और विश्वास करने वाले, बगैर किसी निजी स्वार्थ के परोपकार की ईक्षा रखने वाले ये सच्चे "निष्काम कर्म योगी" है और मानव सेवा करना ही इनका कार्य है!
आज "एक वृक्ष दस पुत्र समान" जैसे सद्वाक्य जब स्वार्थी राजनैतिज्ञों एवं व्हाट्सप्प यूनिवर्सटी के प्रवीण छात्रों द्वारा सृजित छद्म नारों और "मुट्ठी से फिसलती रेत" के संकल्पों और शिक्षाओं से तो पर्यावरण, वृक्षों, पेड़ों का विकास तो संभव होने से रहा? पर जैसे प्राचीन काल मे ऋषि दधीच का आत्माहुति दे अस्थियों से बज्र का निर्माण का उदाहरण दिया था आज शारदा बालग्राम की पहाड़ियों पर इन प्रकृति एवं पर्यावरण प्रेमी "देवदूतों" द्वारा वही उदाहरण अपने जीवंत आचरण से दिया जा रहा है तब उससे बड़ी शिक्षा क्या होगी? इन देवदूतों के इस सद्प्रयास को मै नमन करता हूँ।
विजय सहगल





3 टिप्पणियां:
आपके ऐसे लेखों से दूसरों को भी शुभ कार्य करने की प्रेरणा मिलती है
सच्ची घटनाओं पर आधारित संवेदनशील व प्रेरणास्पद वृतांत
आज प्रातः भ्रमण पर एक मजेदार घटना घटी। मैंने एक दुबली काया के एक सज्जन को एक प्लास्टिक के डिब्बे से पौधों मे पानी देते दिखे, अपने स्वभाव अनुसार मैंने उन सज्जन द्वारा उनके पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षा के कार्य की प्रशंसा की जिसे उन्होने सविनय अपना कर्तव्य बताया। उन्होने बताया काफी लोग इस सद्कार्य मे इस पहाड़ी पर अपना योगदान दे रहे है। मैंने उनसे सहमति दर्शाते कहा हाँ पिछले दस दिन से मै आप जैसे सज्जन लोगो से मिल रहा हूँ। मुझे कई लोगो से मिलने का सौभाग्य मिला, कुछ लोगो के नाम जैसे वर्मा जी, एजी ऑफिस के अधिकारी और एक सेवानिवृत्त जिला जज, श्री कुशवाह जी का भी नाम सुना है। इतना सुनते ही उन्होने बताया मै ही कुशवाह, रिटायर्ड जिला जज हूँ । मुझे सुनकर हार्दिक आश्चर्य और प्रसन्नता हुई, बड़ा सुखद आश्चर्य था। फिर काफी देर तक उनसे चर्चा हुई। मै मुझे आश्चर्य था कैसे एक व्यक्ति इतने बड़े पद प्रतिष्ठा के मुखैटे को उतार पर्यावरण के इस महान काम मे रात हो डिब्बा उठाए पहाड़ी पर जगह जगह पेड़ो को पानी दे रहा है। धन्य है इन जैसे देवदूत जिन्हे मै नमन करता हूँ।
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